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Wednesday, March 27, 2019

भगवान श्री कृष्ण का संदेश | Shri Krishna Story in Hindi


श्री कृष्ण का पूरा जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन की हर एक घटना एक महत्वपूर्ण सन्देश देती है, चाहे बचपन की रास लीला हो या गीता का ज्ञान या फिर महाभारत का युद्ध, भगवान श्री कृष्ण के जीवन का हर एक पल मानव जाति के लिए एक शिक्षा है।
यूँ तो महाभारत की पूरी कथा हम सभी जानते हैं और किताबों में काफी पढ़ भी चुके हैं, इसके आलावा टीवी पर भी अक्सर आप लोग महाभारत देख चुके होंगे। महाभारत के युद्ध की एक घटना है जो मुझे बहुत ज्यादा प्रेरित करती है और मुझे उम्मीद है आप लोग भी इसे काफी एन्जॉय करेंगे और हाँ, कहानी को केवल पढ़ के मत छोड़ देना क्यूंकि इससे मिलने वाला सन्देश आपका जीवन बदल सकता है।
श्री कृष्णा और भीष्म पितामह वार्तालाप –
श्री कृष्ण ने अपनी पूरी सेना दुर्योधन को सौंप दी थी और स्वयं पाण्डवों की तरफ से युद्ध का आगाज कर रहे थे। भगवान कृष्ण ने अर्जुन से वादा किया था कि वह युद्ध में हथियार नहीं उठाएँगे और निहत्थे ही पाण्डवों को विजयी बनायेंगे।
युद्ध के नौवें दिन कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह में चारों तरफ कहर बरपा रखा था। वो अकेले ही पूरी पांडव सेना पर भारी पड़ रहे थे। भीष्म पितामह अपने वचन और प्रतिज्ञा पर अडिग रहने के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि जो प्रतिज्ञा उन्होंने की है उसे प्राण देकर भी निभाना है। एक तरफ श्री कृष्ण अपने निहत्थे रहने के वचन से बंधे थे लेकिन वहीं भीष्म पितामह पांडव सेना पर आग उगल रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कुछ क्षण में ही भीष्म पांडवों को हरा देंगे।
श्री कृष्ण शांति पूर्वक सब कुछ देख रहे थे वो जानते थे कि अर्जुन भीष्म का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन उन्होंने अर्जुन से वादा किया था कि वह पांडवों को ही विजयी बनाएंगे। वहीँ महाबलशाली भीष्म पांडवों का तहस नहस करने में लगे थे, यही सोचकर श्री कृष्ण ने भीष्म पितामह को रोकने के लिए रथ का पहिया उठा लिया। लेकिन भीष्म जानते थे कि श्री कृष्ण भगवान हैं इसीलिए उन्होने मुस्कुराते हुए अपने धनुष बाण एक ओर रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
भीष्म पितामह – भगवन आपने तो युद्ध में कोई शस्त्र ना उठाने का वादा किया था, और आप तो भगवान हैं आप अपना वादा कैसे तोड़ सकते हैं।
श्री कृष्ण हे भीष्म, आप तो खुद ज्ञानी हैं। आप कभी अपना वचन या प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते इसीलिए आपका नाम भीष्म पड़ा। लेकिन शायद आप नहीं जानते कि धर्म और सत्य की रक्षा करना, आपकी प्रतिज्ञा से ज्यादा बढ़कर है। आप अपनी प्रतिज्ञा और वचन पर अटल हैं लेकिन अपनी प्रतिज्ञा निभाने के चक्कर में अधर्म का साथ दे रहे हैं। याद रहे, जब जब दुनियाँ में धर्म का नाश होगा तब तब मैं इस धरती पर अधर्म का नाश करने अवतरित होता रहूँगा। तुम एक इंसान होकर अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ पाये और अधर्म का साथ दे रहे हो लेकिन मैं भगवान होकर भी धर्म की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ रहा हूँ। अगर मेरी किसी प्रतिज्ञा या वचन की वजह से धर्म और सत्य पर कोई आंच आती है तो मेरे लिए वो प्रतिज्ञा कोई मायने नहीं रखती है और मैं धर्म के लिए ऐसी हजारों प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए तैयार हूँ। अगर आपके सामने धर्म का नाश हो रहा हो और आप कुछ नहीं कर रहे तो भी आप पाप के भागी हैं|
श्री कृष्ण का ये सन्देश दिल पर बहुत गहरी छाप छोड़ता है। दोस्तों सत्य की रक्षा हमारे हर स्वार्थ, हर वचन और हर मज़बूरी से बढ़ कर है यही इस कहानी की शिक्षा है। – जय श्री कृष्णा
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Source:https://bit.ly/2Wt9cPc

