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Friday, August 2, 2019

माँ दुर्गा के 9 अवतारों की कहानियाँ | Maa Durga Stories |


माँ दुर्गा के 9 रूप हैं जिनकी कहानियाँ आप इस पोस्ट में पढ़ सकते हैं –

शैलपुत्री Shailaputri

शैलपुत्री देवी दुर्गा का प्रथम रूप है। वह पर्वतों के राजा – हिमालय की पुत्री हैं। राजा हिमालय और उनकी पत्नी मेनाका ने कई तपस्या की जिसके फल स्वरुप माता दुर्गा उनकी पुत्री के रूप में पृथ्वी पर उतरी। तभी उनका नाम शैलपुत्री रखा गया यानी (शैल = पर्वत और पुत्री = बेटी)। माता शैलपुत्री का वाहन है बैल तथा उनके दायें हाँथ में होता है त्रिशूल और बाएं हाँथ में होता है कमल का फूल।
दक्ष यज्ञ में पवित्र माँ ने सती के रूप में अपने शरीर को त्याग दिया। उसके पश्चात माँ दोबारा भगवान शिव जी की दिव्य पत्नी बनी। उनकी कहानी बहुत ही प्रेरणा देती है।

ब्रह्मचारिणी Brahmacharini

(ब्रह्म = तपस्या), माता दुर्गा इस रूप में वह अपने दायें हाथ में एक जप माला पकड़ी रहती है और बाएं हाथ में एक कमंडल। नारद मुनि के सलाह देंने पर माता ब्रह्मचारिणी ने शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्या किया। पवित्र माता में बहुत ही ज्यादा शक्ति है।
मुक्ति प्राप्त करने के लिए माता शक्ति ने ब्रह्म ज्ञान को ज्ञात किया और उसी कारण से उनको ब्रह्मचारिणी के नाम से पूजा जाता है। माता अपने भक्तों को सर्वोच्च पवित्र ज्ञान प्रदान करती हैं।

चन्द्रघंटा Chandraganta

यह माता दुर्गा का तीसरा रूप है। चंद्र यानी की चंद्र की रोशनी। यह परम शांति प्रदान करने वाला माँ का रूप है। मा की आराधना करने से सुख शांति मिलता है। वह तेज़ स्वर्ण के समान होता है और उनका वाहन सिंह होता है। उनके दस हाँथ हैं और कई प्रकार के अस्त्र -शस्त्र जैसे कडग, बांड, त्रिशूल, पद्म फूल उनके हांथों में होते हैं।
माँ चन्द्रघंटा की पूजा आराधना करने से पाप और मुश्किलें दूर होती हैं उनकी घाटियों की भयानक आवाज़ से राक्षस भाग खड़े होते हैं।

कुष्मांडा Kushmanda

कुष्मांडा माता दुर्गा का चौथा रूप है। जब पृथ्वी पर कुछ नहीं था और हर जगह अंधकार ही अंधकार था तब माता कुष्मांडा ने सृष्टि को जन्म दिया। उस समय माता सूर्य लोक में रहती थी। ऊर्जा का सृजन भी उन्ही ने सृष्टि में किया। 
माता कुष्मांडा के आठ हाँथ होते हैं इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनका वाहन सिंह है और माता के हांथों मैं कमंडल, चक्र, कमल का फूल, अमृत मटका, और जप माला होते हैं।
माता कुष्मांडा शुद्धता की देवी हैं, उनकी पूजा करने से सभी रोग और दुख-कष्ट दूर होते हैं।

