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Tuesday, March 12, 2019

गणेश जी के जन्म की कथा । | Ganesh Janam Katha |


शास्त्रों के अनुसार भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्री गणेश का धरती पर अवतरण हुआ था। श्री गणेश का जन्म माता पार्वती के उदर से नहीं हुआ था बल्कि माता पार्वती ने अपनी शक्ति से उनका निर्माण किया था। इससे सम्बंधित एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है –

कथा के अनुसार एक बार शिवजी के गण नंदी ने माता पार्वती की आज्ञा पालन में गलती कर दी। जिससे रुष्ट होकर माता पार्वती ने स्वयं एक बालक के निर्माण का निश्चय किया। माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल और उबटन से एक पिंड का निर्माण किया और अपनी शक्ति से उसमे प्राण डाल दिए। माता पार्वती ने उससे कहा की तुम मेरे पुत्र हो, तुम्हारा नाम गणेश है। तुम्हें सिर्फ मेरी ही आज्ञा का पालन करना है और किसी की भी नहीं। अब मैं स्नान करने अंदर जा रही हूँ। ध्यान रहे जब तक मैं स्नान करके वापस नहीं आऊं कोई भवन के अंदर नहीं आ पाए।

पुत्र गणेश को ऐसी आज्ञा देकर माता पार्वती स्नान करने भवन के अंदर चली गई और पुत्र गणेश वही भवन की पहरेदारी के लिए रह गए। कुछ समय पश्चात वहां भगवान शंकर आए और पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोका और कहा आप अंदर नहीं जा सकते। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हुए। पहले तो उन्होंने बालक को समझाया पर जब बालक गणेश नहीं माने तो उन्होंने नंदी और अपने गणों को बालक को वहाँ से हटाने को कहा। पर बालक गणेश ने सबको परास्त कर दिया। इससे क्रोधित हो भगवान शिव ने हठी बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और भवन के भीतर चले गए।
भगवान शिव को क्रोधित देखकर माता पार्वती ने उनसे इसका कारण पूछा। तब भगवान शिव ने उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया।यह सुन देवी पार्वती क्रोधित हो विलाप करने लगीं। उनकी क्रोधाग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी (गज) के बच्चे का सिर काट कर बालक के धड़ से जोड़ दिया।
कहते तो यह भी हैं कि भगवान शंकर के कहने पर विष्णु जी एक हाथी (गज) का सिर काट कर लाए थे और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रख कर उसे जीवित किया था। भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
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                                                                                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2J7fx0E

Tuesday, February 26, 2019

जानिये भगवन गणेश का जन्म कैसे हुआ ।



हम सभी उस कथा को जानते हैं, कि कैसे गणेशजी हाथी के सिर वाले भगवान बने। जब पार्वती शिव के साथ उत्सव क्रीड़ा कर रहीं थीं, तब उन पर थोड़ा मैल लग गया। जब उन्हें इस बात की अनुभूति हुई, तब उन्होंने अपने शरीर से उस मैल को निकल दिया और उससे एक बालक बना दिया। फिर उन्होंने उस बालक को कहा कि जब तक वे स्नान कर रहीं हैं, वह वहीं पहरा दे।
जब शिवजी वापिस लौटे, तो उस बालक ने उन्हें पहचाना नहीं, और उनका रास्ता रोका । तब भगवान शिव ने उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और अंदर चले गए।
यह देखकर पार्वती बहुत हैरान रह गयीं। उन्होंने शिवजी को समझाया कि वह बालक तो उनका पुत्र था, और उन्होंने भगवान शिव से विनती करी, कि वे किसी भी कीमत पर उसके प्राण बचाएँ।
तब भगवान शिव ने अपने सहायकों को आज्ञा दी कि वे जाएँ और कहीं से भी कोई ऐसा मस्तक ले कर आये जो उत्तर दिशा की ओर मुहँ करके सो रहा हो। तब शिवजी के सहायक एक हाथी का सिर लेकर आये, जिसे शिवजी ने उस बालक के धड़ से जोड़ दिया और इस तरह भगवान गणेश का जन्म हुआ

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                                                                                                                                                                                     Source:https://bit.ly/2IDvWtN

