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Sunday, February 17, 2019

भगवान सूर्य की पौराणिक कथा और महिमा.



कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति ?

सूर्य और चंद्र इस पृथ्वी के सबसे साक्षात देवता हैं जो हमें प्रत्यक्ष उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई है। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति,प्रभाव,स्तुति, मन्त्र इत्यादि विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है।
कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति

मार्कंडेय पुराण के अनुसार  पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए।

यह वैदिक तेज ही आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है। ये वेद स्वरूप सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति,पालन व संहार के  कारण हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया।

सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न किया जिन्होंने उसकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश किया। गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी। ऋषि राज कश्यप ने क्रोधित हो कर अदिति से कहा-'तुम इस तरह उपवास रख कर गर्भस्थ शिशु को क्यों मरना चाहती हो”> > यह सुन कर देवी अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। भगवान् सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ से प्रगट हुए। अदिति को मारिचम- अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है।

copyrights :- https://bit.ly/2rOHor5

Saturday, February 2, 2019

सूर्य पूजा करने के अनेक लाभ ।



यह है सूर्य पूजा करने के अनेक लाभ ।

१) सूर्यदेव की पूजा करने वाला हर व्यक्ति आने वाली कठिनाओं पर काबू पा लेता है इससे उनके शारीरिक , व्यावहारिक और धैर्य का पता चलता है ।

२) सूर्य की पूजा इंसान को निडर और बलवान बनाती है ।

३) सूर्य पूजा मनुष्य को परोपकारी बनती है ।

४) सूर्य पूजा इंसान को विद्वान और बुद्धिमान के साथ साथ मधुर वाणी वाला बनती है ।

५) सूर्यदेव की पूजा कोमल और पवित्र आचरण प्रदान करती है ।

६) सूर्य पूजा व्यक्ति के मन से अहंकार , क्रोध , लोभ , इच्छा, कपट , और बुरे विचारो से दूर करती है ।

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Thursday, January 24, 2019

सूर्य देवता और उनकी पत्नी की कहानी ।


अपनी पहली पत्नी संजना को पाने की खातिर सूर्य ने किए थे क्या-क्या जतन ? 


संजना विश्वकर्मा जो कि पहले वास्तुकार थे उनकी बेटी थी। 


शास्त्रों के अनुसार सूर्यदेव की पत्नी का नाम संध्या है और इनका एक नाम संजना भी है। संजना दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं। यहां जानिए सूर्यदेव और उनकी पत्नी से जुड़ी खास बातें और उनके परिवार का परिचय...

सूर्य के पास आते ही इनकी पत्नी का शरीर पड़ जाता था काला |
सूर्य के शरीर से निकलने वाली तेज किरणों की आभा को सहन न कर पाने के कारण संजना का शरीर सांवला पड़ गया था। इसी सांवले शरीर के कारण संजना का नया नाम संज्ञा (संध्या) हुआ। संध्या ने तीन बच्चों सावर्णि मनु, यम और पुत्री यमुना को जन्म दिया।
संध्या के लिए सूर्य के तेज को सहन कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। अपने शरीर के सांवले रंग को देख उसकी पीड़ा और अधिक बढ़ गयी। तब संध्या ने अपनी ही हमशक्ल (क्लोन) तैयार की। उस हमशक्ल का नाम संध्या ने छाया रखा।
संध्या नही चाहती थी कि ये बात सूर्य या किसी अन्य को पता चले। बिना किसी को बताए संध्या ने छाया को सूर्य के पास संध्या बनकर रहने का आदेश दे दिया।

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                                                                                                                                                                                          Source:https://bit.ly/2CQxgn1

Friday, January 18, 2019

तीन स्थान जहां सूर्य की पूजा विशेष फलदायी |


सूर्य देव सर्वव्यापी हैं। दुनिया के किसी भी कोने में इनका दर्शन करते हुए इनकी पूजा दुनिया के किसी भी कोने में आप कर सकते हैं। लेकिन तीन स्थान ऐसे हैं जहां सूर्य की पूजा करना विशेष फलदायी मानी गर्ई है। 

कालपीः यह स्थान उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में यमुना तट पर स्थित है। प्राचीन काल में इसे कालप्रिया नगरी के ना से जाना जाता था। भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शांब को दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण कुष्ट रोग हो गया था।