स्कंदमाता Skandamata

स्कंदमाता माता दुर्गा का पांचवा रूप है। माँ दुर्गा ने देवताओं को सही मढ़ और आशीर्वाद देने के लिए भगवान् शिव से विवाह किया। असुरों और देवताओं के युद्ध होने के दौरान देवताओं को अपना एक मार्ग दर्शक नेता की जरूरत थी। शिव पारवती जी के पुत्र कार्तिक जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है देवताओं के नेता बने।
कार्तिक/स्कंदा को माता पारवती माता अपने गोद में बैठा के रखती हैं अपने वाहन सिंह पर बैठे हुए इसलिए उन्हें स्कंदमाता के नाम से पूजा जाता है।उनके 4 भुजाएं हैं, ऊपर के हाथ में माता कमल का फूल पकड़ी रहती है और नीचे के एक हाथ से माँ वरदान देती हैं और दुसरे से कार्तिक को पकड़ी रखती है।
स्कंदमाता के पूजा से भक्तों के सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

कात्यायनी Katyayani

माँ कात्यायनी, दुर्गा माता के छटवां रूप हैं। महर्षि कात्यायना एक महान ज्ञानी थे जो अपने आश्रम में कठोर तपस्या कर रहे थे ताकि महिषासुर का अंत हो सके। एक दिन भगवान ब्रह्मा,विष्णु, और महेश्वर एक साथ उनके समक्ष प्रकट हुए। तीनो त्रिमूर्ति ने मिलकर अपनी शक्ति से माता दुर्गा को प्रकट किया। यह आश्विन महीने के 14वें दिन पूर्ण रात्रि के समय हुआ।
महर्षि कात्यायना वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने माता दुर्गा की पूजा की थी इसलिए माता दुर्गा का नाम माँ कात्यायनी कहा जाता है और आश्विन माह के पूर्ण उज्वाल रात्रि सातवें, आठवें और नौवे दिन नवरात्री का त्यौहार मनाया जाता है। दसवें दिन को महिषासुर का अंत मानया जाता है।
माता कात्यायनी को शुद्धता की देवी माना जाता है। माता कात्यायनी के चार हाथ हैं, उनके उपरी दाहिने हाथ में वह मुद्रा प्रदर्शित करती हैं जो डर से मुक्ति देता है, और उनके नीचले दाहिने हाथ में वह आशीर्वाद मुद्रा, उपरी बाएं हाथ में वह तलवार और नीचले बाएं में कमल का फूल रखती है। उनकी पूजा आराधना करने से धन-धन्य और मुक्ति मिलती है।

कालरात्रि Kalaraatri

माँ कालरात्रि, दुर्गा का सातवां रूप हैं। उनका नाम काल रात्रि इसलिए है क्योंकि वह काल का भी विनाश हैं। वह सब कुछ विनाश कर सकती हैं। कालरात्रि का अर्थ है अन्धकार की रात। उनका रैंड काला होता है उनके बाद बिखरे और उड़ते हुए होते हैं। उनका शरीर अग्नि के सामान तेज़ होता है।
उनका वहां गधा है और उनके ऊपर दायिने हाथ में वह आशीर्वाद देती मुद्रा में होती हैं और निचले दायिने हाथ में माँ निडरता प्रदान करती है। उनके ऊपर बाएं हाथ में गदा और निचले बाएं हाथ में लोहे की कटार रखती हैं।
उनका प्रचंड रूप बहुत भयानक है परन्तु वह अपने भक्तों की हमेशा मदद करती है इसलिए उनका एक और नाम है भायांकारी भी है। उनकी पूजा करने से भूत, सांप, आग, बाढ़ और भयानक जानवरों के भय से मुक्ति मिलती है।

महागौरी Maha Gauri

माँ दुर्गा का आठवां रूप है महागौरी। देवी पारवती का रंग सावला था और इसी कारन महादेव शिवजी उन्हें कालिके के नाम से पुकारा करते थे। बाद में माता पार्वती ने तपस्या किया जिसके कारन शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा के पानीको माता पारवती के ऊपर डाल कर उन्हें गोरा रंग दिया। तब से माता पारवती को महागौरी के नाम से पूजा जाने लगा।
उनका वाहन बैल है और उनके उपरी दाहिने हाथ से माँ आशीर्वाद वरदान देती है, और निचले दायिने हाथ में त्रिशूल रखती है। उपरी बाएं हाथ में उनके डमरू होता है और निचले हाथ से वह वरदान और अशोर्वाद देती हैं।
महागौरी की पूजा आराधना करने वाले भक्तों को भ्रम से मुक्ति, जीवन में दुख कष्ट का अंत होता है।

