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Monday, March 18, 2019

कैसे एकदंत हो गए भगवान गणेश?



ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के अवतार परशुराम शिव के शिष्य थे। जिस फरसे से उन्होंने 17 बार क्षत्रियों को धरती से समाप्त किया था, वो अमोघ फरसा शिव ने ही उन्हें प्रदान किया था। 17 बार क्षत्रियों को हराने के बाद ब्राह्मण परशुराम शिव और पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। उस समय भगवान शिव शयन कर रहे थे और पहरे पर स्वयं गणेश थे। गणेश ने परशुराम को रोक लिया। परशुराम को क्रोध बहुत जल्दी आता था।
वे रोके जाने पर गणेश से झगड़ने लगे। बात-बात में झगड़ा इतना बढ़ गया कि परशुराम ने गणेश को धक्का दे दिया। गिरते ही गणेश को भी क्रोध आ गया। परशुराम ब्राह्मण थे, सो गणेश उन पर प्रहार नहीं करना चाहते थे। उन्होंने परशुराम को अपनी सूंड से पकड़ लिया और चारों दिशाओं में गोल-गोल घूमा दिया। घूमते-घूमते ही गणेश ने परशुराम को अपने कृष्ण रूप के दर्शन भी करवा दिए। कुछ पल घुमाने के बाद गणेश ने उन्हें छोड़ दिया।
छोड़े जाने के थोड़ी देर तक तो परशुराम शांत रहे। बाद में परशुराम को अपने अपमान का आभास हुआ तो उन्होंने अपने फरसे से गणेश पर वार किया। फरसा शिव का दिया हुआ था सो गणेश उसके वार को विफल जाने नहीं देना चाहते थे, ये सोचकर उस वार को उन्होंने अपने एक दांत पर झेल लिया। फरसा लगते ही दांत टूटकर गिर गया। इस बीच कोलाहल सुन कर शिव भी शयन से बाहर आ गए और उन्होंने दोनों को शांत करवाया। तब से गणेश को एक ही दांत रह गया और वे एकदंत कहलाने लगे।
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                                                                                                                                                                                           Source:https://bit.ly/2TN4Bu3

Tuesday, March 12, 2019

गणेश जी के जन्म की कथा । | Ganesh Janam Katha |


शास्त्रों के अनुसार भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्री गणेश का धरती पर अवतरण हुआ था। श्री गणेश का जन्म माता पार्वती के उदर से नहीं हुआ था बल्कि माता पार्वती ने अपनी शक्ति से उनका निर्माण किया था। इससे सम्बंधित एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है –

कथा के अनुसार एक बार शिवजी के गण नंदी ने माता पार्वती की आज्ञा पालन में गलती कर दी। जिससे रुष्ट होकर माता पार्वती ने स्वयं एक बालक के निर्माण का निश्चय किया। माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल और उबटन से एक पिंड का निर्माण किया और अपनी शक्ति से उसमे प्राण डाल दिए। माता पार्वती ने उससे कहा की तुम मेरे पुत्र हो, तुम्हारा नाम गणेश है। तुम्हें सिर्फ मेरी ही आज्ञा का पालन करना है और किसी की भी नहीं। अब मैं स्नान करने अंदर जा रही हूँ। ध्यान रहे जब तक मैं स्नान करके वापस नहीं आऊं कोई भवन के अंदर नहीं आ पाए।

