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Saturday, May 4, 2019

संतोषी माता की कहानी | Santoshi Mata ki kahani |


एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और बची हुई झूठन सातवें बेटे को दे दिया करती थी। बेटे को यह पता नहीं था।

उसकी पत्नी ने उसे यह बात बताई। उसे विश्वास नहीं हुआ। छुपकर देखा तो उसे पता चला की यह सच था। उसे बड़ा दुःख हुआ। माँ के खाना खाने बुलाने पर वह बोला – मैं यह खाना नहीं खाऊंगा। परदेस जाकर कमाई करूँगा।
माँ बोली – कल जाता हो तो आज ही चला जा। यह सुनकर वह तुरंत घर से निकल गया।
रास्ते में पत्नी से मिला। वह गोबर से कंडे बना रही थी। बोला – मैं परदेस जा रहा हूँ कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम अपना धर्म का पालन करते हुए ध्यान से रहना।
वह बोली आप मेरी चिंता ना करें। मुझे भूलना मत और मुझे अपनी कुछ निशानी दे दो। उसे देखकर मैं समय बिता लूँगी। उसने उसे अपनी अंगूठी दे दी और चल पड़ा।  
एक बड़े शहर में बड़ी दुकान देखकर उसने काम माँगा। वहां जरुरत थी इसलिए सेठ ने उसे काम पर रख लिया। उसने दिन रात मेहनत की। सेठ उसे तरक्की देता गया।
कुछ ही समय में अपनी मेहनत और लगन से उसने सेठ का विश्वास इतना जीत लिया की सेठ ने उसे अपना पार्टनर बना लिया। कुछ समय बाद सारा काम उसे सौंप कर सेठ यात्रा पर निकल गया। अब वह खुद बड़ा सेठ बन चुका था।
उधर उसकी पत्नी पर बड़े जुल्म हो रहे थे। घर के सभी लोग उससे दिन भर काम करवाते। जंगल में लकड़ी लाने भेजते। भूसे की रोटी खाने को देते। नारियल के कटोरे में पानी पिलाते।
एक दिन जंगल जाते समय उसने रास्ते में कुछ औरतों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। कथा कहते हुए सुना। उसने पूछा की यह व्रत कैसे करते है , और इसे करने से क्या होता है।  
उनमे से एक औरत ने बताया कि यह संतोषी माता का व्रत है। इसे करने से दरिद्रता मिटती है , मन की चिंता दूर होती है , कुंवारों को मनपसंद जीवन साथी मिलता है , रोग दूर होते है , हर प्रकार का सुख  प्राप्त होता है।
इसे करने के लिए अपनी सुविधा और शक्ति  के अनुसार गुड़ चना खरीद लेना। हर शुक्रवार व्रत करना और कथा कहना या सुनना। जब तक कार्य सिद्ध नहीं हो जाता बिना क्रम तोड़े व्रत करना।
कथा सुनने वाला कोई ना मिले तो दीपक को सामने रखकर कथा कहना। कार्य सिद्ध होने पर उद्यापन करना। उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा , उतनी ही खीर और उतना ही चने का साग बनाना।
आठ लड़कों को भोजन कराना। लड़के परिवार के ही हो तो अच्छा नहीं तो पड़ोस से भी बुला सकते हैं। भोजन कराकर व केला आदि फल देकर विदा करना। खट्टे फल नहीं देना।
उस दिन घर में कोई खटाई ना खाये।  
सारी विधि जानकर उसने गुड़ चने खरीद लिए। रास्ते में संतोषी माता के मंदिर में भोग लगाकर याचना करने लगी – माँ मुझे व्रत के नियम कायदे नहीं पता। मैं शुक्रवार का व्रत निष्ठां से करुँगी , मेरा दुःख दूर करना।
एक शुक्रवार बीता ,दूसरे शुक्रवार को पति का पत्र आया ,तीसरे शुक्रवार पति के भेजे रूपये आ गए। परन्तु सब घर वाले ताना मारने से नहीं चूकते।
दुखी होकर माता के मंदिर में प्रार्थना करने लगी – माँ मुझे पैसा नहीं चाहिए। मुझे अपने स्वामी के दर्शन करने हैं। माता ने उसे आशीर्वाद देकर कहा – तेरा पति जल्दी ही आएगा। वह बहुत खुश हुई।
परदेस में उसके पति के पास बिल्कुल समय नहीं था। दिनभर व्यस्त रहता था। माँ संतोषी ने उसके सपने में आकर उसे बताया कि उसकी पत्नी बहुत दुखी है। उसे उसके पास जाना चाहिए। उसे पत्नी की बहुत चिंता होने लगी। दुकान बेचकर पत्नी के लिए कपड़े , गहने और ढ़ेर सारा पैसा लेकर रवाना हो गया। 
बहु जंगल से लकड़ी काटकर लौट रही थी तब उसने धूल का गुबार उठते देखा। माता ने उसे बताया की उसका पति आ रहा है। वह घर माँ के पास जा रहा है।
इसलिए वह भी घर जाये और चौक में लकड़ी का गट्ठर डाल कर आवाज लगाये – लो सासुजी लकड़ी का गट्ठर , भूसी की रोटी दो , नारियल के खोखे में पानी दो ,आज कौन मेहमान आया है। उसने ऐसा ही किया।
आवाज सुनकर उसका पति बाहर आया और अंगूठी देखकर व्याकुलता के साथ माँ से पूछा की ये कौन है ? माँ बोली ये तेरी बहु है। दिन भर घूमती रहती है। भूख लगे तो यहाँ आकर खाना खा लेती है। काम कुछ करती नहीं है।  तुझे दिखाने के लिए नाटक कर रही है।
उसे विश्वास नहीं हुआ और माँ से चाबी लेकर ऊपर वाली मंजिल के कमरे में अपनी पत्नी के साथ चला गया। कमरे को महंगे सामान से सजा कर महल जैसा बना दिया। दोनों सुख से रहने लगे।  
बहु में अपने पति से कहा – मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने स्वीकृति दे दी। ख़ुशी से माता के उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठानी के बच्चों को खाने का न्योता दिया।
उसका उद्यापन बिगड़ने के लिए जेठानी ने बच्चों से कहा की तुम खटाई मांगना। बच्चों ने वैसा ही किया पर उसने खटाई देने से मना कर दिया तो बच्चों ने पैसे मांगे जो उसने दे दिए।
बच्चों ने खटाई खरीद कर खा ली। माता क्रुद्ध हो गई। सिपाही आये और उसके पति को अपने साथ ले गए। जेठानी बोली चोरी करके पैसे इकट्ठे किये है। इसलिए सिपाही पकड़कर ले गए।
बहु रोती बिलखती माता के मंदिर गई। माँ ने कहा तुमसे भूल हुई यह उसी का परिणाम है। बहु क्षमा मांग कर बोली में फिर से उद्यापन करुँगी और अब ऐसी भूल नहीं होगी। मेरे पति को वापस बुलाओ।
माता ने कहा वह रास्ते में आता हुआ मिल जायेगा। उसका पति रास्ते में मिला और कहने लगा इतना धन कमाया है उसका टेक्स भरने गया था। सिपाही इसी कारण आये थे। बहु ने चैन की साँस ली।
शुक्रवार आने पर फिर से उद्यापन की तैयारी कर ली। इस बार जेठानी के बच्चों को नहीं बुलाया। पंडित के बच्चों को बुलाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया और केले देकर विदा किया। माता बहुत प्रसन्न हुई।
कुछ समय बाद उसे बहुत सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर रोजाना माता के मंदिर जाती थी। एक दिन माता ने सोचा आज मैं इसके घर जाकर देखती हूँ।   
माता ने भयानक रूप अपनाया। गुड़ और चने से सना मुख , सूंड जैसे होंठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी। दहलीज पर पांव रखते ही उसकी सास चिल्लाने लगी।
अरे देखो कोई चुड़ैल आ गई है। इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। घर के सब लोग डर गए और चिल्लाने लगे। घर के खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। छोटी बहु देखते ही पहचान गई।
प्रसन्न होकर बोली – आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं। सास से बोली माँ जी डरो मत ये वही संतोषी माता जी हैं जिनकी मैं पूजा करती हूँ और जिनका व्रत रखती हूँ। यह कह कर उसने घर के सब खिड़की दरवाजे खोल दिए ।
सभी लोग माँ के चरणों में गिर गए । कहते हैं – माँ , हम अज्ञानी हैं। आपका व्रत भंग करके हमने जो अपराध किया है उसके लिए हमें क्षमा करो। माँ ने सभी को क्षमा करके कुशल मंगल का आशीर्वाद दिया और प्रेम पूर्वक रहने की सीख दी। सब आनंद से रहने लगे।
बहु को जैसा फल दिया संतोषी माँ सबको वैसा ही दे। जो यह कहानी पढ़े ,उसका मनोरथ पूर्ण हो।
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                                                                                                                                               Source:http://bit.ly/2V2nHZ0

Saturday, April 27, 2019

भगवन श्री राम के गुण । Qualities of Lord Rama |


भगवान राम

भगवान राम का जन्म धरती से राक्षसों और असुरों का संहार करने के लिए हुआ था। धरती रावण रूपी बुराई के आतंक से त्रस्त थी, चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था....धरती को पाप मुक्त बनाने के लिए विष्णु जी ने देवी कौशल्या की गर्भ से श्रीराम के रूप में जन्म लिया था।

भगवान राम का चरित्र

पौराणिक कथाओं में भगवान राम के चरित्र की व्याख्या बड़ी ही खूबसूरती के साथ की गई है। वे मर्यादा पुरुषोतम तो थे ही साथ ही वे एक आदर्श पुत्र भी और प्रिय भाई भी थे। एक ऐसे राजा थे जिन्होंने अपनी प्रजा की देखभाल अपनी संतान की भांति, वे अपनी प्रजा के दुख को अपना ही दुख समझते थे।

राम का वनवास

यही करण है कि जब भगवान राम को वनवास जाना पड़ा तब पूरी अयोध्या ही शोक में डूब गई थी और जब वे 13 साल के वनवास के बाद लौटे तो उनकी प्रजा ने उस दिन को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाकर उनके प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन किया।

रामायण ग्रंथ

रामायण ग्रंथ, भगवान राम के जीवन पर आधारित एक ऐसी रचना है जिसे पढ़ने के बाद ना सिर्फ आनंद की, बल्कि ओज और उत्साह की भी अनुभूति होती है। रामायण, भगवान राम के जीवन का दर्शन है और साथ ही इस महान ग्रंथ में कुछ ऐसी बातें भी उल्लिखित है जो मानव जीवन के बहिय काम आ सकती है।

प्राचीन ग्रंथ और पुराण

रामायण के अलावा, ऐसे कई प्राचीन ग्रंथ और पुराण हैं जिनमें भगवान राम द्वारा कही गई बातों का जिक्र है, जिनमें से एक है अग्नि पुराण। अग्नि पुराण के एक विस्तृत अध्याय के अंतर्गत श्रीराम और उनके भ्राता लक्ष्मण के बीच वार्तालाप का उल्लेख है। जिसका आधार था “कैसा व्यक्ति एक बेहतरीन राजा या नेता बन सकता है”।

भगवान राम

भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण को बताया था कि एक व्यक्ति तभी अच्छा राजा या नेता बन सकता है जब वह चार दिशाओं में कार्य करे। सबसे पहले वो ये जानता हो कि धन कैसे अर्जित किया जाता है, दूसरा अर्जित धन को बढ़ाया कैसे जाता है, तीसरा वह ये जानता हो कि उस धन की रक्षा किस तरह की जाती है और चौथा, किस तरह उस धन का प्रयोग अपनी प्रजा के सुखद भविष्य के लिए किया जाए।

प्रजा से प्रेम

भगवान श्रीराम के अनुसार राजा को ना सिर्फ उन लोगों के साथ हमेशा विनम्र और शांत रहना चाहिए जो उसके लिए काम करते हैं वल्कि उन लोगों के साथ भी नम्र व्यवहार करना चाहिए जो उसके साथ कार्य नहीं करते। ऐसा राजा जो बात-बात पर क्रोधित होता है या फिर अधिकांश स्थितियों में अपना धैर्य खो देता है, वह कभी भी अपनी प्रजा से प्रेम या आदर प्राप्त नहीं कर पाता।

गलती को मांफ़ करना

गलती को मांफ़ करना और अहिंसा के मार्ग पर चलना... जो व्यक्ति इन गुणों को अपने बेहेतर संजो कर रखता है वह एक अच्छा राजा बन सकता है। खासकर तब जब ये बातें उसके राज्य की खुशियों की बात हो। वह एक अच्छा मार्गदर्शक होना चाहिए, जो सभी की मदद करने के लिए तत्पर रहे और साथ ही साथ अपनी प्रजा की रक्षा करनी भी जानता हो।

शिकायतें सुनने का समय

एक अच्छे राजा को कभी भी अपनी प्रजा या दरबार में आए किसी भी व्यक्ति को नाउम्मीद नहीं छोड़ना चाहिए। उसके पास हमेशा अपने लोगों के दुख और शिकायतें सुनने का समय होना चाहिए, ताकि वह उन्हें सुलझा पाए। साथ ही जो लोग उससे खुश नहीं है, उन्हें भी संतुष्ट करने की कोशिश होनी चाहिए।

 अच्छे वचन

एक नेता या शासक को हमेशा अच्छे वचन ही बोलने चाहिए, फिर चाहे हो अपने दोस्त के लिए प्रयोग कर रहा हो या फिर दुश्मन के लिए।

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Thursday, April 25, 2019

भगवन शिव की अद्भुत कहानी । Story of Lord Shiva |


कई पुराणों की बात करें अगर हम तो भगवान शिव के जन्म के बारे में कोई साक्षात् हमारे पास उपलब्ध नहीं है न इस दुनिया के किसी कोने में है ! पुराणों से हमे पता चलता है की भगवान शिव निरंकार है ! भगवान शिव कोई रूप नहीं ! हम सब जिन्हें भगवान जानते है ! वो सभी एक ही है ! भगवान शिव जी का रूप कैसा है किस तरह का कोई नहीं जनता है ! भगवान शिव एक ज्ञान हैं ! दुनिया का निर्माण भगवान शिव ने किया शिव के जन्म की कहानी - वैसे तो हमारे प्राचीन वेदों में भगवान शिव जी को एक निराकार रूप बताया गया है पुराणों से हमे पता चलता है की उन्होंने भगवान विष्णु को जन्म दिया और विष्णु भगवान की नाभि से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ ! 

भगवान विष्णु और ब्रह्मा दोनों को जन्म के बाद, तब उन्हें ये भी नहीं पता था की वो इस लोक में कैसे आये कहा से आये उन्हें कौन लाया है ! इस संसार में दोनों को बहुत शक्तिशाली मना गया है ! पुराणी कथाओं की मानें तो बात-बात पर दोनों में बहस सुरु हो गयी थी की कौन हम दोनों में महान हैं कौन किससे ज्यादा शक्तिशाली है ज्यादा शक्तिशाली है या कोन बड़ा है ! वो दोनों आपस में ही लड़ने लगे ! एक बार इन दोनों के बिच युद्ध करीबन दस हजार सालो तक चला ! अलग अलग धारणाओं की मानें तो शिव पुराण और विष्णु पुराण की अलग अलग मान्यताएं हैं शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए, जबकि शिव माथे के तेज से उत्पन्न बताये गए है. 

सर्वशक्तिमान भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे देवताओं में से एक है, जो मूर्तिपूजा है क्योंकि भगवान शिव के शैवती संप्रदायों के प्रमुख प्रभु यह है कि "बुराई के विध्वंसक", हिंदू त्रिमूर्ति जिसमें ब्रह्मा और हिंदू देवता हैं शैव धर्म की परंपरा में, शिव यह है कि सभी का ईश्वर, ब्रह्मांड को संरक्षित और बदलता है। हिंदुत्व की दिव्यता परंपरा के भीतर शक्तिवाद के रूप में संदर्भित, देवत्व सर्वोच्च के रूप में चित्रित किया गया है, फिर भी शिव हिंदू देवता और ब्रह्मा के बखूबी सम्मानित है। 

हम सब जानते हैं शिव शक्तिमान हैं संसार चलाने के लिए शिव जी अपना विस्तार किया और विष्णु जी को इस संसार का पालक बनाया ! श्री ब्रह्मा जी को जन्म देने वाले भगवान् शिव ने और जरुरत पढ़ने पर विष भी पिने वाले भगवान बने ! भगवा न्विष्णू शिव की पूजा करते है ! शिव जी विष्णु की पूजा करते है ! पर तीनो ही सर्वश्रेस्ठ है ! कोई बड़ा या छोटा नहीं है ! भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ – इस बात का जवाब यही है ! 

शिव की नहीं कोई शुरुआत है और नाही अंत जो शुरू होता है उसे खत्म भी होना होता है ! पर भगवान शिव इन सबसे परे है ! उनका कोई जन्म नहीं हुआ और नाही कोई अंत होगा ! भगवान शिव सबसे पहले है और भगवान शिव सबसे अंत तक रहेंगे ! भगवान शिवशंकर जिन्हें हम जानते है ! ये बस एक आकार ग्रहण करण था!