सिद्धिदात्री Siddhidaatri

माता दुर्गा के नौवे रूप का नाम सिद्धिदात्री है। उनका ना ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें सिद्धि प्रदान करने की माता कहा जाता है। माता सिद्धिदात्री के अनुकम्पा सेही शिवजी को अर्धानारिश्वार का रूप मिला। उनका वाहन सिंह है और उनका आसन है कमल का फूल।
उनके उपरी दायिने हाथ में माता एक गदा और निचले दायिने हाथ में चक्रम रखती है। माता अपने उपरी बाएं हाथ में एक कमल का फूल और निचले बाएं हाथ में एक शंख रखती हैं। माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों की सभी मनोस्कम्नाओं की सिद्धि देती हैं।
Source:http://bit.ly/2YBY431
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Thursday, August 1, 2019

भगवन शिव और माता पारवती की कहानी |




माता पार्वती शिव जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप कर रही थीं। उनके तप को देखकर देवताओं ने शिव जी से देवी की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की।

शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा लेने सप्तर्षियों को भेजा।
सप्तर्षियों ने शिव जी के सैकड़ों अवगुण गिनाए पर पार्वती जी को महादेव के अलावा किसी और से विवाह मंजूर न था।

विवाह से पहले सभी वर अपनी भावी पत्नी को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। इसलिए शिव जी ने स्वयं भी पार्वती की परीक्षा लेने की ठानी।

भगवान शंकर प्रकट हुए और पार्वती को वरदान देकर अंतर्ध्यान हुए। इतने में जहां वह तप कर रही थीं, वही पास में तालाब में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया।

लड़का जान बचाने के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती जी से उस बच्चे की चीख सुनी न गई। द्रवित हृदय होकर वह तालाब पर पहुंचीं। देखती हैं कि मगरमच्छ लड़के को तालाब के अंदर खींचकर ले जा रहा है।

लड़के ने देवी को देखकर कहा- मेरी न तो मां है न बाप, न कोई मित्र... माता आप मेरी रक्षा करें.. .

पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! इस लडके को छोड़ दो। मगरमच्छ बोला- दिन के छठे पहर में जो मुझे मिलता है, उसे अपना आहार समझ कर स्वीकार करना, मेरा नियम है।

ब्रह्मदेव ने दिन के छठे पहर इस लड़के को भेजा है। मैं इसे क्यों छोडूं ?

पार्वती जी ने विनती की- तुम इसे छोड़ दो। बदले में तुम्हें जो चाहिए वह मुझसे कहो।

मगरमच्छ बोला- एक ही शर्त पर मैं इसे छोड़ सकता हूं। आपने तप करके महादेव से जो वरदान लिया, यदि उस तप का फल मुझे दे दोगी तो मैं इसे छोड़ दूंगा।

पार्वती जी तैयार हो गईं। उन्होंने कहा- मैं अपने तप का फल तुम्हें देने को तैयार हूं लेकिन तुम इस बालक को छोड़ दो।
मगरमच्छ ने समझाया- सोच लो देवी, जोश में आकर संकल्प मत करो। हजारों वर्षों तक जैसा तप किया है वह देवताओं के लिए भी संभव नहीं।

उसका सारा फल इस बालक के प्राणों के बदले चला जाएगा।

पार्वती जी ने कहा- मेरा निश्चय पक्का है। मैं तुम्हें अपने तप का फल देती हूं। तुम इसका जीवन दे दो।

मगरमच्छ ने पार्वती जी से तपदान करने का संकल्प करवाया। तप का दान होते ही मगरमच्छ का देह तेज से चमकने लगा।

मगर बोला- हे पार्वती, देखो तप के प्रभाव से मैं तेजस्वी बन गया हूं। तुमने जीवन भर की पूंजी एक बच्चे के लिए व्यर्थ कर दी। चाहो तो अपनी भूल सुधारने का एक मौका और दे सकता हूं।

पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ?

देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया।

पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया।

भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो?

पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी।
महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं....

देवी ने महादेव को प्रणाम कर प्रसन्न मन से विदा किया।

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                                                                                                                                                                                                  Source:http://bit.ly/2SVRnaZ


Wednesday, May 15, 2019

Mohini Ekadashi || मोहिनी एकादशी की कहानी ||



मोहिनी एकादशी ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार अप्रैल-मई के महीने में पड़ने वाले 'वैशाख' के हिंदू महीने में शुक्ल पक्ष के दौरान पड़ता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माना जाता है कि समुद्र मंथन के बाद, अमृत पाने के लिए राक्षसों और देवताओं के बीच विवाद हुआ था। दानवों को अमृत प्राप्त करने की तीव्र इच्छा थी, इसलिए भगवान विष्णु ने राक्षसों को विचलित करने के लिए खुद को मोहिनी के रूप में प्रच्छन्न कर लिया, ताकि राक्षसों को अमृत प्राप्त ना हो भगवान विष्णु ने फिर देवताओं को अमृत सौंप दिया जिसे ​​पीने के बाद, देवता अमर हो गए और बाद में, इस दिन को मोहिनी एकादशी के रूप में मनाया जाने लगा। विष्णु पुराण के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति मोहिनी एकादशी पर व्रत का पालन करता है, तो वह मोह के बंधनों से मुक्ति पाता है। साथ ही, व्यक्ति वृत्ति के सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

Mohini Ekadashi falls on the Ekadashi (11th day) during the Shukla Paksha (the bright fortnight of moon) in the Hindu month of ‘Vaisakha’ that falls during the months of April-May, according to the Gregorian calendar. According to Hindu mythology, it is believed that after the Samudra Manthana, a dispute took place between the demons and the Gods to get the nectar. Demons had a strong desire to acquire the nectar so Lord Vishnu disguised himself as Mohini to distract the demons so that demons don’t acquire the nectar and handed over the nectar to the Gods. After drinking the nectar, gods became immortal and subsequently, the day began to be celebrated as Mohini Ekadashi. According to Vishnu Puran, if a person follows a fast on Mohini Ekadashi, he gets liberation from the bonds of attachment. Also, the person gets rid of all sins of Vritta.

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Saturday, May 4, 2019

संतोषी माता की कहानी | Santoshi Mata ki kahani |


एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और बची हुई झूठन सातवें बेटे को दे दिया करती थी। बेटे को यह पता नहीं था।

उसकी पत्नी ने उसे यह बात बताई। उसे विश्वास नहीं हुआ। छुपकर देखा तो उसे पता चला की यह सच था। उसे बड़ा दुःख हुआ। माँ के खाना खाने बुलाने पर वह बोला – मैं यह खाना नहीं खाऊंगा। परदेस जाकर कमाई करूँगा।
माँ बोली – कल जाता हो तो आज ही चला जा। यह सुनकर वह तुरंत घर से निकल गया।
रास्ते में पत्नी से मिला। वह गोबर से कंडे बना रही थी। बोला – मैं परदेस जा रहा हूँ कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम अपना धर्म का पालन करते हुए ध्यान से रहना।
वह बोली आप मेरी चिंता ना करें। मुझे भूलना मत और मुझे अपनी कुछ निशानी दे दो। उसे देखकर मैं समय बिता लूँगी। उसने उसे अपनी अंगूठी दे दी और चल पड़ा।  
एक बड़े शहर में बड़ी दुकान देखकर उसने काम माँगा। वहां जरुरत थी इसलिए सेठ ने उसे काम पर रख लिया। उसने दिन रात मेहनत की। सेठ उसे तरक्की देता गया।
कुछ ही समय में अपनी मेहनत और लगन से उसने सेठ का विश्वास इतना जीत लिया की सेठ ने उसे अपना पार्टनर बना लिया। कुछ समय बाद सारा काम उसे सौंप कर सेठ यात्रा पर निकल गया। अब वह खुद बड़ा सेठ बन चुका था।
उधर उसकी पत्नी पर बड़े जुल्म हो रहे थे। घर के सभी लोग उससे दिन भर काम करवाते। जंगल में लकड़ी लाने भेजते। भूसे की रोटी खाने को देते। नारियल के कटोरे में पानी पिलाते।
एक दिन जंगल जाते समय उसने रास्ते में कुछ औरतों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। कथा कहते हुए सुना। उसने पूछा की यह व्रत कैसे करते है , और इसे करने से क्या होता है।  
उनमे से एक औरत ने बताया कि यह संतोषी माता का व्रत है। इसे करने से दरिद्रता मिटती है , मन की चिंता दूर होती है , कुंवारों को मनपसंद जीवन साथी मिलता है , रोग दूर होते है , हर प्रकार का सुख  प्राप्त होता है।
इसे करने के लिए अपनी सुविधा और शक्ति  के अनुसार गुड़ चना खरीद लेना। हर शुक्रवार व्रत करना और कथा कहना या सुनना। जब तक कार्य सिद्ध नहीं हो जाता बिना क्रम तोड़े व्रत करना।
कथा सुनने वाला कोई ना मिले तो दीपक को सामने रखकर कथा कहना। कार्य सिद्ध होने पर उद्यापन करना। उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा , उतनी ही खीर और उतना ही चने का साग बनाना।
आठ लड़कों को भोजन कराना। लड़के परिवार के ही हो तो अच्छा नहीं तो पड़ोस से भी बुला सकते हैं। भोजन कराकर व केला आदि फल देकर विदा करना। खट्टे फल नहीं देना।
उस दिन घर में कोई खटाई ना खाये।  
सारी विधि जानकर उसने गुड़ चने खरीद लिए। रास्ते में संतोषी माता के मंदिर में भोग लगाकर याचना करने लगी – माँ मुझे व्रत के नियम कायदे नहीं पता। मैं शुक्रवार का व्रत निष्ठां से करुँगी , मेरा दुःख दूर करना।
एक शुक्रवार बीता ,दूसरे शुक्रवार को पति का पत्र आया ,तीसरे शुक्रवार पति के भेजे रूपये आ गए। परन्तु सब घर वाले ताना मारने से नहीं चूकते।
दुखी होकर माता के मंदिर में प्रार्थना करने लगी – माँ मुझे पैसा नहीं चाहिए। मुझे अपने स्वामी के दर्शन करने हैं। माता ने उसे आशीर्वाद देकर कहा – तेरा पति जल्दी ही आएगा। वह बहुत खुश हुई।
परदेस में उसके पति के पास बिल्कुल समय नहीं था। दिनभर व्यस्त रहता था। माँ संतोषी ने उसके सपने में आकर उसे बताया कि उसकी पत्नी बहुत दुखी है। उसे उसके पास जाना चाहिए। उसे पत्नी की बहुत चिंता होने लगी। दुकान बेचकर पत्नी के लिए कपड़े , गहने और ढ़ेर सारा पैसा लेकर रवाना हो गया। 