पुत्र गणेश को ऐसी आज्ञा देकर माता पार्वती स्नान करने भवन के अंदर चली गई और पुत्र गणेश वही भवन की पहरेदारी के लिए रह गए। कुछ समय पश्चात वहां भगवान शंकर आए और पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोका और कहा आप अंदर नहीं जा सकते। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हुए। पहले तो उन्होंने बालक को समझाया पर जब बालक गणेश नहीं माने तो उन्होंने नंदी और अपने गणों को बालक को वहाँ से हटाने को कहा। पर बालक गणेश ने सबको परास्त कर दिया। इससे क्रोधित हो भगवान शिव ने हठी बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और भवन के भीतर चले गए।
भगवान शिव को क्रोधित देखकर माता पार्वती ने उनसे इसका कारण पूछा। तब भगवान शिव ने उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया।यह सुन देवी पार्वती क्रोधित हो विलाप करने लगीं। उनकी क्रोधाग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी (गज) के बच्चे का सिर काट कर बालक के धड़ से जोड़ दिया।
कहते तो यह भी हैं कि भगवान शंकर के कहने पर विष्णु जी एक हाथी (गज) का सिर काट कर लाए थे और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रख कर उसे जीवित किया था। भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
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                                                                                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2J7fx0E

Tuesday, March 5, 2019

खीर बन गई हीरे !!



एक बार गणेश जी एक बालक का रूप धर कर पृथ्वी लोक आते है और भक्तों की परीक्षा लेने की सोचते है। एक चुटकी चावल और एक चम्मच में दूध लेकर लोगों के पास जाते है और उनसे दूध एवं चावल की खीर बनाने के लिए कहते है। एक चुटकी चावल और थोडे से दूध की खीर बनाने की बात सुनकर लोग उन पर हंसने लगे। बहुत भटकने के बाद भी किसी ने खीर नहीं बनाई। आखिर एक गांव में एक बुढ़िया को उन पर दया आ गई और वह बोली— ला बेटा मैं बना देती हूं खीर। ऐसा कह कर वह एक छोटी कटोरी ले आई। यह देख बालक बोला अरे मां! इस कटोरी से क्या होगा कोई बड़ा बर्तन लेकर आओ। बच्चे का मन रखने के लिए बुढिया बड़ा बर्तन ले आती है। अब बालक उसमें चावल और दूध उडैलता है। देखते ही देखते वह बर्तन भर जाता है उसके बाद भी चुटकी भर चावल और चम्मच भर दूध खत्म नहीं होता। बुढिया एक—एक कर घर के सारे बर्तन ले आती है। सब भर जाते है लेकिन, चुटकी भर चावल और चम्मच भर दूध खत्म नहीं होता। तब बालक बुढिया से कहता है कि वह खीर बनाने के लिए सामग्री को चूल्हे पर चढ़ा दे तथा गांव में जाए और सबको खाना खाने का निमंत्रण देकर आए। जब खीर बन जाए तो उसे भी बुला लेना। बुढिया वैसा ही करती है। सारा गांव आता है और खीर खाकर चला जाता है लेकिन, उसके बाद भी खीर बच जाती है। बुढ़िया पूछती है कि वह इसका क्या करें? तब बालक ने कहा कि— इस खीर को घर के चारों कौनों में बर्तन सहित उलट कर ढक दे और सुबह तक ऐसे ही रहने दे। सुबह बुढिया बर्तन उठाकर देखती है तो हीरे जवाहरात नजर आते है। इस तरह जैसे भगवान गणेश ने बुढ़िया पर कृपा बनाई, वैसे ही वह सब भक्तों पर कृपा बनाए रखें। बोलो, गणेश जी महाराज की जय।