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                                                                                                                                                                                                                  Source:http://bit.ly/2Vx7WOh

Friday, April 12, 2019

दुर्गा कथा : मां पार्वती की पवित्र पौराणिक गाथा | Maa Durga Story in Hindi |



कैलाश पर्वत के निवासी भगवान शिव की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो 'मां' ही है।

माता की पवित्र गाथा : -
आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को शक्ति कहा जाता है। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। लेकिन वह भस्म रमाने वाले योगी शिव के प्रेम में पड़ गई। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया।
एक यज्ञ में जब दक्ष ने पार्वती (शक्ति) और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी पार्वती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। पार्वती को यह सब सहन नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।  

यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने कंधों पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित हो गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया। 

माता का रूप :-

मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। रक्तांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्धचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है।
माता की प्रार्थना :- 
जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

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Tuesday, April 9, 2019

क्यों भगवान विष्णु के चरणों के निकट विराजती हैं देवी लक्ष्मी



पति को परमेश्वर का स्थान

हिन्दू धर्म में पति को परमेश्वर का स्थान दिया गया है। रूढ़िवादी समाज का मानना है कि पति के सेवा में ही स्त्री का स्वर्ग है और अपने इस कथन को आधार देने के लिए वे माता लक्ष्मी का उदाहरण देते हैं, जिन्हें हमेशा अपने पति भगवान विष्णु के चरणों के निकट बैठा हुआ ही दिखाया गया है।

देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु

हमारे समाज का ये मानना है कि जब धन की देवी लक्ष्मी अपने पति के चरणों में अपना स्वर्ग तलाश सकती हैं तो आज की महिलाएं जो खुद को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से स्वतंत्रता प्रदान कर चुकी हैं, उनके लिए पति की सेवा करना कौन सी बड़ी बात है। लेकिन क्या वाकई माता लक्ष्मी और विष्णु के चित्र को जो अवधारणा प्रदान की गई है, उसके पीछे की हकीकत वैसी ही है?

चरणों में वास

शायद नहीं, ऐसा लगता है देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु का चित्र हिन्दू धर्म में भ्रांति फैलाने का कार्य कर रहा है, क्योंकि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए माता लक्ष्मी ने अपने पति के चरणों के निकट वास किया है वो पूरी तरह भिन्न है।

ब्रह्मांड के पालनहार

हिन्दू पौराणिक दस्तावेजों के अनुसार माता लक्ष्मी की एक बहन हैं, अलक्ष्मी। जहां देवी लक्ष्मी, धन, सौभाग्य और वैभव की देवी हैं वहीं अलक्ष्मी, दरिद्रता, निर्धनता आदि का प्रतीक कही जाती हैं। विष्णु को पालनहार कहा जाता है, जिनका दायित्व घर-परिवार समेत समस्त ब्रह्मांड की रक्षा करना है और देवी लक्ष्मी इन्हीं पालनहार को दरिद्रता और दुर्भाग्य से बचाने के लिए उनके चरणों में बैठी हैं।

उल्लू का स्वरूप

अलक्ष्मी, लक्ष्मी देवी की बड़ी बहन हैं। बेहद कुरूप होने की वजह से उनका विवाह भी नहीं हो पाया। कहा जाता है कि जहां-जहां देवी लक्ष्मी जाती हैं, अलक्ष्मी उनके पीछे-पीछे वहां पहुंचती हैं। कभी अपने स्वरूप में तो कभी देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू के स्वरूप में।

ईर्ष्यालु बहन

अलक्ष्मी अपनी बहन लक्ष्मी से बेहद ईर्ष्या रखती हैं। वह बिल्कुल भी आकर्षक नहीं हैं, उनकी आंखें भड़कीली, बाल फैले हुए और बड़े-बड़े दांत हैं। यहां तक कि जब भी देवी लक्ष्मी अपने पति के साथ होती हैं, अलक्ष्मी वहां भी उन दोनों के साथ पहुंच जाती हैं।

देवी लक्ष्मी का क्रोध

पौराणिक मान्यतानुसार, अपनी बहन का ये बर्ताव देवी लक्ष्मी को बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने अलक्ष्मी से पूछा “तुम मुझे और मेरे पति को अकेला क्यों नहीं छोड़ देती? तुम क्यों मेरे पति के समीप जाना चाहती हो?”

अलक्ष्मी का जवाब

इस पर अलक्ष्मी ने जवाब दिया “मेरे पास पति नहीं है और कोई भी मेरी आराधना नहीं करता, इसलिए जहां-जहां तुम जाओगी, मैं तुम्हारे साथ रहूंगी”।

श्राप

इस पर देवी लक्ष्मी अत्यंत क्रोधित हो गईं और क्रोध के आवेग में उन्होंने अलक्ष्मी को श्राप दिया “मृत्यु के देवता तुम्हारे पति हैं और जहां भी गंदगी, ईर्ष्या, लालच, आलस, रोष और अस्वच्छता रहेगी, तुम वहीं रहोगी”।

गंदगी पर वास

इस प्रकार भगवान विष्णु और अपने पति के चरणों में बैठकर माता लक्ष्मी उनके चरणों की गंदगी को दूर करती हैं, ताकि अलक्ष्मी उनके निकट भी ना सकें। यहां माता लक्ष्मी एक देवी नहीं बल्कि एक पत्नी की भूमिका में हैं, जो अपने पति को पराई स्त्री से दूर रखने की हर संभव कोशिश कर रही हैं।

प्रतीकात्मक ग्रंथ

इस तरह देखा जाए तो हिन्दू पौराणिक इतिहास जितना स्पष्ट है उतना ही ज्यादा प्रतीकात्मक भी। इन प्रतीकों को हम अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार परिभाषित कर लेते हैं। यहां देवी लक्ष्मी, अलक्ष्मी और भगवान विष्णु की कहानी को सौभाग्य और दुर्भाग्य के साथ जोड़ा गया है।

