Shri Radhe Maa, also called Mamtamai Shri Radhe Guru Maa and Guru Maa by her devotees, is a Hindu spiritual teacher and guru from India. Shri Radhe Maa emphasises the need for surrender to God, humility, truthfulness, self-discipline and self-restrain. Radhe Maa urges devotees to engage with society through initiatives like donation of blood, clothes, food, books and medicines to orphanages, old age homes and sadhus
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Tuesday, March 3, 2020
माँ चिंतपूर्णी जी के पवित्र ज्योति के दर्शन।
१ मार्च २०२०, श्री राधे माँ चैरिटेबल सोसाइटी, नई दिल्ली: माँ चिंतपूर्णी
जी के पवित्र ज्योति के दर्शन। चिंतपूर्णी मंदिर से धार्मिक समागम के लिए
माता की पवित्र ज्योति लेकर पहुंचे थे बारीदार सभा के प्रधान श्री रविंद्र
छिंदा जी।
`For medical and educational help, we are a helping hand. For more information, call Nandi Baba on 9820969020 or visit our website at www.radhemaa.com
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Wednesday, February 26, 2020
Dorangla, Punjab: Clothes Distribution - Shri Radhe Maa
16 Feb 2020, Dorangla, Punjab: Clothes Distribution to needy people in
Baupur Afghana Village, Gurdaspur by Shri Radhe Maa Charitable Society,
New Delhi.
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15 Feb 2020, Mumbai: Shirdi Yatra - Handicapped & Senior Citizen
15 Feb 2020, Mumbai: Shirdi Yatra - Handicapped & Senior Citizen
Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust organised Shri Kshetra Shirdi Sai Baba & Shani Shignapur Tirth Darshan with Sai Sewak Mandal (Borivali, Mumbai) for Handicapped & Senior Citizen.
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Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust organised Shri Kshetra Shirdi Sai Baba & Shani Shignapur Tirth Darshan with Sai Sewak Mandal (Borivali, Mumbai) for Handicapped & Senior Citizen.
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Monday, January 29, 2018
महाभारत कथा : दुर्योधन ने भीम को पहुंचाया नाग लोक में
दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से शिकायत की, ‘मैंने भीम को मारने की कितनी कोशिशें की, लेकिन किसी न किसी तरह से वह बच ही जाता है।’ यह सुन कर धृतराष्ट्र हैरान रह गए। महल के भीतर ही उनका पुत्र अपने चचेरे भाई को मारने की योजना बना रहा था। और वह भी तब, जब दोनों सिर्फ सोलह साल के थे।
शकुनी ने सिखाया दुर्योधन को चालें रचना
कुनि ने दुर्योधन को सलाह दी, ‘ऐसे काम नहीं बनेगा। अगर हम उसे महल के बाहर मारने की योजना बनाएं, तो वहां हम जो करना चाहेंगे, वह ज्यादा आजादी के साथ कर पाएंगे। महल में तुम्हें उसे चालाकी से मारना होगा, मगर तुम्हारा चचेरा भाई इतना शक्तिशाली है, कि उसे ऐसे मारना मुश्किल है।’ उसने आगे कहा, ‘शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ दिल के भाव को व्यक्त करने के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि मन में चल रही बातों को छिपाने के लिए भी किया जाता है। भीम से दोस्ती करो। उससे प्रेम के साथ पेश आओ। उसके साथ कुश्ती मत लड़ो, उसे गले लगाओ। उसे गुस्से से मत देखो, मुस्कुरा कर देखो। वह मूर्ख है, तुम्हारी बातों में आ जाएगा।’
इस तरह एक बहादुर, निर्भय. और एक सीध में सोचने वाला दुर्योधन धोखेबाज और छली बन गया। उसके अंदर हमेशा से जलन, नफरत और गुस्सा तो था, मगर धोखेबाजी उसे शकुनि ने सिखाई। इसके बाद दुर्योधन ने पांचों भाइयों, खास तौर पर भीम से दोस्ती कर ली। उन सभी को लगा कि दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है, और वह उनसे प्रेम करने लगा है। सिर्फ सहदेव, जो पांचों में सबसे बुद्धिमान था, इस झांसे में नहीं आया और उसने दूरी बनाए रखी।
सिर्फ सहदेव समझते थे कौरवों की चालें
सहदेव को ऐसी बुद्धि कैसे मिली, इसके पीछे भी एक कहानी है। एक दिन जंगल में अलाव के पास बैठे हुए, उनके पिता पांडु ने अपने पुत्रों से कहा, ‘इन सोलह सालों में मैं न सिर्फ तुम्हारी माताओं से दूर रहा, बल्कि ब्रह्मचर्य की साधना करके असाधारण भीतरी शक्ति और बहुत ज्यादा दूरदर्शिता, परख तथा बुद्धि हासिल की है। मगर मैं कोई गुरु नहीं हूं। इसलिए मैं नहीं जानता कि इन गुणों को तुम लोगों तक कैसे पहुंचाऊं। जिस दिन मेरी मृत्यु होगी, तुम सब को बस इतना करना है कि मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा लेकर खा लेना। अगर तुम मेरे मांस को अपने शरीर का एक हिस्सा बना लोगे, तो मेरी बुद्धिमत्ता अपने आप तुम्हारे अंदर पहुंच जाएगी और तुम लोगों को उसके लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।’
