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Friday, February 8, 2019

क्यों की जाती है सर्वप्रथम गणेशजी की ही पूजा

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किसी भी मंगल कार्य को करने से पहले भगवान् गणेश की पूजा अर्चना की जाती है. भगवान् गणेश की ही सर्वप्रथम पूजा किये जाने का कारण जानने के लिए पढ़िए यह लेख.
श्री गणेश के समतुल्य और कोई देवता नहीं हैं. इनकी पूजा किये बिना कोई भी मांगलिक कार्य, अनुष्ठान या महोत्सव की शुरुआत नहीं की जा सकती. गणेश जी, शिव भगवान एवं माता पार्वती की संतान हैं, इन्हें विघ्नहर्ता, भक्तों का दुःख दूर करने वाले, विद्या, बुद्धि व तेज़ बल प्रदान करने वाले के रूप में जाना जाता है.
शास्त्रों व पुराणों के अनुसार गणेश पूजन के लिए बुधवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है. गणेश जी को लगभग 108 से भी अधिक नामो से जाना जाता है. किसी भी मांगलिक कार्य से पहले गणेश जी की पूजा करना भारतीय संस्कृति में शुभकारी बताया गया है. ऐसा माना गया है कि सर्वप्रथम किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले यदि गणेश पूजन किया जाता है तो वह कार्य निश्चित ही सफल होता है.

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Monday, January 21, 2019

गणेश जी की कहानी |


एक दिन पारवती माता स्नान करने के लिए गयी लेकिन वहां पर कोई भी रक्षक नहीं था। इसलिए उन्होंने चंदन के पेस्ट से एक लड़के को अवतार दिया और उसका नाम रखा गणेश। माता पारवती नें गणेश से आदेश दिया की उनकी अनुमति के बिना किसी को भी घर के अंदर ना आने दिया जाये।



जब शिवजी वापस लौटे तो उन्होंने देखा की द्वार पर एक एक बालक खड़ा है। जब वे अन्दर जाने लगे तो उस बालक नें उन्हें रोक लिया और नहीं जाने दिया। यह देख शिवजी क्रोधित हुए और अपने सवारी बैल नंदी को उस बालक से युद्ध करने को कहाँ। पर युद्ध में उस छोटे बालक नें नंदी को हरा दिया। यह देख कर भगवान शिव जी नें क्रोधित हो कर उस बाल गणेश के सर को काट दिया। 

अब माता पारवती वापस लौटी तो वो बहुत दुखी हुई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। शिवजी को जब पता चला की वह उनका स्वयं का पुत्र था तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ। शिवजी नें पारवती को बहुत समझाने का कोशिश किया पर वह नहीं मानी और गणेश का नाम लेते लेते और दुखित होने लगी।


अंत में माता पारवती नें क्रोधित हो कर शिवजी को अपनी शक्ति से गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए कहा। शिवजी बोले – हे पारवती में गणेश को जीवित तो कर सकता हूँ पर किसी भी अन्य जीवित प्राणी के सीर को जोड़ने पर ही। माता पारवती रोते-रोते बोल उठी – मुझे अपना पुत्र किसी भी हाल में जीवित चाहिए।
यह सुनते ही शिवजी नें नंदी को आदेश दिया – जाओ नंदी इस संसार में जिस किसी भी जीवित प्राणी का सीर तुमको मिले काट लाना। जब नंदी सीर खोज रहा था तो सबसे पहले उससे एक हाथी दिखा तो वो उसका सीर काट कर ले आया। भगवान शिव नें उस सीर को गणेश के शारीर से जोड़ दिया और गणेश को जीवन दान दे दिया। शिवजी नें इसीलिए गणेश जी का नाम गणपति रखा और बाकि सभी देवताओं नें उन्हें वरदान दिया की इस दुनिया में जो भी कुछ नया कार्य करेगा पहले !जय श्री गणेश को याद करेगा।
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                                                                                                                                                                          Source:https://bit.ly/2SI72cT

Tuesday, July 3, 2018

भगवान गणेश की उपासना का महत्व.

प्रथम पूज्य गणेश को खुश करने के लिए विशेष रूप से दूब, फूल, लड्डू और मोदक चढ़ाने का विधान है. लेकिन भोलेनाथ के पुत्र की कृपा केवल पत्ते अर्पित करके भी पाई जा सकती है. आइए जानें कि गणपति की उपासना में पत्तों का क्या महत्व है….


भगवान गणेश की उपासना का महत्व :
– भगवान गणेश को मंगलमूर्ति कहा जाता है.
– इनकी उपासना से सारे विघ्न और बाधाएं दूर हो जाती हैं.
– संतान, शिक्षा और भाग्य के लिए भगवान गणेश की उपासना सबसे उत्तम है.
– गणपति की उपासना से कुंडली के अशुभ योग भी नष्ट हो जाते हैं.