Wednesday, March 13, 2019

कृष्ण जन्म की पौराणिक कथा । Story of Lord Krishna's birth |



देवकी के सातवें गर्भ में अनन्त भगवान शेष पधारे। भगवान के आदेश से योगमाया ने इस गर्भ को आकर्षित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया। यह प्रचार हो गया कि देवकी का गर्भ स्त्रवित हो गया।
जब देवकी के आठवें गर्भ का समय आया तो उनका शरीर ओज से पूर्ण हो गया। कंस को विश्वास हो गया कि इस बार अवश्य ही मुझे मारने वाला विष्णु आया है। इसीलिए कारागार के आसपास पहरेदारों की संख्या बढ़ा दी गयी। भाद्रपद की अँधेरी रात की अष्टमी तिथि थी। शंख, चक्र, गदा, पद्म, वनमाला धारण किए भगवान देवकी-वसुदेव के समक्ष प्रकट हुए। भगवान का दर्शन करके माता देवकी धन्य हो गयीं। पुन: भगवान नन्हें शिशु के रूप में देवकी की गोद में आ गये। पहरेदार सो गए। वसुदेव-देवकी की हथकड़ी-बेड़ी अपने-आप खुल गयीं। भगवान के आदेश से वसुदेव उन्हें गोकुल में यशोदा की गोद में डाल आए और वहाँ से उनकी तत्काल पैदा हुई कन्या ले आए। कन्या को देवकी की शैया पर सुलाते ही हथकड़ी-बेड़ी अपने आप लग गये, कपाट बन्द हो गये और पहरेदारों को चेत आ गया।
कारागार में कन्या के रोने की आवाज़ सुनकर पहरेदारों ने कंस को देवकी के गर्भ से कन्या होने का समाचार दिया। कंस उसी क्षण अति व्याकुल होकर हाथ में नंगी तलवार लेकर बन्दीगृह की ओर दौड़ा। बन्दीगृह पहुँचते ही उसने तत्काल उस कन्या को देवकी के हाथ से छीन लिया। देवकी अति कातर होकर कंस के सामने गिड़गिड़ाने लगी- "हे भाई! तुमने मेरे छः बालकों का वध कर दिया है। इस बार तो कन्या का जन्म हुआ है। तुम्हारे काल की आकाशवाणी तो पुत्र के द्वारा होने की हुई थी। इस कन्या को मत मारो।"
देवकी के रोने गिड़गिड़ाने पर भी दुष्ट कंस का हृदय नहीं पिघला और उसने कन्या को भूमि पर पटक डालने के लिये ज्यों ही ऊपर उछाला कि कन्या उसके हाथ से छूट कर आकाश में उड़ गई। वह आकाश में स्थित होकर अष्टभुजा धारण करके आयुधों से युक्त हो गई और बोली- "रे दुष्ट कंस! तुझे मारने वाला तेरा काल कहीं और उत्पन्न हो चुका है। तू व्यर्थ निर्दोष बालकों की हत्या न कर।" इतना कह कर योगमाया अन्तर्ध्यान हो गईं।
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                                                                                                                                                                                      Source:https://bit.ly/2O4LkOY

Wednesday, February 6, 2019

कृष्ण भगवान की कहानी |

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को मनाया जाता है। अष्टमी तिथि का महत्व इसलिये है क्योंकि वह वास्तविकता के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्वरूपों में सुन्दर संतुलन को दर्शाता है, प्रत्यक्ष भौतिक संसार और अप्रत्यक्ष आध्यात्मिक दायरे।
भगवान श्रीकृष्ण का अष्टमी तिथि के दिन जन्म होना यह दर्शाता है कि वे आध्यात्मिक और सांसारिक दुनिया में पूर्ण रूप से परिपूर्ण थे। वे एक महान शिक्षक और आध्यात्मिक प्रेरणा के अलावा उत्कृष्ट राजनीतिज्ञ भी थे। एक तरफ वे योगेश्वर हैं (वह अवस्था जिसे प्रत्येक योगी हासिल करना चाहता है) और दूसरी ओर वे नटखट चोर भी हैं।
भगवान श्री कृष्ण का सबसे अद्भुत गुण यह है कि वे सभी संतों में सबसे श्रेष्ठ ओर पवित्र होने के बावजूद वे अत्यंत नटखट भी हैं। उनका स्वभाव दो छोरों का सबसे सुन्दर संतुलन है और शायद इसलिये भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व को समझ पाना बहुत ही कठिन है। अवधूत बाहरी दुनिया से अनजान है और सांसारिक पुरुष, राजनीतिज्ञ और एक राजा आध्यात्मिक दुनिया से अनजान है। लेकिन भगवान श्री कृष्ण दोनों द्वारकाधीश और योगेश्वर हैं।
भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा और ज्ञान हाल के समय के लिये सुसंगत हैं क्योंकि वे व्यक्ति को सांसारिक कायाकल्पो में फँसने नहीं देती और संसार से दूर होने भी नहीं देती। वे एक थके हुए और तनावग्रस्त व्यक्तित्व को पुनः प्रज्वलित करते हुये और अधिक केंद्रित और गतिशील बना देती है। भगवान श्री कृष्ण हमें भक्ति की शिक्षा कुशलता के साथ देते हैं। गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाने का अर्थ है कि विरोधाभासी गुणों को लेकिन फिर भी सुसंगत गुणों को अपने जीवन में उतार के या धारण कर के प्रदर्शित करना।
जन्माष्टमी का उत्सव मनाने का सबसे प्रामाणिक तरीका यह है कि आप को यह जान लेना होगा कि आपको दो भूमिकाएं निभानी हैं। यह कि आप इस ग्रह के एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं और उसी समय आपको यह एहसास करना होगा कि आप सभी घटनाओं से परे हैं और एक अछूते ब्रह्म हैं। जन्माष्टमी का उत्सव मनाने का वास्तविक महत्व अपने जीवन में अवधूत के कुछ अंश को धारण करना और जीवन को अधिक गतिशील बनाना होता है।
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Source:https://bit.ly/2GhpXsH

