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Friday, August 11, 2017

कालका मंदिर के स्थल पर प्रकट हुई थीं मां भगवती 'महाकाली'



अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात 'कालिका मंदिर' देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है। जहां नवरात्र में हजारों लोग माता का दर्शन करने पहुंचते हैं।

इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। माना जाता है कि हर काल में इसका स्वरूप बदला। मान्यता है कि इसी जगह आद्यशक्ति माता भगवती 'महाकाली' के रूप में प्रकट हुई और असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। मौजूदा मंदिर बाबा बालक नाथ ने स्थापित किया। उनके कहने पर मुगल सम्राज्य के कल्पित सरदार अकबर शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने इसी जगह शिवा (शक्ति) की अराधना की। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने काली की स्तुति की तो मां भगवती ने कहा कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

माना जाता है कि महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की। तब माता भगवती से उनका साक्षात्कार हुआ।

मंदिर की विशेषता

मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर के परिक्रमा में 36 मातृकाओं (हिन्दी वर्णमाला के अक्षर) के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। इसलिए दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला होता है।

नवरात्र मेले में घूमती है माता

आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों से पूजा होती है। नवरात्र में यहां मेला लगता है। रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मंदिर में अखंड दीप प्रज्जवलित है। पहली नवरात्र के दिन लोग मंदिर से माता की जोत अपने घर ले जाते हैं। नवरात्र में रात 2:30 बजे सुबह की व शाम की आरती सात बजे होती है। मान्यता है कि अष्टमी व नवमी को माता मेला में घूमती हैं। इसलिए अष्टमी के दिन सुबह की आरती के बाद कपाट खोल दिया जाता है। दो दिन आरती नहीं होती। दसवीं को आरती होती है।

Wednesday, May 10, 2017

ज्ञान की चाँदनी फैलाती है बुद्ध पूर्णिमा !!

|| ज्ञान की चाँदनी फैलाती है बुद्ध पूर्णिमा ||


भिक्षाम् देहि' की पुकार सुनकर जैसे ही यशोधरा द्वार पर आईं , तो देखती हैं कि सामने बुद्ध खड़े हैं-कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ और वह भी हाथ में भिक्षा का पात्र लिए हुए।उस समय पत्नी यशोधरा पति सिद्धार्थ से बुद्ध बने इस भिक्षुक से एक बहुत ही प्रखर एवं शाश्वत महत्व का प्रश्न पूछती हैं।वे पूछती हैं- 'आर्य जो ज्ञान आपको वन में जाने से प्राप्त हुआ, क्या वही ज्ञान यहां प्राप्त नहीं हो सकता था ?'बुद्ध ने तत्काल उत्तर दिया, 'हो सकता था।' यशोधरा के लिए यह उत्तर चौंकाने के साथ ही अत्यतं व्यतिथ करने वाला भी था। ' तो फिर यहां से क्यों गए स्वामी ?' यह यशोधरा का अगला प्रश्न था।इसके उत्तर में बुद्ध ने जो कहा , वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।बुद्ध ने कहा , 'वह यहां भी प्राप्त हो सकता था , इस तथ्य का ज्ञान मुझे वहीं जाकर प्राप्त हो सका।' 

गौतम बुद्ध के जीवन का अत्यतं ही भावप्रवण यह प्रसंग हमारी चेतना और आचरण का हिस्सा होना चाहिए ।दुख ही अशांति का कारण है।यह जानने के लिए वे भटके थे कि इन दुखों से छुटकारा कैसे पाया जा सके।जैसे ही उन्होंने जाना , वे सिद्धार्थ से बुद्ध हो गए।
जिस प्रकार हर तार में संगीत निहित होता है,हर पत्थर में प्रतिमा मौजूद रहती है।जरूरत ऐसे हाथों की होती है जो छिपे इस स्वरूप साकार कर सके। 
बात सीधी सी है कि कर्म में ही शांति है और उसे उदात्त चेतना के साथ करना ही आध्यात्मिक जीवन जीने का उपक्रम है।यदि आपको काम में रस आ रहा है , आनंद मिल रहा है, तो निश्चित रूप से वहां शांति भी मिलेगी।
गौतम बुद्ध के संदेश "अप्प दीपो भव।" अर्थात ' हम सभी अपना दीपक स्वयं बनें ' को अपने जीवन में अमल करते हुए जीवन को सार्थक करें।
बुद्ध पूर्णिमा ज्ञान की चांदनी फैलाकर मानवता में शांति और समृद्धि का संचार कर रही है।जरूरत है हम खुले मन से बांहें फैला कर उसे अंगीकार करें।