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Tuesday, March 5, 2019

श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए |



श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन | Shri Krishna Darshan Kahani : आमतौर पर आप मंदिर जाते हो तो भगवान् के दर्शन जरूर करते हो लेकिन शायद आपको यह नहीं पता की मंदिर में भगवान् की  पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए | अब आप सोच रहे होंगे की भगवान् की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए तो इसी को लेकर हम आपको एक रोचक कहानी बताते है|

जब भी कृष्ण भगवान के मंदिर जाएं तो यह जरुर ध्यान रखें कि कृष्ण जी कि मूर्ति की पीठ के दर्शन ना करें। दरअसल पीठ के दर्शन न करने के संबंध में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असूर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा। कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा। तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले। इस तरह रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा।
जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा। इस तरह भगवान रणभूमि से भागे क्योंकि कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे और कृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है। कालयवन कृष्णा की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढऩे लगा क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है।  
जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया कृष्ण एक गुफा में चले गए। जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था। मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को निंद से जगाएगा और राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्ण समझकर उठा दिया और राजा की नजर पढ़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया।
 अत: भगवान श्री हरि की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हमारे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है और अधर्म बढ़ता है। कृष्णजी के हमेशा ही मुख की ओर से ही दर्शन करें। 
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                                                                                                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2SMaS3M

Tuesday, January 1, 2019

श्री कृष्ण से जुडी कुछ रहस्यमयी बातें |


दोस्तों केवल भारत में ही नहीं परंतु विश्व भर में भगवान श्री कृष्ण की लीला प्रचलित है श्री हरी भगवान् विष्णु के अवतार कृष्ण के बारे में जो लोग जितना जानते है उनके मन उनके बारे में और ज्यादा जानने की इच्छा जगती है आप में से बहुत सारे लोग भगवान श्रीकृष्ण की कथा जानते होंगे परंतु आज हम भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कुछ ऐसे रहस्य के बारे में बता रहे है जो शायद आप नहीं जानते होंगे |

श्री कृष्ण का रंग

पुराण के अनुसार कुछ लोग कृष्ण जी की त्वचा का रंग काला और ज्यादातर लोग शाम रंग का मानते हैं श्याम रंग अर्थात कुछ कुछ काला और कुछ कुछ नीला मतलब कि काले जैसा नीला जैसा कि सूर्यास्त के बाद जब दिन अस्त होने वाला होता है तो आसमान का रंग काले जैसा नीला हो जाता है जनश्रुति अनुसार उनका रंग ना तो काला और ना ही नीला था उनका रंग काला मिश्रित नीला भी नहीं था असल में उनकी त्वचा का रंग मेघश्याम था यानी एक बादल के समान अर्थात काला नीला और सफेद का मिश्रित रंग था |

कृष्ण जी के गंध 

माना जाता है कि श्री कृष्ण जी के शरीर से एक मादक गंध निकलती रहती थी इस इस गंध को वह अपने गुप्त अभियानों में छुपाने का उपक्रम करते थे चौंकाने वाली बात यह है कि यही खूबी द्रोपदी में भी थी द्रौपदी के शरीर से से भी सुगंध निकलते रहती थी लोगों का मानना है कि यह खूबी के कारण ही श्री कृष्ण जी ने द्रौपदी को अपनी बहन माना था माना जाता है कि श्री कृष्ण के शरीर से निकलने वाली गंध गोपीका चंदन और कुछ कुछ रातरानी की सुगंध से मिलती-जुलती थी कुछ लोग उसे अष्टगंध भी कहते हैं |