जब पांडु की मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार किया जा रहा था, तो भावनाओं के वशीभूत होकर लगभग हर कोई इस बात को पूरी तरह भूल गया। सिर्फ सबसे छोटे और विचारशील सहदेव ने जब एक चींटी को पांडु के मांस का एक छोटा सा टुकड़ा ले जाते देखा, तो उसे पिता की बात याद आ गई। उसने वह टुकड़ा चींटी से छीनकर खा लिया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी और शक्ति बढ़ गई।
कृष्ण का आदेश पाकर चुप रहे सहदेव
वह राजाओं के बीच एक ऋषि की तरह जी सकता था मगर कृष्ण ने भांप लिया था कि उसकी बुद्धिमानी भाग्य की धारा को रोक देगी। इसीलिए एक बार उन्होंने सहदेव को टोकते हुए उससे कहा – ‘यह मेरा आदेश कि कभी अपनी बुद्धि को प्रकट मत करना। अगर कोई तुमसे प्रश्न पूछता है, तो उसका उत्तर हमेशा दूसरे प्रश्न के रूप में देना।’
उस दिन के बाद से सहदेव हमेशा प्रश्नों के जवाब प्रश्नों से ही देते, जिन्हें बहुत कम लोग समझ पाते। उसे समझने वाले लोग उसकी बुद्धिमानी को देख सकते थे और जिन्हें ये प्रश्न समझ में नहीं आते थे, उन्हें लगता था कि वह सिर्फ हर चीज को लेकर अस्पष्टता और भ्रम पैदा करना चाहता है। एक पूरा शास्त्र इसी से निकला है, जिसे ‘सहदेव – बुद्धि’ कहा जाता है। आज भी दक्षिण भारत में अगर कोई ज्यादा चतुराई दिखाने की कोशिश करता है, तो कहा जाता है, ‘वह सहदेव बनने की कोशिश कर रहा है।’ क्योंकि लोगों को लगता था कि वह सवालों में जवाब देकर चतुराई दिखाने की कोशिश करते थे। मगर वास्तव में वह कृष्ण के आदेश का पालन कर रहे थे। जिससे सिर्फ बुद्धिमान लोगों को ही यह समझ आता था, कि वो उन्हें उत्तर देने की कोशिश कर रहा है। अन्य लोग ये बात नहीं समझ पाते थे।
पांडव फंस गए दुर्योधन की चाल में
सिर्फ सहदेव दुर्योधन के दिल में झांक सकते थे, जहां उसे सिर्फ जहर दिखाई दिया। बाकी चार भाई दुर्योधन के जाल में फंस चुके थे। दुर्योधन उन पर उपहारों की बरसात करता। भीम को सिर्फ एक ही उपहार की परवाह रहती थी – वो था भोजन। दुर्योधन उसे खूब खिलाता। भीम इतना पेटू था कि भोजन के सामने आते ही वह सब कुछ भूल जाता। जो उसे भोजन कराता, वह उसके लिए मित्र था। उसे हर समय भूख लगी रहती थी, इसलिए वह खाता रहा, खाता रहा और विशालकाय हो गया। एक दिन दुर्योधन ने पिकनिक पर चलने का प्रस्ताव रखा। शकुनि ने बहुत सावधानी से योजना बनाई। उन्होंने प्रमनकोटि नाम की जगह पर नदी के किनारे एक मंडप बनवाया। सभी लोग वहां गए और ढेर सारा भोजन परोसा गया। दुर्योधन ने मेजबान की भूमिका को खूब अच्छी तरह निभाया। उसने हरेक पांडव के पास जाकर अपने हाथ से उन्हें खिलाया। भीम को अकेले इतना भोजन परोसा गया, जितना बाकी सब ने मिलकर खाया। हर किसी ने खूब दावत उड़ाई। मूर्ख लोग दुर्योधन के इस बर्ताव पर मुग्ध थे – बस सहदेव एक कोने में बैठकर चुपचाप देखता रहा।
नाग लोक पहुंचे भीम :-
भोजन के बाद जब मिष्ठान का समय आया, तो भीम को एक प्लेट भरकर मिष्ठान दिया गया। उसमें धीमे असर करने वाला एक खास जहर मिलाया गया था। भीम ने पूरी प्लेट साफ कर दी। फिर वे सब नदी में तैरने और मस्ती करने चले गए। कुछ देर बाद भीम पानी से बाहर निकला और नदी के तट पर लेट गया। बाकी लोग वापस मंडप में जाकर मजे करने लगे और आपस में कहानियां सुनाने लगे। कुछ समय बाद, दुर्योधन नदी तक वापस गया तो उसने भीम को आधी बेहोशी की हालत में पाया। उसने भीम के हाथ-पैर बांध कर उसे नदी में फेंक दिया। भीम नीचे डूबकर ऐसी जगह पहुंचा, जहां बहुत सारे जहरीले सांप थे।
शकुनी ने सिखाया दुर्योधन को चालें रचना
कुनि ने दुर्योधन को सलाह दी, ‘ऐसे काम नहीं बनेगा। अगर हम उसे महल के बाहर मारने की योजना बनाएं, तो वहां हम जो करना चाहेंगे, वह ज्यादा आजादी के साथ कर पाएंगे। महल में तुम्हें उसे चालाकी से मारना होगा, मगर तुम्हारा चचेरा भाई इतना शक्तिशाली है, कि उसे ऐसे मारना मुश्किल है।’ उसने आगे कहा, ‘शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ दिल के भाव को व्यक्त करने के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि मन में चल रही बातों को छिपाने के लिए भी किया जाता है। भीम से दोस्ती करो। उससे प्रेम के साथ पेश आओ। उसके साथ कुश्ती मत लड़ो, उसे गले लगाओ। उसे गुस्से से मत देखो, मुस्कुरा कर देखो। वह मूर्ख है, तुम्हारी बातों में आ जाएगा।’
इस तरह एक बहादुर, निर्भय. और एक सीध में सोचने वाला दुर्योधन धोखेबाज और छली बन गया। उसके अंदर हमेशा से जलन, नफरत और गुस्सा तो था, मगर धोखेबाजी उसे शकुनि ने सिखाई। इसके बाद दुर्योधन ने पांचों भाइयों, खास तौर पर भीम से दोस्ती कर ली। उन सभी को लगा कि दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है, और वह उनसे प्रेम करने लगा है। सिर्फ सहदेव, जो पांचों में सबसे बुद्धिमान था, इस झांसे में नहीं आया और उसने दूरी बनाए रखी।
