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Monday, January 21, 2019

गणेश जी की कहानी |


एक दिन पारवती माता स्नान करने के लिए गयी लेकिन वहां पर कोई भी रक्षक नहीं था। इसलिए उन्होंने चंदन के पेस्ट से एक लड़के को अवतार दिया और उसका नाम रखा गणेश। माता पारवती नें गणेश से आदेश दिया की उनकी अनुमति के बिना किसी को भी घर के अंदर ना आने दिया जाये।



जब शिवजी वापस लौटे तो उन्होंने देखा की द्वार पर एक एक बालक खड़ा है। जब वे अन्दर जाने लगे तो उस बालक नें उन्हें रोक लिया और नहीं जाने दिया। यह देख शिवजी क्रोधित हुए और अपने सवारी बैल नंदी को उस बालक से युद्ध करने को कहाँ। पर युद्ध में उस छोटे बालक नें नंदी को हरा दिया। यह देख कर भगवान शिव जी नें क्रोधित हो कर उस बाल गणेश के सर को काट दिया। 

अब माता पारवती वापस लौटी तो वो बहुत दुखी हुई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। शिवजी को जब पता चला की वह उनका स्वयं का पुत्र था तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ। शिवजी नें पारवती को बहुत समझाने का कोशिश किया पर वह नहीं मानी और गणेश का नाम लेते लेते और दुखित होने लगी।


अंत में माता पारवती नें क्रोधित हो कर शिवजी को अपनी शक्ति से गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए कहा। शिवजी बोले – हे पारवती में गणेश को जीवित तो कर सकता हूँ पर किसी भी अन्य जीवित प्राणी के सीर को जोड़ने पर ही। माता पारवती रोते-रोते बोल उठी – मुझे अपना पुत्र किसी भी हाल में जीवित चाहिए।
यह सुनते ही शिवजी नें नंदी को आदेश दिया – जाओ नंदी इस संसार में जिस किसी भी जीवित प्राणी का सीर तुमको मिले काट लाना। जब नंदी सीर खोज रहा था तो सबसे पहले उससे एक हाथी दिखा तो वो उसका सीर काट कर ले आया। भगवान शिव नें उस सीर को गणेश के शारीर से जोड़ दिया और गणेश को जीवन दान दे दिया। शिवजी नें इसीलिए गणेश जी का नाम गणपति रखा और बाकि सभी देवताओं नें उन्हें वरदान दिया की इस दुनिया में जो भी कुछ नया कार्य करेगा पहले !जय श्री गणेश को याद करेगा।
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                                                                                                                                                                          Source:https://bit.ly/2SI72cT

Monday, January 29, 2018

मूषक कैसे बना भगवान श्री गणेशजी का वाहन?

मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना। सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होता है। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेशजी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य और चूहे के मस्तिष्क का आकार-प्रकार एक समान है। चूहे का किसी न किसी रूप में मनुष्य से कोई सबंध जरूर है उसी तरह जिस तरह की चूहे और हाथी का संबंध गहरा है।


शिवपुत्र गणेशजी का वाहन है मूषक। हालांकि गणेश पुराण अनुसार हर युग में गणेशजी का वाहन बदलता रहता है। सतयुग में गणेशजी का वाहन सिंह है। त्रेता युग में गणेशजी का वाहन मयूर है, द्वापर में उनका वाहन मूषक है और वर्तमान युग यानी कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है। मूषक को भगवान श्री गणेश द्वारा अपना वाहन बनाने के संबंध में कई कथाएं प्रचलन में है।

गणेश पुराण की एक कथा के अनुसार गणेशची का वाहन चूहा पूर्वजन्म में एक गंधर्व था जिसका नाम क्रोंच था। एक बार देवराज इंद्र की सभा में गलती से क्रोंच का पैर मुनि वामदेव के ऊपर पड़ गया। मुनि वामदेव को लगा की क्रोंच ने यह शरारत की है। इसलिए गुस्से में उन्होंने क्रोंच को चूहा बनने का शाप दे दिया। इस शाप के चलते वह चूहा बन गया लेकिन वह बहुत ही विशालकाय था। वह इतना विशालकाय था कि झाड़ पेड़ आदि जो भी उसके रास्ते में आता उसे वह नष्ट कर देता था। एक बार वह उत्पात मचाता हुआ महर्षि पराशर के आश्रम में पहुंच गया।

महर्षि पराशर के आश्रम में पहुंचकर वह बलवान मूषक उत्पात मचाने लगा। जिससे परेशान होकर महर्षि ने भगवान श्रीगणेश की स्तुति की। गणेशजी महर्षि की भक्ति से प्रसन्न हुए और उत्पाती मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका। पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक पहुंच गया और उसे बांधकर गणेशजी के सामने ले आया।

गणेशजी को सामने देखकर मूषक उनकी स्तुति करने लगा। गणेश जी ने कहा तुमने महर्षि पराशर को बहुत परेशान किया है लेकिन अब तुम मेरी शरण में हो इसलिए जो चाहो वरदान मांग लो। गणेश जी के ऐसे वचन सुनते ही मूषक अहंकारवश खुद ही गणेशजी से कहने लगा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, अगर आपको मुझसे कुछ चाहिए तो मांग लीजिए। गणेश जी मुस्कुराए और मूषक से कहा कि अच्‍छा ठीक है तब फिर तुम मेरा वाहन बन जाओ। मूषक तो हतप्रभ रह गया।

अपने अभिमान के कारण मूषक गणेश जी का वाहन बन गया। लेकिन जैसे ही गणेश जी मूषक पर चढ़े गणेश जी के भार से वह दबने लगा। मूषक ने गणेश जी से कहा कि हे प्रभो मैं आपके वजन से दबा जा रहा हूं। अपने वाहन की विनती सुनकर गणेशजी ने अपना भार कम कर लिया। इसके बाद से मूषक गणेशजी का वाहन बनकर उनकी सेवा में लगा हुआ है।