Tuesday, February 5, 2019

भगवान् गणेश और कुबेर की कहानी |




एक बार की बात है, धन के देवता कुबेर को अपने ऊपर घमंड हो गया, की वो सबसे अमीर देवता हैं| अपने धन का वैभव दिखाने के लिए एक बार इन्होने एक शानदार भोज रखी, और सारे देवताओं को आमंत्रित किया|
भगवान् शिव को भी किया| किसी कारण वश शिवजी भोज में जा नहीं पाए| अरे भई…., जब कोई न्योता आता है, तो किसी न किसी को तो जाना ही पडता है, हाजरी देने के लिए|
तो शिव भगवान् ने हमारे प्यारे गणपति बप्पा को बोला बेटा तू चला जा, आज में थोडा कहीं और बिजी हूँ| तो चले गए बाल गणेश भोज अटेंड करने|
फिर क्या था, वहां जा कर गणेशजी ने भोजन करना शुरू किया, और देखते देखते सारा की सारा खाना खा गए|
गणेशजी की भूख ही न मिटे| उन्होंने वहां रखे हुए बर्तनों को भी खाना शुरू कर दिया| जब बर्तन भी नहीं बचे तो पूरे अलकापुरी शहर में जो कुछ भी मिला उसे ही खा गए|
अब कुछ बचा नहीं खाने को, तो कुबेर को ही खाने के लिए उसकी तरफ दोड़े| फिर क्या था, अपनी जान बचाने के लिए कुबेर ने हिमालय पर्वत पर भगवान शिव की शरण ली, और कहा मुझे गणेशजी से बचाओ|
भगवान् शिव ने एक कटोरे में थोड़े से उबले हुए चावल गणेशजी को दिए| तब जाकर उनकी भूख मिटी| बस गणेशजी ने ये सब कुबेर को सबक सीखने के लिए किया|
सिख :-
बच्चो इससे हमें क्या सीखने को मिला बताओ| कभी भी आपके पास चाहे कितना भी धन हो आप कितने भी अमीर हो कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए|
बल्कि हमारे पास अगर धन ज्यादा है तो उसे अच्छे कामों में खर्च करना चाहिए| नहीं तो गणपति बप्पा आ जाएँगे सबक सिखाने|
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Monday, January 14, 2019

गणेश जी की कथा ||


एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
 'बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।'
बुढ़िया बोली- 'मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?' 
तब गणेशजी बोले - 'अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।' 
तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- 'गणेशजी कहते हैं 'तू कुछ मांग ले' बता मैं क्या मांगू?' 
पुत्र ने कहा- 'मां! तू धन मांग ले।' 
बहू से पूछा तो बहू ने कहा- 'नाती मांग ले।' 
तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- 'बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।'

इस पर बुढ़िया बोली- 'यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।' 
यह सुनकर तब गणेशजी बोले- 'बुढ़िया मां! तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।' और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

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Tuesday, July 24, 2018

जब गणपति ने किया सारे देवताओं को यज्ञ में निमंत्रित


एक बार भगवान शिव के मन में एक बड़े यज्ञ के अनुष्ठान का विचार आया। विचार आते ही वे शीघ्र यज्ञ प्रारंभ करने की तैयारियों में जुट गए। सारे गणों को यज्ञ अनुष्ठान की अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंप दी गई। सबसे बड़ा काम था यज्ञ में सारे देवताओं को आमंत्रित करना। आमंत्रण भेजने के लिए पात्र व्यक्ति का चुनाव किया जाना था, जो समय रहते सभी लोकों में जाकर वहां के देवताओं को ससम्मान निमंत्रण दे आए। ऐसे में किसी ऐसे व्यक्ति का चयन किया जाना था, जो तेजी से जाकर ये काम कर दे, लेकिन भगवान शिव को ये भी डर था कि कहीं आमंत्रण देने की जल्दी में देवताओं का अपमान ना हो जाए। इसलिए उन्होंने इस काम के लिए गणेश का चयन किया। गणेश बुद्धि और विवेक के देवता हैं। वे जल्दबाजी में भी कोई गलती नहीं करेंगे, ये सोचकर शिव ने गणपति को बुलाया और उन्हें समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का काम सौंपा। गणेश ने इस काम को सहर्ष स्वीकार किया, लेकिन उनके साथ समस्या यह थी कि उनका वाहन चूहा था, जो बहुत तेजी से चल नहीं सकता था। गणेश ने काफी देर तक चिंतन किया कि किस तरह सभी लोकों में जाकर आदरपूर्वक सारे देवताओं को यज्ञ में शामिल होने का आमंत्रण दिया जाए। बहुत विचार के बाद उन्होंने सारे आमंत्रण पत्र उठाए और पूजन सामग्री लेकर ध्यान में बैठे शिव के सामने बैठ गए।
गणेश ने विचार किया कि यह तो सत्य है कि सारे देवताओं का वास भगवान शिव में है। उनको प्रसन्न किया तो सारे देवता प्रसन्न हो जाएंगे। ये सोचकर गणेश ने शिव का पूजन किया और सारे देवताओं का आह्वान करके सभी आमंत्रण पत्र शिव को ही समर्पित कर दिए। सारे आमंत्रण देवताओं तक स्वत: पहुंच गए और सभी यज्ञ में नियत समय पर ही पहुंच गए। इस तरह गणेश ने एक मुश्किल काम को अपनी बुद्धिमानी से आसान कर दिया।