पत्तों से की गई विघ्नहर्ता की उपासना के लाभ :
– हर पत्ते का अलग रंग और अलग खुशबू होती है.
– इनके रंग और गंध अलग-अलग ग्रहों से जुड़े होते हैं.
– यही पत्ते अलग-अलग मंत्रों के साथ श्री गणेश को चढ़ाए जाते हैं.
– खास तरीके से गणपति को अलग-अलग पत्ते अर्पित करने से मनवांछित फल मिलता है.

गणपति को कैसे चढ़ाएं पत्ते :
– बुधवार या चतुर्थी को श्री गणेश को पत्ते अर्पित करें.
– सुबह नहाकर गणपति के सामने घी का दीपक जलाएं.
– फिर उन्हें मोदक का भोग लगाएं.
– अपनी मनोकामना के अनुसार मंत्रों के साथ अलग-अलग पत्ते गणपति को अर्पित करें.
– एक बार में कम से नौ पत्ते चढ़ाएं, 108 पत्ते भी अर्पित कर सकते हैं.

कौन से मंत्र के साथ कौन सा पत्ता अर्पित करें :
– उच्च पद प्राप्ति के लिए – ‘गणाधीशाय नमः’ कहकर भंगरैया का पत्ता अर्पित करें.
– संतान प्राप्ति के लिए – ‘उमापुत्राय नमः’ कहकर बेलपत्र चढ़ाएं.
– अच्छे स्वास्थ्य के लिए – ‘लम्बोदराय नमः’ कहकर बेर का पत्ता अर्पित करें.
– कार्य की बाधा दूर करने के लिए – ‘वक्रतुण्डाय नमः’ कहकर सेम का पत्ता अर्पित करें.
– मान-सम्मान, यश की प्राप्ति के लिए – ‘चतुर्होत्रे नमः’ कहकर तेजपत्ता चढ़ाएं.
– नौकरी के लिए – ‘विकटाय नमः’ कहकर कनेर का पत्ता चढ़ाएं.
– व्यवसाय में लाभ के लिए – ‘सिद्धिविनायकाय नमः’ कहकर केतकी का पत्ता अर्पित करें.
– आर्थिक लाभ के लिए – ‘विनायकाय नमः’ कहकर आक का पत्ता चढ़ाएं.
– ह्रदय रोग में लाभ के लिए – ‘कपिलाय नमः’ कहकर अर्जुन का पत्ता अर्पित करें.
– शनि की पीड़ा को शांत करने के लिए – ‘सुमुखाय नमः’ कहकर शमी का पत्ता अर्पित

sources :- https://bit.ly/2KtbeNt

Monday, January 8, 2018

श्रीगणेश ने दिया राजा वरेण्य को गीता का ज्ञान

श्रीगणेश गीता 

|| ऊँ नम: शिवाय || ऊँ गं गणपतये नम: ||


भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता उपदेश दिया था, यह बात तो सब जानते हैं लेकिन विघ्न विनाशक गणपति ने भी गीता का उपदेश दिया था, ये कम लोगों को पता है।

श्रीकृष्ण गीता और गणेश गीता में लगभग सारे विषय समान हैं। बस दोनों में उपदेश देने की मन: स्थिति में अंतर है। भगवत गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में, मोह और अपना कर्तव्य भूल चुके अर्जुन को दिया गया था। लेकिन गणेश गीता में विघ्नविनाशक गणपति, यह उपदेश युद्ध के बाद , राजा वरेण्य को देते हैं। दोनों ही गीता में गीता सुनने वाले श्रोताओं अर्जुन और राजा वरेण्य की स्थिति और परिस्थिति में अंतर है।

भगवत गीता के पहले अध्याय अर्जुन विषाद योग से यह बात स्पष्ट होती है कि अर्जुन मोह के कारण मूढ़ावस्था में चले गये थे। लेकिन राजा वरेण्य मुमुक्षु स्थिति में थे। वह अपने धर्म और कर्तव्य को जानते थे।

श्रीगणेश गीता की पृष्ठ भूमि:—

देवराज इंद्र समेत सारे देवी देवता, सिंदूरा दैत्य के अत्याचार से परेशान थे। जब ब्रह्मा जी से सिंदूरा से मुक्ति का उपाय पूछा गया तो उन्होने गणपति के पास जाने को कहा। सभी देवताओं ने गणपति से प्रार्थना की कि वह दैत्य सिंदूरा के अत्याचार से मुक्ति दिलायें। देवताओं और ऋषियों की आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने मां जगदंबा के घर गजानन रुप में अवतार लिया। इधर राजा वरेण्य की पत्नी पुष्पिका के घर भी एक बालक ने जन्म लिया। लेकिन प्रसव की पीड़ा से रानी मूर्छित हो गईं और उनके पुत्र को राक्षसी उठा ले गई। ठीक इसी समय भगवान शिव के गणों ने गजानन को रानी पुष्पिका के पास पहुंचा दिया। क्योंकि गणपति भगवान ने कभी राजा वरेण्य की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वह उनके यहां पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