Tuesday, January 29, 2019

जानिये राधे कृष्णा ने क्यों नहीं की थी शादी ।



राधा-कृष्ण के प्रेम की कहानी किसी से छुपी नहीं है. उनके अमर प्रेम का उदाहरण आज भी लोग देते हैं. कृष्ण की राधा के साथ लीलाएं और राधा की कृष्ण के लिए दीवानगी किसी से छुपी नहीं है.
शायद राधा के कृष्ण के लिए प्रेम की वजह से ही राधा का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है. लेकिन इसके बावजूद श्रीकृष्ण ने राधा से शादी नहीं की. लेकिन क्या आप इसकी वजह जानते हैं?
पुुराणों में इसकी वजह बताई गई है. लेकिन इसके कई कारण बताए गए हैं, आज हम आपको बता रहें हैं कि आखिर राधा-कृष्ण ने शादी क्यों नहीं की?

पौराणिक कथाओं की माने तो कृष्ण राधा के प्रेमी होने के साथ-साथ एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे. लेकिन राधा तो केवल कृष्ण की ही दीवानी थी. ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी बचपन से ही शुरू हो गई थी.
आपको बता दें कि राधा उम्र में कृष्ण से बड़ी थीं, लेकिन इसके बाद भी उनके मन में कृष्ण के लिए प्रेम पैदा हुआ.
पुराणों के अनुसार राधा को माता लक्ष्मी का ही स्वरूप माना जाता है. ये बात तो सभी जानते हैं कि कृष्ण भगवान विष्णु जी के ही अवतार थे. हालांकि लक्ष्मी जी ने इस बात का प्रण लिया था कि वो हर अवतार में विष्णु जी की पत्नी बनेंगी.
भगवान विष्णु का उनके अलावा और किसी से विवाह नहीं होगा. अब इस बात को माने तो इस बात की पूरी संभावना हो सकती है कि राधा के रूप में लक्ष्मी जी का विवाह कृष्ण रूप में भगवान विष्णु से हुआ होगा.
गर्ग संहिता की माने तो कृष्ण जब बचपन में नंद बाबा की गोद में खेल रहे थे. तभी उन्हें एक अद्भुत शक्ति का अबसास हुआ जो कोई नहीं बल्कि राधा थीं. वो तुरंत ही बाल अवस्था को छोड़ कर यौवनावस्था में आ गए.
ऐसा माना जाता है कि इसी समय ब्रह्मा जी ने राधा-कृष्ण का विवाह कराया था. विवाह होने के बाद सब कुछ सामान्य हो गया. विवाह के बाद ही ब्रह्मा जी और राधा जी भी अंतरध्यान हो गए और कृष्ण भी अपनी बाल अवस्था में वापस आ गए|


कुछ पौराणिक कथाओं की माना तो राधा और रुक्मणी एक ही थीं. जिस तरह से राधा कृष्ण की दीवानी थीं ठीक वैसे ही रुक्मणी भी कृष्ण को पति के रूप में पाने के सपने देखती थीं. लेकिन रुक्मणी के भाई ने उनका संबंध कहीं और ही कर दिया था.
ये बात जानकर रुक्मणी ने अपने भाई से कहा कि अगर उनका विवाह कृष्ण के अलावा किसी से हुआ तो वो अपने प्राण त्याग देंगी. लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि इस घटना से पहले कृष्ण, रुक्मणी को जानते ही नहीं थे, लेकिन इसके बाद भी वो रुक्मणी से विवाह करने चले गए.
ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के ऐसा करने के पीछे का कारण ये था कि असल में राधा और रुक्मणी एक ही थीं. पौराणिक कथाओं के अनुसार राधा को रुक्मणी का आध्यात्मिक अवतार भी माना जाता है. अब इन कथाओं की माने तो राधा-कृष्ण का विवाह सीधे तौर पर तो नहीं हुआ लेकिन दोनों जीवन भर एक-दूसरे से प्रेम करते रहे|

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                                                                                                                                                                                           Source: https://bit.ly/2BccQoc

Tuesday, January 22, 2019

श्री राधा कृष्ण प्रेम इतना सच्चा क्यों था?