सिर्फ सहदेव समझते थे कौरवों की चालें
सहदेव को ऐसी बुद्धि कैसे मिली, इसके पीछे भी एक कहानी है। एक दिन जंगल में अलाव के पास बैठे हुए, उनके पिता पांडु ने अपने पुत्रों से कहा, ‘इन सोलह सालों में मैं न सिर्फ तुम्हारी माताओं से दूर रहा, बल्कि ब्रह्मचर्य की साधना करके असाधारण भीतरी शक्ति और बहुत ज्यादा दूरदर्शिता, परख तथा बुद्धि हासिल की है। मगर मैं कोई गुरु नहीं हूं। इसलिए मैं नहीं जानता कि इन गुणों को तुम लोगों तक कैसे पहुंचाऊं। जिस दिन मेरी मृत्यु होगी, तुम सब को बस इतना करना है कि मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा लेकर खा लेना। अगर तुम मेरे मांस को अपने शरीर का एक हिस्सा बना लोगे, तो मेरी बुद्धिमत्ता अपने आप तुम्हारे अंदर पहुंच जाएगी और तुम लोगों को उसके लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।’
जब पांडु की मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार किया जा रहा था, तो भावनाओं के वशीभूत होकर लगभग हर कोई इस बात को पूरी तरह भूल गया। सिर्फ सबसे छोटे और विचारशील सहदेव ने जब एक चींटी को पांडु के मांस का एक छोटा सा टुकड़ा ले जाते देखा, तो उसे पिता की बात याद आ गई। उसने वह टुकड़ा चींटी से छीनकर खा लिया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी और शक्ति बढ़ गई।
कृष्ण का आदेश पाकर चुप रहे सहदेव
वह राजाओं के बीच एक ऋषि की तरह जी सकता था मगर कृष्ण ने भांप लिया था कि उसकी बुद्धिमानी भाग्य की धारा को रोक देगी। इसीलिए एक बार उन्होंने सहदेव को टोकते हुए उससे कहा – ‘यह मेरा आदेश कि कभी अपनी बुद्धि को प्रकट मत करना। अगर कोई तुमसे प्रश्न पूछता है, तो उसका उत्तर हमेशा दूसरे प्रश्न के रूप में देना।’
उस दिन के बाद से सहदेव हमेशा प्रश्नों के जवाब प्रश्नों से ही देते, जिन्हें बहुत कम लोग समझ पाते। उसे समझने वाले लोग उसकी बुद्धिमानी को देख सकते थे और जिन्हें ये प्रश्न समझ में नहीं आते थे, उन्हें लगता था कि वह सिर्फ हर चीज को लेकर अस्पष्टता और भ्रम पैदा करना चाहता है। एक पूरा शास्त्र इसी से निकला है, जिसे ‘सहदेव – बुद्धि’ कहा जाता है। आज भी दक्षिण भारत में अगर कोई ज्यादा चतुराई दिखाने की कोशिश करता है, तो कहा जाता है, ‘वह सहदेव बनने की कोशिश कर रहा है।’ क्योंकि लोगों को लगता था कि वह सवालों में जवाब देकर चतुराई दिखाने की कोशिश करते थे। मगर वास्तव में वह कृष्ण के आदेश का पालन कर रहे थे। जिससे सिर्फ बुद्धिमान लोगों को ही यह समझ आता था, कि वो उन्हें उत्तर देने की कोशिश कर रहा है। अन्य लोग ये बात नहीं समझ पाते थे।
पांडव फंस गए दुर्योधन की चाल में
सिर्फ सहदेव दुर्योधन के दिल में झांक सकते थे, जहां उसे सिर्फ जहर दिखाई दिया। बाकी चार भाई दुर्योधन के जाल में फंस चुके थे। दुर्योधन उन पर उपहारों की बरसात करता। भीम को सिर्फ एक ही उपहार की परवाह रहती थी – वो था भोजन। दुर्योधन उसे खूब खिलाता। भीम इतना पेटू था कि भोजन के सामने आते ही वह सब कुछ भूल जाता। जो उसे भोजन कराता, वह उसके लिए मित्र था। उसे हर समय भूख लगी रहती थी, इसलिए वह खाता रहा, खाता रहा और विशालकाय हो गया। एक दिन दुर्योधन ने पिकनिक पर चलने का प्रस्ताव रखा। शकुनि ने बहुत सावधानी से योजना बनाई। उन्होंने प्रमनकोटि नाम की जगह पर नदी के किनारे एक मंडप बनवाया। सभी लोग वहां गए और ढेर सारा भोजन परोसा गया। दुर्योधन ने मेजबान की भूमिका को खूब अच्छी तरह निभाया। उसने हरेक पांडव के पास जाकर अपने हाथ से उन्हें खिलाया। भीम को अकेले इतना भोजन परोसा गया, जितना बाकी सब ने मिलकर खाया। हर किसी ने खूब दावत उड़ाई। मूर्ख लोग दुर्योधन के इस बर्ताव पर मुग्ध थे – बस सहदेव एक कोने में बैठकर चुपचाप देखता रहा।
नाग लोक पहुंचे भीम :-
भोजन के बाद जब मिष्ठान का समय आया, तो भीम को एक प्लेट भरकर मिष्ठान दिया गया। उसमें धीमे असर करने वाला एक खास जहर मिलाया गया था। भीम ने पूरी प्लेट साफ कर दी। फिर वे सब नदी में तैरने और मस्ती करने चले गए। कुछ देर बाद भीम पानी से बाहर निकला और नदी के तट पर लेट गया। बाकी लोग वापस मंडप में जाकर मजे करने लगे और आपस में कहानियां सुनाने लगे। कुछ समय बाद, दुर्योधन नदी तक वापस गया तो उसने भीम को आधी बेहोशी की हालत में पाया। उसने भीम के हाथ-पैर बांध कर उसे नदी में फेंक दिया। भीम नीचे डूबकर ऐसी जगह पहुंचा, जहां बहुत सारे जहरीले सांप थे।
Soruce :- http://bit.ly/2DGDrJn
Tuesday, January 9, 2018
कृष्ण-रुक्मिणी विवाह
“कृं कृष्णाय नमः”.
