Thursday, May 10, 2018

क्यों माता शक्ति (माँ भगवती) का नाम दुर्गा पड़ा?

पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। तब दुर्गम ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब देवताओं को देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया।



देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की बात सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया।
यह बात जब दैत्यों का राजा दुर्गम को पता चली तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया। सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया। तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण भी भगवती का नाम दुर्गा के नाम से भी विख्यात हुआ।

Monday, March 26, 2018

मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व है करते है भगवान श्री राम ः गुरु राधे मां

मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व है करते है भगवान श्री राम ः गुरु राधे मां














श्री रामनवमी के उपलक्ष्य में मुकेरिया में महंत बलदेव दास की अध्यक्षता में आयोजित शोभायात्रा में ममतामयी श्री राधे गुरु मां भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए पहुंची। इस दौरान विभिन्न धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। राधे मां ने भक्तों को आशीर्वाद दिया और श्री राम नवमी की बधाई देते हुए कहा कि प्रभू राम मानवता का प्रतिनिधित्व है। मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते है। मर्यादाओं को एकांतित करते है और विवेक, त्याग तपस्या उसकी एक मिसाल हमारे बीच छोड़ कर गए है। देश का हर भक्त राम तो नहीं बन पाएगा, लेकिन अनाचार, दुराचार और अत्याचारके सामने हम जुटायू जैसी भूमिका तो ्दा कर सकते है। श्री राम भक्त के रग-रग में है। जन-जन में है मन है। प्रभू श्री राम हमें मानवता के रास्ते पर चलने की ताकत दे। उन्होंने कहा कि हमें सभी धर्मों का मान सत्कार करना चाहिए। इस अवसर पर संजीव गुप्ता, भुपिंदर सिंह बंटी, हरजिंदर सिंह, नीशू, मेघा सिंह, मनीषा सिंह, राज, डॉ. जगदीश कश्यप, मनोज अग्रवाल, रुपिंदर भाटिया, जसविंदर भाटिया, जगमोहन गुप्ता, नकुल गुप्ता, अकुल गुप्ता, योगराज शर्मा, विजय ओहरी, डॉ सहगल, सोनी शर्मा, चंद्र मोहन, शिव कुमार, विशू कुंद्रा, भगवान दास, केसी राणा, रजिंदर शर्मा, कमल देव, मंगलेश कुमार व भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

Saturday, March 24, 2018

हनुमान जी का लंका गमन

हनुमान जी का लंका गमन :- 



पवन वेग से हनुमान जी समुद्र के ऊपर आकाश में उड़े जा रहे थे । पवनदेव अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहायता कर रहे थे । आकाश में देवगण उन पर पुष्प वर्षा कर रहे थे । समुद्र के गर्भ में मैनाक नामक एक पर्वत था ।

समुद्र ने उससे कहा, ”हे मैनाक ! पवन पुत्र हनुमान रघुवंश शिरोमणि श्री रघुनाथ जी के कार्य के लिए लंका जा रहे हैं । तुम अपना आकार ऊपर-नीचे और चारों दिशाओं में बढ़ा सकते हो । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि तुम समुद्र के गर्भ से ऊपर उठो और श्री हनुमान जी को थोड़ा विश्राम करने के लिए कहो । इस प्रकार कोई यह नहीं कहेगा कि समुद्र ने श्री रघुनाथ जी के कार्य में सहयोग नहीं किया ।”

मैनाक पर्वत से भेंट:

समुद्र की आज्ञा पाकर मैनाक पर्वत आकाश की ओर ऊंचा उठ गया और तीव्र गति से जाते हुए हनुमान जी के मार्ग में आ गया । हनुमान जी ने समझा कि यह पर्वत उनके मार्ग में बाधा बन रहा है । इसलिए उन्होंने उस पर पद प्रहार करना चाहा ।

तभी मैनाक पर्वत हाथ जोड़कर हनुमान जी से बोला, ”हे पवनपुत्र ! मेरा आशय तुम्हारे मार्ग में रोड़ा बनने का नहीं है । मैं तो चाहता हूं कि आप मेरा आतिश्य ग्रहण करें और कुछ देर यहां विश्राम करके आगे जाए ।” इस पर हनुमान जी ने कहा, ”हे मैनाक ! तुम्हारा आतिथ्य मैंने स्वीकार कर लिया । परंतु मैं रुक नहीं सकता । मैंने सकल्प लिया हुआ है कि मार्ग में रुके बिना ही मैं लंका पहुँचूँगा ।”

ऐसा कहकर हनुमान ने अपने एक पैर का आघात करके मैनाक पर्वत को फिर से समुद्र में धकेल दिया और आगे बढ़ गए । उनकी गति और भी तीव्र हो गई ।

सुरसा से भेंट:

हनुमान जी अभी थोड़ा आगे बढे ही थे कि समुद्र में रहने वाली नागमाता सुरसा अपना विकराल मुंह फाड़कर हनुमान जी के मार्ग में आ खडी हुई और हनुमान जी से बोली, ”अरे वानर ! तू मेरा निरादर करके कहां जा रहा है ? तू मेरा भोजन है । मैं तुझे उठाऊंगी ।”

हनुमान जी ने मुस्कराकर सुरसा से कहा, ”देवी ! मैं श्रीरामचंद्र जी के कार्य से लंका जा रहा हूं । तुम्हें मेरे मार्ग में अवरोध नहीं बनना चाहिए और उनके कार्य में विप्न नहीं डालना चाहिए । यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो मैं तुम्हें वचन देताहूं किमैं श्रीरामचंद्र जी के कार्य को संपन्न करकेपुन तुम्हारे पास आ जाऊंगा, तब तुम मुझे खा लेना ।”

हनुमान जी के ऐसा कहने पर सुरसा बोली, ”अरे वानर ! मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लांघकर आगे नहीं जा सकता । तुम्हें यदि आगे जाना ही है तो मेरे मुख में प्रवेश करके ही आगे जाना हो सकेगा ।” ऐसा कहकर सुरसा ने अपना विशाल मुख फैला दिया ।

आगे का मार्ग अवरुद्ध देखकर हनुमान जी ने भी अपना आकार बढ़ा लिया । सुरसा ने अपने मुख का आकार उनसे भी बड़ा कर लिया । तब हनुमान जी ने अपना रूप अंगूठे के बराबर छोटा करके सुरसा के मुख में प्रवेश किया और वे तत्काल उसके मुख से बाहर निकल आए ।

बाहर आकर हनुमान ने अपने पूर्व रूप में आकर सुरसा से कहा, ”हे देवी ! मैंने तुम्हारे मुख में प्रवेश कर लिया है । इस प्रकार तुम्हारा वर सत्य हो गया है । अब मैं उस स्थान को जाऊँगा जहाँ माता सीता विराजमान हैं ।”

हनुमान जी की चतुराई देखकर सुरसा ने अपने सामान्य रूप में आकर हनुमान जी से कहा, ”हे कपिश्रेष्ठ अब मैं तुम्हारे मार्ग में बाधा नहीं डालूंगी । तुम सुखपूर्वक श्रीराम के कार्य को संपन्न करने के लिए जाओ । मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं ।”

हनुमान जी द्वारा सिंहिका राक्षसी का वध:

हनुमान जी एक पल गंवाए बिना तीव्र गति से आगे बढ़ गए । वे अभी कुछ ही दूर गए थे कि समुद्र के गर्भ में रहने वाली एक अत्यंत भयंकर सिंहिका नामक राक्षसी ने उछलकर हनुमान जी को पकड़ लिया और बोली, ”अरे ! मुझे लांघकर जाने वाला तू कौन है ?”

वह राक्षसी अत्यंत विकट थी । वह पानी पर पड़ने वाली छाया से ही ऊपर उड़ते हुए जीव को पकड़ लेने की क्षमता रखती थी । हनुमान जी समझ गए कि यह अत्यंत दुष्ट राक्षसी है । इससे पहले कि वे अपने बचाव का कोई मार्ग सोचते, उस राक्षसी ने अपने विशाल मुख में हनुमान जी को डाल लिया और सटक गई ।

परंतु उसके पेट में पहुंचते ही हनुमान जी ने अपना आकार बढ़ाया और उसके पेट को फाड़कर बाहर निकल आए । सिंहिका का वध करके वे पुन: आकाश में उड़ने लगे । सिंहिका का विशाल शरीर समुद्र के गर्भ में समा गया ।

जिस समय हनुमान जी लंका के करीब पहुंचे तो उन्होंने सोचा कि उनके इस विशाल शरीर को देखकर कहीं राक्षसगण भयभीत न हो जाएं, ऐसा सोचकर उन्होंने अपना आकार छोटा कर लिया और अपने सामान्य रूप में आकर धीरे से लंका की धरती पर उतर पड़े ।

लंका प्रवेश के अवसर पर लंकिनी से भेंट:

त्रिकूट पर्वत पर खड़े होकर हनुमान जी ने लंका नगरी की शोभा को देखा । लंका नगरी के चारों ओर गहरी खाई थी । समस्त राजभवन स्वर्ण पत्रों से मंडित थे । विशाल परकोटे थे और सर्वत्र भव्य भवन दिखाई पड़ रहे थे ।

लंका में चारों ओर शक्तिशाली और विराट शरीर वाले राक्षस मदमस्त होकर विचरण कर रहे थे । परकोटों पर रावण के सशस्त्र सैनिक विद्यमान थे । उनके वर्ण काले थे और वे बड़े भयानक दिखाई पड़ रहे थे । अधिकांश राक्षस और राक्षसियां मद्यपान किए हुए थे और मांस भक्षण कर रहे थे ।

