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Tuesday, March 5, 2019

श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए |



श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन | Shri Krishna Darshan Kahani : आमतौर पर आप मंदिर जाते हो तो भगवान् के दर्शन जरूर करते हो लेकिन शायद आपको यह नहीं पता की मंदिर में भगवान् की  पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए | अब आप सोच रहे होंगे की भगवान् की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए तो इसी को लेकर हम आपको एक रोचक कहानी बताते है|

जब भी कृष्ण भगवान के मंदिर जाएं तो यह जरुर ध्यान रखें कि कृष्ण जी कि मूर्ति की पीठ के दर्शन ना करें। दरअसल पीठ के दर्शन न करने के संबंध में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असूर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा। कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा। तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले। इस तरह रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा।
जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा। इस तरह भगवान रणभूमि से भागे क्योंकि कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे और कृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है। कालयवन कृष्णा की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढऩे लगा क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है।  
जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया कृष्ण एक गुफा में चले गए। जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था। मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को निंद से जगाएगा और राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्ण समझकर उठा दिया और राजा की नजर पढ़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया।
 अत: भगवान श्री हरि की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हमारे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है और अधर्म बढ़ता है। कृष्णजी के हमेशा ही मुख की ओर से ही दर्शन करें। 
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                                                                                                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2SMaS3M

Wednesday, February 13, 2019

भगवन श्री कृष्णा (Shri Krishna) के जन्म की कथा ।


श्री कृष्ण जी का जन्म  भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात में हुआ था .रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव जी  की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से जन्माष्टमी(janmashtami) के रूप में मनाई जाती है।

क्यों भगवान श्रीकृष्ण जी का जन्म की कथा अद्भुत है ?

‘द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।
एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।
तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?’ कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।
वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।
उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।

जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’

उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।
अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी के  बच्चे का जन्म हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।

क्यों मनाते है जन्माष्टमी(janmashtami) ?
इस दिन श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ था जो की बहुत ही अद्भुत था। इनका जन्म काली अँधेरी रात में हुआ लेकिन सभी भक्तो के जीवन में प्रकाश ही प्रकाश फ़ैल गया। 
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Source:https://bit.ly/2WUlMrL

Tuesday, January 22, 2019

श्री राधा कृष्ण प्रेम इतना सच्चा क्यों था?


यह सब जानते है , भगवान कृष्ण ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का आग्रह किया। यह भादो (सितंबर के महीने में ), शुक्ल पक्ष की अष्टमी, अनुराधा नक्षत्र का समय था और समय 12 बजे जब राधा रानी इस दुनिया में प्रकट हुई।


श्री राधा जी का जन्मस्थान रावल है, मथुरा शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक छोटा गांव है। ऐसा कहा जाता है कि एक दिन बृषभानु जी एक नदी में स्नान कर रहे था, तभी उन्होंने एक कमल देखा जो कि हजारों पंखुड़ियों वाला था और वह सूर्य के प्रकाश में सुनहरा कमल जैसा दिखता था और जब वह करीब आ गया, तो उन्होंने उस फूल के अंदर एक छोटी बच्ची को देखा और उस बच्ची को उन्होंने भगवान का आशीर्वाद समझ कर ले लिया और उसे अपनी बेटी के रूप में घर ले आये ।
श्री राधा जी ने अपनी आँखें नहीं खोलीं, जब तक कि वह भगवान कृष्ण के सुंदर चेहरे को नहीं देखा। वृषभनु और उनकी पत्नी बहुत परेशान थे और इस धारणा के तहत कि लड़की अंधी थी।

ग्यारह महीनों के बाद, जब अपने परिवार के साथ वृषभनू नंदबाबा को देखने के लिए गोकुल गए तो श्री राधा जी ने अपनी आंखें पहली बार खोली वो भी जब नंदबाबा बाल गोपाल श्री कृष्ण को उनके सामने लाये। अपने स्वामी आकर्षक चेहरे को देखने के लिए राधा रानी ने अपनी अपनी आंखें खोल दीं। वह पहली बार अपनी आँखें खोलने पर श्री कृष्ण जी का चेहरा देखना चाहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अब तक अपनी आंखें नहीं खोली थी।

बरसाने से कुछ किलोमीटर दूर गह्वर वन है यही वो जगह है जहा राधा कृष्णा पहली बार अकेले मिले। जहा उन्होंने कुछ समय साथ में व्यतीत किया। जहा श्री कृष्ण ने राधा रानी के बालों को फूलो से सजाया था।