सौभाग्य और दुर्भाग्य

माना जाता है सौभाग्य और दुर्भाग्य एक साथ चलते हैं और एक ही साथ पहुंचते हैं। जब आपके ऊपर सौभाग्य की वर्षा होती है तब दुर्भाग्य भी निकट बैठे हुए अपने लिए एक अवसर की तलाश कर रहा होता है।

अलक्ष्मी का उद्देश्य

अलक्ष्मी भी कुछ इसी तरह घर के बाहर बैठकर लक्ष्मी के जाने का इंतजार करती हैं कि वो जाएं तो अलक्ष्मी को घर के भीतर आने का मौका मिले।

अलक्ष्मी का प्रवेश

जहां भी गंदगी मौजूद होती है वहां लालच, ईर्ष्या, पति-पत्नी के झगड़े, अश्लीलता, क्लेश और कलह का वातावरण बन जाता है, जो कि अलक्ष्मी के प्रवेश की निशानी है।

सफाई का महत्व

अलक्ष्मी को दूर रखने और लक्ष्मी को आमंत्रित करने के लिए हिन्दू धर्म से जुड़े प्रत्येक घर में सफाई के साथ-साथ नित्य पूजा-पाठ और अगबत्ती का धुआं किया जाता है, ताकि घर और घर के लोगों को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता और दुर्भाग्य से दूर रखा जा सके।
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                                                                                                                                     Source:http://bit.ly/2U3qPmR

Monday, April 1, 2019

शिव पुराण | Shiv Puran in Hindi |



'शिव पुराण' का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु 'शिव पुराण' में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

भगवान शिव सदैव लोकोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति को सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती । शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं। जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से 'जीवन' और 'मृत्यु' का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।

'रामचरितमानस' में तुलसीदास ने जिन्हें 'अशिव वेषधारी' और 'नाना वाहन नाना भेष' वाले गणों का अधिपति कहा है, वे शिव जन-सुलभ तथा आडम्बर विहीन वेष को ही धारण करने वाले हैं। वे 'नीलकंठ' कहलाते हैं। क्योंकि समुद्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए मरे जा रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। तभी से शिव नीलकंठ कहलाए। क्योंकि विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था।

ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही इस पुराण की रचना की गई है। यह पुराण पूर्णत: भक्ति ग्रन्थ है। पुराणों के मान्य पांच विषयों का 'शिव पुराण' में अभाव है। इस पुराण में कलियुग के पापकर्म से ग्रसित व्यक्ति को 'मुक्ति' के लिए शिव-भक्ति का मार्ग सुझाया गया है।
मनुष्य को निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म शिव को अर्पित कर देने चाहिए। वेदों और उपनिषदों में 'प्रणव - ॐ' के जप को मुक्ति का आधार बताया गया है। प्रणव के अतिरिक्त 'गायत्री मन्त्र' के जप को भी शान्ति और मोक्षकारक कहा गया है। परन्तु इस पुराण में आठ संहिताओं सका उल्लेख प्राप्त होता है, जो मोक्ष कारक हैं। ये संहिताएं हैं- विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता (पूर्व भाग) और वायु संहिता (उत्तर भाग)।
इस विभाजन के साथ ही सर्वप्रथम 'शिव पुराण' का माहात्म्य प्रकट किया गया है। इस प्रसंग में चंचुला नामक एक पतिता स्त्री की कथा है जो 'शिव पुराण' सुनकर स्वयं सद्गति को प्राप्त हो जाती है। यही नहीं, वह अपने कुमार्गगामी पति को भी मोक्ष दिला देती है। तदुपरान्त शिव पूजा की विधि बताई गई है। शिव कथा सुनने वालों को उपवास आदि न करने के लिए कहा गया है। क्योंकि भूखे पेट कथा में मन नहीं लगता। साथ ही गरिष्ठ भोजन, बासी भोजन, वायु विकार उत्पन्न करने वाली दालें, बैंगन, मूली, प्याज, लहसुन, गाजर तथा मांस-मदिरा का सेवन वर्जित बताया गया है।

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Source:https://bit.ly/2FNII5x

Friday, March 29, 2019

हनुमान पुराण कथा । Hanuman-puran-katha



हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना(एक नारी वानर) के पुत्र के रूप मे हुआ था। अंजना असल मे पुन्जिकस्थला नाम की एक अप्सरा थीं, मगर एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। अंजना केसरी की पत्नी थीं। केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, "केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।


केसरी के संग मे अंजना ने भगवान शिव कि बहुत कठोर तपस्या की जिसके फ़लस्वरूप अंजना ने हनुमान(शिव के अन्श) को जन्म दिया।

जिस समय अंजना शिव की आराधना कर रहीं थीं उसी समय अयोध्या-नरेश दशरथ, पुत्र प्राप्ति के लिये पुत्र कामना यज्ञ करवा रहे थे। फ़लस्वरूप उन्हे एक दिव्य फल प्राप्त हुआ जिसे उनकी रानियों ने बराबर हिस्सों मे बाँटकर ग्रहण किया। इसी के फ़लस्वरूप उन्हे राम, लषन, भरत और शत्रुघन पुत्र रूप मे प्राप्त हुए।

विधि का विधान ही कहेंगे कि उस दिव्य फ़ल का छोटा सा टुकडा एक चील काट के ले गई और उसी वन के ऊपर से उडते हुए(जहाँ अंजना और केसरी तपस्या कर रहे थे) चील के मुँह से वो टुकडा नीचे गिर गया। उस टुकडे को पवन देव ने अपने प्रभाव से याचक बनी हुई अंजना के हाथों मे गिरा दिया। ईश्वर का वरदान समझकर अंजना ने उसे ग्रहण कर लिया जिसके फ़लस्वरूप उन्होंने पुत्र के रूप मे हनुमान को जन्म दिया।

अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'। 

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                                                                                                                                                                                                               Source:https://bit.ly/2Uch1eH

तिरुपति बालाजी मंत्र का महत्त्व | Tirupati-Balaji-mantra-benifits-importance



तिरुपति बालाजी मंत्र

तिरुपति भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है. यह आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है. प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं. समुद्र तल से 3200 फीट ऊंचाई पर स्थित तिरुमला की पहाड़ियों पर बना श्री वैंकटेश्वर मंदिर यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है.