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं- इस प्रकार कह-सुनकर सब-के-सब राजा क्रोध से आग बबूला हो उठे और कवच पहनकर अपने-अपने वाहनों पर सवार हो गये। अपनी-अपनी सेना के सात सब धनुष ले-लेकर भगवान श्रीकृष्ण पीछे दौड़े। राजन! जब यदुवंशियों के सेनापतियों ने देखा कि शत्रुदल हम पर चढ़ा आ रहा है, तब उन्होंने भी अपने-अपने धनुष का टंकार किया और घूमकर उनके सामने डट गये। जरासंध की सेना के लोग कोई घोड़े पर, कोई हाथी पर, तो कोई रथ पर चढ़े हुए थे। वे सभी धनुर्वेद के बड़े मर्मज्ञ थे। वे यदुवंशियों पर इस प्रकार बाणों की वर्षा करने लगे, मानो दल-के-दल बादल पहाड़ो पर मूसलधार पानी बरसा रहे हों। परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने देखा कि उनके पति श्रीकृष्ण की सेना बाण-वर्षा से ढक गयी है। तब उन्होंने लज्जा के साथ भयभीत नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखा। भगवान ने हँसकर कहा- "सुन्दरी! डरो मत! तुम्हारी सेना अभी तुम्हारे शत्रुओं की सेना को नष्ट किये डालती है।" इधर गद और संकर्षण आदि यदुवंशी वीर अपने शत्रुओं का पराक्रम और अधिक न सह सके। वे अपने बाणों से शत्रुओं के हाथी, घोड़े तथा रथों को छिन्न-भिन्न करने लगे। उनके बाणों से रथ, घोड़े और हाथियों पर बैठे विपक्षी वीरों के कुण्डल, किरीट और पगड़ियों से सुशोभित करोंड़ों सिर, खड्ग, गदा और धनुषयुक्त हाथ, पहुँचे, जाँघें और पैर कट-कटकर पृथ्वी पर गिरने लगे। इसी प्रकार घोड़े, खच्चर, हाथी, ऊँट, गधे और मनुष्यों के सिर भी कट-कटकर रणभूमि में लोटने लगे। अन्त में विजय की सच्ची आकांक्षा वाले यदुवंशियों ने शत्रुओं की सेना तहस-नहस कर डाली। जरासंध आदि सभी राजा युद्ध से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।
उधर शिशुपाल अपनी भावी पत्नी के छिन जाने के कारण मरणासन्न-सा हो रहा था। न तो उसके हृदय में उत्साह रह गया था और न तो शरीर पर कान्ति। उसका मुँह सूख रहा था। उसके पास जाकर जरासंध कहने लगा- "शिशुपालजी! आप तो एक श्रेष्ठ पुरुष हैं, यह उदासी छोड़ दीजिये। क्योंकि राजन! कोई भी बात सर्वदा अपने मन के अनुकूल ही हो या प्रतिकूल, इस सम्बन्ध में कुछ स्थिरता किसी भी प्राणी के जीवन में नहीं देखी जाती। जैसे कठपुतली बाजीगर की इच्छा के अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवदिच्छा के अधीन रहकर सुख और दुःख के सम्बन्ध में यथा शक्ति चेष्टा करता रहता है। देखिये, श्रीकृष्ण ने मुझे तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेनाओं के साथ सत्रह बार हरा दिया, मैंने केवल एक बार-अठारहवीं बार उन पर विजय प्राप्त की। फिर भी इस बात को लेकर मैं न तो कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्ध के अनूसार काल भगवान ही इस चराचर जगत को झकझोरते रहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि हम लोग बड़े-बड़े वीर सेनापतियों के भी नायक हैं। फिर भी, इस समय श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित यदुवंशियों की थोड़ी-सी सेना ने हमें हरा दिया है। इस बार हमारे शत्रुओं की ही जीत हुई, क्योंकि काल उन्हीं के अनुकूल था। जब काल हमारे दाहिने होगा, तब हम भी उन्हें जीत लेंगे।"
रुक्मिणीजी का बड़ा भाई रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से बहुत द्वेष रखता था। उसको यह बात बिलकुल सहन न हुई कि मेरी बहिन को श्रीकृष्ण हर ले जायँ और राक्षस रीति से बलपूर्वक उसके साथ विवाह करें। रुक्मी बली तो था ही, उसने एक अक्षौहिणी सेना साथ ले ली और श्रीकृष्ण का पीछा किया। महाबाहु रुक्मी क्रोध के मारे जल रहा था। उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियों के सामने यह प्रतिज्ञा की- "मैं आप लोगों के बीच में यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्ध में श्रीकृष्ण को न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणी को न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा। यह कहकर वह रथ पर सवार हो गया और सारथि से बोला- "जहाँ कृष्ण हो वहाँ शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ ले चलो। आज मेरा उसी के साथ युद्ध होगा। आज मैं अपने तीखे बाणों से उस खोटी बुद्धि वाले ग्वाले के बल-वीर्य का घमंड चूर-चूर कर दूँगा। देखो तो उसका साहस, वह हमारी बहिन को बलपूर्वक हर ले गया है। रुक्मी की बुद्धि बिगड़ गयी थी। वह भगवान के तेज-प्रभाव को बिलकुल नहीं जानता था। इसी से इस प्रकार बहक-बहककर बातें करता हुआ वह एक ही रथ से श्रीकृष्ण के पास पहुँचकर ललकारने लगा- "खड़ा रह! खड़ा रह।" उसने अपने धनुष को बलपूर्वक खींचकर भगवान श्रीकृष्ण को तीन बाण मारे और कहा- "एक क्षण मेरे सामने ठहर! यदुवंशियों के कुलकलंक! जैसे कौआ होम की सामग्री चुराकर उड़ जाय, वैसे ही तू मेरी बहिन को चुराकर कहाँ भागा जा रहा है? अरे मन्द! तू बड़ा मायावी और कपट-युद्ध में कुशल है। आज मैं तेरा सारा गर्व खर्व किये डालता हूँ। देख! जब तक मेरे बाण तुझे धरती पर सुला नहीं देते, उसके पहले ही इस बच्ची को छोड़कर भाग जा।"
