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Friday, March 29, 2019

हनुमान पुराण कथा । Hanuman-puran-katha



हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना(एक नारी वानर) के पुत्र के रूप मे हुआ था। अंजना असल मे पुन्जिकस्थला नाम की एक अप्सरा थीं, मगर एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। अंजना केसरी की पत्नी थीं। केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, "केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।


केसरी के संग मे अंजना ने भगवान शिव कि बहुत कठोर तपस्या की जिसके फ़लस्वरूप अंजना ने हनुमान(शिव के अन्श) को जन्म दिया।

जिस समय अंजना शिव की आराधना कर रहीं थीं उसी समय अयोध्या-नरेश दशरथ, पुत्र प्राप्ति के लिये पुत्र कामना यज्ञ करवा रहे थे। फ़लस्वरूप उन्हे एक दिव्य फल प्राप्त हुआ जिसे उनकी रानियों ने बराबर हिस्सों मे बाँटकर ग्रहण किया। इसी के फ़लस्वरूप उन्हे राम, लषन, भरत और शत्रुघन पुत्र रूप मे प्राप्त हुए।

विधि का विधान ही कहेंगे कि उस दिव्य फ़ल का छोटा सा टुकडा एक चील काट के ले गई और उसी वन के ऊपर से उडते हुए(जहाँ अंजना और केसरी तपस्या कर रहे थे) चील के मुँह से वो टुकडा नीचे गिर गया। उस टुकडे को पवन देव ने अपने प्रभाव से याचक बनी हुई अंजना के हाथों मे गिरा दिया। ईश्वर का वरदान समझकर अंजना ने उसे ग्रहण कर लिया जिसके फ़लस्वरूप उन्होंने पुत्र के रूप मे हनुमान को जन्म दिया।

अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'। 

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                                                                                                                                                                                                               Source:https://bit.ly/2Uch1eH

Tuesday, July 3, 2018

भगवान गणेश की उपासना का महत्व.

प्रथम पूज्य गणेश को खुश करने के लिए विशेष रूप से दूब, फूल, लड्डू और मोदक चढ़ाने का विधान है. लेकिन भोलेनाथ के पुत्र की कृपा केवल पत्ते अर्पित करके भी पाई जा सकती है. आइए जानें कि गणपति की उपासना में पत्तों का क्या महत्व है….


भगवान गणेश की उपासना का महत्व :
– भगवान गणेश को मंगलमूर्ति कहा जाता है.
– इनकी उपासना से सारे विघ्न और बाधाएं दूर हो जाती हैं.
– संतान, शिक्षा और भाग्य के लिए भगवान गणेश की उपासना सबसे उत्तम है.
– गणपति की उपासना से कुंडली के अशुभ योग भी नष्ट हो जाते हैं.

पत्तों से की गई विघ्नहर्ता की उपासना के लाभ :
– हर पत्ते का अलग रंग और अलग खुशबू होती है.
– इनके रंग और गंध अलग-अलग ग्रहों से जुड़े होते हैं.
– यही पत्ते अलग-अलग मंत्रों के साथ श्री गणेश को चढ़ाए जाते हैं.
– खास तरीके से गणपति को अलग-अलग पत्ते अर्पित करने से मनवांछित फल मिलता है.

गणपति को कैसे चढ़ाएं पत्ते :
– बुधवार या चतुर्थी को श्री गणेश को पत्ते अर्पित करें.
– सुबह नहाकर गणपति के सामने घी का दीपक जलाएं.
– फिर उन्हें मोदक का भोग लगाएं.
– अपनी मनोकामना के अनुसार मंत्रों के साथ अलग-अलग पत्ते गणपति को अर्पित करें.
– एक बार में कम से नौ पत्ते चढ़ाएं, 108 पत्ते भी अर्पित कर सकते हैं.

कौन से मंत्र के साथ कौन सा पत्ता अर्पित करें :
– उच्च पद प्राप्ति के लिए – ‘गणाधीशाय नमः’ कहकर भंगरैया का पत्ता अर्पित करें.
– संतान प्राप्ति के लिए – ‘उमापुत्राय नमः’ कहकर बेलपत्र चढ़ाएं.
– अच्छे स्वास्थ्य के लिए – ‘लम्बोदराय नमः’ कहकर बेर का पत्ता अर्पित करें.
– कार्य की बाधा दूर करने के लिए – ‘वक्रतुण्डाय नमः’ कहकर सेम का पत्ता अर्पित करें.
– मान-सम्मान, यश की प्राप्ति के लिए – ‘चतुर्होत्रे नमः’ कहकर तेजपत्ता चढ़ाएं.
– नौकरी के लिए – ‘विकटाय नमः’ कहकर कनेर का पत्ता चढ़ाएं.
– व्यवसाय में लाभ के लिए – ‘सिद्धिविनायकाय नमः’ कहकर केतकी का पत्ता अर्पित करें.
– आर्थिक लाभ के लिए – ‘विनायकाय नमः’ कहकर आक का पत्ता चढ़ाएं.
– ह्रदय रोग में लाभ के लिए – ‘कपिलाय नमः’ कहकर अर्जुन का पत्ता अर्पित करें.
– शनि की पीड़ा को शांत करने के लिए – ‘सुमुखाय नमः’ कहकर शमी का पत्ता अर्पित