श्रीकृष्ण की मृत्यु 

श्री कृष्ण का बचपन गोकुल वृंदावन बरसाना आदि जगहों पर बीता था कंस का वध करने के बाद उन्होंने अपने माता पिता को कंस के कारागार से मुक्त कराया और फिर जनता के अनुरोध से मथुरा का राजभर संभाला उसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने द्वारिका में अपना निवास स्थान बनाया और यही नहीं उन्होंने महाभारत युद्ध में भी भाग लिया महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण कौरवों की माता गांधारी के पास गए तो गांधारी ने अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से क्रोधित होकर भगवान श्रीकृष्ण को अपने पुत्रों की मृत्यु का कारण बताते हुए उन को श्राप दे दिया की तुम्हारे कारण जिस तरह मेरे पुत्रों का नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक दूसरे को मारकर नाश हो जाएगा उसी श्राप के कारण मदिरापान के नशे में श्री कृष्ण के वंशज आपस में लड़ने लगे और एक दूसरे को मारने लगे जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण और उनके साथ कुछ ही लोग जीवित बचे थे एक दिन इसी प्रभाव क्षेत्र के वन में श्री कृष्ण एक पीपल के वृक्ष के नीचे लेटे हुए थे तभी जरा नामक एक बहेलिया ने भूलवश भगवान श्रीकृष्ण को हिरन समझकर विष युक्त बाण चला दिया वाण से भगवान भगवान श्री कृष्ण के पैरों के तलवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर अपना शरीर का त्याग कर दिया |

मार्शल आर्ट के जन्मदाता भगवान श्री कृष्ण

भारतीय परंपरा और जनश्रुतियों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण जी ने ही मार्शल आर्ट का आविष्कार किया था दरअसल पहले इसे अलारी प्लाटो कहा जाता था इस विधि के मदद से ही भगवान श्रीकृष्ण ने चारु ओर और अन्य कई दैत्यों का वध किया था उनकी उम्र कुछ 16 वर्ष की ही थी उन्होंने मथुरा के राजा का सर को अपने हथेली के प्रहार से ही काट दिया था दोस्तों जनश्रुतियों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का आविष्कार भरत क्षेत्र के वनों में किया था डांडिया रास उसी का एक नित्य रूप है मार्शल आर्ट का जन्मदाता भगवान श्रीकृष्ण को ही माना जाता है हालांकि इसके बाद इस विधि को अगस्त मुनि ने प्रचारित किया था इस कारण भी नारायणी सेना भारत के सबसे भयंकर सेना और प्रलयकारी सेना बन गई थी भगवान श्रीकृष्ण नहीं मार्शल आर्ट की नींव रखी थी जो बाद में बौद्ध धर्म से होते हुए मार्शल आर्ट के नाम से प्रसिद्धि हुआ बौद्ध धर्म के कारण ही यह विद्या चीन-जापान आदि बौद्ध क्षेत्रों में खूब फली-फूली आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है |

श्री कृष्ण की पत्नियां 

भगवान श्री कृष्ण के बारे में कहा जाता है कि उनकी 16100 पत्नियां थी लेकिन यह तथ्य गलत है भगवान श्रीकृष्ण की मात्र 8 पत्नियां थी श्री कृष्ण जी की जींस 16000 पत्नियों के बारे में कहा जाता है दरअसल वे सभी नरकासुर के यहां बंधक बनाई हुई महिलाएं थी जिनको भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्त करवाया था वो सभी महिलाएं किसी की मां थी किसी की बहन और किसी की बीवी थी जिनको नरकासुर अपहरण करके अपने यहाँ बंदी बनाए हुए था सभी महिलाओं की इज्जत बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उन् सभी को अपनी पत्नियां होने का दर्जा दिया था |

तो दोस्तों यह था भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कुछ रहस्यमई बातें  |

                                                                                                                            Source: https://bit.ly/2ToLv9g

Tuesday, December 18, 2018

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। 
 'द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। 
एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। 
कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। 

वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। 

उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।'
उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। 
अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। 

उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे  पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा। 

                                                                                        Source : https://bit.ly/2SZPVTK

Sunday, September 6, 2015

Happy Birthday Lord Krishna!




Krishna Janmashtami falls on Saturday, September 5, this year. It marks the birth of Lord Krishna - the most attractive male in the universe. 
In the Hindu tradition God in his virat roop is considered incomprehensible to the five senses. He therefore as an act of mercy enables his worship through murtis that are installed as per the prescriptions of the shastras. He is worshipped through the listening of his leelas and glorification of his names. May we live, breathe, sing, dance and behave in ways that are pleasing to the Lord of the Gopis! 




Welcome into our hearts O Lord Gopijana-Vallabha!