यह सब जानते है , भगवान कृष्ण ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का आग्रह किया। यह भादो (सितंबर के महीने में ), शुक्ल पक्ष की अष्टमी, अनुराधा नक्षत्र का समय था और समय 12 बजे जब राधा रानी इस दुनिया में प्रकट हुई।


श्री राधा जी का जन्मस्थान रावल है, मथुरा शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक छोटा गांव है। ऐसा कहा जाता है कि एक दिन बृषभानु जी एक नदी में स्नान कर रहे था, तभी उन्होंने एक कमल देखा जो कि हजारों पंखुड़ियों वाला था और वह सूर्य के प्रकाश में सुनहरा कमल जैसा दिखता था और जब वह करीब आ गया, तो उन्होंने उस फूल के अंदर एक छोटी बच्ची को देखा और उस बच्ची को उन्होंने भगवान का आशीर्वाद समझ कर ले लिया और उसे अपनी बेटी के रूप में घर ले आये ।
श्री राधा जी ने अपनी आँखें नहीं खोलीं, जब तक कि वह भगवान कृष्ण के सुंदर चेहरे को नहीं देखा। वृषभनु और उनकी पत्नी बहुत परेशान थे और इस धारणा के तहत कि लड़की अंधी थी।

ग्यारह महीनों के बाद, जब अपने परिवार के साथ वृषभनू नंदबाबा को देखने के लिए गोकुल गए तो श्री राधा जी ने अपनी आंखें पहली बार खोली वो भी जब नंदबाबा बाल गोपाल श्री कृष्ण को उनके सामने लाये। अपने स्वामी आकर्षक चेहरे को देखने के लिए राधा रानी ने अपनी अपनी आंखें खोल दीं। वह पहली बार अपनी आँखें खोलने पर श्री कृष्ण जी का चेहरा देखना चाहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अब तक अपनी आंखें नहीं खोली थी।

बरसाने से कुछ किलोमीटर दूर गह्वर वन है यही वो जगह है जहा राधा कृष्णा पहली बार अकेले मिले। जहा उन्होंने कुछ समय साथ में व्यतीत किया। जहा श्री कृष्ण ने राधा रानी के बालों को फूलो से सजाया था।

उनका प्रेम वृंदावन की जमीन पर उग आया जो माना जाता है कि श्री जी का दिल और ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक धन्य भूमि है । उन्होंने यमुना के तट पर महा-रास लीला किया जो को युगो युगो तक नहीं भुलाया जा सकता ये अटूट भक्ति (प्रेम ) का संगम था। लेकिन तब वह समय भी आ गया जब शाप के कारन कृष्णाji को राधा जी से अलग होना पड़ा। उनसे दूर जाना पड़ा। लेकिन वो कहते है ना जिनकी रूह एक दूसरे की रूह में समायी होती है वो अलग कहा होते है। कंस को मारने के लिए श्री कृष्णा को मथुरा जाना पड़ा।
जाने से पहले, श्री कृष्णा जी ने ,श्री राधा जी से अपना वचन लिया को वो उनकी याद में कभी आँसू नहीं बहायेंगी।
श्री राधा जी ने  वादा किया कि वो नहीं रोयेंगी और आँसू नहीं बहाएंगे। श्री राधा जी ने  वादा किया कि वो नहीं रोयेंगी और आँसू नहीं बहाएंगे। कृष्ण ने उससे कहा कि उनका प्यार बिना शर्त का है और हमेशा रहेगा। मैं समय के अंत तक तुम्हारा ऋणी बना रहूँगा और वो हमेशा उनके साथ देखी जाएँगी। मेरे नाम से पहले हर कोई तुम्हारा नाम लेगा।  और हम आज देख सकते हैं कि वृंदावन में लोग या ब्रजवासी कहते है राधे राधे कहो चले आएंगे कृष्णा।

आज वृन्दावन में हर तरफ राधे राधे है। यहां तक कि रिक्शा वाला रास्ता मांगने के लिए रास्ते भी सिर्फ राधे राधे नाम का प्रयोग करते है। वृंदावन में हर घर या वृक्ष पे श्री राधा का नाम लिखा गया है। श्री राधा जी का भक्ति(प्रेम ) और दर्द ऐसा था कि कृष्ण ने उसे एक वरदान दिया कि उनका  नाम श्री कृष्णा जी से पहले लिया जाएगा।