रुक्मी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने उसका धनुष काट डाला और उस पर छः बाण छोड़े। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण ने आठ बाण उसके चार घोंड़ो पर और दो सारथि पर छोड़े और तीन बाणों से उसके रथ की ध्वजा को काट डाला। तब रुक्मी ने दूसरा धनुष उठाया और भगवान श्रीकृष्ण को पाँच बाण मारे। उन बाणों के लगने पर उन्होंने उसका वह धनुष भी काट डाला। रुक्मी ने इसके बाद एक और धनुष लिया, परन्तु हाथ में लेते-ही-लेते अविनाशी अच्युत ने उसे भी काट डाला। इस प्रकार रुक्मी ने परिघ, पट्टिश, शूल, ढाल, तलवार, शक्ति और तोमर-जितने अस्त्र-शस्त्र उठाये, उन सभी को भगवान ने प्रहार करने के पहले ही काट डाला। अब रुक्मी क्रोधवश हाथ में तलवार लेकर भगवान श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से रथ से कूद पड़ा और इस प्रकार उनकी ओर झपटा, जैसे पतिंगा आग की ओर लपकता है। जब भगवान ने देखा कि रुक्मी मुझ पर चोट करना चाहता है, तब उन्होंने अपने बाणों से उसकी ढाल-तलवार को तिल-तिलकर करके काट दिया और उसको मार डालने के लिये हाथ में तीखी तलवार निकाल ली। जब रुक्मिणीजी ने देखा कि ये तो हमारे भाई को अब मार ही डालना चाहते हैं, तब वे भय विह्वल हो गयीं और अपने प्रियतम पति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरकर करुण-स्वर में बोलीं- "देवताओं के भी आराध्यदेव! जगत्पते! आप योगेश्वर हैं। आपके स्वरूप और इच्छाओं को कोई जान नहीं सकता। आप परम बलवान हैं, परन्तु कल्याण स्वरूप भी तो हैं। प्रभो! मेरे भैया को मारना आपके योग्य काम नहीं है।"
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- रुक्मिणीजी का एक-एक अंग भय के मारे थर-थर काँप रहा था। शोक की प्रबलता से मुँह सूख गया था, गला रूँध गया था। आतुरतावश सोने का हार गले से गिर पड़ा था और इसी अवस्था में वे भगवान के चरणकमल पकड़े हुए थीं। परम दयालु भगवान उन्हें भयभीत देखकर करुणा से द्रवित हो गये। उन्होंने रुक्मी को मार डालने का विचार छोड़ दिया। फिर भी रुक्मी उनके अनिष्ट की चेष्टा से विमुख न हुआ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसको उसी के दुपट्टे से बाँध दिया और उसकी दाढ़ी-मूँछ तथा केश कई जगह से मूँड़कर उसे कुरूप बना दिया। तब तक यदुवंशी वीरों ने शत्रु की अद्भुत सेना को तहस-नहस कर डाला-ठीक वैसे ही, जैसे हाथी कमलवन को रौंद डालता है। फिर वे लोग उधर से लौटकर श्रीकृष्ण के पास आये तो देखा कि रुक्मी दुपट्टे से बँधा हुआ अधमरी अवस्था में पड़ा हुआ है। उसे देखकर सर्वशक्तिमान भगवान बलरामजी को बड़ी दया आयी और उन्होंने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड़ दिया तथा श्रीकृष्ण से कहा- "कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह निन्दित कार्य हम लोगों के योग्य नहीं है। अपने सम्बन्धी की दाढ़ी-मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकार का वध ही है।" इसके बाद बलरामजी ने रुक्मिणी को सम्बोधन करके कहा- "साध्वी! तुम्हारे भाई का रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हम लोगों को बुरा न मानना; क्योंकि जीव को सुख-दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्म का फल भोगना पड़ता है।" अब श्रीकृष्ण से बोले- "कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करने योग्य अपराध करे तो भी अपने सम्बन्धियों के द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराध से ही मर चुका है, मरे हुए को फिर क्या मारना?" फिर रुक्मिणीजी से बोले- "साध्वी! ब्रह्माजी ने क्षत्रियों का धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाई को मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है।" इसके बाद श्रीकृष्ण से बोले- "भाई कृष्ण! यह ठीक है कि जो लोग धन के नशे में अंधे हो रहे हैं और अभिमानी हैं, वे राज्य, पृथ्वी, पैसा, स्त्री, मान, तेज अथवा किसी और कारण से अपने बन्धुओं का ही तिरस्कार कर दिया करते हैं।"
अब वे रुक्मिणी से बोले- "साध्वी! तुम्हारे भाई-बन्धु समस्त प्राणियों के प्रति दुर्भाव रखते हैं। हमने उनके मंगल के लिये ही उनके प्रति दण्डविधान किया है। उसे तुम अज्ञानियों की भाँति अमंगल मान रही हो, यह तुम्हारी बुद्धि की विषमता है। देवि! जो लोग भगवान की माया से मोहित होकर देह को ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हीं को ऐसा आत्म मोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है। समस्त देहधारियों की आत्मा एक ही है और कार्य-कारण से, माया से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। जल और घड़ा आदि उपाधियों के भेद से जैसे सूर्य, चन्द्रमा और प्रकाशयुक्त पदार्थ और आकाश भिन्न-भिन्न मालूम पड़ते हैं; परन्तु हैं एक ही, वैसे ही मूर्ख लोग शरीर के भेद से आत्मा का भेद मानते हैं। यह शरीर आदि और अन्तवाला है। पंचभूत, पंचप्राण, तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है। आत्मा में उसके