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Tuesday, February 5, 2019

भगवान् गणेश और कुबेर की कहानी |




एक बार की बात है, धन के देवता कुबेर को अपने ऊपर घमंड हो गया, की वो सबसे अमीर देवता हैं| अपने धन का वैभव दिखाने के लिए एक बार इन्होने एक शानदार भोज रखी, और सारे देवताओं को आमंत्रित किया|
भगवान् शिव को भी किया| किसी कारण वश शिवजी भोज में जा नहीं पाए| अरे भई…., जब कोई न्योता आता है, तो किसी न किसी को तो जाना ही पडता है, हाजरी देने के लिए|
तो शिव भगवान् ने हमारे प्यारे गणपति बप्पा को बोला बेटा तू चला जा, आज में थोडा कहीं और बिजी हूँ| तो चले गए बाल गणेश भोज अटेंड करने|
फिर क्या था, वहां जा कर गणेशजी ने भोजन करना शुरू किया, और देखते देखते सारा की सारा खाना खा गए|
गणेशजी की भूख ही न मिटे| उन्होंने वहां रखे हुए बर्तनों को भी खाना शुरू कर दिया| जब बर्तन भी नहीं बचे तो पूरे अलकापुरी शहर में जो कुछ भी मिला उसे ही खा गए|
अब कुछ बचा नहीं खाने को, तो कुबेर को ही खाने के लिए उसकी तरफ दोड़े| फिर क्या था, अपनी जान बचाने के लिए कुबेर ने हिमालय पर्वत पर भगवान शिव की शरण ली, और कहा मुझे गणेशजी से बचाओ|
भगवान् शिव ने एक कटोरे में थोड़े से उबले हुए चावल गणेशजी को दिए| तब जाकर उनकी भूख मिटी| बस गणेशजी ने ये सब कुबेर को सबक सीखने के लिए किया|
सिख :-
बच्चो इससे हमें क्या सीखने को मिला बताओ| कभी भी आपके पास चाहे कितना भी धन हो आप कितने भी अमीर हो कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए|
बल्कि हमारे पास अगर धन ज्यादा है तो उसे अच्छे कामों में खर्च करना चाहिए| नहीं तो गणपति बप्पा आ जाएँगे सबक सिखाने|
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Tuesday, January 29, 2019

गणेश जी के टूटे दांत की कहानी |


जब महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के लिए बैठे, तो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनके मुख से निकले हुए महाभारत की कहानी को लिखे। इस कार्य के लिए उन्होंने श्री गणेश जी को चुना। गणेश जी भी इस बात के लिए मान गए पर उनकी एक शर्त थी कि पूरा महाभारत लेखन को एक पल ले लिए भी बिना रुके पूरा करना होगा। गणेश जी बोले – अगर आप एक बार भी रुकेंगे तो मैं लिकना बंद कर दूंगा।

महर्षि वेदव्यास नें गणेश जी की इस शर्त को मान लिया। लेकिन वेदव्यास ने गणेश जी के सामने भी एक शर्त रखा और कहा – गणेश आप जो भी लिखोगे समझ कर ही लिखोगे। गणेश जी भी उनकी शर्त मान गए। दोनों महाभारत के महाकाव्य को लिखने के लिए बैठ गए। वेदव्यास जी महाकाव्य को अपने मुहँ से बोलने लगे और गणेश जी समझ-समझ कर जल्दी-जल्दी लिखने लगे। कुछ देर लिखने के बाद अचानक से गणेश जी का कलम टूट गया। कलम महर्षि के बोलने की तेजी को संभाल ना सका।
गणेश जी समझ गए की उन्हें थोडा से गर्व हो गया था और उन्होंने महर्षि के शक्ति और ज्ञान को ना समझा। उसके बाद उन्होंने धीरे से अपने एक दांत को तोड़ दिया और स्याही में डूबा कर दोबारा महाभारत की कथा लिखने लगे। जब भी वेदव्यास को थकान महसूस होता वे एक मुश्किल सा छंद बोलते , जिसको समझने और लिखने के लिए गणेश जी को ज्यादा समय लग जाता था और महर्षि को आराम करने का समय भी मिल जाता था।
महर्षि वेदव्यास जी और गणेश जी को महाभारत लिखने में 3 वर्ष लग गए। वैसे तो कहा जाता है महाभारत के कुछ छंद घूम हो गए हैं परन्तु आज भी इस कविता में 100000 छंद हैं।
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Tuesday, September 10, 2013

Shri Ganpati Festival Special - Part 2


  Name the most important granthas connected to Lord Ganesha




Ganeshapurana, Mudgalapurana and Ganesha Gita. The texts, which are said to have been written around the 13th or 14th century, explain the philosophy, rituals, mantras and puja paddhati of Lord Ganesha major beliefs.


- Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust



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