तिरुपति बालाजी मंत्र क्यों पढ़ा जाता है

कई शताब्दी पूर्व बना यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला और शिल्प कला का अदभूत उदाहरण हैं. भगवान तिरुपति बालाजी भगवान विष्णु का ही दूसरा रूप है. तिरुपति बालाजी मंत्र से भगवान बालाजी को आभार प्रकट करते हुए श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया जाता है. तिरुपति बालाजी मंत्र एक सूत्र या शब्द है जिसका अर्थ है जागरूकता की संवेदनशीलता.

तिरुपति बालाजी मंत्र का महत्व

यह मंत्र संवेदनशीलता के माध्यम से ध्वनि, ताल, स्वर और मुंह के संशोधित आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है. यह मंत्र एक शुद्ध ध्वनि कंपन है जो कि मन को मोह माया और भ्रम से बचाता है. इस जप मंत्र को दोहराने की प्रक्रिया है. यह जप मंत्र प्राण में ऊर्जा भर देता है.

तिरुपति बालाजी मंत्र का भाव

इस मंत्र को दोहराने से एक मानसिक कंपन होती है जो कि जागरूकता के गहरे स्तर का अनुभव करके मन को शांत करता है.मंत्र जप का मूल भाव होता है. जिस देव का मंत्र है उस देव के मनन के लिए सही तरीके धर्मग्रंथों में बताए हैं. शास्त्रों के मुताबिक मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए. साथ ही एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है

तिरुपति बालाजी मंत्र को सुनने के लाभ

जब इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है तो मन शांत होकर ध्यान मुद्रा में चला जाता है. माना जाता है कि इनके बिना मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है. इस मंत्र को पढ़ने से खुशी मिलती है. ये भावनाओं को पवित्र कर शरीर में ऊर्जा का प्रवाह करता है.

तिरुपति बालाजी मंत्र लाभ

ये अलगाव और भय की भावनाओं को कम करता है. ये रचनात्मक प्रक्रिया को बढ़ाता है. ये मंत्र शारीरिक दर्द और अवसाद को मन से दूर भगाता है. ये मंत्र मन को शांत कर अच्छी नींद लाने में मदद करता है. ये भगवान और देवी का स्मरण करवाता है., इस मंत्र को हर रोज सुनने से भावना और कोर आध्यात्मिकता की समृद्धि का अनुभव होता है.

बालाजी मंत्र


तिरुपति बालाजी मंत्र का अर्थ

इस मंत्र का अर्थ है भगवान तिरुपति बालाजी अर्थात भगवान् वेंकटेश्वर को नमस्कार.

पुराणों में मंत्र

पुराणों के अनुसार शब्द "वेंकट" का अर्थ है - "पापों का नाश", वम शब्द संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है पाना, दूसरे अक्षरो में पापों को काटने की प्रतिरोधक क्षमता की शक्ति.

इच्छा प्राप्ति मंत्र

कुछ विशेष कामना की पूर्ति के लिए विशेष मालाओं से जप करने का भी विधान है. जैसे धन प्राप्ति की इच्छा से मंत्र जप करने के लिए मूंगे की माला, पुत्र पाने की कामना से जप करने पर पुत्रजीव के मनकों की माला और किसी भी तरह की कामना पूर्ति के लिए जप करने पर स्फटिक की माला का उपयोग करें. तिरुपति बालाजी मंत्र को जपने के लिए भी एक विशेष माला का उपयोग किया जाता है.

Monday, March 25, 2019

शिव पुराण कथा के लाभ और महत्व | shiv-puran-importance-benifits




शिव पुराण क्या है?

'शिव पुराण' का सम्बन्ध शैव मत से है। शिव पुराण में भगवान शंकर के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। शिवमहापुराण में भगवान शिव और देवी पार्वती के बारे में और उनकी गाथा का विवरण पूर्ण रूप से दिया गया है।

शिव पुराण में शिव की महिमा

शिवपुराण में शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। इसमें इन्हें पंचदेवों में प्रधान अनादि सिद्ध परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। शिव-महिमा के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन और भगवान शिव के भव्यतम व्यक्तित्व का गुणगान है।

शिव पुराण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण

शिव - जो स्वयंभू हैं, शाश्वत हैं, सर्वोच्च सत्ता है, विश्व चेतना हैं और ब्रह्माण्डीय अस्तित्व के आधार हैं। सभी पुराणों में शिव पुराण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होने का दर्जा प्राप्त है। इसमें भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, भक्तों और भक्ति का विशद् वर्णन किया गया है।

शिव पुराण में खास

इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। किन्तु 'शिव पुराण' में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

शिव पुराण में श्लोक और स्कंध-

इसमें भगवान शिव और देवी पार्वती की गाथा का पूर्ण विवरण है जो कुल 12 स्कंध भागों में बंटा हुआ है। शिवपुराण के हर स्कंध में शिव के अलग-अलग रूपों और उसकी माहिमा आदि का वर्णन है। इस पुराण में 2 4 ,000 श्लोक है तथा इसके क्रमश: 6 खण्ड हैं - 1. विद्येश्वर संहिताच; 2. रुद्र संहिता; 3. कोटिरुद्र संहिता; 4. उमा संहिता; 5. कैलास संहिता; 6. वायु संहिता।