उनका प्रेम वृंदावन की जमीन पर उग आया जो माना जाता है कि श्री जी का दिल और ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक धन्य भूमि है । उन्होंने यमुना के तट पर महा-रास लीला किया जो को युगो युगो तक नहीं भुलाया जा सकता ये अटूट भक्ति (प्रेम ) का संगम था। लेकिन तब वह समय भी आ गया जब शाप के कारन कृष्णाji को राधा जी से अलग होना पड़ा। उनसे दूर जाना पड़ा। लेकिन वो कहते है ना जिनकी रूह एक दूसरे की रूह में समायी होती है वो अलग कहा होते है। कंस को मारने के लिए श्री कृष्णा को मथुरा जाना पड़ा।
जाने से पहले, श्री कृष्णा जी ने ,श्री राधा जी से अपना वचन लिया को वो उनकी याद में कभी आँसू नहीं बहायेंगी।
श्री राधा जी ने  वादा किया कि वो नहीं रोयेंगी और आँसू नहीं बहाएंगे। श्री राधा जी ने  वादा किया कि वो नहीं रोयेंगी और आँसू नहीं बहाएंगे। कृष्ण ने उससे कहा कि उनका प्यार बिना शर्त का है और हमेशा रहेगा। मैं समय के अंत तक तुम्हारा ऋणी बना रहूँगा और वो हमेशा उनके साथ देखी जाएँगी। मेरे नाम से पहले हर कोई तुम्हारा नाम लेगा।  और हम आज देख सकते हैं कि वृंदावन में लोग या ब्रजवासी कहते है राधे राधे कहो चले आएंगे कृष्णा।

आज वृन्दावन में हर तरफ राधे राधे है। यहां तक कि रिक्शा वाला रास्ता मांगने के लिए रास्ते भी सिर्फ राधे राधे नाम का प्रयोग करते है। वृंदावन में हर घर या वृक्ष पे श्री राधा का नाम लिखा गया है। श्री राधा जी का भक्ति(प्रेम ) और दर्द ऐसा था कि कृष्ण ने उसे एक वरदान दिया कि उनका  नाम श्री कृष्णा जी से पहले लिया जाएगा।

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                                                                                                                                                                         Source:https://bit.ly/2Wd1idb

Tuesday, January 9, 2018

कृष्ण-रुक्मिणी विवाह


“कृं कृष्णाय नमः”.


श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं-  इस प्रकार कह-सुनकर सब-के-सब राजा क्रोध से आग बबूला हो उठे और कवच पहनकर अपने-अपने वाहनों पर सवार हो गये। अपनी-अपनी सेना के सात सब धनुष ले-लेकर भगवान श्रीकृष्ण पीछे दौड़े। राजन! जब यदुवंशियों के सेनापतियों ने देखा कि शत्रुदल हम पर चढ़ा आ रहा है, तब उन्होंने भी अपने-अपने धनुष का टंकार किया और घूमकर उनके सामने डट गये। जरासंध की सेना के लोग कोई घोड़े पर, कोई हाथी पर, तो कोई रथ पर चढ़े हुए थे। वे सभी धनुर्वेद के बड़े मर्मज्ञ थे। वे यदुवंशियों पर इस प्रकार बाणों की वर्षा करने लगे, मानो दल-के-दल बादल पहाड़ो पर मूसलधार पानी बरसा रहे हों। परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने देखा कि उनके पति श्रीकृष्ण की सेना बाण-वर्षा से ढक गयी है। तब उन्होंने लज्जा के साथ भयभीत नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखा। भगवान ने हँसकर कहा- "सुन्दरी! डरो मत! तुम्हारी सेना अभी तुम्हारे शत्रुओं की सेना को नष्ट किये डालती है।" इधर गद और संकर्षण आदि यदुवंशी वीर अपने शत्रुओं का पराक्रम और अधिक न सह सके। वे अपने बाणों से शत्रुओं के हाथी, घोड़े तथा रथों को छिन्न-भिन्न करने लगे। उनके बाणों से रथ, घोड़े और हाथियों पर बैठे विपक्षी वीरों के कुण्डल, किरीट और पगड़ियों से सुशोभित करोंड़ों सिर, खड्ग, गदा और धनुषयुक्त हाथ, पहुँचे, जाँघें और पैर कट-कटकर पृथ्वी पर गिरने लगे। इसी प्रकार घोड़े, खच्चर, हाथी, ऊँट, गधे और मनुष्यों के सिर भी कट-कटकर रणभूमि में लोटने लगे। अन्त में विजय की सच्ची आकांक्षा वाले यदुवंशियों ने शत्रुओं की सेना तहस-नहस कर डाली। जरासंध आदि सभी राजा युद्ध से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।