अज्ञान से ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ‘मैं समझता है’, उसको जन्म-मृत्यु के चक्कर में ले जाता है। साध्वी! नेत्र और रूप दोनों ही सूर्य के द्वारा प्रकाशित होते हैं। सूर्य ही उनका कारण है। इसलिये सूर्य के साथ नेत्र और रूप का न तो कभी वियोग होता है और न संयोग। इसी प्रकार समस्त संसार की सत्ता आत्मसत्ता के कारण जान पड़ती है, समस्त संसार का प्रकाशक आत्मा ही है। फिर आत्मा के साथ दूसरे असत पदार्थों का संयोग या वियोग हो ही कैसे सकता है? जन्म लेना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और मरना ये सारे विकार शरीर के ही होते हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कृष्णपक्ष में कलाओं का ही क्षय होता है, चन्द्रमा का नहीं, परन्तु अमावस्या के दिन व्यवहार में लोग चन्द्रमा का ही क्षय हुआ कहते-सुनते हैं; वैसे ही जन्म-मृत्यु आदि सारे विकार शरीर के ही होते हैं, परन्तु लोग उसे भ्रमवश अपना-अपने आत्मा का मान लेते हैं। जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थ के न होने पर भी स्वप्न में भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलों का अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठ-मूठ संसार-चक्र का अनुभव करते हैं। इसलिये साध्वी! अज्ञान के कारण होने वाले इस शोक को त्याग दो। यह शोक अंतःकरण को मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।"
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब बलरामजी ने इस प्रकार समझाया, तब परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने अपने मन का मैल मिटाकर विवेक-बुद्धि से उसका समाधान किया। रुक्मी की सेना और उसके तेज का नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्त की सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओं ने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जाने की कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी। अतः उसने अपने रहने के लिये भोजकट नाम की एक बहुत बड़ी नगरी बसायी। उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि "दुर्बुद्धि कृष्ण को मारे बिना और अपनी छोटी बहिन को लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा।" इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सब राजाओं को जीत लिया और विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणीजी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। हे राजन! उस समय द्वारकापुरी के घर-घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा। क्यों न हो, वहाँ के सभी लोगों का यदुपति श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जो था। वहाँ के सभी नर-नारी मणियों के चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्द से भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिन को अनेकों भेंट की सामग्रियाँ उपहार दीं। उस समय द्वारका की अपूर्व शोभा हो रही थी। कहीं बड़ी-बड़ी पताकाएँ बहुत ऊँचे तक फहरा रही थीं। चित्र-विचित्र मालाएँ, वस्त्र और रत्नों के तोरन बँधे हुए थे। द्वार-द्वार पर दूब, खील आदि मंगल की वस्तुएँ सजायी हुई थीं। जल भरे कलश, अरगजा और धूप की सुगन्ध तथा दीपावली से बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी। मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियों के मद से द्वारका की सड़क और गलियों का छिड़काव हो गया था। प्रत्येक द्वार पर केलों के खंभे और सुपारी के पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे। उस उत्सव में कुतूहलवश इधर-उधर दौड़-धूप करते हुए बन्धु-वर्गों में कुरु, सृज्चय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशों के लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे। जहाँ-तहाँ रुक्मिणीहरण की गाथा गयी जाने लगी। उसे सुनकर राजा और राज कन्याएँ अत्यन्त विस्मित हो गयीं। महाराज! भगवती लक्ष्मीजी को रुक्मिणी के रूप में साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियों को परम आनन्द हुआ।
Source :- http://bit.ly/2DhEdxa
http://bit.ly/2meAnMZ
Sunday, January 7, 2018
भगवान शिव के पूजन में बेलपत्र का विशेष महत्व है ||
शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से प्रसन्न होते हैं महादेव. मान्यता है कि शिव की उपासना बिना बेलपत्र के पूरी नहीं होती.
अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है. आइए जानते हैं कि बेलपत्र क्यों है शिव को इतना प्रिय और क्या है बेलपत्र का महत्व...
बेलपत्र का महत्व
बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं. बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं. भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र प्रयोग होते हैं और इनके बिना शिव की उपासना सम्पूर्ण नहीं होती. पूजा के साथ ही बेलपत्र के औषधीय प्रयोग भी होते हैं. इसका प्रयोग करके तमाम बीमारियां दूर की जा सकती हैं.