लेकिन जब रानी पुष्पिका की मूर्छा टूटी तो वो चतुर्भुज गजमुख गणपति के इस रूप को देखकर डर गईं। राजा वरेण्य के पास यह सूचना पहुंचाई गई कि ऐसा बालक पैदा होना राज्य के लिये अशुभ होगा। बस राजा वरेण्य ने उस बालक यानि गणपति को जंगल में छोड़ दिया। जंगल में इस शिशु के शरीर पर मिले शुभ लक्षणों को देखकर महर्षि पराशर उस बालक को आश्रम लाये।

यहीं पर पत्नी वत्सला और पराशर ऋषि ने गणपति का पालन पोषण किया। बाद में राजा वरेण्य को यह पता चला कि जिस बालक को उन्होने जंगल में छोड़ा था, वह कोई और नहीं बल्कि गणपति हैं।

अपनी इसी गलती से हुए पश्चाताप के कारण वह भगवान गणपति से प्रार्थना करते हैं कि मैं अज्ञान के कारण आपके स्वरूप को पहचान नहीं सका इसलिये मुझे क्षमा करें। करुणामूर्ति गजानन पिता वरेण्य की प्रार्थना सुनकर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने राजा को कृपापूर्वक अपने पूर्वजन्म के वरदान का स्मरण कराया|

भगवान् गजानन पिता वरेण्य से अपने स्वधाम-यात्रा की आज्ञा माँगी| स्वधाम-गमन की बात सुनकर राजा वरेण्य व्याकुल हो उठे अश्रुपूर्ण नेत्र और अत्यंत दीनता से प्रार्थना करते हुए बोले- ‘कृपामय! मेरा अज्ञान दूरकर मुझे मुक्ति का मार्ग प्रदान करे|’

राजा वरेण्य की दीनता से प्रसन्न होकर भगवान् गजानन ने उन्हें ज्ञानोपदेश प्रदान किया| यही अमृतोपदेश गणेश-गीता के नाम से विख्यात है|

Source :- http://bit.ly/2mfRSxf
                http://bit.ly/2qNzb99

Tuesday, September 1, 2015

Powerful Ganapati Mantra for Success



वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ
 निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा 

This powerful Ganapathi Mantra can remove obstacles in our attempt and brings in success.


Tuesday, July 28, 2015

The divine family of Lord Shiva


Lord Shiva and Shridevi Parvathi are one and always together. They are inseparable divine couple. They have a small and happy family with beloved sons elephant-headed Lord Ganesha and Lord Karthikeya.

Note

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Thursday, August 28, 2014

How do the Japanese chant Ganesha mantras?

Ganpati


The Japanese know Ganesha as Kangiten who is also worshiped in a dual form as Kangiten. The dual Ganesha has images of both Vinayaka as well as Vinayaki in an embrace. Couples who desire happiness in the married life and children worship Vinayaka in this form in Japan. The Japanese consider Ganesha as the granter of prosperity and is therefore very popular among businessmen.

While there are hundreds of of Ganesh temples in Japan, the most important the Hōzan-ji shrine on Mount Ikoma. 


May Lord Ganesha of Hōzan-ji shrine on Mount Ikoma in Japan bless us all with happiness, love and prosperity!

Watch a Japanese man chant Ganesh mantras in Sanskrit on the following link https://www.youtube.com/watch?v=6ZFgidJhttM

- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust


Note

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Monday, January 27, 2014

Ganesh Gufa, where Lord Ganpati wrote the Mahabharata




Ganesh Gufa is located 100 meters from Mana village, in Chamoli district, Uttarakhand, which is the last Indian village before the Indo-Tibetan border. Reaching the spot involves an uphill trek.

This is the spot mentioned in the Mahabharata where Maharishi Vyasa narrated the grant epic Mahabharata and where it was ditifully recorded in writing by the divine scribe Lord Ganesha on condition that Vyasa would not pause in his narration at any point. If Vyasa paused, Ganesha would abandon the task which was too huge for anyone in all the worlds. 

Vyasa agreed and the Mahabharata came to be written.

May Lord Ganesha, the divine writer, write intellect, humility, knowledge and abundance in the book of our fortunes. 



Note - 


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