मकरंजनगर में स्थित सूर्यकुंड में स्नान करके शांब कुष्ट मुक्त हुए थे। इसलिए शांब ने कालप्रियनाथ सूर्यदेव का मंदिर बनवाया था। माना जाता है कि यहां सूर्य की पूजा करने से त्वचा रोग से मुक्ति मिलती है।


इन्द्रवनः भविष्य पुराण में व्रज के उपवनों का वर्णन मिलता है। इन में एक वन है सूर्यवन। पुराण के अनुसार इस वन में सूर्य की आराधना करने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


सांबपुरः वर्तमान मुल्तान का प्राचीन नाम सांबपुर है। श्री कृष्ण के पुत्र ने इस नगर की स्थापना की थी। यहां सांब को कुष्ट रोग से मुक्ति के लिए श्री कृष्ण ने सूर्य देव की प्रसन्नता हेतु भव्य यज्ञ का आयोजन किया था।


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                                                                                                                                                                            Source:https://bit.ly/2T3InzA


Saturday, December 22, 2018

भगवान सूर्य की पौराणिक कथा और महिमा


सूर्य और चंद्र इस पृथ्वी के सबसे साक्षात देवता हैं जो हमें प्रत्यक्ष उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई है। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति,प्रभाव,स्तुति, मन्त्र इत्यादि विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है।  

कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति
 
मार्कंडेय पुराण के अनुसार  पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए। 
 
यह वैदिक तेज ही आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है। ये वेद स्वरूप सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति,पालन व संहार के  कारण हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया। 
 
सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न किया जिन्होंने उसकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश किया। गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी। ऋषि राज कश्यप ने क्रोधित हो कर अदिति से कहा-'तुम इस तरह उपवास रख कर गर्भस्थ शिशु को क्यों मरना चाहती हो”> > यह सुन कर देवी अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। भगवान् सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ से प्रगट हुए। अदिति को मारिचम- अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है।
                                                                                                                               Source : https://bit.ly/2rOHor5

Friday, June 29, 2018

भगवान सूर्य ने स्वयं कहा है, यहां पूजन करने वाले के निकट नहीं आएंगे दुख और दरिद्रता.

अरुणादित्य की कथा :- 

कश्यप ऋषि की पत्नी विनता अपनी सपत्नी (सौत) को गोद में बच्चा खेलाते देखकर स्वयं भी बच्चा खेलाने की अभिलाषा न त्याग सकी; अत: उसका जो अंडा अभी पूर्ण विकसित भी नहीं हुआ था, उसको उसने असमय फोड़ दिया। इसलिए उससे विकलांग शिशु पैदा हुआ और वह जंघा रहित होने के कारण ‘अनूरु’ एवं अंडा फोड़ देने से मां के प्रति क्रोधवश अरुण (लाल) होने से अरुण कहलाया।


आगे चलकर अरुण ने काशी में भगवान् सूर्य की प्रसन्नता के लिए बड़ी कठोर तपस्या की। बहुत दिनों तक उसने जल और वायु मात्र पर रहकर दिन-रात बड़े मनोयोग पूर्वक सूर्य की आराधना की। उसकी तपस्या के तेज से तीनों लोक कांप उठे तथा इंद्र का सिंहासन डगमगाने लगा। सभी देवता मिल कर भगवान् सूर्य के पास गए और कहा-‘‘प्रभो! आप लोक कल्याण के लिए शीघ्र जाकर तथा अरुण को वर देकर उन्हें तपस्या से विरत करें, अन्यथा उनकी तपस्या के तेज से तीनों लोक दहक उठेंगे।’’

भगवान् सूर्य विनतानंदन अरुण के समक्ष प्रकट हुए और कहा, ‘‘पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारी तपस्या से अत्यधिक प्रसन्न हैं। आज से काशी में तुम्हारे द्वारा आराधित मेरी मूर्त अरुणादित्य के नाम से प्रसिद्ध होगी।’’

इसके अतिरिक्त भगवान् सूर्य ने अरुण को और भी अनेक वर दिए। भगवान् सूर्य ने कहा, ‘‘अरुण! तुम जगत के हित के लिए अंधकार का नाश करते हुए सदा मेरे रथ पर सारथि के स्थान पर बैठा करो। जो मनुष्य काशी में विश्वेश्वर से उत्तर में तुम्हारे  द्वारा स्थापित अरुणादित्य नामक मेरी मूर्त की पूजा-अर्चना करेंगे; दुख, दरिद्रता और पातक उनके निकट भी नहीं आएंगे। वह न विविध प्रकार की व्याधियों से आक्रांत होंगे और न ही नाना प्रकार के उपद्रवों से पीड़ित होंगे।’’