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                                                                                                                                                                         Source:https://bit.ly/2Wd1idb

Wednesday, January 9, 2019

श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी |


एक बार की बात है देवराज इंद्र ब्रज के लोगों से बहुत क्रोधित हुए क्योंकि लोग भगवान कृष्ण की बातों को सुनकर गोवर्धन पर्वत की पूजा कर रहे थे और इंद्र देव की पूजा नहीं कर रहे थे। क्रोधित होकर इंद्र ने उन्हें दंडित करने के लिए घनघोर वर्षा करने के लिए बादलों को भेजा जिसके कारण पूरे वृंदावन में बाढ़ की संभावना उत्पन्न हो जाए। आदेश देते हैं वृंदावन के ऊपर काले मेघों ने अत्यधिक वर्षा करना शुरू कर दिया। अत्यधिक वर्षा और बाढ़ के कारण ज्यादातर लोगों के घर पानी में बह गए।


वृंदावन के लोग डर गए और सभी भगवान कृष्ण की शरण में पहुंचे। भगवान कृष्ण को इस परिस्थिति के बारे में सब कुछ ज्ञात हो चुका था। उसी समय कृष्ण ने पूरे गोवर्धन पर्वत को अपने बाएं हाथ की छोटी उंगली पर एक छतरी की भांति उठा दिया। वृंदावन के सभी लोग और गाय एक-एक करके गोवर्धन पर्वत के नीचे आने लगे और इस प्रकार कृष्ण ने वृंदावन के लोगों की जान बचाई। कृष्ण के इस आलोकित चमत्कार को देखकर सभी वृंदावन के लोग आश्चर्यचकित रह गए। भगवान कृष्ण की शक्ति को देख कर बादल वापस लौट गए और व्रज वासी ख़ुशी से रहने लगे।

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                                                                                                                         Source: https://bit.ly/2QA01Ja

Tuesday, January 9, 2018

कृष्ण-रुक्मिणी विवाह


“कृं कृष्णाय नमः”.


श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं-  इस प्रकार कह-सुनकर सब-के-सब राजा क्रोध से आग बबूला हो उठे और कवच पहनकर अपने-अपने वाहनों पर सवार हो गये। अपनी-अपनी सेना के सात सब धनुष ले-लेकर भगवान श्रीकृष्ण पीछे दौड़े। राजन! जब यदुवंशियों के सेनापतियों ने देखा कि शत्रुदल हम पर चढ़ा आ रहा है, तब उन्होंने भी अपने-अपने धनुष का टंकार किया और घूमकर उनके सामने डट गये। जरासंध की सेना के लोग कोई घोड़े पर, कोई हाथी पर, तो कोई रथ पर चढ़े हुए थे। वे सभी धनुर्वेद के बड़े मर्मज्ञ थे। वे यदुवंशियों पर इस प्रकार बाणों की वर्षा करने लगे, मानो दल-के-दल बादल पहाड़ो पर मूसलधार पानी बरसा रहे हों। परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने देखा कि उनके पति श्रीकृष्ण की सेना बाण-वर्षा से ढक गयी है। तब उन्होंने लज्जा के साथ भयभीत नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखा। भगवान ने हँसकर कहा- "सुन्दरी! डरो मत! तुम्हारी सेना अभी तुम्हारे शत्रुओं की सेना को नष्ट किये डालती है।" इधर गद और संकर्षण आदि यदुवंशी वीर अपने शत्रुओं का पराक्रम और अधिक न सह सके। वे अपने बाणों से शत्रुओं के हाथी, घोड़े तथा रथों को छिन्न-भिन्न करने लगे। उनके बाणों से रथ, घोड़े और हाथियों पर बैठे विपक्षी वीरों के कुण्डल, किरीट और पगड़ियों से सुशोभित करोंड़ों सिर, खड्ग, गदा और धनुषयुक्त हाथ, पहुँचे, जाँघें और पैर कट-कटकर पृथ्वी पर गिरने लगे। इसी प्रकार घोड़े, खच्चर, हाथी, ऊँट, गधे और मनुष्यों के सिर भी कट-कटकर रणभूमि में लोटने लगे। अन्त में विजय की सच्ची आकांक्षा वाले यदुवंशियों ने शत्रुओं की सेना तहस-नहस कर डाली। जरासंध आदि सभी राजा युद्ध से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।