बहु जंगल से लकड़ी काटकर लौट रही थी तब उसने धूल का गुबार उठते देखा। माता ने उसे बताया की उसका पति आ रहा है। वह घर माँ के पास जा रहा है।
इसलिए वह भी घर जाये और चौक में लकड़ी का गट्ठर डाल कर आवाज लगाये – लो सासुजी लकड़ी का गट्ठर , भूसी की रोटी दो , नारियल के खोखे में पानी दो ,आज कौन मेहमान आया है। उसने ऐसा ही किया।
आवाज सुनकर उसका पति बाहर आया और अंगूठी देखकर व्याकुलता के साथ माँ से पूछा की ये कौन है ? माँ बोली ये तेरी बहु है। दिन भर घूमती रहती है। भूख लगे तो यहाँ आकर खाना खा लेती है। काम कुछ करती नहीं है।  तुझे दिखाने के लिए नाटक कर रही है।
उसे विश्वास नहीं हुआ और माँ से चाबी लेकर ऊपर वाली मंजिल के कमरे में अपनी पत्नी के साथ चला गया। कमरे को महंगे सामान से सजा कर महल जैसा बना दिया। दोनों सुख से रहने लगे।  
बहु में अपने पति से कहा – मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने स्वीकृति दे दी। ख़ुशी से माता के उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठानी के बच्चों को खाने का न्योता दिया।
उसका उद्यापन बिगड़ने के लिए जेठानी ने बच्चों से कहा की तुम खटाई मांगना। बच्चों ने वैसा ही किया पर उसने खटाई देने से मना कर दिया तो बच्चों ने पैसे मांगे जो उसने दे दिए।
बच्चों ने खटाई खरीद कर खा ली। माता क्रुद्ध हो गई। सिपाही आये और उसके पति को अपने साथ ले गए। जेठानी बोली चोरी करके पैसे इकट्ठे किये है। इसलिए सिपाही पकड़कर ले गए।
बहु रोती बिलखती माता के मंदिर गई। माँ ने कहा तुमसे भूल हुई यह उसी का परिणाम है। बहु क्षमा मांग कर बोली में फिर से उद्यापन करुँगी और अब ऐसी भूल नहीं होगी। मेरे पति को वापस बुलाओ।
माता ने कहा वह रास्ते में आता हुआ मिल जायेगा। उसका पति रास्ते में मिला और कहने लगा इतना धन कमाया है उसका टेक्स भरने गया था। सिपाही इसी कारण आये थे। बहु ने चैन की साँस ली।
शुक्रवार आने पर फिर से उद्यापन की तैयारी कर ली। इस बार जेठानी के बच्चों को नहीं बुलाया। पंडित के बच्चों को बुलाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया और केले देकर विदा किया। माता बहुत प्रसन्न हुई।
कुछ समय बाद उसे बहुत सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर रोजाना माता के मंदिर जाती थी। एक दिन माता ने सोचा आज मैं इसके घर जाकर देखती हूँ।   
माता ने भयानक रूप अपनाया। गुड़ और चने से सना मुख , सूंड जैसे होंठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी। दहलीज पर पांव रखते ही उसकी सास चिल्लाने लगी।
अरे देखो कोई चुड़ैल आ गई है। इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। घर के सब लोग डर गए और चिल्लाने लगे। घर के खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। छोटी बहु देखते ही पहचान गई।
प्रसन्न होकर बोली – आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं। सास से बोली माँ जी डरो मत ये वही संतोषी माता जी हैं जिनकी मैं पूजा करती हूँ और जिनका व्रत रखती हूँ। यह कह कर उसने घर के सब खिड़की दरवाजे खोल दिए ।
सभी लोग माँ के चरणों में गिर गए । कहते हैं – माँ , हम अज्ञानी हैं। आपका व्रत भंग करके हमने जो अपराध किया है उसके लिए हमें क्षमा करो। माँ ने सभी को क्षमा करके कुशल मंगल का आशीर्वाद दिया और प्रेम पूर्वक रहने की सीख दी। सब आनंद से रहने लगे।
बहु को जैसा फल दिया संतोषी माँ सबको वैसा ही दे। जो यह कहानी पढ़े ,उसका मनोरथ पूर्ण हो।
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