Friday, January 18, 2019

तीन स्थान जहां सूर्य की पूजा विशेष फलदायी |


सूर्य देव सर्वव्यापी हैं। दुनिया के किसी भी कोने में इनका दर्शन करते हुए इनकी पूजा दुनिया के किसी भी कोने में आप कर सकते हैं। लेकिन तीन स्थान ऐसे हैं जहां सूर्य की पूजा करना विशेष फलदायी मानी गर्ई है। 

कालपीः यह स्थान उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में यमुना तट पर स्थित है। प्राचीन काल में इसे कालप्रिया नगरी के ना से जाना जाता था। भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शांब को दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण कुष्ट रोग हो गया था।


मकरंजनगर में स्थित सूर्यकुंड में स्नान करके शांब कुष्ट मुक्त हुए थे। इसलिए शांब ने कालप्रियनाथ सूर्यदेव का मंदिर बनवाया था। माना जाता है कि यहां सूर्य की पूजा करने से त्वचा रोग से मुक्ति मिलती है।


इन्द्रवनः भविष्य पुराण में व्रज के उपवनों का वर्णन मिलता है। इन में एक वन है सूर्यवन। पुराण के अनुसार इस वन में सूर्य की आराधना करने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


सांबपुरः वर्तमान मुल्तान का प्राचीन नाम सांबपुर है। श्री कृष्ण के पुत्र ने इस नगर की स्थापना की थी। यहां सांब को कुष्ट रोग से मुक्ति के लिए श्री कृष्ण ने सूर्य देव की प्रसन्नता हेतु भव्य यज्ञ का आयोजन किया था।


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                                                                                                                                                                            Source:https://bit.ly/2T3InzA


शनि देव की कथा |



भगवान सूर्य ने देवी संध्या के साथ विवाह किया और तीन बच्चों का जन्म हुआ। वैश्स्व, मनु, यम (मृत्यु के भगवान) और यमुना। हालांकि संध्या सूर्य के लिए एक पवित्र पत्नी थी, लेकिन वह सूर्य की चमकदार प्रतिभा और गर्मी को सहन नहीं कर सकी। इसलिए, वह सूर्य की प्रतिभा का सामना करने के लिए आवश्यक शक्ति हासिल करने के लिए तपस्या करने की इच्छा भी रखतीं थीं या अपनी तपस्या के परिणामस्वरूप हासिल की गई अपनी प्रतिभा को भी आगे बढ़ाना चाहती थीं।
संध्या ने एक औरत को बनाया और उसका नाम छाया रखा और कहा- कि वह सूर्य की पत्नी के रूप में अपनी भूमिका का प्रतिनिधित्व करे और तीन बच्चों की देखभाल भी करे। हालांकि, वह सूर्य भगवान के लिए अपनी योजनाओं को किसी के सामने प्रकट नहीं करना चाहती थी इसलिये, वह तपस्या करने के लिए जंगलों में चली गयी। चूंकि छाया बहुत साधारण रूप से मिलती-झूलती थी, सूर्य भगवान उसपे संदेह नहीं कर सके। छाया के माध्यम से सूर्य भगवान के तीन और शिशु हुए थे, जो थे मनु, शनि और तापती। इसलिए, शनि को सूर्य के पुत्र और यम का भाई कहा जाता है।
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                                                                                                                                                                    Source : https://bit.ly/2U14d78