उधर शिशुपाल अपनी भावी पत्नी के छिन जाने के कारण मरणासन्न-सा हो रहा था। न तो उसके हृदय में उत्साह रह गया था और न तो शरीर पर कान्ति। उसका मुँह सूख रहा था। उसके पास जाकर जरासंध कहने लगा- "शिशुपालजी! आप तो एक श्रेष्ठ पुरुष हैं, यह उदासी छोड़ दीजिये। क्योंकि राजन! कोई भी बात सर्वदा अपने मन के अनुकूल ही हो या प्रतिकूल, इस सम्बन्ध में कुछ स्थिरता किसी भी प्राणी के जीवन में नहीं देखी जाती। जैसे कठपुतली बाजीगर की इच्छा के अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवदिच्छा के अधीन रहकर सुख और दुःख के सम्बन्ध में यथा शक्ति चेष्टा करता रहता है। देखिये, श्रीकृष्ण ने मुझे तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेनाओं के साथ सत्रह बार हरा दिया, मैंने केवल एक बार-अठारहवीं बार उन पर विजय प्राप्त की। फिर भी इस बात को लेकर मैं न तो कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्ध के अनूसार काल भगवान ही इस चराचर जगत को झकझोरते रहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि हम लोग बड़े-बड़े वीर सेनापतियों के भी नायक हैं। फिर भी, इस समय श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित यदुवंशियों की थोड़ी-सी सेना ने हमें हरा दिया है। इस बार हमारे शत्रुओं की ही जीत हुई, क्योंकि काल उन्हीं के अनुकूल था। जब काल हमारे दाहिने होगा, तब हम भी उन्हें जीत लेंगे।"

रुक्मिणीजी का बड़ा भाई रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से बहुत द्वेष रखता था। उसको यह बात बिलकुल सहन न हुई कि मेरी बहिन को श्रीकृष्ण हर ले जायँ और राक्षस रीति से बलपूर्वक उसके साथ विवाह करें। रुक्मी बली तो था ही, उसने एक अक्षौहिणी सेना साथ ले ली और श्रीकृष्ण का पीछा किया। महाबाहु रुक्मी क्रोध के मारे जल रहा था। उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियों के सामने यह प्रतिज्ञा की- "मैं आप लोगों के बीच में यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्ध में श्रीकृष्ण को न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणी को न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा। यह कहकर वह रथ पर सवार हो गया और सारथि से बोला- "जहाँ कृष्ण हो वहाँ शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ ले चलो। आज मेरा उसी के साथ युद्ध होगा। आज मैं अपने तीखे बाणों से उस खोटी बुद्धि वाले ग्वाले के बल-वीर्य का घमंड चूर-चूर कर दूँगा। देखो तो उसका साहस, वह हमारी बहिन को बलपूर्वक हर ले गया है। रुक्मी की बुद्धि बिगड़ गयी थी। वह भगवान के तेज-प्रभाव को बिलकुल नहीं जानता था। इसी से इस प्रकार बहक-बहककर बातें करता हुआ वह एक ही रथ से श्रीकृष्ण के पास पहुँचकर ललकारने लगा- "खड़ा रह! खड़ा रह।" उसने अपने धनुष को बलपूर्वक खींचकर भगवान श्रीकृष्ण को तीन बाण मारे और कहा- "एक क्षण मेरे सामने ठहर! यदुवंशियों के कुलकलंक! जैसे कौआ होम की सामग्री चुराकर उड़ जाय, वैसे ही तू मेरी बहिन को चुराकर कहाँ भागा जा रहा है? अरे मन्द! तू बड़ा मायावी और कपट-युद्ध में कुशल है। आज मैं तेरा सारा गर्व खर्व किये डालता हूँ। देख! जब तक मेरे बाण तुझे धरती पर सुला नहीं देते, उसके पहले ही इस बच्ची को छोड़कर भाग जा।"

