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Tuesday, February 12, 2019

भगवान् गणेश और कावेरी नदी की कहानी |


एक बार की बात है, अगस्त्य ऋषि भगवान् विष्णु और शिव का आशीर्वाद लेने के लिए गए|
अगस्त्य ऋषि एक नदी का निर्माण करना चाहते थे जो दक्षिण भारत के लोगों के लिए सिचाई और पीने का पानी उपलब्द करवा सके|
भगवान् शिव ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और उनके कमंडल में दिव्य पानी डाल दिया| और कहा इस कमंडल का पानी जिस जगह गिरेगा वहीँ से नदी का आरंभ होगा|
कमंडल ले कर अगस्त्य ऋषि अब ऐसी जगह की तलाश करने लगे जहाँ से नदी की शुरुआत हो सके| स्थान खोजने के लिए वो कूर्ग पहाड़ियों पर घूम रहे थे| लेकिन किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे|
अचानक अगस्त्य ऋषि को एक छोटा बच्चा वहां दिखाई दिया| ऋषि को लघुशंका के लिए जाना था| ऋषि ने अपना कमंडल कुछ देर के लिए उस छोटे बच्चे को देखभाल के लिए दे दिया|
वो छोटा बालक और कोई नहीं, भगवान् गणेश थे| भगवान् गणेश को पता था, कोन सा स्थान नदी के प्रारम्भ के लिए ठीक होगा| जिससे ज्यादा से ज्यादा दक्षिण भारत के क्षेत्रों को पानी मिल सके|
उन्होंने कमंडल वहीँ धरती पर रख दिया| तभी एक कोवा कमंडल पर पानी पिने के लिए बेठा| और कमंडल को वही गिरा दिया| बस वहीँ से नदी का प्रारंभ हुआ| इसी नदी को कावेरी के नाम से जाना जाता है|
Moral:-
जीवन में जो कुछ भी होता है, अच्छे के लिए होता है| अगर आपको लगता है की कुछ आपके साथ बुरा हुआ है| बेफिक्र रहिये,. उस घटना के अच्छे परिणाम हमें भविष्य में देखने को मिलेंगे|
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                                                                                                                                                   Source:https://bit.ly/2GaB72i

Tuesday, February 5, 2019

भगवान् गणेश और कुबेर की कहानी |




एक बार की बात है, धन के देवता कुबेर को अपने ऊपर घमंड हो गया, की वो सबसे अमीर देवता हैं| अपने धन का वैभव दिखाने के लिए एक बार इन्होने एक शानदार भोज रखी, और सारे देवताओं को आमंत्रित किया|
भगवान् शिव को भी किया| किसी कारण वश शिवजी भोज में जा नहीं पाए| अरे भई…., जब कोई न्योता आता है, तो किसी न किसी को तो जाना ही पडता है, हाजरी देने के लिए|
तो शिव भगवान् ने हमारे प्यारे गणपति बप्पा को बोला बेटा तू चला जा, आज में थोडा कहीं और बिजी हूँ| तो चले गए बाल गणेश भोज अटेंड करने|
फिर क्या था, वहां जा कर गणेशजी ने भोजन करना शुरू किया, और देखते देखते सारा की सारा खाना खा गए|
गणेशजी की भूख ही न मिटे| उन्होंने वहां रखे हुए बर्तनों को भी खाना शुरू कर दिया| जब बर्तन भी नहीं बचे तो पूरे अलकापुरी शहर में जो कुछ भी मिला उसे ही खा गए|
अब कुछ बचा नहीं खाने को, तो कुबेर को ही खाने के लिए उसकी तरफ दोड़े| फिर क्या था, अपनी जान बचाने के लिए कुबेर ने हिमालय पर्वत पर भगवान शिव की शरण ली, और कहा मुझे गणेशजी से बचाओ|
भगवान् शिव ने एक कटोरे में थोड़े से उबले हुए चावल गणेशजी को दिए| तब जाकर उनकी भूख मिटी| बस गणेशजी ने ये सब कुबेर को सबक सीखने के लिए किया|
सिख :-
बच्चो इससे हमें क्या सीखने को मिला बताओ| कभी भी आपके पास चाहे कितना भी धन हो आप कितने भी अमीर हो कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए|
बल्कि हमारे पास अगर धन ज्यादा है तो उसे अच्छे कामों में खर्च करना चाहिए| नहीं तो गणपति बप्पा आ जाएँगे सबक सिखाने|
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Tuesday, January 29, 2019

गणेश जी के टूटे दांत की कहानी |


जब महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के लिए बैठे, तो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनके मुख से निकले हुए महाभारत की कहानी को लिखे। इस कार्य के लिए उन्होंने श्री गणेश जी को चुना। गणेश जी भी इस बात के लिए मान गए पर उनकी एक शर्त थी कि पूरा महाभारत लेखन को एक पल ले लिए भी बिना रुके पूरा करना होगा। गणेश जी बोले – अगर आप एक बार भी रुकेंगे तो मैं लिकना बंद कर दूंगा।

