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Friday, March 8, 2019

शिर्डी के साईं बाबा का इतिहास व कहानी | Shirdi Sai Baba History Story in Hindi


शिर्डी के साईं बाबा का इतिहास व कहानी Shirdi Sai Baba History Story in Hindi

प्रारंभिक जीवन Early Life

साईं बाबा एक जन्म ब्राह्मण जोड़े के यहाँ पथरी गाँव में हुआ था, जो ब्रिटिश भारत के निजाम राज्य में था। जहां उसके माता-पिता ने उन्हें फकीर को सौंप दिया था। ये उनके आखिरी दिनों में बाबा द्वारा बताये गये शब्द थे। लेकिन जन्म की तारीख अभी भी दुनिया के लिए अज्ञात है। बाबा पहली बार 16 साल की उम्र में महाराष्ट्र में शिरडी गांव आये थे।

लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित हुये कि एक लड़का बहुत ही कम उम्र में एक नीम के पेड़ के नीचे आसन में बैठकर गहरा ध्यान कर रहा है, बिना भोजन और बिना पानी के। इसके बाद लोग इस युवा बाबा पर बहुत आस्था करने लगे। गांव प्रमुख की पत्नी बयाजाबाई ने बचपन में साई बाबा के कल्याण के बारे में पूछताछ की। धीरे-धीरे वे बाबा के लिये खाना लाने लगी।

साईं बाबा के चमत्कारी कहानी Sai Baba Stories in Hindi


साईं बाबा रोज़ मंदिर और मस्जिद में दिया जलाते थे, पर इसके लिये उन्हें बनियों से तेल मांगने की जरुरत होती थी पर एक दिन बनियों ने बाबा से कह दिया बाबा हमारे पास तेल नहीं है। तब बाबा वहां से चुपचाप चले गये और मंदिर जाकर उन्होंने दिये में तेल की जगह पानी डाला और दिया जल पड़ा और यह बात चरों तरफ फ़ैल गई। तब वहां के बनिये उनके सामने आये और उनसे मांफी मांगी तो बाबा ने उन्हें माफ़ कर दिया और उनसे कहा अब कभी झूठ मत बोलना ।

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                                                                                                                                                                                                           Source:https://bit.ly/2RTOSro

Wednesday, January 16, 2019

साई बाबा की ३ चमत्कारी कहानियाँ ।


  कहानी | १ |

साईं बाबा रोज़ मंदिर और मस्जिद में दिया जलाते थे, पर इसके लिये उन्हें बनियों से तेल मांगने की जरुरत होती थी पर एक दिन बनियों ने बाबा से कह दिया बाबा हमारे पास तेल नहीं है। तब बाबा वहां से चुपचाप चले गये और मंदिर जाकर उन्होंने दिये में तेल की जगह पानी डाला और दिया जल पड़ा और यह बात चरों तरफ फ़ैल गई। तब वहां के बनिये उनके सामने आये और उनसे मांफी मांगी तो बाबा ने उन्हें माफ़ कर दिया और उनसे कहा अब कभी झूठ मत बोलना ।

कहानी ।२।
एकबार बाबा का भक्त बहुत दूर से अपनी पत्नी को लेकर बाबा के दर्शन के लिये आया और जब वह जाने लगा तो जोरों से बारिश होने लगी तब उनका भक्त परेशान होने लगा तब बाबा ने उनकी परेशानी को देखकर कहा – हे अल्लाह बारिश को रोक दो मेरे बच्चों को घर जाना है और तत्काल ही बारिश रुक गई।

कहानी ।३।
एकबार गाँव के एक व्यक्ति की एक बेटी अचानक खेलते हुये वहां के कुएं में गिर गई लोगों को लगा वह डूब रही है सब वहां दौड़कर गये और देखा की वह लटकी है कोई अदृश्य है जो उसे पकडे हुये है। वह और कोई नहीं बाबा ही थे क्योंकि वह बच्ची कहती थी कि मै बाबा की बहन हूँ। अब लोगों को कोई ओर स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं थी।   

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                                                                                                                                                         Source: https://bit.ly/2RTOSro



Thursday, September 13, 2018

साईं बाबा से जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियां !



साईं बाबा के चमत्कारिक कहानियों के पीछे जीवन से जुड़ी कोई न कोई शिक्षा या मर्म छिपा है। साईं बाबा सशरीर भले ही अब नहीं हैं लेकिन सच्चे भक्तों को हमेशा यह एहसास होता है कि साईं बाबा उनके साथ हैं। उनकी जन्म तिथि के विषय में यह मान्यता है कि एक बार अपने एक भक्त के पूछे जाने पर उन्होंने अपनी जन्म तिथि 28 सितंबर 1836 बताई थी। इसलिए हर 28 सितम्बर को उनका जन्मदिन मनाया जाता है। इस मौके पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियों पर एक नजर।

भोजन में सभी प्राणियों का हिस्सा

शिरडी के लोग शुरू में साईं बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। साईं बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे।

वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इकट्ठा किया करते थे। सभी सामग्रियों को वे द्वारिका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियाँ, चिड़िया निःसंकोच आकर उस खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साईं बाबा भक्तों के साथ मिल बाँट कर खाते थे।

कुत्ते काअनादर  नहीं साईं का

एक बार साईं के एक भक्त ने साईं बाबा को भोजन के लिए घर पर बुलाया। निश्चित समय से पूर्व ही साईं बाबा कुत्ते का रूप धारण करके भक्त के घर पहुंच गये। साईं के भक्त ने अनजाने में चूल्हे में जलती हुई लकड़ी से कुत्ते को मारकर भगा दिया।

जब साईं बाबा नहीं आए तो उनका भक्त घर पर जा पहुंचा। साईं बाबा मुस्कुराये और कहा, "मैं तो तुम्हारे घर भोजन के लिए आया था लेकिन तुमने जलती हुई लकड़ी से मारकर मुझे भगा दिया।" साईं का भक्त अपनी भूल पर पछताने लगा और माफी मांगी। साईं बाबा ने स्नेह पूर्वक उसकी भूल को क्षमा कर दिया।

उदी की महिमा से संतान सुख

लक्ष्मी नामक एक स्त्री संतान सुख के लिए तरप रही थी। एक दिन साईं बाबा के पास अपनी विनती लेकर पहुंच गयी। साईं ने उसे उदी यानी भभूत दिया और कहा आधा तुम खा लेना और आधा अपने पति को दे देना।

लक्ष्मी ने ऐसा ही किया। निश्चित समय पर लक्ष्मी गर्भवती हुई। साईं के इस चमत्कार से वह साईं की भक्त बन गयी और जहां भी जाती साईं बाबा के गुणगाती। साईं के किसी विरोधी ने लक्ष्मी के गर्भ को नष्ट करने के लिए धोखे से गर्भ नष्ट करने की दवाई दे दी। इससे लक्ष्मी को पेट में दर्द एवं रक्तस्राव होने लगा। लक्ष्मी साईं के पास पहुंचकर साईं से विनती करने लगी।

साईं बाबा ने लक्ष्मी को उदी खाने के लिए दिया। उदी खाते ही लक्ष्मी का रक्तस्राव रूक गया और लक्ष्मी को सही समय पर संतान सुख प्राप्त हुआ।

Source - https://bit.ly/2MuaxzF

Thursday, March 8, 2018

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 1

अध्याय 1 - गेहूँ पीसने वाला एक अद्भभुत सन्त वन्दना-गेहूँ पीसने की कथा तथा उसका तात्पर्य ।


पुरातन पद्घति के अनुसार श्री हेमाडपंत श्री साई सच्चरित्र का आरम्भ वन्दना करते हैं ।

गेहूँ पीसने की कथा :- सन् 1910 में मैं एक दिन प्रातःकाल श्री साई बाबा के दर्शनार्थ मसजिद में गया । वहाँ का विचित्र दृश्य देख मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि साई बाबा मुँह हाथ धोने के पश्चात चक्की पीसने की तैयारी करने लगे । उन्होंने फर्श पर एक टाट का टुकड़ा बिछा, उस पर हाथ से पीसने वाली चक्की में गेहूँ डालकर उन्हें पीसना आरम्भ कर दिया ।

मैं सोचने लगा कि बाबा को चक्की पीसने से क्या लाभ है । उनके पास तो कोई है भी नही और अपना निर्वाह भी भिक्षावृत्ति दृारा ही करते है । इस घटना के समय वहाँ उपसि्थत अन्य व्यक्तियों की भी ऐसी ही धोरणा थी । परंतु उनसे पूछने का साहस किसे था । बाबा के चक्की पीसने का समाचार शीघ्र ही सारे गाँव में फैल गया और उनकी यह विचित्र लीला देखने के हेतु तत्काल ही नर-नारियों की भीड़ मसजिद की ओर दौड़ पडी़ ।

उनमें से चार निडर सि्त्रयां भीड़ को चीरता हुई ऊपर आई और बाबा को बलपूर्वक वहाँ से हटाकर हाथ से चक्की का खूँटा छीनकर तथा उनकी लीलाओं का गायन करते हुये उन्होंने गेहूँ पीसना प्रारम्भ कर दिया ।

पहिले तो बाबा क्रोधित हुए, परन्तु फिर उनका भक्ति भाल देखकर वे षान्त होकर मुस्कराने लगे । पीसते-पीसते उन सि्त्रयों के मन में ऐसा विचार आया कि बाबा के न तो घरदृार है और न इनके कोई बाल-बच्चे है तथा न कोई देखरेख करने वाला ही है । वे स्वयं भिक्षावृत्ति दृारा ही निर्वाह करते हैं, अतः उन्हें भोजनाआदि के लिये आटे की आवश्यकता ही क्या हैं । बाबा तो परम दयालु है । हो सकता है कि यह आटा वे हम सब लोगों में ही वितरण कर दें । इन्हीं विचारों में मगन रहकर गीत गाते-गाते ही उन्होंने सारा आटा पीस डाला । तब उन्होंने चक्की को हटाकर आटे को चार समान भागों में विभक्त कर लिया और अपना-अपना भाग लेकर वहाँ से जाने को उघत हुई । अभी तक शान्त मुद्रा में निमग्न बाब तत्क्षण ही क्रोधित हो उठे और उन्हें अपशब्द कहने लगे- सि्त्रयों क्या तुम पागल हो गई हो । तुम किसके बाप का माल हडपकर ले जा रही हो । क्या कोई कर्जदार का माल है, जो इतनी आसानी से उठाकर लिये जा रही हो । अच्छा, अब एक कार्य करो कि इस अटे को ले जाकर गाँव की मेंड़ (सीमा) पर बिखेर आओ ।

मैंने शिरडीवासियों से प्रश्न किया कि जो कुछ बाबा ने अभी किया है, उसका यथार्थ में क्या तात्पर्य है । उन्होने मुझे बतलाया कि गाँव में विषूचिका (हैजा) का जोरो से प्रकोप है और उसके निवारणार्थ ही बाबा का यह उपचार है । अभी जो कुछ आपने पीसते देखा था, वह गेहूँ नहीं, वरन विषूचिका (हैजा) थी, जो पीसकर नष्ट-भ्रष्ट कर दी गई है । इस घटना के पश्चात सचमुच विषूचिका की संक्रामतकता शांत हो गई और ग्रामवासी सुखी हो गये ।

यह जानकर मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । मेरा कौतूहल जागृत हो गया । मै स्वयं से प्रश्न करने लगा कि आटे और विषूचिका (हैजा) रोग का भौतिक तथा पारस्परिक क्या सम्बंध है । इसका सूत्र कैसे ज्ञात हो । घटना बुदिगम्य सी प्रतीत नहीं होती । अपने हृतय की सन्तुष्टि के हेतु इस मधुर लीला का मुझे चार शब्दों में महत्व अवश्य प्रकट करना चाहिये । लीला पर चिन्तन करते हुये मेरा हृदय प्रफुलित हो उठा और इस प्रकार बाब का जीवन-चरित्र लिखने के लिये मुझे प्रेरणा मिली । यह तो सब लोगों को विदित ही है कि यह कार्य बाबा की कृपा और शुभ आशीर्वाद से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया ।

आटा पीसने का तात्पर्य

शिरडीवासियों ने इस आटा पीसने की घटना का जो अर्थ लगाया, वह तो प्रायः ठीक ही है, परन्तु उसके अतिरिक्त मेरे विचार से कोई अन्य भी अर्थ है । बाब शिरड़ी में 60 वर्षों तक रहे और इस दीर्घ काल में उन्होंने आटा पीसने का कार्य प्रायः प्रतिदिन ही किया । पीसने का अभिप्राय गेहूँ से नहीं, वरन् अपने भक्तों के पापो, दुर्भागयों, मानसिक तथा शाशीरिक तापों से था । उनकी चक्की के दो पाटों में ऊपर का पाट भक्ति तथा नीचे का कर्म था । चक्की का मुठिया जिससे कि वे पीसते थे, वह था ज्ञान । बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक मनुष्य के हृदय से प्रवृत्तियाँ, आसक्ति, घृणा तथा अहंकार नष्ट नहीं हो जाते, जिनका नष्ट होना अत्यन्त दुष्कर है, तब तक ज्ञान तथा आत्मानुभूति संभव नहीं हैं ।

यह घटना कबीरदास जी की उसके तदनरुप घटना की स्मृति दिलाती है । कबीरदास जी एक स्त्री को अनाज पीसते देखकर अपने गुरू निपतिनिरंजन से कहने लगे कि मैं इसलिये रुदन कर रहा हूँ कि जिस प्रकार अनाज चक्की में पीसा जाता है, उसी प्रकार मैं भी भवसागर रुपी चक्की में पीसे जाने की यातना का अनुभव कर रहा हूँ । उनके गुरु ने उत्तर दिया कि घबड़ाओ नही, चक्की के केन्द्र में जो ज्ञान रुपी दंड है, उसी को दृढ़ता से पकड़ लो, जिस प्रकार तुम मुझे करते देख रहे हो ष उससे दूर मत जाओ, बस, केन्द्र की ओप ही अग्रसर होते जाओ और तब यह निशि्चत है कि तुम इस भवसागर रुपी चक्की से अवश्य ही बच जाओगे ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Wednesday, July 12, 2017

साईं बाबा की मूर्ति का राज?

शिरडी के संत साईं बाबा को गुरू का दर्जा का प्राप्त है इसलिए साईं मंदिर में गुरूवार को बड़ी संख्या में श्रद्घालु बाबा के दर्शनों के लिए आते हैं। अगर आप कभी साईं मंदिर में गए हैं या उनकी मूर्तियों को देखा तो जरा ध्यान करके सोचिए हर मूर्ति में साईं बाबा एक बुजुर्ग की तरह नजर आते हैं जो एक ऊंचे आसन पर पैर पर पैर चढ़ाकर बैठे होते हैं।


साईं बाबा की ऐसी मूर्तियों के पीछे कारण यह है कि साईं बाबा प्रमुख स्थान शिरडी में साईं बाबा जो मूर्ति है उसी के अनुरूप सभी मूर्तियों का निर्माण हुआ है। लेकिन शिरडी में साईं बाबा की मूर्ति इस प्रकार कैसे बनी इसकी एक बेहद ही रोचक और रहस्यमयी कहानी है जो कम लोग ही जानते हैं।

साईं बाबा ने अपने जीवन का बड़ा भाग शिरडी में बिताया और यहीं पर साईं ने अपनी अंतिम सांस ली। इसलिए शिरडी को साईं का धाम माना जाता है। साईं बाबा के बारे में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं जिसके अनुसार अपने जीवनकाल में साईं ने बड़े ही अद्भुत चमत्कार दिखाए थे।

साईं भक्त मानते हैं कि शरीर त्याग करने के बाद भी साईं उनके बीच हैं और संकट के समय भक्तों की पुकार पर किसी चमत्कार की तरह उन्हें संकट से उबाड़ लेते हैं। साईं की मूर्ति के बारे में भी माना जाता है कि इसका निर्माण भी एक चमत्कार की तरह ही हुआ था।


ऐसी कथा है कि साईं बाबा की महासामधि के बुट्टी वाडा में उनकी तस्वीर रखकर उनकी पूजा होती थी। 1954 तक इसी तरह साईं बाब की पूजा होती थी। लेकिन एक दिन अचानक ही इटली से मुंबई बंदरगाह पर आए। लेकिन इस मार्बल को किसने और क्यों मुंबई भेजा यह किसी को पता नहीं।

शिरडी संस्थान ने मार्बल को साईं की मूर्ति बनाने के लिए ले लिए। इसके बाद मूर्ति बनाने का काम वसंत तालीम नाम के मूर्तिकार को सौंपा गया। ऐसी मान्यता है कि मूर्तिकार ने साईं बाबा से प्रार्थना की आशीर्वाद दीजिए की आपकी मूर्ति मैं आपकी छवि जैसी बना सकूं। कहते हैं साईं बाबा ने मूर्तिकार को दर्शन देकर अपनी छवि दिखाई और उसी छवि को देखकर मूर्तिकार ने साईं की मूर्ति का निर्माण किया जो शिरडी के समाधि मंदिर में विराजमान है। और साईं की यह छवि पूरी दुनिया में साईं भक्तों की आस्था का प्रीतक है।


साईं बाबा की जो मूर्ति आप शिरडी में देखते हैं उस मूर्ति को विजया दशमी के दिन मंदिर में स्थापित किया गया था। यह मूर्ति का आकार 4 फुट 5 इंच है। इस मंदिर में साईं बाबा का ख्याल एक बुजुर्ग साधु की तरह रखा जाता है।