रुक्मी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने उसका धनुष काट डाला और उस पर छः बाण छोड़े। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण ने आठ बाण उसके चार घोंड़ो पर और दो सारथि पर छोड़े और तीन बाणों से उसके रथ की ध्वजा को काट डाला। तब रुक्मी ने दूसरा धनुष उठाया और भगवान श्रीकृष्ण को पाँच बाण मारे। उन बाणों के लगने पर उन्होंने उसका वह धनुष भी काट डाला। रुक्मी ने इसके बाद एक और धनुष लिया, परन्तु हाथ में लेते-ही-लेते अविनाशी अच्युत ने उसे भी काट डाला। इस प्रकार रुक्मी ने परिघ, पट्टिश, शूल, ढाल, तलवार, शक्ति और तोमर-जितने अस्त्र-शस्त्र उठाये, उन सभी को भगवान ने प्रहार करने के पहले ही काट डाला। अब रुक्मी क्रोधवश हाथ में तलवार लेकर भगवान श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से रथ से कूद पड़ा और इस प्रकार उनकी ओर झपटा, जैसे पतिंगा आग की ओर लपकता है। जब भगवान ने देखा कि रुक्मी मुझ पर चोट करना चाहता है, तब उन्होंने अपने बाणों से उसकी ढाल-तलवार को तिल-तिलकर करके काट दिया और उसको मार डालने के लिये हाथ में तीखी तलवार निकाल ली। जब रुक्मिणीजी ने देखा कि ये तो हमारे भाई को अब मार ही डालना चाहते हैं, तब वे भय विह्वल हो गयीं और अपने प्रियतम पति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरकर करुण-स्वर में बोलीं- "देवताओं के भी आराध्यदेव! जगत्पते! आप योगेश्वर हैं। आपके स्वरूप और इच्छाओं को कोई जान नहीं सकता। आप परम बलवान हैं, परन्तु कल्याण स्वरूप भी तो हैं। प्रभो! मेरे भैया को मारना आपके योग्य काम नहीं है।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- रुक्मिणीजी का एक-एक अंग भय के मारे थर-थर काँप रहा था। शोक की प्रबलता से मुँह सूख गया था, गला रूँध गया था। आतुरतावश सोने का हार गले से गिर पड़ा था और इसी अवस्था में वे भगवान के चरणकमल पकड़े हुए थीं। परम दयालु भगवान उन्हें भयभीत देखकर करुणा से द्रवित हो गये। उन्होंने रुक्मी को मार डालने का विचार छोड़ दिया। फिर भी रुक्मी उनके अनिष्ट की चेष्टा से विमुख न हुआ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसको उसी के दुपट्टे से बाँध दिया और उसकी दाढ़ी-मूँछ तथा केश कई जगह से मूँड़कर उसे कुरूप बना दिया। तब तक यदुवंशी वीरों ने शत्रु की अद्भुत सेना को तहस-नहस कर डाला-ठीक वैसे ही, जैसे हाथी कमलवन को रौंद डालता है। फिर वे लोग उधर से लौटकर श्रीकृष्ण के पास आये तो देखा कि रुक्मी दुपट्टे से बँधा हुआ अधमरी अवस्था में पड़ा हुआ है। उसे देखकर सर्वशक्तिमान भगवान बलरामजी को बड़ी दया आयी और उन्होंने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड़ दिया तथा श्रीकृष्ण से कहा- "कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह निन्दित कार्य हम लोगों के योग्य नहीं है। अपने सम्बन्धी की दाढ़ी-मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकार का वध ही है।" इसके बाद बलरामजी ने रुक्मिणी को सम्बोधन करके कहा- "साध्वी! तुम्हारे भाई का रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हम लोगों को बुरा न मानना; क्योंकि जीव को सुख-दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्म का फल भोगना पड़ता है।" अब श्रीकृष्ण से बोले- "कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करने योग्य अपराध करे तो भी अपने सम्बन्धियों के द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराध से ही मर चुका है, मरे हुए को फिर क्या मारना?" फिर रुक्मिणीजी से बोले- "साध्वी! ब्रह्माजी ने क्षत्रियों का धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाई को मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है।" इसके बाद श्रीकृष्ण से बोले- "भाई कृष्ण! यह ठीक है कि जो लोग धन के नशे में अंधे हो रहे हैं और अभिमानी हैं, वे राज्य, पृथ्वी, पैसा, स्त्री, मान, तेज अथवा किसी और कारण से अपने बन्धुओं का ही तिरस्कार कर दिया करते हैं।"