बेलपत्र के प्रयोग की सावधानियां
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो जब भी आप महादेव को बेलपत्र अर्पित करें तो कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि गलत तरीके से अर्पित किए हुए बेलपत्र शिव को अप्रसन्न भी कर सकते हैं.
जानिए बेलपत्र से जुड़ी इन सावधानियों के बारे में...
- एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए.
- पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए.
- भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें.
- एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं.
- शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं.
- बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए.
शादी में देरी हो रही हो तो कैसे करें बेलपत्र का प्रयोग?
कई बार ना चाहते हुए भी शादी में देरी होने लगती है. कोई भी रिश्ता तय नहीं हो पाता. इसका कारण जो भी हो पर बेलपत्र के उपाय से इस समस्या का समाधान जरूर हो सकता है. तो आइए जानते हैं बेलपत्र के प्रयोग से कैसे मनचाहे समय पर होगा आपका विवाह...
- 108 बेलपत्र लें और हर बेलपत्र पर चन्दन से 'राम' लिखें.
- 'ॐ नमः शिवाय' कहते हुए बेलपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- सारे बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिव जी से शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें.
गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाएगा बेलपत्र
शिव जी का प्रिय बेलपत्र गंभीर बीमारियों से भी आपको छुटकारा दिला सकता है. अगर आप लंबे समय से किसी बीमारी से परेशान हैं और हर इलाज नाकाम हो रहा है तो अब आपकी ये बीमारी बेलपत्र के प्रयोग से खुद ब खुद दूर हो जाएगी...
- 108 बेलपत्र लें और एक पात्र में चन्दन का इत्र भी लें.
- अब एक-एक बेलपत्र चन्दन में डुबाते जाएं और शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- हर बेलपत्र के साथ 'ॐ हौं जूं सः' का जाप करते रहें.
- मंत्र जाप के बाद जल्दी स्वस्थ होने की प्रार्थना करें.
बेलपत्र के आयुर्वेदिक प्रयोग
बेलपत्र का केवल दैवीय प्रयोग नहीं है. यह तमाम औषधियों में भी काम आता है. इसके प्रयोग से आपकी सेहत से जुड़ी तमाम समस्याएं चुटकियों में हल होती हैं. आइए जानें क्या-क्या हैं बेलपत्र के औषधीय प्रयोग...
- बेलपत्र का रस आंख में डालने से आंखों की ज्योति बढ़ती है.
- बेलपत्र का काढ़ा शहद में मिलाकर पीने से खांसी से राहत मिलती है.
- सुबह 11 बेलपत्रों का रस पीने से पुराना सिरदर्द भी ठीक हो जाता है.
अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है. आइए जानते हैं कि बेलपत्र क्यों है शिव को इतना प्रिय और क्या है बेलपत्र का महत्व...
बेलपत्र का महत्व
बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं. बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं. भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र प्रयोग होते हैं और इनके बिना शिव की उपासना सम्पूर्ण नहीं होती. पूजा के साथ ही बेलपत्र के औषधीय प्रयोग भी होते हैं. इसका प्रयोग करके तमाम बीमारियां दूर की जा सकती हैं.
बेलपत्र के प्रयोग की सावधानियां
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो जब भी आप महादेव को बेलपत्र अर्पित करें तो कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि गलत तरीके से अर्पित किए हुए बेलपत्र शिव को अप्रसन्न भी कर सकते हैं.
जानिए बेलपत्र से जुड़ी इन सावधानियों के बारे में...
- एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए.
- पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए.
- भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें.
- एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं.
- शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं.
- बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए.
शादी में देरी हो रही हो तो कैसे करें बेलपत्र का प्रयोग?
कई बार ना चाहते हुए भी शादी में देरी होने लगती है. कोई भी रिश्ता तय नहीं हो पाता. इसका कारण जो भी हो पर बेलपत्र के उपाय से इस समस्या का समाधान जरूर हो सकता है. तो आइए जानते हैं बेलपत्र के प्रयोग से कैसे मनचाहे समय पर होगा आपका विवाह...
- 108 बेलपत्र लें और हर बेलपत्र पर चन्दन से 'राम' लिखें.
- 'ॐ नमः शिवाय' कहते हुए बेलपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- सारे बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिव जी से शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें.
गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाएगा बेलपत्र
शिव जी का प्रिय बेलपत्र गंभीर बीमारियों से भी आपको छुटकारा दिला सकता है. अगर आप लंबे समय से किसी बीमारी से परेशान हैं और हर इलाज नाकाम हो रहा है तो अब आपकी ये बीमारी बेलपत्र के प्रयोग से खुद ब खुद दूर हो जाएगी...
- 108 बेलपत्र लें और एक पात्र में चन्दन का इत्र भी लें.
- अब एक-एक बेलपत्र चन्दन में डुबाते जाएं और शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- हर बेलपत्र के साथ 'ॐ हौं जूं सः' का जाप करते रहें.
- मंत्र जाप के बाद जल्दी स्वस्थ होने की प्रार्थना करें.
बेलपत्र के आयुर्वेदिक प्रयोग
बेलपत्र का केवल दैवीय प्रयोग नहीं है. यह तमाम औषधियों में भी काम आता है. इसके प्रयोग से आपकी सेहत से जुड़ी तमाम समस्याएं चुटकियों में हल होती हैं. आइए जानें क्या-क्या हैं बेलपत्र के औषधीय प्रयोग...
- बेलपत्र का रस आंख में डालने से आंखों की ज्योति बढ़ती है.
- बेलपत्र का काढ़ा शहद में मिलाकर पीने से खांसी से राहत मिलती है.