लंका के परकोटों के बाहर भयानक वन थे और नगर में प्रवेश के लिए भारी भरकम दरवाजे थे । उन दरवाजों पर भी सशस्त्र राक्षसों का पहरा था । लंका में कोई भी घर संपदा विहीन दिखाई नहीं पड़ता था । सभी संपन्न और बलशाली थे ।

हनुमान जी ने सोचा कि लंका में प्रवेश करने का यह समय उचित नहीं है । रात्रि में जब ये राक्षस मद्यपान और विलास कृत्यों से थक-हारकर सो जाएंगे, तब मैं लंका में प्रवेश करूंगा और सीता जी की खोज करूंगा । ऐसा सोचकर हनुमान जी ने त्रिकूट पर्वत पर ही समय बिताया और रात्रि का तीसरा प्रहर होने की प्रतीक्षा करने लगे ।

रात्रि का तीसरा प्रहर होने पर जब लंका में सोता पड़ गया तो हनुमान जी ने अपना सामान्य रूप बनाया और लंका में प्रवेश करने लगे । लेकिन तभी एक विशाल और कुरूप राक्षसी ने उन्हें रोका, ”हे वानर ! तू कौन है और इस तरह लंका में कहां घुसा चला जा रहा है ?

तू क्या जानता नहीं कि इस लंका की रक्षा करने का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा गया है ? मैं राजराजेश्वर लंकापति रावण की प्रधान सेविका हूं और मेरा नाम लंकिनी है । मेरे नाम पर ही इस नगरी का नाम लंका पड़ा है । मेरी आज्ञा के बिना कोई भी इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता । तू बता कि यहां किसलिए आया है ?”

हनुमान जी ने कहा, ”हे देवी ! मैं श्रीराम का दूत हनुमान हूं और उनकी पत्नी सीता जी की खोज में यहां आया हूँ । मैं इस लंका नगरी से उनकी खोज करके ही वापस जाऊंगा । कोई भी मेरा मार्ग नहीं रोक सकता । जो ऐसा दुस्साहस करेगा वह पछताएगा ।”

हनुमान जी की बात सुनकर लंकिनी ने कहा, “तू जो भी है, मुझे परास्त किए बिना लंका में प्रवेश नहीं कर सकता । तुझे पहले मुझे परास्त करना होगा ।” ”हे देवी ! मैं स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाता । यह हमारी संस्कृति के विपरीत है । किंतु यदि कोई स्त्री भी मेरे मार्ग की बाधा बनेगी, तो मैं उसे भी अपने मार्ग से हटा दूंगा ।”

हनुमान जी ने उससे कहा । हनुमान जी की बात सुनकर लंकिनी को क्रोध आ गया । उसने पलटकर एक थप्पड़ हनुमान जी को मार दिया और चीखी, ”भाग जा यहां से, वरना मैं तुझे कच्चा चबा जाऊंगी ।” हनुमान जी ने भी आव देखा न ताव, अपना एक ऐसा लंकिनी पर चला दिया ।

वह ऐसा उन्होंने उसे स्त्री जानकर हल्के से ही चलाया था, पर वह उस घूंसे के प्रहार से धरती पर जा गिरी और उसके मुख से रक्त बहने लगा । लंकिनी का सारा शरीर पीड़ा से भर उठा । वह जोर-जोर से सांस लेकर हांफने लगी । कुछ क्षण बाद वह उठी और हनुमान जी के सामने हाथ जोड़कर बोली, ”हे महाबली वानर! मुझे लगता है कि अब लंका के पापों का अत समय आ पहुँचा है । ब्रह्मा जी की बात असत्य नहीं हो सकती ।

उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रम से अपने वश में कर लेगा, तब तुझे समझ लेना होगा कि राक्षसों पर महान विपत्ति आने वाली है और इस लंका का सर्वनाश हो जाएगा । हे महाबली ! आपकी शक्ति अपार है । आपके एक हल्के से प्रहार ने ही मेरे शरीर की चूल-चूल हिला दो है ।

आप श्रीराम के दूत हैं । आपके दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया । आप अपनी इच्छा से इस लंका नगरी में प्रवेश करें और सीता जी से भेंट करे ।” इतना कहकर लंकिनी उनके मार्ग से हट गई । हनुमान जी ने तभी अपना सूक्ष्म रूप बनाया और लंका में प्रवेश किया ।

लंका में विभीषण से भेंट:

लंकिनी की बातों पर विचार करते हुए हनुमान जी राजभवन के अंतःपुर में प्रवेश कर गए । वहां उन्होंने अनेकानेक सुदर युवतियों और राक्षसों को सशस्त्र पहरा देते हुए देखा । राजभवन की शोभा नेत्रों को चकाचौंध कर रही थी । वहाँ एक शयनकक्ष में उन्होंने महाबली रावण को एक अति सुँदर गौरांग स्त्री के साथ सोते हुए देखा ।

पलभर के लिए उनके मन में विचार आया कि कहीं ये देवी सीता तो नहीं । लेकिन तत्काल उनके मन में विचार कौंधा कि देवी सीता इस प्रकार अपने पति से बिछुड़ने के उपरांत पूरे साज-संगार के साथ एक परपुरुष के साथ कैसे हो सकती है ।

निश्चय ही ये देवी सीता नहीं, कोई और है । तभी उन्हें लगा कि वे इस प्रकार सोती हुई स्त्रियों को देख रहे हैं, इससे कहीं उनके धर्म का लोप तो नहीं हो रहा है ? परंतु दूसरे ही पल वे सोचने लगते कि उन्हें देखकर भी उनके मन में किसी प्रकार के काम भाव उत्पन्न नहीं हो रहे हैं ।

वे तो बालब्रह्यचारी हैं और सदैव सात्विक विचारों को धारण करने वाले हैं । तभी उन्हें श्रीराम का ध्यान आया तो उनके मन का सारा मैल धुल गया । वे एक महल से दूसरे और दूसरे से तीसरे में होकर घूमते रहे । परंतु उन्हें कहीं भी सीता मैथ्या के दर्शन नहीं हुए ।

उन्होंने रावण द्वारा कुबेर से छीना हुआ ‘पुष्पक विमान’ भी देखा और उसकी भव्यता तथा शिल्प को देखकर वे चकित रह गए । एक बार उनके मन में आया कि वे रावण को सोते से उठाकर मार डालें और उसके शव को ले जाकर श्रीराम के चरणों में डाल दें ।

लेकिन इससे प्रभु श्रीराम का कार्य तो पूर्ण नहीं हो पाएगा । ऐसा सोचते हुए वे वहां भटक रहे थे । तभी उनकी दृष्टि एक ऐसे भवन पर पड़ी जिसकी बुर्जी पर चक्र लगा हुआ शोभा पा रहा था और दीवारों पर जगह-जगह प्रभु श्रीराम लिखा हुआ था ।

उसके चारों ओर वाटिका में सुंदर फूल खिले हुए थे और एक मंदिर भी वहां था । उस मंदिर में चतुर्भुज विष्णु और महालक्ष्मी की मूर्तियां विराजमान थीं । हनुमान जी सोच में पड गए कि इस राक्षस नगरी में भगवान विष्णु का भक्त यह वैष्णव कौन है ?

उसी समय भवन के भीतर से किसी के उठने और भगवान श्रीराम की स्तुति के स्वर सुनाई दिए । हनुमान जी ने सोचा कि यह अवश्य श्रीराम का कोई भक्त है । इससे मिलना चाहिए । हनुमान जी ने तत्काल एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और महल के द्वार पर जाकर ‘जय श्रीराम’ का उद्‌घोष किया ।

उस उद्‌घोष को सुनकर राजसी वस्त्रों में एक सौम्य आकृति वाले भद्र पुरुष ने द्वार खोला और कहा, ”विप्रवर ! आपका स्वागत है । मेरे अहोभाग्य, जो आज प्रात: वेला में मुझे आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कृपा अपना परिचय दें ।”

हनुमान जी ने कहा, ”हे भद्र पुरुष ! मैं दशरथ नंदन श्रीराम का दूत और किष्किंधा नरेश सुग्रीव का सेवक हनुमान हूं और इस राक्षस नगरी में श्रीराम के भक्त को देखकर आश्चर्यचकित हूँ ।”  हनुमान जी का परिचय पाकर उस भद्र पुरुष के चेहरे पर हर्ष छा गया । वह बोला, ”मेरे आराध्यदेव श्रीराम के आप दूत हैं, यह जानकर मेरा हृदय गद्‌गद हो उठा है ।

हे हनुमान जी! मैं लंकेश्वर रावण का छोटा भाई विभीषण हूं । मेरा एक भाई कुम्भकरण सदैव सोता रहता है और मेरे अग्रज लंकेश्वर रावण और उनके पुत्र मेघनाद सदैव युद्धरत रहते हैं । इसलिए राज्य का सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही रहता है ।”

”हे असुरश्रेष्ठ आप श्रीराम के भक्त हैं ।” हनुमान जी ने हर्षित होकर कहा, ”परंतु आपका भाई रावण तो उनका वैरी है । उसने दण्डकारण्य से उनकी धर्मपत्नी सीता जी का अपहरण किया है और यहां लंका में उन्हें रखा है । मैं उन्हीं की खोज में यहां आया हूं ।” ऐसा कहकर वे अपने असली रूप में आ गए ।

”हे वानरराज! मैं तो आपको देखते ही समझ गया था कि यह ब्राह्मण वेश आपका असली रूप नहीं है ।” विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”आपके इस रूप को देखकर मेरा मन हर्ष से भर उठा है । मैंने सुना है कि श्रीराम तो परमब्रह्म श्री विष्णु जी के अवतार हैं । आज मुझे आपके दर्शन हुए हैं तो शीघ्र ही उनके भी दर्शन होंगे ।”

”विभीषण जी! श्रीराम तो भक्तवत्सल, दयास्मिघु और सबके तारनहार हैं । मैं उन्हीं की कृपा से यह सौ योजन समुद्र लाघकर यहीं तक आया हू । क्या आप मुझे सीता मैथ्या का पता बताने की कृपा करेंगे ?” हनुमान जी ने उनसे पूछा, ”साथ ही मुझे यह आश्चर्य भी है कि आप यहां अपने अग्रज के शत्रु श्रीराम का नाम लेकर कैसे रह पाते हैं ?”

वीर शिरोमणि विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”वानरेन्द्र यह मेरे भ्राताश्री की विवशता है, जो वे मेरे किसी कार्य में व्यवधान नहीं डालते । मैंने आपको बताया तो था कि उनके पीछे लंका की देखभाल का दायित्व मुझ पर ही रहता है । इसीलिए वे मुझसे कुछ नहीं कहते । अब आप सुनें कि सीता जी को भ्राताश्री ने कहां रखा हुआ है ।

उन्हें यह शाप है कि वे किसी भी स्त्री से बलात्कार नहीं कर सकते । यदि ऐसा उन्होंने किया तो उसी समय उनकी मृत्यु हो जाएगी । इसीलिए पतिव्रता देवी सीता को उन्होंने अपने महल के निकट अशोक वाटिका में रखा है । वहां वे अत्यत साधारण वस्त्रों में चिंतातुर होकर एक विशाल वट वृक्ष के नीचे रहती हैं ।

परंतु उनसे भेंट करना सहज नहीं है । क्योंकि उन्हें हर समय दुर्दांत राक्षसियां घेरे रहती हैं । भ्राताजी जब कभी उनके पास उन्हें मनाने और धमकाने जाते हैं, तब वे अपनी भार्या मंदोदरी के साथ ही वहां जाते हैं । आप यदि सीता जी से मिलना चाहते हैं तो आपको छिपकर ही वहां जाना होगा । क्योंकि पूरी अशोक वाटिका में भयानक और शक्तिशाली राक्षसों का पहरा रहता है ।”

हनुमान जी ने विभीषण को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोले, ”राक्षसेश्वर विभीषण जी ! अब आप मुझे आज्ञा दीजिए । मैं सीता मैथ्या से भेंट कर लूंगा और यहां से लौटकर भक्तवत्सल श्रीराम को आपके विषय में पूरे विस्तार से बताऊंगा ।”

”जाओ हनुमान!” विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”मेरे विषय में उन्हें तभी बताना जब आप उनके कार्य को पूरा करके पूरा संदेश उन्हें दे चुके । वह भी तब, जब वे पूरी तरह शांत हों । मैं तो बार-बार यही सोचकर शंकित हूं कि क्या वे मुझ जैसे राक्षस को अपने चरणों में स्थान देंगे ।”

”क्यों नहीं देंगे ।” हनुमान जी शीघ्रता से बोले, ”वे तो करुणा के सागर हैं । जो भी निश्छल हृदय से उनका स्मरण करता है, उसे वे अपने हृदय में स्थान देते हैं । जब मुझ जैसे अधम वानर को उन्होंने इतना सम्मान दिया है, तो वे आपको क्यों नहीं अपनाएंगे? वे जरूर आपसे मैत्री करके अपना मैत्री धर्म निबाहेंगे ।” ऐसा कहकर हनुमान जी तेजी से अशोक वाटिका की ओर चले गए ।

Tuesday, March 20, 2018

भगवान श्री कृष्ण की 10 बड़ी लड़ाईयां

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कई युद्धों का संचालन किया। कहना चाहिए कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में युद्ध ही युद्ध किए। श्रीकृष्ण की जो रसिक बिहारी की छवि ‍निर्मित हुई, वह मध्यकाल के भक्त कवियों द्वारा निर्मित की गई है, क्योंकि वे अपने आराध्य को हिंसक मानने के लिए तैयार नहीं थे।

मध्यकाल के भक्तों ने श्रीकृष्ण के संबंध में कई मनगढ़ंत बातों का प्रचार किया और महाभारत के कृष्ण की छवि को पूर्णत: बदलकर रख दिया। उन्होंने कृष्ण के साथ राधा का नाम जोड़कर दोनों को प्रेमी और प्रेमिका बना दिया। उनका यह रूप आज भी जनमानस में व्यापक रूप से प्रचलित है।

खैर, हालांकि भगवान कृष्ण ने यूं तो कई असुरों का वध किया जिनमें पूतना, शकटासुर, कालिया, यमुलार्जन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ठ आदि। लेकिन हम आपको बताएंगे कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कौन-कौन से युद्ध लड़े या उनका संचालन किया। उनमें से भी प्रमुख कौन से हैं। आओ जानते हैं, श्रीकृष्ण के प्रमुख 10 युद्धों के बारे में जानकारी



श्रीकृष्ण की शक्ति के स्रोत :गवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम ‘सारंग’ था। उनके खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजञ्य’ था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम ‘जैत्र’ दूसरे का नाम ‘गरुढ़ध्वज’ था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था।

श्रीकृष्ण के पास कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था।

1. कंस से युद्ध – कंस से युद्ध तो श्रीकृष्‍ण ने जन्म लेते ही शुरू कर दिया था। कंस के कारण ही तो श्रीकृष्ण को ताड़का, पूतना, शकटासुर आदि का बचपन में ही वध करना पड़ा। भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु अवतार श्रीराम ने मारा था।

कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था और शूरसेन के पुत्र वसुदेव का विवाह कंस की बहन देवकी से हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह रखता था, लेकिन एक दिन वह देवकी के साथ रथ पर कहीं जा रहा था, तभी आकाशवाणी सुनाई पड़ी- ‘जिसे तू चाहता है, उस देवकी का 8वां बालक तुझे मार डालेगा।’ बस इसी भविष्यवाणी ने कंस का दिमाग घुमा दिया।

कंस ने अपनी बहन और बहनोई वसुदेव को जेल में डाल दिया। बाद में कंस ने 1-1 करके देवकी के 6 बेटों को जन्म लेते ही मार डाला। 7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। तदनंतर 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया। कृष्ण के जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सभी संतरी सो गए और जेल के दरवाजे अपने आप खुलते गए। वसुदेव मथुरा की जेल से शिशु कृष्ण को लेकर नंद के घर पहुंच गए।

बाद में कंस को जब पता चला तो उसके मंत्रियों ने अपने प्रदेश के सभी नवजात शिशुओं को मारना प्रारंभ कर दिया। बाद में उसे कृष्ण के नंद के घर होने के पता चला तो उसने अनेक आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों से कृष्ण को मरवाना चाहा, पर सभी कृष्ण तथा बलराम के हाथों मारे गए।

तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया। वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की।

2. जरासंध से युद्ध – कंस वध के बाद जरासंध से तो कृष्ण ने कई बार युद्ध किया। जरासंध कंस का ससुर था इसलिए उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर कई बार आक्रमण किया। जरासंध मगध का अत्यंत क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण के अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, कश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है।

जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद (मथुरा) पर एक बार नहीं, कई बार चढ़ाई की, लेकिन हर बार वह असफल रहा। पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग, कोशल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज, गांधार का राजा सुबल, नग्नजित का राजा मीर, दरद देश का राजा गोभर्द आदि। महाभारत युद्ध से पहले भीम ने जरासंध के शरीर को 2 हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था।

3. कालयवन से युद्ध – पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया। ऐसा कहा जाता है कि इसी युद्ध के बाद श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा।

कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा।

उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

4. कृष्ण और अर्जुन का युद्ध – कहते हैं कि एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन में द्वंद्व युद्ध हुआ था। यह श्रीकृष्ण के जीवन का भयंकर द्वंद्व युद्ध था। माना जाता है कि यह युद्ध कृष्ण की बहन सुभद्रा की प्रतिज्ञा के कारण हुआ था।

अंत में इस युद्ध में दोनों ने अपने-अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे, लेकिन देवताओं के हस्तक्षेप करने से ही वे दोनों शांत हुए थे।

5. शिव और कृष्ण का जीवाणु युद्ध – माना जाता है कि कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय ‘माहेश्वर ज्वर’ के विरुद्ध ‘वैष्णव ज्वर’ का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ लड़ा था।

बलि के 10 पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था। बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप शिव से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किए थे। वह शोणितपुर पर राज्य करता था। बाणासुर को भगवान शिव ने अपना पुत्र माना था इसलिए उन्होंने उसकी जान बचाने के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध किया था। बाणासुर अहंकारी, महापापी और अधर्मी था।

कहते हैं कि इस युद्ध में श्रीकृष्ण ने शिव पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया था। इस युद्ध में बाणासुर की जान बचाने की लिए स्वयं मां पार्वती जब सामने आकर खड़ी हो गईं, तब श्रीकृष्ण ने बाणासुर को अभयदान दिया।

6. नरकासुर से युद्ध – नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुंडल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।’

इंद्र ने कहा, ‘भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दर कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।’

इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरूड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के 6 पुत्रों- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।

मुर दैत्य का वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।

7. महाभारत युद्ध – महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व हुआ था। तब श्रीकृष्ण 55 या 56 वर्ष के थे। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उनकी उम्र 83 वर्ष की थी। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने देह त्याग दी थी। इसका मतलब 119 वर्ष की आयु में उन्होंने देहत्याग किया था। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईपू में हुआ। श्रीकृष्ण ने यह युद्ध नहीं लड़ा था लेकिन उन्होंने इस युद्ध का संचालन जरूर किया था।

माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था और 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे। लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। कलियुग के आरंभ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरंभ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था। इस युद्ध में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।

8. चाणूर और मुष्टिक से युद्ध – श्रीकृष्‍ण ने 16 वर्ष की उम्र में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। कहते हैं कि यह मार्शल आर्ट की विद्या थी। पूर्व में इस विद्या का नाम कलारिपट्टू था।

जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कलारिपट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली।

9. कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध – भगवान श्रीकृष्ण का जाम्बवंत से द्वंद्व युद्ध हुआ था। जाम्बवंत रामायण काल में थे और उनको अजर-अमर माना जाता है। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम जाम्बवती था। जाम्बवंतजी से भगवान श्रीकृष्ण को स्यमंतक मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं, बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी।

सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रख ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंत ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।

तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने राम स्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।

10. पौंड्रक-कृष्ण युद्ध – चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। इसलिए वह खुद को वासुदेव कहता था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी के तट पर किरात, वंग एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला है। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है।

एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।’

युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं वह गरूड़ पर आरूढ़ था। नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपट रूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।

मूषक क्यों बना गणेश जी का वाहन !!


गणेश जी ने अपना वाहन मूषक क्यों चुना इस विषय में कई कथाएं मिलती हैं। एक कथा के अनुसार गजमुखासुर नामक एक असुर से गजानन का युद्ध हुआ। गजमुखासुर को यह वरदान प्राप्त था कि वह किसी अस्त्र से नहीं मर सकता। गणेश जी ने इसे मारने के लिए अपने एक दांत को तोड़ा और गजमुखासुर पर वार किया। गजमुखासुर इससे घबरा गया और मूषक बनकर भागने लगा। गणेश जी ने मूषक बने गजमुखासुर को अपने पाश में बांध लिया। गजमुखासुर गणेश जी से क्षमा मांगने लगा। गणेश जी ने गजमुखासुर को अपना वाहन बनाकर जीवनदान दे दिया।
एक अन्य कथा का जिक्र गणेश पुराण में मिलता है। जिसके अनुसार द्वापर युग में एक बहुत ही बलवान मूषक महर्षि पराशर के आश्रम में आकर महर्षि को परेशान करने लगा। उत्पाती मूषक ने महर्षि के आश्रम के मिट्टी के बर्तन तोड़ दिये। आश्रम में रखे अनाज को नष्ट कर दिया। ऋषियों के वस्त्र और ग्रंथों को कुतर डाला।

महर्षि पराशर मूषक की इस करतूत से दुःखी होकर गणेश जी की शरण में गये। गणेश जी महर्षि की भक्ति से प्रसन्न हुए और उत्पाती मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका। पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक पहुंच गया और उसे बांधकर गणेश जी के सामने ले आया।

गणेश जी को सामने देखकर मूषक उनकी स्तुति करने लगा। गणेश जी ने कहा तुमने महर्षि पराशर को बहुत परेशान किया है लेकिन अब तुम मेरी शरण में हो इसलिए जो चाहो वरदान मांग लो। गणेश जी के ऐसे वचन सुनते ही मूषक का अभिमान जाग उठा। उसने कहा कि मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, अगर आपको मुझसे कुछ चाहिए तो मांग लीजिए। गणेश जी मुस्कुराए और मूषक से कहा कि तुम मेरा वाहन बन जाओ।

अपने अभिमान के कारण मूषक गणेश जी का वाहन बन गया। लेकिन जैसे ही गणेश जी मूषक पर चढ़े गणेश जी के भार से वह दबने लगा। मूषक ने गणेश जी से कहा कि प्रभु मैं आपके वजन से दबा जा रहा हूं। अपने वाहन की विनती सुनकर गणेश जी ने अपना भार कम कर लिया। इसके बाद से मूषक गणेश जी का वाहन बनकर उनकी सेवा में लगा हुआ है।

गणेश पुराण में यह भी वर्णन किया गया है कि हर युग में गणेश जी का वाहन बदलता रहता है। सतयुग में गणेश जी का वाहन सिंह है। त्रेता युग में गणेश जी का वाहन मयूर है और वर्तमान युग यानी कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है।

Thursday, March 15, 2018

शिव और विष्णु मे बड़ा कौन ?

भगवान विष्णु और  शिव में से कौन सबसे ज्यादा शक्तिशाली है ?


भारत में सदियों से वैष्णवों और शैव सम्प्रदाय को मानने वालों के बीच श्रेष्ठता का झगड़ा होता रहा है. लेकिन आपने कभी सुन है कि भगवान भी आपस में लड़ते हैं. नहीं न तो चलिए आज आपको बताते हैं एक ऐसी ही कहानी के बारे में. दोस्तों देवाताओं और राक्षस के युद्ध की तो कई कहानियां आपने सुनी होंगी. रामायण और महाभारत के युद्ध की कहानी के बारे में भी सब लोग जानते हैं.

लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव के बीच भी कभी भयंकर युद्ध हुआ था. बहुत ही कम लोगों को ये पता है कि इन दोनों के बीच भी युद्ध हुआ था. ये कहानी भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी हुई है. प्रह्लाद की रक्षा के लिए विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण करके हिरण्यकश्यप का वध अपने पंजे से कर दिया.