उधर शिशुपाल अपनी भावी पत्नी के छिन जाने के कारण मरणासन्न-सा हो रहा था। न तो उसके हृदय में उत्साह रह गया था और न तो शरीर पर कान्ति। उसका मुँह सूख रहा था। उसके पास जाकर जरासंध कहने लगा- "शिशुपालजी! आप तो एक श्रेष्ठ पुरुष हैं, यह उदासी छोड़ दीजिये। क्योंकि राजन! कोई भी बात सर्वदा अपने मन के अनुकूल ही हो या प्रतिकूल, इस सम्बन्ध में कुछ स्थिरता किसी भी प्राणी के जीवन में नहीं देखी जाती। जैसे कठपुतली बाजीगर की इच्छा के अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवदिच्छा के अधीन रहकर सुख और दुःख के सम्बन्ध में यथा शक्ति चेष्टा करता रहता है। देखिये, श्रीकृष्ण ने मुझे तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेनाओं के साथ सत्रह बार हरा दिया, मैंने केवल एक बार-अठारहवीं बार उन पर विजय प्राप्त की। फिर भी इस बात को लेकर मैं न तो कभी शोक करता हूँ और न तो कभी हर्ष; क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रारब्ध के अनूसार काल भगवान ही इस चराचर जगत को झकझोरते रहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि हम लोग बड़े-बड़े वीर सेनापतियों के भी नायक हैं। फिर भी, इस समय श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित यदुवंशियों की थोड़ी-सी सेना ने हमें हरा दिया है। इस बार हमारे शत्रुओं की ही जीत हुई, क्योंकि काल उन्हीं के अनुकूल था। जब काल हमारे दाहिने होगा, तब हम भी उन्हें जीत लेंगे।"

रुक्मिणीजी का बड़ा भाई रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से बहुत द्वेष रखता था। उसको यह बात बिलकुल सहन न हुई कि मेरी बहिन को श्रीकृष्ण हर ले जायँ और राक्षस रीति से बलपूर्वक उसके साथ विवाह करें। रुक्मी बली तो था ही, उसने एक अक्षौहिणी सेना साथ ले ली और श्रीकृष्ण का पीछा किया। महाबाहु रुक्मी क्रोध के मारे जल रहा था। उसने कवच पहनकर और धनुष धारण करके समस्त नरपतियों के सामने यह प्रतिज्ञा की- "मैं आप लोगों के बीच में यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्ध में श्रीकृष्ण को न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणी को न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा। यह कहकर वह रथ पर सवार हो गया और सारथि से बोला- "जहाँ कृष्ण हो वहाँ शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ ले चलो। आज मेरा उसी के साथ युद्ध होगा। आज मैं अपने तीखे बाणों से उस खोटी बुद्धि वाले ग्वाले के बल-वीर्य का घमंड चूर-चूर कर दूँगा। देखो तो उसका साहस, वह हमारी बहिन को बलपूर्वक हर ले गया है। रुक्मी की बुद्धि बिगड़ गयी थी। वह भगवान के तेज-प्रभाव को बिलकुल नहीं जानता था। इसी से इस प्रकार बहक-बहककर बातें करता हुआ वह एक ही रथ से श्रीकृष्ण के पास पहुँचकर ललकारने लगा- "खड़ा रह! खड़ा रह।" उसने अपने धनुष को बलपूर्वक खींचकर भगवान श्रीकृष्ण को तीन बाण मारे और कहा- "एक क्षण मेरे सामने ठहर! यदुवंशियों के कुलकलंक! जैसे कौआ होम की सामग्री चुराकर उड़ जाय, वैसे ही तू मेरी बहिन को चुराकर कहाँ भागा जा रहा है? अरे मन्द! तू बड़ा मायावी और कपट-युद्ध में कुशल है। आज मैं तेरा सारा गर्व खर्व किये डालता हूँ। देख! जब तक मेरे बाण तुझे धरती पर सुला नहीं देते, उसके पहले ही इस बच्ची को छोड़कर भाग जा।"

रुक्मी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने उसका धनुष काट डाला और उस पर छः बाण छोड़े। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण ने आठ बाण उसके चार घोंड़ो पर और दो सारथि पर छोड़े और तीन बाणों से उसके रथ की ध्वजा को काट डाला। तब रुक्मी ने दूसरा धनुष उठाया और भगवान श्रीकृष्ण को पाँच बाण मारे। उन बाणों के लगने पर उन्होंने उसका वह धनुष भी काट डाला। रुक्मी ने इसके बाद एक और धनुष लिया, परन्तु हाथ में लेते-ही-लेते अविनाशी अच्युत ने उसे भी काट डाला। इस प्रकार रुक्मी ने परिघ, पट्टिश, शूल, ढाल, तलवार, शक्ति और तोमर-जितने अस्त्र-शस्त्र उठाये, उन सभी को भगवान ने प्रहार करने के पहले ही काट डाला। अब रुक्मी क्रोधवश हाथ में तलवार लेकर भगवान श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से रथ से कूद पड़ा और इस प्रकार उनकी ओर झपटा, जैसे पतिंगा आग की ओर लपकता है। जब भगवान ने देखा कि रुक्मी मुझ पर चोट करना चाहता है, तब उन्होंने अपने बाणों से उसकी ढाल-तलवार को तिल-तिलकर करके काट दिया और उसको मार डालने के लिये हाथ में तीखी तलवार निकाल ली। जब रुक्मिणीजी ने देखा कि ये तो हमारे भाई को अब मार ही डालना चाहते हैं, तब वे भय विह्वल हो गयीं और अपने प्रियतम पति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरकर करुण-स्वर में बोलीं- "देवताओं के भी आराध्यदेव! जगत्पते! आप योगेश्वर हैं। आपके स्वरूप और इच्छाओं को कोई जान नहीं सकता। आप परम बलवान हैं, परन्तु कल्याण स्वरूप भी तो हैं। प्रभो! मेरे भैया को मारना आपके योग्य काम नहीं है।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- रुक्मिणीजी का एक-एक अंग भय के मारे थर-थर काँप रहा था। शोक की प्रबलता से मुँह सूख गया था, गला रूँध गया था। आतुरतावश सोने का हार गले से गिर पड़ा था और इसी अवस्था में वे भगवान के चरणकमल पकड़े हुए थीं। परम दयालु भगवान उन्हें भयभीत देखकर करुणा से द्रवित हो गये। उन्होंने रुक्मी को मार डालने का विचार छोड़ दिया। फिर भी रुक्मी उनके अनिष्ट की चेष्टा से विमुख न हुआ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसको उसी के दुपट्टे से बाँध दिया और उसकी दाढ़ी-मूँछ तथा केश कई जगह से मूँड़कर उसे कुरूप बना दिया। तब तक यदुवंशी वीरों ने शत्रु की अद्भुत सेना को तहस-नहस कर डाला-ठीक वैसे ही, जैसे हाथी कमलवन को रौंद डालता है। फिर वे लोग उधर से लौटकर श्रीकृष्ण के पास आये तो देखा कि रुक्मी दुपट्टे से बँधा हुआ अधमरी अवस्था में पड़ा हुआ है। उसे देखकर सर्वशक्तिमान भगवान बलरामजी को बड़ी दया आयी और उन्होंने उसके बन्धन खोलकर उसे छोड़ दिया तथा श्रीकृष्ण से कहा- "कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह निन्दित कार्य हम लोगों के योग्य नहीं है। अपने सम्बन्धी की दाढ़ी-मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकार का वध ही है।" इसके बाद बलरामजी ने रुक्मिणी को सम्बोधन करके कहा- "साध्वी! तुम्हारे भाई का रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हम लोगों को बुरा न मानना; क्योंकि जीव को सुख-दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्म का फल भोगना पड़ता है।" अब श्रीकृष्ण से बोले- "कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करने योग्य अपराध करे तो भी अपने सम्बन्धियों के द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराध से ही मर चुका है, मरे हुए को फिर क्या मारना?" फिर रुक्मिणीजी से बोले- "साध्वी! ब्रह्माजी ने क्षत्रियों का धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाई को मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है।" इसके बाद श्रीकृष्ण से बोले- "भाई कृष्ण! यह ठीक है कि जो लोग धन के नशे में अंधे हो रहे हैं और अभिमानी हैं, वे राज्य, पृथ्वी, पैसा, स्त्री, मान, तेज अथवा किसी और कारण से अपने बन्धुओं का ही तिरस्कार कर दिया करते हैं।"