6 खण्ड शिवपुराण के 10 स्कन्द और उनका वर्णन

1. शिवपुराण के पहले स्कंध में शिवपुराण की महिमा का वर्णन है। 2.शिवपुराण के दूसरे स्कंध में शिवलिंग की पूजा और उसके प्रकार का वर्णन है जिससे विद्येश्वर संहिता नाम से जाना जाता है। 3. शिवपुराण के तीसरे स्कंध के पार्वती खंड में शिव-पार्वती की कथा का वर्णन है। 4. शिवपुराण के चौथे स्कंध कुमार खंड में कार्तिकेय भगवान की कथा का वर्णन है।

6 खण्ड शिवपुराण के 10 स्कन्द और उनका वर्णन

5. शिवपुराण के पांचवे स्कंध युद्ध खंड में शिव जी द्वारा त्रिपुरासुर वध की कथा का वर्णन है। 6. शिवपुराण के छठे स्कंध शतरुद्रसंहिता में शिव के अवतारों और शिव की मूर्तियों का वर्णन है। 7. शिवपुराण के सातवें स्कंध कोटि रुद्र संहिता में द्वादश ज्योतिर्लिंग और शिव सहस्त्रनाम का वर्णन है।

6 खण्ड शिवपुराण के 10 स्कन्द और उनका वर्णन

8. शिवपुराण के आठवे स्कंध उमा संहिता में मृत्यु और नरकों और क्रियायोग का वर्णन है। 9. शिवपुराण के नवें स्कंध वायवीय संहिता पूर्व खंड में शिव के अर्धनारीश्वर स्वरुप का वर्णन है। 10. शिवपुराण के दसवे स्कंध वायवीय संहिता के उत्तरखंड में शिव धर्म और शिव-शिवा की विभूतियों का वर्णन है।

शिव पुराण को पढ़ने का क्या लाभ मिलता है?

पृथ्वी पर हर व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके लाभ और हानि के बारे में सोचता है। हर व्यक्ति कार्य को करने से प्राप्त लक्ष्य के बारे में सोचकर तभी कार्य करता है। शिवपुराण के आरंभ में पुराण विशेष की महिमा और उसके पढ़ने की विधि के बारे में जानकारी दी गयी है। आईये हम आपको यह बतायेंगे कि शिव पुराण को पढ़ने से क्या लाभ होता है।

शिव पुराण को पढ़ने का क्या लाभ मिलता है?

- जो व्यक्ति शिवपुराण को पढ़ता है उससे भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। - अगर किसी व्यक्ति से अनजाने या जान-बूझकर कोई पाप हो जाए तो तो अगर वो शिवपुराण को पड़ने लगता है तो उसका घोर से घोर पाप से छुटकारा मिल जाता है।

शिव पुराण को पढ़ने का क्या लाभ मिलता है?

- जो व्यक्ति शिवपुराण को पढ़ने लगते है उनके मृत्यु के बाद शिव के गण लेने आते हैं। - सावन में शिव पुराण का पाठ करने से उसका फल बहुत ही सुखदायी होता है।

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                                                                                                                                                                                                              Source:https://bit.ly/2JFafK8

Friday, March 22, 2019

जब अपनी ही पुत्री सरस्वती से ब्रह्मा जी ने किया जबरन विवाह | Brahma-married-his-own-daughter-saraswati



विद्या और कला की देवी सरस्वती को पवित्रता और उर्वरता की देवी मन गया है और कहते हैं जिसके ऊपर सरस्वती का आशीर्वाद होता है उसका जीवन सदैव के लिए प्रकाशमय हो जाता है। लेकिन ऐसी कौन सी वजह थी जो इनके ऊपर स्वयं इनके पिता ने कुदृष्टि डाली थी। आइए जानते हैं इस कहानी के पीछे का रहस्य।

किसकी पुत्री थी देवी सरस्वती? हमारे सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मदेव माता सरस्वती के पिता थे। सरस्वती पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मदेव ने सृष्टि का निर्माण करने के बाद अपने वीर्य से सरस्वती जी को जन्म दिया था। इनकी कोई माता नहीं है इसलिए यह ब्रह्मा जी की पुत्री के रूप में जानी जाती थी। वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। जब उन्होंने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में बिलकुल अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया।

अपनी ही पुत्री से ब्रह्मदेव हुए आकर्षित कहते हैं देवी सरस्वती इतनी रूपवन्ती थी की स्वयं ब्रह्मा जी उनके सुन्दर रूप से आकर्षित हो गए थे और उनसे विवाह करना चाहते थे। किन्तु जब माता को इस बात की भनक लगी तो वह ब्रह्मा जी से बचने के लिए चारों दिशाओं में छुपने लगीं। लेकिन उनके सारे प्रयत्न विफल हुए। अंत में उन्होंने हार मान ली और उन्हें ब्रह्मा जी के साथ विवाह करना पड़ा। माना जाता है कि ब्रह्मा जी और देवी सरस्वती पूरे सौ वर्षों तक एक जंगल में पति पत्नी की तरह रहे वहां इनके पुत्र स्वयंभु मनु का भी जन्म हुआ। मतस्य पुराण की एक कथा के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती पर कुदृष्टि डाली थी तब वह इनसे बचने के लिए आकाश में जा कर छुप गई थी। तब ब्रह्मा जी के पांचवे सिर ने उन्हें ढूंढ निकाला, इसके बाद ब्रह्मदेव ने देवी सरस्वती से सृष्टि की रचना में सहयोग करने के लिए कहा।

तब इनके पुत्र मनु का जन्म हुआ जिसे पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है। इसके अलावा मनु को वेदों, सनातन धर्म और संस्कृत समेत समस्त भाषाओं का जनक भी कहा जाता है।

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हनुमानजी की जन्म कथा - Story of Lord Hanuman's birth