भक्त पर हुए अत्याचार से नाराज नरसिंह पूरी सृष्टि के विनाश के लिए उतारु हो गए. उन्होंने समस्त देवताओं यहां तक कि ब्रह्माजी और लक्ष्मीजी की प्रार्थना भी अस्वीकार कर दी. दरअसल आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान विष्णु और भगवान शिव में से कौन सबसे ज्यादा शक्तिशाली है. जानने के लिए देखें नीचे दी गई वीडियो.

आज हम आपको बताने वाले हैं की भगवान शिव और भगवान विष्णु में से बड़ा कौन है. हर किसी के मन में ये सवाल उठता ही रहता है की शिव बड़े हैं या विष्णु तो आज हम इसी सवाल का जवाब लेकर आएं हैं. भगवान शिव त्रिमूर्ति में से एक हैं, अन्य दो भगवान विश्व रचयिता बह्मा तथा संरक्षक देवता विष्णु हैं. शिव को विनाशक माना जाता है, उन्हें देवों का देव कहा जाता है.

उन्हें असीम, निराकार और तीनों देवताओं में सबसे बड़ा माना जाता है. शिव के कई डरावने रूप हैं जो भयानक रूप से शक्तिशाली हैं. त्रिमूर्ति में उन्हें प्रभावित करना सबसे आसान है तथा इनके क्रोध की तीव्रता भी सबसे अधिक है. ऐसा कहा जाता है कि जब जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते है. भगवान शिव और भगवान विष्णु ने अनेको बार पृथ्वी पर अवतार लिया है.

Tuesday, March 13, 2018

भगवान कृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत उठाया

गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। 


गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। पांच हजार साल पहले यह गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था और अब शायद 30 मीटर ही रह गया है। पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली पर उठा लिया था। श्रीगोवर्धन पर्वत मथुरा से 22 किमी की दूरी पर स्थित है।
पौराणिक मान्यता अनुसार श्रीगिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि जब रामसेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमानजी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देववाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है, तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।

क्यों उठाया गोवर्धन पर्वत :

इस पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली से उठा लिया था। कारण यह था कि मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को वह अति जलवृष्टि से बचाना चाहते थे। नगरवासियों ने इस पर्वत के नीचे इकठ्ठा होकर अपनी जान बचाई। अति जलवृष्टि इंद्र ने कराई थी। लोग इंद्र से डरते थे और डर के मारे सभी इंद्र की पूजा करते थे, तो कृष्ण ने कहा था कि आप डरना छोड़ दे...मैं हूं ना।

सभी हिंदूजनों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का महत्व है। वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है।

इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।

परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं। गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न हैं।

परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जातिपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं। यह अर्जी लगाने जैसा है। पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है।

वैष्णवजन मानते हैं कि गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहां शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथद्वारा तक जाती है।

गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहां की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं। प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर यहां की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है। श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है।

अब बात करते हैं पर्वत की स्थिति की। क्या सचमुच ही पिछले पांच हजार वर्ष से यह स्वत: ही रोज एक मुठ्ठी खत्म हो रहा है या कि शहरीकरण और मौसम की मार ने इसे लगभग खत्म कर दिया। आज यह कछुए की पीठ जैसा भर रह गया है।

हालांकि स्थानीय सरकार ने इसके चारों और तारबंदी कर रखी है फिर भी 21 किलोमीटर के अंडाकार इस पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है कि मानो बड़े-बड़े पत्‍थरों के बीच भूरी मिट्टी और कुछ घास जबरन भर दी गई हो। छोटी-मोटी झाड़ियां भी दिखाई देती है।

पर्वत को चारों तरफ से गोवर्धन शहर और कुछ गांवों ने घेर रखा है। गौर से देखने पर पता चलता है कि पूरा शहर ही पर्वत पर बसा है, जिसमें दो हिस्से छूट गए है उसे ही गिर्राज (गिरिराज) पर्वत कहा जाता है। इसके पहले हिस्से में जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, पूंछरी का लौठा प्रमुख स्थान है तो दूसरे हिस्से में राधाकुंड, गोविंद कुंड और मानसी गंगा प्रमुख स्थान है।

बीच में शहर की मुख्य सड़क है उस सड़क पर एक भव्य मंदिर हैं, उस मंदिर में पर्वत की सिल्ला के दर्शन करने के बाद मंदिर के सामने के रास्ते से यात्रा प्रारंभ होती है और पुन: उसी मंदिर के पास आकर उसके पास पीछे के रास्ते से जाकर मानसी गंगा पर यात्रा समाप्त होती है।

मानसी गंगा के थोड़ा आगे चलो तो फिर से शहर की वही मुख्य सड़क दिखाई देती है। कुछ समझ में नहीं आता कि गोवर्धन के दोनों और सड़क है या कि सड़क के दोनों और गोवर्धन? ऐसा लगता है कि सड़क, आबादी और शासन की लापरवाही ने खत्म कर दिया है गोवर्धन पर्वत को।