sources :- https://bit.ly/2KtbeNt

Tuesday, June 5, 2018

भगवान श्री कृष्ण ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश ||

भगवान श्रीकृष्ण ने बचपन में ही सबकी भलाई के लिए निर्बल, दुर्लब, कमजोर वर्ग के लोगों में उत्साह भरने के लिए मनोबल ऊँचा रखने के लिए ब्रज में श्वेत आंदोलन की स्थापना की। जिन घरों से दूध, दही कंस जैसे दुर्दान्त दुष्टों के यहाँ भय के कारण सुविधापूर्वक पहुँचाया जाता था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे रोकने के लिए एक आंदोलन का स्वरूप निर्मित किया। उसी दूध-दही के द्वारा उन्हीं दुर्बल, निर्बल कमजोर लोगों को स्वयं बदनामी लेते हुए अपने को चोर की संज्ञा दी।


कंस के द्वारा किए गए जनता के पर अनेक अत्याचार उनमें बाल हत्या से लेकर जितनी भी प्रकार की मानसिक, वाचिक और कायिक हिंसाएँ हो सकती हैं। उन सबका सामना करने की ताकत इन दुर्लब गरीबों ने पाई। अनेक का मान-मर्दन अहंकार, दलित हुआ और गोवर्धन लीला इसका जीवन्त उदाहरण है। जिसमें इन्द्र ने भी अपनी ताकत का संपूर्ण प्रयोग किया। किंतु कृष्ण की जननिष्ठा के सामने इन्द्र का भी अहंकार टिक न सका।

एक-एक लाठी के सहयोग द्वारा अनेक लाठियों के संबल से कृष्ण की विशेष भावना शक्ति से इस सफल कार्य को अंजाम दिया जा सका। सात दिनों तक प्रलयकालीन बादलों ने ब्रज को तहस नहस करने की साजिश से अपने अपमान का बदला लेने के लिए भीषण जल वृष्टि की।
भगवान श्रीकृष्ण की संगठन शक्ति के सामने इन्द्र को नतमस्तक होना पड़ा। स्वयं श्रीकृष्ण गोवर्धन बनकर गोवर्धन पूजन की मान्यता प्रदान की। वृक्षों और पहाड़ों का संरक्षण, पर्यावरण को व्यवस्थित रखने का सबसे बड़ा साधन है।

गोवर्धन पूजा से सामान्य से सामान्य व्यक्ति जुड़ता है। यहाँ गरीब-अमीर, ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है। भगवान कृष्ण की गोवर्धन पूजा महत्वपूर्ण जन पूजा है। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार से लेकर तिरोभाव तक धर्मरक्षा, समाजहित, प्रकृति संरक्षण एवं सौहार्दपूर्ण समाज को संगठित रखने का संदेश दिया हैं।

Friday, June 9, 2017

|| रविवार व्रत कथा ||



सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाले रविवार व्रत की कथा इस प्रकार से है- प्राचीन काल में किसी नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह प्रत्येक रविवार को सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती थी। उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती थी। भगवान सूर्यदेव की कृपा से उसे किसी प्रकार की चिन्ता व कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे बुरी तरह जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः रविवार के दिन घर लीपने केलिए वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। इस प्रकार उसने निराहर व्रत किया। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपनी भक्त की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा- हे माता, हम तुमको एक ऐसी गाय देते हैं जो सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। क्यूंकि तुम हमेशा रविवार को पूरा घर गाय के गोबर से लीपकर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती हो, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। स्वप्न में उस बुढ़िया को ऐसा वरदान देकर भगवान सूर्य अंतर्ध्यान हो गए।

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई। जब उसे सोने का गोबर पाने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह राजा के दरबार में पहुंची और राजा को सारी बात बताई। राजा को जब बुढ़िया के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर बुढ़िया की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक उस बुढ़िया के घर पहुंचे। उस समय बुढ़िया सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय खोला और अपने साथ महल की ओर ले चले। बुढ़िया ने सैनिकों से गाय को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्लाई लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय के चले जाने से बुढ़िया को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय को पुन: प्राप्त करने हेतु प्रार्थना करने लगी। दूसरी ओर राजा गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। लेकिन अगले दिन सुबह जैसे ही वह उठा सारा महल गोबर से भरा देखकर घबरा गया। उसी रात भगवान सूर्य उसके सपने में आए और बोले- हे राजन। यह गाय वृद्धा को लौटाने में ही तुम्हारा भला है। रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर ही उसे यह गाय मैंने दी है।

सुबह होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत-से धन के साथ सम्मान सहित गाय लौटा दी और क्षमा मांगी। इसके बाद राजा ने पड़ोसन को दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से गंदगी दूर हो गई। उसी दिन राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए।