Monday, June 18, 2018

क्यों की जाती है सर्वप्रथम गणेशजी की ही पूजा?

श्री गणेश करना जिसका अर्थ है किसी भी कार्य का शुभारम्भ.क्या कारण है की ब्रह्मा, शिव, विष्णु और अन्य कई दिग्गज भगवानों की बजाय सर्वप्रथम पूजा गणपति की ही क्यों होती है.



श्री गणेश के समतुल्य और कोई देवता नहीं हैं. इनकी पूजा किये बिना कोई भी मांगलिक कार्य, अनुष्ठान या महोत्सव की शुरुआत नहीं की जा सकती. गणेश जी, शिव भगवान एवं माता पार्वती की संतान हैं, इन्हें विघ्नहर्ता, भक्तों का दुःख दूर करने वाले, विद्या, बुद्धि व तेज़ बल प्रदान करने वाले के रूप में जाना जाता है.

शास्त्रों व पुराणों के अनुसार गणेश पूजन के लिए बुधवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है. गणेश जी को लगभग 108 से भी अधिक नामो से जाना जाता है. किसी भी मांगलिक कार्य से पहले गणेश जी की पूजा करना भारतीय संस्कृति में शुभकारी बताया गया है. ऐसा माना गया है कि सर्वप्रथम किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले यदि गणेश पूजन किया जाता है तो वह कार्य निश्चित ही सफल होता है. गणेश जी की सर्वप्रथम पूजा के विषय में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. गणेश भगवान के सर्वप्रथम पूजन की ऐसी ही एक प्रसिद्ध व लोकप्रिय कथा आप यहाँ पढ़ सकते हैं-

श्री गणेश के सर्वप्रथम पूजन की कथा

समस्त देवताओं के मन में इस बात पर विवाद उत्पन्न हुआ कि धरती पर किस देवता की पूजा समस्त देवगणों से पहले हो. अतः सभी देवता इस प्रश्न को सुनते ही स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने लगे. बात बढ़ते बढ़ते शस्त्र प्रहार तक आ पहुँची. तब नारद जी ने इस स्थिति को देखते हुए सभी देवगणों को भगवान शिव की शरण में जाने व उनसे इस प्रश्न का उत्तर बताने की सलाह दी.

जब सभी देवता भगवान शिव के समीप पहुँचे तो उनके मध्य इस झगड़े को देखते हुए भगवान शिव ने इसे सुलझाने की एक योजना सोची. उन्होंने एक प्रतियोगिता आयोजित की. सभी देवगणों को कहा गया कि वे सभी अपने-अपने वाहनों पर बैठकर इस पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर आएं. इस प्रतियोगिता में जो भी सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर उनके पास पहुँचेगा वही सर्वप्रथम पूजनीय माना जाएगा.

सभी देवता अपने-अपने वाहनों को लेकर परिक्रमा के लिए निकल पड़े. गणेश जी भी इसी प्रतियोगिता का हिस्सा थे. परन्तु गणेश जी बाकी देवताओं की तरह ब्रह्माण्ड के चक्कर लगाने की जगह अपने माता-पिता शिव-पार्वती की सात परिक्रमा पूर्ण कर उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हो गए.

जब समस्त देवता अपनी अपनी परिक्रमा करके लौटे तब भगवान शिव ने श्री गणेश को प्रतियोगिता का विजयी घोषित कर दिया. सभी देवता यह निर्णय सुनकर अचंभित हो गए व शिव भगवान से इसका कारण पूछने लगे. तब शिवजी ने उन्हें बताया कि माता-पिता को समस्त ब्रह्माण्ड एवं समस्त लोक में सर्वोच्च स्थान दिया गया है, जो देवताओं व समस्त सृष्टि से भी उच्च माने गए है. तब सभी देवता, भगवान शिव के इस निर्णय से सहमत हुए. तभी से गणेश जी को सर्वप्रथम पूज्य माना जाने लगा.

यही कारण है कि भगवान गणेश अपने तेज़ बुद्धिबल के प्रयोग के कारण देवताओं में सर्वप्रथम पूजे जाने लगे. तब से आज तक प्रत्येक शुभ कार्य या उत्सव से पूर्व गणेश वन्दन को शुभ माना गया है. गणेश जी का पूजन सभी दुःखों को दूर करने वाला एवं खुशहाली लाने वाला है. अतः सभी भक्तों को पूरी श्रद्धा व आस्था से गणेश जी का पूजन हर शुभ कार्य से पूर्व करना चाहिए.
तो इस कारण हर शुभ कार्य का श्री गणेश विघ्ननाशक गणेश जी के पूजन से ही होता है.

source :- https://bit.ly/2I2VydT

क्यों होती है सोमवार को भगवान शिव की पूजा?

सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। पुरातन काल से लोग इस दिन शिव की पूजा करते आ रहे है। कभी सोचा है आपने कि सोमवार के दिन ही भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते है इस दिन शिव की पूजा का क्या महत्व है।

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा करने की परंपरा शुरू से चली आ रही है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए तो कोई अपने भाग्य को बदलने के लिए पूजा करता है। हिंदू धर्म में अगल दिन का अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा करने का महत्व है।

सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। पुरातन काल से लोग इस दिन शिव की पूजा करते आ रहे है। कभी सोचा है आपने कि सोमवार के दिन ही भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते है इस दिन शिव की पूजा का क्या महत्व है।



सोमवार का व्रत :-

लोग सोमवार को जो व्रत रखते हैं उसे सोमेश्वर कहते हैं। सोमेश्वर का अर्थ आप दो तरह से समझ सकते हैं इसका पहला अर्थ चंद्रमा है और दूसरा वह देव, जिसे सोमदेव भी अपना देव मानते हैं। हिंदू धर्म में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस दिन पूजा और व्रत किया जाता है। भगवान शिव को लोग भोले नाथ,महेश,के नाम से भी जानते हैं। भोले नाथ की पूजा-अर्चना करने से आपके सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। मान्यता है श्रद्धालु अगर सोलह सोमवार पूरी श्रद्धा के साथ व्रत करें तो, भोले नाथ उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं।

मान्यता है कि सोमवार के दिन जो व्यक्ति भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करता है उसकी सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं। सोम का एक अर्थ सौम्य भी होता है, शिव जी को संसार में शांत देवता के रूप में भी मान्यता दी जाती है। इसलिए भी सोमवार के दिन को भगवान शिव का दिन माना जाता है।

पूजन की सामग्री और विधि :-

इस दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करने के बाद पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। भोलेनाथ की पूजा सामग्री में आप शुद्ध जल, गंगा जल, कच्चा दूध,चीनी, केसर, रोली, सफेद चंदन, धतूरा, फल, अक्षत, सफेद फूल, माला,धूप बत्ती, दीपक, अगरबत्ती आदि सामग्री श्रद्धालु पूजा कर सकते हैं। इस दिन शिव की पूजा के लिए बेलपत्र को बहुत शुभ माना जाता है।

Source :- https://bit.ly/2MAMh0g

Wednesday, June 13, 2018

ब्राह्मण पुत्र होने के बाद भी परशुराम में क्यों थे क्षत्रियों के गुण !!

भगवान परशुराम एक ब्राह्मण थे। लेकिन आचरण उनका क्षत्रियों जैसा था।ब्राह्मण पुत्र होते हुए भी परशुराम में क्षत्रियों के गुण क्यों थे.



महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना।

किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।

तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

Source :- https://bit.ly/2HLvvYE

Sunday, June 10, 2018

शिवलिंग पर तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए ||


भगवान शिव ने जालंधर का वध ऐसे किया...


शास्त्रों में बताया गया है कि आखिर क्यों शिवलिंग पर तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते हैं। इसके बारे में कई मान्यताएं प्रचलित हैं, इनमें से एक मान्यता इस प्रकार है.....
पौराणिक मान्यता के अनुसार जालंधर नाम का एक असुर था जिसे अपनी पत्नी की पवित्रता और भगवान विष्णु के कवच की वजह से अमर होने का वरदान मिला हुआ था। इसका फ़ायदा उठाकर वह दुनिया भर में आतंक मचा रहा था। उसके आतंक को रोकने के लिए भगवान विष्णु और भगवान शिव ने उसे मारने की योजना बनाई। पहले भगवान विष्णु ने जालंधर से अपना कवच मांगा और इसके बाद भगवान विष्णु ने उसकी पत्नी की पवित्रता भंग की।
जिससे भगवान शिव को जालंधर को मरने का मौका मिल गया। जब वृंदा को अपने पति जालंधर की मृत्यु का पता चला तो उसे बहुत दुःख हुआ। गुस्से में उसने भगवान शिव को शाप दिया कि उन पर तुलसी की पत्ती कभी नहीं चढ़ाई जाएंगी। यही कारण है कि शिव जी की किसी भी पूजा में तुलसी की पत्ती नहीं चढ़ाई जाती है।

Saturday, June 9, 2018

राम जी के लिए क्यों चीरा हनुमान जी ने अपना सीना ||

राम जी के लिए क्यों चीरा हनुमान जी ने अपना सीना  ||


जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपनी पत्नी सीता और भैया लक्ष्मण के साथ चौदह वर्षों के वनवास और रावण के साथ हुए युद्ध के पश्चात् अयोध्या वापस लौटे तब इस उपलक्ष में पूरे अयोध्या में हर्षो उल्लाहस था और सभी लोग खुशियां मना रहे थे। कुछ दिनों पश्चात श्री राम अपने भाइयों एवं पत्नी सीता के साथ राज सभा में थे और सभी को युद्ध में उनके सहयोग के लिए प्यार स्वरुप उपहार दे रहे थे तब माता सीता ने हनुमान को अपने गले से उतार कर बहुत हे कीमती मोतियों का हार दिया और उनकी वीरता सहस और राम भक्ति की सराहना की, हनुमान जी उपहार ले कर कुछ आश्चर्य में थे और उन्होंने माला तोड़ दी और एक एक मोती अपने दांतो से चबा कर उसमे कुछ देखते और उसे फेंक देते,

हनुमान जी को ऐसा करते देख पूरी सभा हैरान थी और माता सीता भी क्रोधित थी की उनके दिए हुए उपहार का इतना अपमान, परंतु भगवान् सही राम इस सब को देख कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। उनके इस व्यवहार को देख कर सभा में उपस्थित कुछ लोगो ने हमुमान जी को उपहार के इस अपमान का कारण पुछा तब श्री हनुमान जी ने बड़ी विनम्रता से का की में तो इन कीमती मोतियों में अपने प्रभु श्री राम और माता सीता को ढूंढ रहा हूँ, परंतु मुझे अभी तक किसी भी मोती में प्रभु राम और माता सीता के दर्शन नहीं हुए इसलिए ये मोती मेरे लिए बेकार हैं क्यू की जिस वस्तु में मेरे राम नहीं वो मेरे लिए व्यर्थ है। हनुमान जी की इस बात पर पूरी सभा में हलचल होने लगी कुछ हँसने लगे कुछ व्यंग करने लगे कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया इस का अर्थ ये हुआ की प्रभु श्री राम और सीता आपके रोम रोम में वास होना चाहिए यदि नहीं है तो आपका ये शरीर भी व्यर्थ है।

ऐसा सुन कर हनुमान जी महाराज ने भरी सभा के सामने अपना सीना चीर के अपने हृदय में विराजित प्रभु राम और माता सीता के दर्शन समस्त सभा को कराये. और ये दृश्य देख कर समस्त सभा जन राम भक्त हनुमान जी की जय जय कार करने लगे।

Tuesday, June 5, 2018

भगवान श्री कृष्ण ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश ||

भगवान श्रीकृष्ण ने बचपन में ही सबकी भलाई के लिए निर्बल, दुर्लब, कमजोर वर्ग के लोगों में उत्साह भरने के लिए मनोबल ऊँचा रखने के लिए ब्रज में श्वेत आंदोलन की स्थापना की। जिन घरों से दूध, दही कंस जैसे दुर्दान्त दुष्टों के यहाँ भय के कारण सुविधापूर्वक पहुँचाया जाता था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे रोकने के लिए एक आंदोलन का स्वरूप निर्मित किया। उसी दूध-दही के द्वारा उन्हीं दुर्बल, निर्बल कमजोर लोगों को स्वयं बदनामी लेते हुए अपने को चोर की संज्ञा दी।


कंस के द्वारा किए गए जनता के पर अनेक अत्याचार उनमें बाल हत्या से लेकर जितनी भी प्रकार की मानसिक, वाचिक और कायिक हिंसाएँ हो सकती हैं। उन सबका सामना करने की ताकत इन दुर्लब गरीबों ने पाई। अनेक का मान-मर्दन अहंकार, दलित हुआ और गोवर्धन लीला इसका जीवन्त उदाहरण है। जिसमें इन्द्र ने भी अपनी ताकत का संपूर्ण प्रयोग किया। किंतु कृष्ण की जननिष्ठा के सामने इन्द्र का भी अहंकार टिक न सका।

एक-एक लाठी के सहयोग द्वारा अनेक लाठियों के संबल से कृष्ण की विशेष भावना शक्ति से इस सफल कार्य को अंजाम दिया जा सका। सात दिनों तक प्रलयकालीन बादलों ने ब्रज को तहस नहस करने की साजिश से अपने अपमान का बदला लेने के लिए भीषण जल वृष्टि की।
भगवान श्रीकृष्ण की संगठन शक्ति के सामने इन्द्र को नतमस्तक होना पड़ा। स्वयं श्रीकृष्ण गोवर्धन बनकर गोवर्धन पूजन की मान्यता प्रदान की। वृक्षों और पहाड़ों का संरक्षण, पर्यावरण को व्यवस्थित रखने का सबसे बड़ा साधन है।

गोवर्धन पूजा से सामान्य से सामान्य व्यक्ति जुड़ता है। यहाँ गरीब-अमीर, ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है। भगवान कृष्ण की गोवर्धन पूजा महत्वपूर्ण जन पूजा है। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार से लेकर तिरोभाव तक धर्मरक्षा, समाजहित, प्रकृति संरक्षण एवं सौहार्दपूर्ण समाज को संगठित रखने का संदेश दिया हैं।

Sunday, June 3, 2018

नंदी कैसे बने शिव की सवारी

नंदी बैल – भगवान शिव हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. ये इकलौते ऐसे भगवान हैं, जिन्हें देवता, दैत्य और इंसान पूजते हैं. भगवान शिव ने कभी भी अपने भक्तों में भेद नहीं किया. भले ही वो दानव ही क्यों न हों, इसीलिए भगवान शिव की भक्ति पूरे लोक में फ़ैल गई. भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता बन गए, जिन्हें हर कोई पूजता है. भगवान शिव की आराधना और पूजा तो हर कोई करता है. उनेक मंदिर में जाने से पहले आपने नंदी बैल को देखा होगा. नंदी बैल की पूजा करने के बाद ही लोग मंदिर में प्रवेश करते हैं. असल में बिना इनको चढ़ावा चढ़ाए आपकी भक्ति पूरी नहीं होती.


नंदी बैल को भगवान शिव का प्रिय माना गया है. भगवान शिव के प्रिय गणों में नंदी महत्व रखते हैं. नंदी को भगवान शिव ने अपनी सवारी के रूप में भू चुना. ये विशेष महत्व किसी और को नहीं प्राप्त है. किसी भी मंदिर में शिव से पहले इनकी आराधना की जाती है. इन्हें माला-फूल आदि चढ़ाया जाता है. वो इसलिए कि अगर आप भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके प्रिय को प्रसन्न कीजिए.

नंदी बह्ग्वान शिव के प्रिय कैसे बन गए, जबकि उनके गले में सांपों का घेरा रहता है. भला किसी एक के इतने करीब होने पर कोई और कैसे उनका प्रिय बन सकता है. इसके पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है. पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्मचारी व्रत का पालन करते हुए शिलाद ऋषि को यह भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका पूरा वंश समाप्त हो जाएगा, इसलिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेने का निर्णय किया. ये ऋषि एक ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिसपर भगवान शिव की अपार कृपा हो. ऐसे में ऋषि भगवान् शिव की आराधना करने लगें.

ऋषि कठोर तपस्या करते रहे, लेकिन उन्हें भगवान की कृपा प्राप्त नहीं हुई. वो फिर से तपस्या करना शुरू किये. उनकी तपस्या का उद्देश्य किसी आम बच्चे को पाना नहीं, बल्कि एक ऐसी संतान को अपनाना पाना था, जिसपर भगवान शिव का आशीर्वाद हो और वह असामान्य रूप से आध्यात्मिक हो. ऋषि ने अपनी तपस्या को और भी कठोर बना दिया. अंत में भगवान शिव को अपने भक्त के लिए आना पड़ा. शिव उस ऋषि से प्रसन्न हुए.

भगवान् को अपने समक्ष देखकर ऋषि की आँखें ही चुंधिया गई. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्वयं ईश्वर उनके सामने खड़े हैं. ऋषि ख़ुशी से भगवान् के चरणों में गिर पड़े. भगवान् शिव ने ऋषि से वरदान मांगने को कहा. ऋषि ने अपनी कामना भगवान् के समक्ष रख दी. भगवान् ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए. अगले ही दिन खेती करने के लिए वह खेत पर पहुंचे, जहां उन्हें एक खूबसूरत नवजात शिशु मिला. ऋषि बहुत खुश हुए, तभी भगवान् ने कहा कि यही तुम्हारी संतान है.

देखते देखते समय बीतता गया. नंदी बड़ा हो गया. एक दिन उस ऋषि के आश्रम पर दो सन्यासी आएं और उन्होंने कहा कि नंदी ज्यादा जीवित नहीं रहेगा. ये बात नंदी सुन लिए और जाकर भगवान् शिव की आराधना करने लगे. भगवान् प्रसन्न हुए, उन्होंने न केवल नंदी को वरदान दिया बल्कि बैल का मुख देकर उन्हें अपना वाहन बना लिया. इस तरह से नंदी बैल भगवान शिव के प्रिय वाहन बन गए. वो अजर और अमर हो गए. आज लोग भगवान् शिव के साथ ही उनकी भी पूजा करते हैं.

Copy rights ;- https://bit.ly/2JfhvrB 
Image Source :- https://bit.ly/2sD9pBX