महावीर हनुमान को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार कहा जाता है और वे प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं। हनुमान जी ने वानर जाति में जन्म लिया। उनकी माता का नाम अंजना (अंजनी) और उनके पिता वानरराज केशरी हैं। इसी कारण इन्हें आंजनाय और केसरीनंदन आदि नामों से पुकारा जाता है। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार हनुमान जी को पवन पुत्र भी कहते हैं।

हनुमान जी के जन्म के पीछे पवन देव का भी योगदान था। एक बार अयोध्या के राजा दशरथ अपनी पत्नियों के साथ पुत्रेष्टि हवन कर रहे थे। यह हवन पुत्र प्राप्ति के लिए किया जा रहा था। हवन समाप्ति के बाद गुरुदेव ने प्रसाद की खीर तीनों रानियों में थोड़ी थोड़ी बांट दी।

खीर का एक भाग एक कौआ अपने साथ एक जगह ले गया जहा अंजनी मां तपस्या कर रही थी। यह सब भगवान शिव और वायु देव के इच्छा अनुसार हो रहा था। तपस्या करती अंजना के हाथ में जब खीर आई तो उन्होंने उसे शिवजी का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया। इसी प्रसाद की वजह से हनुमान का जन्म हुआ।

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लक्ष्मी जी की कहानी – Laxmi ji ki kahani


एक साहूकार की एक बेटी थी। वह रोजाना पीपल के पेड़ में पानी डालने जाती थी। पीपल के पेड़ पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने प्रकट होकर उससे कहा तू मेरी सहेली बन जा।
वह लड़की माता पिता की आज्ञाकारी थी। उसने कहा यदि मेरे मेरे माता पिता आज्ञा दे देंगे तो मै आपकी सहेली बन जाउंगी। उसके माता पिता ने उसे आज्ञा दे दी। दोनों सहेली बन गई।
एक दिन लक्ष्मी जी ने उसे खाना खाने के लिए निमंत्रण दिया। माता पिता की आज्ञा लेकर वह लक्ष्मी जी के यहाँ जीमने चली गई।
लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला भेंट किया , रूपये दिए। उसे सोने से बनी चौकी पर बैठाया। सोने की थाली , कटोरी में छत्तीस प्रकार के व्यंजन परोस कर खाना खिलाया।
जब वह अपने घर के लिए रवाना होने लगी तो लक्ष्मी जी ने कहा मैं भी तुम्हारे यहाँ जीमने आऊँगी। उसने कहा ठीक है , जरूर आना।
घर आने के बाद वह उदास होकर कुछ सोच में पड़ गई । पिता ने पूछा सहेली के यहाँ जीम कर आई तो उदास क्यों हो। उसने अपने पिता को कहा लक्ष्मीजी ने उसे बहुत कुछ दिया अब वो हमारे यहाँ आएगी तो मैं उसे कैसे जिमाउंगी ,अपने घर में तो कुछ भी नहीं है।
पिता ने कहा तू चिंता मत कर। बस तुम घर की साफ सफाई अच्छे से करके लक्ष्मी जी के सामने एक चौमुखा दिया जला कर रख देना। सब ठीक होगा।
वह दिया लेकर बैठी थी। एक चील रानी का नौलखा हार पंजे में दबाकर उड़ती हुई जा रही थी। उसके पंजे से वह हार छूटकर लड़की के पास आकर गिरा। लड़की हार को देखने लगी। उसने अपने पिता को वह हार दिखाया।
बाहर शोर हो रहा था की एक चील रानी का नौलखा हार उड़ा ले गई है। किसी को मिले तो लौटा दे। एक बार तो दोनों के मन विचार आया की इसे बेचकर लक्ष्मी जी के स्वागत का प्रबंध हो सकता है।
लेकिन अच्छे संस्कारों की वजह से पिता ने लड़की को कहा यह हार हम रानी को लौटा देंगे। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए धन तो नहीं पर हम पूरा मान सम्मान देंगे।
उन्होंने हार राजा को दिया तो राजा ने खुश होकर कहा जो चाहो मांग लो। साहूकार ने राजा से कहा की बेटी की  सहेली के स्वागत के लिए शाल दुशाला , सोने की चौकी , सोने की थाली कटोरी और छत्तीस प्रकार के व्यंजन की व्यवस्था करवा दीजिये। राजा ने तुरंत ऐसी व्यवस्था करवा दी।
लड़की ने गणेश और लक्ष्मी जी दोनों को बुलाया। लक्ष्मी जी को सोने की चौकी पर बैठने को कहा। लक्ष्मी जी ने कहा की मैं तो किसी राजा महाराजा की चौकी पर भी नहीं बैठती। लड़की ने कहा मुझे सहेली बनाया है तो मेरे यहाँ तो बैठना पड़ेगा।
गणेश और लक्ष्मी जी दोनों चौकी पर बैठ गए। लड़की ने बहुत आदर सत्कार के साथ और प्रेम पूर्वक भोजन करवाया। लक्ष्मी जी बड़ी प्रसन्न हुई। लक्ष्मी जी ने जब विदा मांगी तो लड़की ने कहा अभी रुको मैं लौट कर आऊं तब जाना ,और चली गई।
लक्ष्मी जी चौकी पर बैठी इंतजार करती रही। लक्ष्मी जी के वहाँ होने से घर में धन धान्य का भंडार भर गया। इस प्रकार साहूकार और उसकी बेटी बहुत धनवान हो गए।
हे लक्ष्मी माँ।  जिस प्रकार आपने साहूकार की बेटी का आतिथ्य स्वीकार करके भोजन किया और उसे धनवान बनाया। उसी प्रकार हमारा भी आमंत्रण स्वीकार करके हमारे घर पधारें और हमें धन धान्य से परिपूर्ण करें।
जय लक्ष्मी माँ , तेरी कृपा हो , तेरी जय हो।
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