Thursday, January 17, 2019

लक्ष्मी देवी की कहानी ।




एक साहूकार की एक बेटी थी। वह रोजाना पीपल के पेड़ में पानी डालने जाती थी। पीपल के पेड़ पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने प्रकट होकर उससे कहा तू मेरी सहेली बन जा।
वह लड़की माता पिता की आज्ञाकारी थी। उसने कहा यदि मेरे मेरे माता पिता आज्ञा दे देंगे तो मै आपकी सहेली बन जाउंगी। उसके माता पिता ने उसे आज्ञा दे दी। दोनों सहेली बन गई।
एक दिन लक्ष्मी जी ने उसे खाना खाने के लिए निमंत्रण दिया। माता पिता की आज्ञा लेकर वह लक्ष्मी जी के यहाँ जीमने चली गई।
लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला भेंट किया , रूपये दिए। उसे सोने से बनी चौकी पर बैठाया। सोने की थाली , कटोरी में छत्तीस प्रकार के व्यंजन परोस कर खाना खिलाया।
जब वह अपने घर के लिए रवाना होने लगी तो लक्ष्मी जी ने कहा मैं भी तुम्हारे यहाँ जीमने आऊँगी। उसने कहा ठीक है , जरूर आना।
घर आने के बाद वह उदास होकर कुछ सोच में पड़ गई । पिता ने पूछा सहेली के यहाँ जीम कर आई तो उदास क्यों हो। उसने अपने पिता को कहा लक्ष्मीजी ने उसे बहुत कुछ दिया अब वो हमारे यहाँ आएगी तो मैं उसे कैसे जिमाउंगी ,अपने घर में तो कुछ भी नहीं है।
पिता ने कहा तू चिंता मत कर। बस तुम घर की साफ सफाई अच्छे से करके लक्ष्मी जी के सामने एक चौमुखा दिया जला कर रख देना। सब ठीक होगा।
वह दिया लेकर बैठी थी। एक चील रानी का नौलखा हार पंजे में दबाकर उड़ती हुई जा रही थी। उसके पंजे से वह हार छूटकर लड़की के पास आकर गिरा। लड़की हार को देखने लगी। उसने अपने पिता को वह हार दिखाया।
बाहर शोर हो रहा था की एक चील रानी का नौलखा हार उड़ा ले गई है। किसी को मिले तो लौटा दे। एक बार तो दोनों के मन विचार आया की इसे बेचकर लक्ष्मी जी के स्वागत का प्रबंध हो सकता है।
लेकिन अच्छे संस्कारों की वजह से पिता ने लड़की को कहा यह हार हम रानी को लौटा देंगे। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए धन तो नहीं पर हम पूरा मान सम्मान देंगे।
उन्होंने हार राजा को दिया तो राजा ने खुश होकर कहा जो चाहो मांग लो। साहूकार ने राजा से कहा की बेटी की  सहेली के स्वागत के लिए शाल दुशाला , सोने की चौकी , सोने की थाली कटोरी और छत्तीस प्रकार के व्यंजन की व्यवस्था करवा दीजिये। राजा ने तुरंत ऐसी व्यवस्था करवा दी।
लड़की ने गणेश और लक्ष्मी जी दोनों को बुलाया। लक्ष्मी जी को सोने की चौकी पर बैठने को कहा। लक्ष्मी जी ने कहा की मैं तो किसी राजा महाराजा की चौकी पर भी नहीं बैठती। लड़की ने कहा मुझे सहेली बनाया है तो मेरे यहाँ तो बैठना पड़ेगा।
गणेश और लक्ष्मी जी दोनों चौकी पर बैठ गए। लड़की ने बहुत आदर सत्कार के साथ और प्रेम पूर्वक भोजन करवाया। लक्ष्मी जी बड़ी प्रसन्न हुई। लक्ष्मी जी ने जब विदा मांगी तो लड़की ने कहा अभी रुको मैं लौट कर आऊं तब जाना ,और चली गई।
लक्ष्मी जी चौकी पर बैठी इंतजार करती रही। लक्ष्मी जी के वहाँ होने से घर में धन धान्य का भंडार भर गया। इस प्रकार साहूकार और उसकी बेटी बहुत धनवान हो गए।
हे लक्ष्मी माँ।  जिस प्रकार आपने साहूकार की बेटी का आतिथ्य स्वीकार करके भोजन किया और उसे धनवान बनाया। उसी प्रकार हमारा भी आमंत्रण स्वीकार करके हमारे घर पधारें और हमें धन धान्य से परिपूर्ण करें।
जय लक्ष्मी माँ , तेरी कृपा हो , तेरी जय हो। 
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                                                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2QTauzK

Wednesday, January 16, 2019

साई बाबा की ३ चमत्कारी कहानियाँ ।


  कहानी | १ |

साईं बाबा रोज़ मंदिर और मस्जिद में दिया जलाते थे, पर इसके लिये उन्हें बनियों से तेल मांगने की जरुरत होती थी पर एक दिन बनियों ने बाबा से कह दिया बाबा हमारे पास तेल नहीं है। तब बाबा वहां से चुपचाप चले गये और मंदिर जाकर उन्होंने दिये में तेल की जगह पानी डाला और दिया जल पड़ा और यह बात चरों तरफ फ़ैल गई। तब वहां के बनिये उनके सामने आये और उनसे मांफी मांगी तो बाबा ने उन्हें माफ़ कर दिया और उनसे कहा अब कभी झूठ मत बोलना ।

कहानी ।२।
एकबार बाबा का भक्त बहुत दूर से अपनी पत्नी को लेकर बाबा के दर्शन के लिये आया और जब वह जाने लगा तो जोरों से बारिश होने लगी तब उनका भक्त परेशान होने लगा तब बाबा ने उनकी परेशानी को देखकर कहा – हे अल्लाह बारिश को रोक दो मेरे बच्चों को घर जाना है और तत्काल ही बारिश रुक गई।

कहानी ।३।
एकबार गाँव के एक व्यक्ति की एक बेटी अचानक खेलते हुये वहां के कुएं में गिर गई लोगों को लगा वह डूब रही है सब वहां दौड़कर गये और देखा की वह लटकी है कोई अदृश्य है जो उसे पकडे हुये है। वह और कोई नहीं बाबा ही थे क्योंकि वह बच्ची कहती थी कि मै बाबा की बहन हूँ। अब लोगों को कोई ओर स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं थी।   

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                                                                                                                                                         Source: https://bit.ly/2RTOSro



Tuesday, January 15, 2019

जानिए क्यों नहीं बचाया भगवान् श्री कृष्ण ने वीर अभिमन्यु को!