अब वे रुक्मिणी से बोले- "साध्वी! तुम्हारे भाई-बन्धु समस्त प्राणियों के प्रति दुर्भाव रखते हैं। हमने उनके मंगल के लिये ही उनके प्रति दण्डविधान किया है। उसे तुम अज्ञानियों की भाँति अमंगल मान रही हो, यह तुम्हारी बुद्धि की विषमता है। देवि! जो लोग भगवान की माया से मोहित होकर देह को ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हीं को ऐसा आत्म मोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है। समस्त देहधारियों की आत्मा एक ही है और कार्य-कारण से, माया से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। जल और घड़ा आदि उपाधियों के भेद से जैसे सूर्य, चन्द्रमा और प्रकाशयुक्त पदार्थ और आकाश भिन्न-भिन्न मालूम पड़ते हैं; परन्तु हैं एक ही, वैसे ही मूर्ख लोग शरीर के भेद से आत्मा का भेद मानते हैं। यह शरीर आदि और अन्तवाला है। पंचभूत, पंचप्राण, तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है। आत्मा में उसके अज्ञान से ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ‘मैं समझता है’, उसको जन्म-मृत्यु के चक्कर में ले जाता है। साध्वी! नेत्र और रूप दोनों ही सूर्य के द्वारा प्रकाशित होते हैं। सूर्य ही उनका कारण है। इसलिये सूर्य के साथ नेत्र और रूप का न तो कभी वियोग होता है और न संयोग। इसी प्रकार समस्त संसार की सत्ता आत्मसत्ता के कारण जान पड़ती है, समस्त संसार का प्रकाशक आत्मा ही है। फिर आत्मा के साथ दूसरे असत पदार्थों का संयोग या वियोग हो ही कैसे सकता है? जन्म लेना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और मरना ये सारे विकार शरीर के ही होते हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कृष्णपक्ष में कलाओं का ही क्षय होता है, चन्द्रमा का नहीं, परन्तु अमावस्या के दिन व्यवहार में लोग चन्द्रमा का ही क्षय हुआ कहते-सुनते हैं; वैसे ही जन्म-मृत्यु आदि सारे विकार शरीर के ही होते हैं, परन्तु लोग उसे भ्रमवश अपना-अपने आत्मा का मान लेते हैं। जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थ के न होने पर भी स्वप्न में भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलों का अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठ-मूठ संसार-चक्र का अनुभव करते हैं। इसलिये साध्वी! अज्ञान के कारण होने वाले इस शोक को त्याग दो। यह शोक अंतःकरण को मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब बलरामजी ने इस प्रकार समझाया, तब परमसुन्दरी रुक्मिणीजी ने अपने मन का मैल मिटाकर विवेक-बुद्धि से उसका समाधान किया। रुक्मी की सेना और उसके तेज का नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्त की सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओं ने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जाने की कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी। अतः उसने अपने रहने के लिये भोजकट नाम की एक बहुत बड़ी नगरी बसायी। उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि "दुर्बुद्धि कृष्ण को मारे बिना और अपनी छोटी बहिन को लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा।" इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सब राजाओं को जीत लिया और विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणीजी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। हे राजन! उस समय द्वारकापुरी के घर-घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा। क्यों न हो, वहाँ के सभी लोगों का यदुपति श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जो था। वहाँ के सभी नर-नारी मणियों के चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्द से भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिन को अनेकों भेंट की सामग्रियाँ उपहार दीं। उस समय द्वारका की अपूर्व शोभा हो रही थी। कहीं बड़ी-बड़ी पताकाएँ बहुत ऊँचे तक फहरा रही थीं। चित्र-विचित्र मालाएँ, वस्त्र और रत्नों के तोरन बँधे हुए थे। द्वार-द्वार पर दूब, खील आदि मंगल की वस्तुएँ सजायी हुई थीं। जल भरे कलश, अरगजा और धूप की सुगन्ध तथा दीपावली से बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी। मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियों के मद से द्वारका की सड़क और गलियों का छिड़काव हो गया था। प्रत्येक द्वार पर केलों के खंभे और सुपारी के पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे। उस उत्सव में कुतूहलवश इधर-उधर दौड़-धूप करते हुए बन्धु-वर्गों में कुरु, सृज्चय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशों के लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे। जहाँ-तहाँ रुक्मिणीहरण की गाथा गयी जाने लगी। उसे सुनकर राजा और राज कन्याएँ अत्यन्त विस्मित हो गयीं। महाराज! भगवती लक्ष्मीजी को रुक्मिणी के रूप में साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियों को परम आनन्द हुआ।

Source :- http://bit.ly/2DhEdxa
                http://bit.ly/2meAnMZ