येऽर्चयिष्यन्ति सततमरुणादित्यसंज्ञकम्।
मामत्र तेषां नो दुखं न दारिद्रयं न पातकम्।।

ऐसा कहकर भगवान् सूर्य अरुण को अपने रथ पर बैठा कर अपने साथ ले गए। जो मनुष्य प्रात:काल उठकर प्रतिदिन सूर्य सहित अरुण को नमस्कार करता है, उसे दुख और भय स्पर्श भी नहीं कर सकते। अरुणादित्य काशी में पाटन-दरवाजा मोहल्ले के त्रिलोचन-मंदिर में स्थित हैं। अरुणादित्य के सेवकों को शोकाग्रि जनित दाह भी कभी नहीं होता है।

पूषा धनंजयो धाता सुषेण: सुरुचिस्तथा।
घृताची गौतमश्चेति तपोमासं नयन्त्यमी।।
पूषा तोषाय मेभूयात्सर्वपापापनोदनात्।
सहस्रकरसंवीतस्समस्ताशान्तरान्तर:।।

आश्विन मास में पूषा नामक आदित्य गौतम ऋषि, घृताची अप्सरा, सुरुचि गन्धर्व, धनंजय नाग, सुषेण यक्ष तथा धाता राक्षस के साथ परिभ्रमण करते हैं। सहस्रों रश्मियों से आवृत भगवान् पूषा मेरे सभी पापों का नाश करके मुझे संतोष प्रदान करें। पूषा आदित्य छ: सहस्र रश्मियों से तपते हैं तथा उनका अलक्तक वर्ण है।

Source :- https://bit.ly/2yTeCvG

Friday, June 9, 2017

|| रविवार व्रत कथा ||



सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाले रविवार व्रत की कथा इस प्रकार से है- प्राचीन काल में किसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह प्रत्येक रविवार को सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती थी। उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती थी। भगवान सूर्यदेव की कृपा से उसे किसी प्रकार की चिन्ता व कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे बुरी तरह जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः रविवार के दिन घर लीपने केलिए वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। इस प्रकार उसने निराहर व्रत किया। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपनी भक्त की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा- हे माता, हम तुमको एक ऐसी गाय देते हैं जो सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। क्यूंकि तुम हमेशा रविवार को पूरा घर गाय के गोबर से लीपकर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती हो, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। स्वप्न में उस बुढ़िया को ऐसा वरदान देकर भगवान सूर्य अंतर्ध्यान हो गए।

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई। जब उसे सोने का गोबर पाने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह राजा के दरबार में पहुंची और राजा को सारी बात बताई। राजा को जब बुढ़िया के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर बुढ़िया की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक उस बुढ़िया के घर पहुंचे। उस समय बुढ़िया सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय खोला और अपने साथ महल की ओर ले चले। बुढ़िया ने सैनिकों से गाय को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्लाई लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय के चले जाने से बुढ़िया को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय को पुन: प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करने लगी। दूसरी ओर राजा गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। लेकिन अगले दिन सुबह जैसे ही वह उठा सारा महल गोबर से भरा देखकर घबरा गया। उसी रात भगवान सूर्य उसके सपने में आए और बोले- हे राजन। यह गाय वृद्धा को लौटाने में ही तुम्हारा भला है। रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर ही उसे यह गाय मैंने दी है।

सुबह होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत-से धन के साथ सम्मान सहित गाय लौटा दी और क्षमा मांगी। इसके बाद राजा ने पड़ोसन को दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से गंदगी दूर हो गई। उसी दिन राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए।

Saturday, January 3, 2015

Shani Dev Quiz - Shri Radhe Guru Maa


Shani Dev is Son Of ___

1. Lord Hanuman
2. Lord Surya
3. Lord Yama
4. Lord Shiva 

How to enter contest 

1. Like Param Shradhey Shri Radhe Maa page on facebook 


2. Guess the right answer and submit on - Link 

3. Comment and tag your friends in comment, more you tag more chances of winning!


- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust

Note

To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.

One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

(Photo Courtesy - google.com)

To get latest updates about 'Shri Radhe Guru Maa' visit -

    

Saturday, November 29, 2014

Shri Radhe Maa - Hanuman Quiz


 Hanuman is called the 11th incarnation of which God?

1. Lord Shiva 
2. Lord Brahma
3. Lord Vishnu 
4. Lord Surya
 
How to enter contest 

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One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

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