महर्षि वेदव्यास नें गणेश जी की इस शर्त को मान लिया। लेकिन वेदव्यास ने गणेश जी के सामने भी एक शर्त रखा और कहा – गणेश आप जो भी लिखोगे समझ कर ही लिखोगे। गणेश जी भी उनकी शर्त मान गए। दोनों महाभारत के महाकाव्य को लिखने के लिए बैठ गए। वेदव्यास जी महाकाव्य को अपने मुहँ से बोलने लगे और गणेश जी समझ-समझ कर जल्दी-जल्दी लिखने लगे। कुछ देर लिखने के बाद अचानक से गणेश जी का कलम टूट गया। कलम महर्षि के बोलने की तेजी को संभाल ना सका।
गणेश जी समझ गए की उन्हें थोडा से गर्व हो गया था और उन्होंने महर्षि के शक्ति और ज्ञान को ना समझा। उसके बाद उन्होंने धीरे से अपने एक दांत को तोड़ दिया और स्याही में डूबा कर दोबारा महाभारत की कथा लिखने लगे। जब भी वेदव्यास को थकान महसूस होता वे एक मुश्किल सा छंद बोलते , जिसको समझने और लिखने के लिए गणेश जी को ज्यादा समय लग जाता था और महर्षि को आराम करने का समय भी मिल जाता था।
महर्षि वेदव्यास जी और गणेश जी को महाभारत लिखने में 3 वर्ष लग गए। वैसे तो कहा जाता है महाभारत के कुछ छंद घूम हो गए हैं परन्तु आज भी इस कविता में 100000 छंद हैं।
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Tuesday, July 17, 2018

ये चार उपाय करने से हो जाये गए रुके हुवे काम !


बुधवार के दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है. इससे अत्‍यंत लाभ मिलता है. सभी देवताओं से पहले पूजे जाने वाले गणेशजी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है. बुधवार के दिन ये विशेष उपाय कर आप अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं…

1. बुधवार के दिन गाय को हरी घास खिलाने से सभी देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

2. गणपति को मोदक का भोग लगाएं. इससे गणेश जी खुश होते हैं और इससे बुध दोष भी समाप्त होता है.

3. गणेश जी को बुधवार को सिंदूर चढ़ाएं. इससे भी गणपति खुश होते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं.

4. बुधवार के दिन दान करने से भी लाभ मिलता है. खासतौर से यदि आप किसी गरीब को मूंग दान करें तो इसका अद्भुत लाभ मिलता है.

Source:- https://bit.ly/2mmbeAt
               https://bit.ly/2viONRZ

Tuesday, July 10, 2018

कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक.

इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है।  हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े।  ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।

भगवान गणेश का जन्म की कहानी :

देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं।  देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।

यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।

तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।

कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।

यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि  मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।

यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।

ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।

Source :- https://bit.ly/2m7OKTP

Monday, June 25, 2018

गणेशजी का स्त्री रुप ||

गणेशजी के स्त्री रुप का नाम है विनायकी

देवों के देव महादेव और माता पार्वती के पुत्र गणेशजी के स्त्री रुप का वर्णन पुराणों में भी किया गया है. विनायक गणेश के इस स्त्री रुप को विनायकी के नाम से जाना जाता है.

धर्मोत्तर पुराण में गणेशजी का स्त्री रुप विनायकी का वर्णन किया गया है इसके अलावा वन दुर्गा उपनिषद में भी गणेश जी के स्त्री रूप का उल्लेख मिलता है, जिसे गणेश्वरी का नाम दिया गया है.


गणेशजी का स्त्री रुप – पुराणों में दर्ज एक कथा के अनुसार

दरअसल एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार अंधक नाम के दैत्य ने जबरन माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी बनाने की कोशिश की, ऐसे में मां पार्वती ने सहायता के लिए अपने पति शिव जी को बुलाया.

अपनी पत्नी की इस दैत्य से रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया और उसके आर-पार कर दिया. लेकिन अंधक की मृत्यु नहीं हुई बल्कि त्रिशूल के प्रहार से उसके रक्त की एक-एक बूंद से राक्षसी अंधका का निर्माण होता चला गया.

यह देख माता पार्वती को एक बात तो समझ में आ गई थी और वो ये कि हर एक दैवीय शक्ति के भीतर दो तत्व मौजूद होते हैं. पहला पुरुष तत्व जो उसे मानसिक रूप से सक्षम बनाता है और दूसरा स्त्री तत्व, जो उसे शक्ति प्रदान करता है.

इसके बाद माता पार्वती ने उन सभी देवियों को आमंत्रित किया जो शक्ति का ही रूप हैं. उनके बुलाने पर हर दैवीय ताकत स्त्री रुप में वहां उपस्थित हो गईं और अंधक दैत्य के खून गिरने से पहले ही अपने भीतर समा लिया जिसके कारण राक्षसी अंधका का उत्पन्न होना कम हो गया.

लेकिन फिर भी अंधक के गिरते हुए रक्त को खत्म करना जब संभव नहीं हो रहा था तब भगवान गणेश को मैदान में उतरना पड़ा और वो भी अपने स्त्री रुप में.

विनायकी के रुप में प्रकट होकर गणेशजी ने अंधक का सारा रक्त पी लिया. इस तरह से गणेश समेत सभी दैवीय शक्तियों के स्त्री रुप की मदद से अंधका का सर्वनाश संभव हो सका.

गौरतलब है कि गणेशजी का स्त्री रुप विनायकी को सबसे पहले 16वीं सदी में पहचाना गया था. उनका यह स्वरुप देखने में बिल्कुल माता पार्वती जैसा ही था. अगर कोई अंतर था तो वो सिर्फ सिर का था क्योंकि गणेश जी की तरह ही विनायकी का सिर भी गज के सिर से बना हुआ था.

Source :-https://bit.ly/2yOWq6m

Monday, January 8, 2018

श्रीगणेश ने दिया राजा वरेण्य को गीता का ज्ञान

श्रीगणेश गीता 

|| ऊँ नम: शिवाय || ऊँ गं गणपतये नम: ||


भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता उपदेश दिया था, यह बात तो सब जानते हैं लेकिन विघ्न विनाशक गणपति ने भी गीता का उपदेश दिया था, ये कम लोगों को पता है।

श्रीकृष्ण गीता और गणेश गीता में लगभग सारे विषय समान हैं। बस दोनों में उपदेश देने की मन: स्थिति में अंतर है। भगवत गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में, मोह और अपना कर्तव्य भूल चुके अर्जुन को दिया गया था। लेकिन गणेश गीता में विघ्नविनाशक गणपति, यह उपदेश युद्ध के बाद , राजा वरेण्य को देते हैं। दोनों ही गीता में गीता सुनने वाले श्रोताओं अर्जुन और राजा वरेण्य की स्थिति और परिस्थिति में अंतर है।

भगवत गीता के पहले अध्याय अर्जुन विषाद योग से यह बात स्पष्ट होती है कि अर्जुन मोह के कारण मूढ़ावस्था में चले गये थे। लेकिन राजा वरेण्य मुमुक्षु स्थिति में थे। वह अपने धर्म और कर्तव्य को जानते थे।

श्रीगणेश गीता की पृष्ठ भूमि:—

देवराज इंद्र समेत सारे देवी देवता, सिंदूरा दैत्य के अत्याचार से परेशान थे। जब ब्रह्मा जी से सिंदूरा से मुक्ति का उपाय पूछा गया तो उन्होने गणपति के पास जाने को कहा। सभी देवताओं ने गणपति से प्रार्थना की कि वह दैत्य सिंदूरा के अत्याचार से मुक्ति दिलायें। देवताओं और ऋषियों की आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने मां जगदंबा के घर गजानन रुप में अवतार लिया। इधर राजा वरेण्य की पत्नी पुष्पिका के घर भी एक बालक ने जन्म लिया। लेकिन प्रसव की पीड़ा से रानी मूर्छित हो गईं और उनके पुत्र को राक्षसी उठा ले गई। ठीक इसी समय भगवान शिव के गणों ने गजानन को रानी पुष्पिका के पास पहुंचा दिया। क्योंकि गणपति भगवान ने कभी राजा वरेण्य की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वह उनके यहां पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

लेकिन जब रानी पुष्पिका की मूर्छा टूटी तो वो चतुर्भुज गजमुख गणपति के इस रूप को देखकर डर गईं। राजा वरेण्य के पास यह सूचना पहुंचाई गई कि ऐसा बालक पैदा होना राज्य के लिये अशुभ होगा। बस राजा वरेण्य ने उस बालक यानि गणपति को जंगल में छोड़ दिया। जंगल में इस शिशु के शरीर पर मिले शुभ लक्षणों को देखकर महर्षि पराशर उस बालक को आश्रम लाये।

यहीं पर पत्नी वत्सला और पराशर ऋषि ने गणपति का पालन पोषण किया। बाद में राजा वरेण्य को यह पता चला कि जिस बालक को उन्होने जंगल में छोड़ा था, वह कोई और नहीं बल्कि गणपति हैं।

अपनी इसी गलती से हुए पश्चाताप के कारण वह भगवान गणपति से प्रार्थना करते हैं कि मैं अज्ञान के कारण आपके स्वरूप को पहचान नहीं सका इसलिये मुझे क्षमा करें। करुणामूर्ति गजानन पिता वरेण्य की प्रार्थना सुनकर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने राजा को कृपापूर्वक अपने पूर्वजन्म के वरदान का स्मरण कराया|

भगवान् गजानन पिता वरेण्य से अपने स्वधाम-यात्रा की आज्ञा माँगी| स्वधाम-गमन की बात सुनकर राजा वरेण्य व्याकुल हो उठे अश्रुपूर्ण नेत्र और अत्यंत दीनता से प्रार्थना करते हुए बोले- ‘कृपामय! मेरा अज्ञान दूरकर मुझे मुक्ति का मार्ग प्रदान करे|’

राजा वरेण्य की दीनता से प्रसन्न होकर भगवान् गजानन ने उन्हें ज्ञानोपदेश प्रदान किया| यही अमृतोपदेश गणेश-गीता के नाम से विख्यात है|

Source :- http://bit.ly/2mfRSxf
                http://bit.ly/2qNzb99