- सुबह 11 बेलपत्रों का रस पीने से पुराना सिरदर्द भी ठीक हो जाता है.
Source:- http://bit.ly/2Ff7Ork
Wednesday, March 2, 2016
Happy Birthday to Shri Radhe Guru Maa
Let us join devotees across the world in wishing our
Mamtamai Shri Radhe Guru Maa a very Happy Birthday!
May we continue to enjoy the good fortune
of serving your blessed feet.
Jai Mata Di!
Note
1.To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com.
2.These social pages are handled by her devoted sevadars.
3.To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days in Mumbai.
4.The darshans are free and open to everyone.
5.One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures.
6.To participate in these charitable activities contact Shri Radhe Maa’s sevadar - admin@radhemaa.com
(Photo Courtesy – google)
To get latest updates about ‘Shri Radhe Guru Maa’ visit -www.radhemaa.com
Now get all info about DMJ on your mobile -download app https://play.google.com/store/apps/details?id=com.effects.bks2
Sunday, January 17, 2016
Radhe Maa devotees donate grocery to Borivali slum families
MUMBAI, January 15, 2016: Devotees of Mamtamai Shri Radhe
Guru Maa donated rice, dal, salt, and sugar in the slums near Chikoowadi,
Borivali (West) on Friday, January 15, 2016.
The donation was made as an act of seva to the
underprivileged in line with Radhe Guru Maa's teachings to serve God through
service to all beings.
The devotees who participated in the seva included Sevadar
Talli Babaji , Raj Gupta and Harminder Shah along with other volunteers who
distributed the groceries.
"Guru Maa says the smallest act of kindness adds up in
our karmic account. We are just following our guru's teachings," said
Sanjeev Gupta, who helped with organizing the event.
Mamtamai Shri Radhe Guru Maa is a Hindu spiritual leader who
hold the worship of Lord Shiva and his consort Devi as the means to achieve all
purusharthas - dharma, artha, kaama and moksha. Her teaching emphasize on seva
as a means of serving God.
Wednesday, January 6, 2016
Subscribe to Win
NOW Subscribe to Shri Radhe Guru Maa Youtube Channel
and chance to Win a Surprise Gift
SUBSCRIBE HERE:https://www.youtube.com/user/MamtamaiShriRadheMaa/featured
Each month, one winner will be randomly selected
Winners will be announced on Facebook
Wednesday, November 11, 2015
Happy Diwali
May this Diwali usher new and never-ending phase of light, happiness, peace and sweetness in your life. May you have the courage and conviction to protect dharma with thought, word and deed and may dharma, which sustains all there is, in turn, sustain you in all your endeavors. May you be lamps of good example to those who look up to you, and may you walk in light of the wisdom of our rishi ancestors.
A very Happy Diwali to all!
Note:
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Thursday, October 29, 2015
करवा चौथ का त्योहार लाए ख़ुशियाँ हजार ......
करवा चौथ
करवा चौथ का त्योहार
लाए ख़ुशियाँ हजार
हर सुहागिं के दिल का
ये अरमान है
प्यारे पिया में बसी
उसकी जान है
पिया के लिए ही
व्रत करती है वह
उसके नाम से ही
अपनी माँग भारती है वह
पिया की दीर्घायु के लिए
करती है दुआ
भूखी - प्यासी रहती है
बस चाहती है पिया
पिया ही तो उसकी ख़ुशियों
का संसार है
आज प्यारा पिया
का ही दीदार है
चाँद फीका लगे
पिया चाँद के आगे
और चाँद से ही पिया की
लंबी आयु मांगे
बस भावुकता से यह
ओत - प्रोत है
प्यारा प्यार का त्योहार
यह करवा चौथ है
by Sima Sach
Thursday, July 9, 2015
Lord Harihara
Lord Harihara is the name of a combined deity form of both Vishnu (Hari) and Shiva (Hara) from the Hindu tradition. Also known as Shankaranarayana
Harihara is thus worshipped by both Vaishnavites and Shaivities as a form of the Supreme God.
Note:
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Thursday, July 2, 2015
Bhagavad Gita Sloka
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥
Meaning:
Krishna speaks to Arjun ,Hey Bharat.
Whenever there is suppression of righteousness, then I take the form / reincarnate in the world to establish the righteousness again.
Krishna speaks to Arjun ,Hey Bharat.
Whenever there is suppression of righteousness, then I take the form / reincarnate in the world to establish the righteousness again.
For liberating gentle righteous persons and punishing those who are evils and to establish the reign of righteousness,
I reincarnate/ manifest in every aeon.
I reincarnate/ manifest in every aeon.
Note:
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Thursday, October 16, 2014
Quiz 29 -Find the Identical Pairs
How to enter -
1. Like Param Shradhey Shri Radhe Maa Page on Facebook
2. Guess the right answer and submit on - Link
3. Tag friends in the comments, the more you Tag the more chances of winning Win exciting Gift Hampers !!

- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust
Note -
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Sunday, December 29, 2013
Brahmin worships the Devi blindfolded in this temple
The
Chandrabadani temple in Pratap nagar, Uttarakhand does not have an idol
but a Sri Yantra that is worshiped once a year by the Brahmin priests
who tie a blindfold on their eyes before offering abhishek to the
Goddess.
The
Chandrabadani temple stands at the spot where the torso (neck to waist)
of Devi Sati's is said to have fallen during Shiva's tandava that
followed the jumping of Mata Sati in the hawan kund of her father
Himavat who had dishonoured her husband.
As Sati's
weapons are said to have also fallen at this spot, hundreds of iron
trishuls and statues are found every day around this temple.
May Mata Chandrabadani, the beloved of Lord Bholenath, protect us all!
- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust
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(Picture Courtesy - Google.com)
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