महाभारत कथाएँ
व्यक्ति के कर्मो पर किसी का वश नहीं होता | व्यक्ति को केवल सही या गलत मार्गदर्शन दिया जा सकता है |
उसे अपने जीवन मार्गो के विकल्प दिए जा सकते है और सत्य तो यह है कि ईश्वर भी कभी किसी प्राणी के  कर्मो और उसकी नियति में हस्तक्षेप नहीं करते ||
 हम में से बहुतो के लिए अभिमन्यु प्रेरणा है , इस योद्धा ने अकेले एक पुरे दिन उन योद्धाओ को रोक कर रखा जो अकेले कई सेनाओ के बराबर थे , किन्तु साथ में हम यह भी सोचते है अभिमन्यु जैसा  वीर उस दिन वीरगति को प्राप्त न हुआ होता||
बहुतो के मन में यह प्रश्न भी उठता है की यदि वासुदेव कृष्ण चाहते तो अभिमन्यु को बचा सकते थे क्यों की वे 
ईश्वर थे , त्रिकालदर्शी थे किन्तु उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया और फिर भी हम श्री कृष्ण के हस्तक्षेप न करने के कारण को महाभारत की इस छोटी से कथा से जानने का प्रयत्न कर सकते है -

हम जानते है की धर्म की रक्षा के लिए भगवान् विष्णु अवतार लेते है तथा उनकी सहायता के लिए दूसरे देवतागण भी विभिन्न स्थानों पर जन्म लेते है | द्धापर युग में जब भगवान् विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लिया तब ब्रह्मा के आदेश से देवताओ ने भी जन्म लिया ताकि धर्म स्थापना में श्री कृष्ण के सहायक हो सके ||

अभिमन्यु के रूप में चन्द्रमा के पुत्र वर्चा ने जन्म लिया था | वर्चा को भेजते समय चन्द्रमा ने देवताओ से कहा "मै अपने प्राणप्यारे पुत्र को नहीं भेजना चाहता" फिर भी इस काम से पीछे हटना उचित नहीं जान पड़ता |इसलिए वर्चा मनुष्य बनेगा तो सही , परन्तु वहाँ अधिक दिनों तक नहीं रहेगा | इंद्र के अंश नरावतार होगा जो |

श्री  कृष्ण से मित्रता करेगा | मेरा पुत्र अर्जुन का ही पुत्र होगा | नर-नारायण की अनुपस्थिति में मेरा पुत्र चक्रव्यूह का भेदन करेगा और घमासान युद्ध करके बड़े-बड़े महारथियों को चकित कर देगा | दिन भर युद्ध करने के बाद सायंकाल में मुझसे आ मिलेगा | इसी कारण अभिमन्यु दिनभर युद्ध करने के उपरांत कौरवो के हाथो चक्रव्यूह के भीतर मारे गए ||
यही कारण था कि भगवान् कृष्ण ने अभिमन्यु की नियति में हस्तक्षेप नहीं किया ||

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                                                                                                                                                                     Source:https://bit.ly/2HnE2WS


Monday, January 14, 2019

गणेश जी की कथा ||


एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
 'बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।'
बुढ़िया बोली- 'मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?' 
तब गणेशजी बोले - 'अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।' 
तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- 'गणेशजी कहते हैं 'तू कुछ मांग ले' बता मैं क्या मांगू?' 
पुत्र ने कहा- 'मां! तू धन मांग ले।' 
बहू से पूछा तो बहू ने कहा- 'नाती मांग ले।' 
तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- 'बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।'

इस पर बुढ़िया बोली- 'यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।' 
यह सुनकर तब गणेशजी बोले- 'बुढ़िया मां! तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।' और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

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                                                                                                                                                                       Source : https://bit.ly/2CoKWVI

पार्वती और शिव के विवाह की कथा |


भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ।

भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ...

                          भगवान शिव की शादी में आए हर तरह के प्राणी

जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव - जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे - एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे।
उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो शिव का विवाह था, इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। यह एक शाही शादी थी, एक राजकुमारी की शादी हो रही थी, इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था।

                         भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म

वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे।
सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र अवस्थाओं में लग रहे थे।

                                                         भगवान शिव ने धारण किया मौन

फिर पार्वती के पिता पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था।
वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे।
समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीची जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।’

                       नारद मुनि ने इशारे से बात समझानी चाही

फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे – टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूं? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, ‘वर के माता-पिता नहीं हैं।’ राजा ने पूछा, ‘क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?’

                     नारद ने सभी को बताया कि भगवान स्वयंभू हैं

नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।’ पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, ‘हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या मां ही न हो।’ नारद ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है – ध्वनि। आदि, शून्य प्रकृति ने जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी – ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा हूं।’

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