अब वे रुक्मिणी से बोले- "साध्वी! तुम्हारे भाई-बन्धु समस्त प्राणियों के प्रति दुर्भाव रखते हैं। हमने उनके मंगल के लिये ही उनके प्रति दण्डविधान किया है। उसे तुम अज्ञानियों की भाँति अमंगल मान रही हो, यह तुम्हारी बुद्धि की विषमता है। देवि! जो लोग भगवान की माया से मोहित होकर देह को ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हीं को ऐसा आत्म मोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है। समस्त देहधारियों की आत्मा एक ही है और कार्य-कारण से, माया से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। जल और घड़ा आदि उपाधियों के भेद से जैसे सूर्य, चन्द्रमा और प्रकाशयुक्त पदार्थ और आकाश भिन्न-भिन्न मालूम पड़ते हैं; परन्तु हैं एक ही, वैसे ही मूर्ख लोग शरीर के भेद से आत्मा का भेद मानते हैं। यह शरीर आदि और अन्तवाला है। पंचभूत, पंचप्राण, तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है। आत्मा में उसके अज्ञान से ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ‘मैं समझता है’, उसको जन्म-मृत्यु के चक्कर में ले जाता है। साध्वी! नेत्र और रूप दोनों ही सूर्य के द्वारा प्रकाशित होते हैं। सूर्य ही उनका कारण है। इसलिये सूर्य के साथ नेत्र और रूप का न तो कभी वियोग होता है और न संयोग। इसी प्रकार समस्त संसार की सत्ता आत्मसत्ता के कारण जान पड़ती है, समस्त संसार का प्रकाशक आत्मा ही है। फिर आत्मा के साथ दूसरे असत पदार्थों का संयोग या वियोग हो ही कैसे सकता है? जन्म लेना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और मरना ये सारे विकार शरीर के ही होते हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कृष्णपक्ष में कलाओं का ही क्षय होता है, चन्द्रमा का नहीं, परन्तु अमावस्या के दिन व्यवहार में लोग चन्द्रमा का ही क्षय हुआ कहते-सुनते हैं; वैसे ही जन्म-मृत्यु आदि सारे विकार शरीर के ही होते हैं, परन्तु लोग उसे भ्रमवश अपना-अपने आत्मा का मान लेते हैं। जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थ के न होने पर भी स्वप्न में भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलों का अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठ-मूठ संसार-चक्र का अनुभव करते हैं। इसलिये साध्वी! अज्ञान के कारण होने वाले इस शोक को त्याग दो। यह शोक अंतःकरण को मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब बलरामजी ने इस प्रकार समझाया, तब परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने अपने मन का मैल मिटाकर विवेक-बुद्धि से उसका समाधान किया। रुक्मी की सेना और उसके तेज का नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्त की सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओं ने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जाने की कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी। अतः उसने अपने रहने के लिये भोजकट नाम की एक बहुत बड़ी नगरी बसायी। उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि "दुर्बुद्धि कृष्ण को मारे बिना और अपनी छोटी बहिन को लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा।" इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सब राजाओं को जीत लिया और विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणीजी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। हे राजन! उस समय द्वारकापुरी के घर-घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा। क्यों न हो, वहाँ के सभी लोगों का यदुपति श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जो था। वहाँ के सभी नर-नारी मणियों के चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्द से भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिन को अनेकों भेंट की सामग्रियाँ उपहार दीं। उस समय द्वारका की अपूर्व शोभा हो रही थी। कहीं बड़ी-बड़ी पताकाएँ बहुत ऊँचे तक फहरा रही थीं। चित्र-विचित्र मालाएँ, वस्त्र और रत्नों के तोरन बँधे हुए थे। द्वार-द्वार पर दूब, खील आदि मंगल की वस्तुएँ सजायी हुई थीं। जल भरे कलश, अरगजा और धूप की सुगन्ध तथा दीपावली से बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी। मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियों के मद से द्वारका की सड़क और गलियों का छिड़काव हो गया था। प्रत्येक द्वार पर केलों के खंभे और सुपारी के पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे। उस उत्सव में कुतूहलवश इधर-उधर दौड़-धूप करते हुए बन्धु-वर्गों में कुरु, सृज्चय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशों के लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे। जहाँ-तहाँ रुक्मिणीहरण की गाथा गयी जाने लगी। उसे सुनकर राजा और राज कन्याएँ अत्यन्त विस्मित हो गयीं। महाराज! भगवती लक्ष्मीजी को रुक्मिणी के रूप में साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियों को परम आनन्द हुआ।

Source :- http://bit.ly/2DhEdxa
                http://bit.ly/2meAnMZ

Friday, February 13, 2015

Radhe Krishna Quiz - Mamtamai Shri Radhe Maa


Radha - Pyar Ka Asli Matlab Kya Hota Hai ? 
Shri Krishna -Jaha Matlab Hota Hai..Waha Pyar Hi Kaha Hota Hai !!


Name the #movie where in the famous song celebrating Radhe Krishna Union 'Mohe Panghat Pe Nandlal Ched Gayo Re ' starring our very own Madhubala .

How to enter contest 
1. Like Param Shradhey Shri Radhe Maa page on facebook 
2. Guess the right answer and submit on – Link 
3. Comment and tag your friends in comment, more you tag more chances of winning!
- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust
Note
To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.
One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.
(Photo Courtesy – google.com)
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Tuesday, January 7, 2014

When the Sultan of Oman protected a Sri Krishna temple



Darsait in Islamic Sultanate of Oman is the site of a famous Sri Krishna temple supported by the family headed presently by Shri Kanaksi Khimji of the Khimji Ramdas Group. The Khimjis are citizens of Oman and remain staunch vegetarians and devotees of Shrinathji with roots in Gujarat. Shri Khimji's grandfather came to Oman in 1870 and the family has had close a and mutually respectful relationship with the ruling family.

Regular worship is offered along with chappan bhog for Lord Krishna at the temple and all major festivals are celebrated at the temple which is frequented in thousands by expat Indians working in Muscat. The Sultan's family is as committed to Islam as it is known for its religious tolerance to all subjects. 

Jayant Vyas, a priest at the Krishna Temple, Muscat, has been quoted in media reports saying that “During the Babri Masjid riots in India, the Sultan personally ordered his guard to protect the (Shri Krishna) temple. He told us not to fear any attacks and to continue with our pujas.”


May Shri Krishna bless the Sultan and his family for his love for all his subjects 


Note - 

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(Picture Courtesy - Google.com)

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