हर दिन साईं बाबा को सुबह स्नान करवाया जाता है और दिन में चार बार उनके वस्त्र बदले जाते हैं। इन्हें नाश्ता और खाना भी खिलाया जाता है। रात के समय मच्छरदानी लगाया जाता है ताकि बाबा का मच्छर न काटे। पानी का गिलास भी साईं बाबा के पास रखा जाता है।

Wednesday, May 10, 2017

|| साईं बाबा की मूर्ति का राज ||

|| साईं बाबा की मूर्ति का राज  ||


शिरडी के संत साईं बाबा को गुरू का दर्जा का प्राप्त है इसलिए साईं मंदिर में गुरूवार को बड़ी संख्या में श्रद्घालु बाबा के दर्शनों के लिए आते हैं। अगर आप कभी साईं मंदिर में गए हैं या उनकी मूर्तियों को देखा तो जरा ध्यान करके सोचिए हर मूर्ति में साईं बाबा एक बुजुर्ग की तरह नजर आते हैं जो एक ऊंचे आसन पर पैर पर पैर चढ़ाकर बैठे होते हैं।

साईं बाबा की ऐसी मूर्तियों के पीछे कारण यह है कि साईं बाबा प्रमुख स्थान शिरडी में साईं बाबा जो मूर्ति है उसी के अनुरूप सभी मूर्तियों का निर्माण हुआ है। लेकिन शिरडी में साईं बाबा की मूर्ति इस प्रकार कैसे बनी इसकी एक बेहद ही रोचक और रहस्यमयी कहानी है जो कम लोग ही जानते हैं।

साईं बाबा ने अपने जीवन का बड़ा भाग शिरडी में बिताया और यहीं पर साईं ने अपनी अंतिम सांस ली। इसलिए शिरडी को साईं का धाम माना जाता है। साईं बाबा के बारे में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं जिसके अनुसार अपने जीवनकाल में साईं ने बड़े ही अद्भुत चमत्कार दिखाए थे।

साईं भक्त मानते हैं कि शरीर त्याग करने के बाद भी साईं उनके बीच हैं और संकट के समय भक्तों की पुकार पर किसी चमत्कार की तरह उन्हें संकट से उबाड़ लेते हैं। साईं की मूर्ति के बारे में भी माना जाता है कि इसका निर्माण भी एक चमत्कार की तरह ही हुआ था।

ऐसी कथा है कि साईं बाबा की महासामधि के बुट्टी वाडा में उनकी तस्वीर रखकर उनकी पूजा होती थी। 1954 तक इसी तरह साईं बाब की पूजा होती थी। लेकिन एक दिन अचानक ही इटली से मुंबई बंदरगाह पर आए। लेकिन इस मार्बल को किसने और क्यों मुंबई भेजा यह किसी को पता नहीं।

शिरडी संस्थान ने मार्बल को साईं की मूर्ति बनाने के लिए ले लिए। इसके बाद मूर्ति बनाने का काम वसंत तालीम नाम के मूर्तिकार को सौंपा गया। ऐसी मान्यता है कि मूर्तिकार ने साईं बाबा से प्रार्थना की आशीर्वाद दीजिए की आपकी मूर्ति मैं आपकी छवि जैसी बना सकूं। कहते हैं साईं बाबा ने मूर्तिकार को दर्शन देकर अपनी छवि दिखाई और उसी छवि को देखकर मूर्तिकार ने साईं की मूर्ति का निर्माण किया जो शिरडी के समाधि मंदिर में विराजमान है। और साईं की यह छवि पूरी दुनिया में साईं भक्तों की आस्था का प्रीतक है।

साईं बाबा की जो मूर्ति आप शिरडी में देखते हैं उस मूर्ति को विजया दशमी के दिन मंदिर में स्थापित किया गया था। यह मूर्ति का आकार 4 फुट 5 इंच है। इस मंदिर में साईं बाबा का ख्याल एक बुजुर्ग साधु की तरह रखा जाता है।

हर दिन साईं बाबा को सुबह स्नान करवाया जाता है और दिन में चार बार उनके वस्त्र बदले जाते हैं। इन्हें नाश्ता और खाना भी खिलाया जाता है। रात के समय मच्छरदानी लगाया जाता है ताकि बाबा का मच्छर काटे। पानी का गिलास भी साईं बाबा के पास रखा जाता है।

Copyrights from  amar ujala

Wednesday, November 26, 2014

Shri Radhe Maa - Sai Baba Quiz

Sai Baba



What was Sai Baba's real name?

1. Satguru
2. Shri Satya Sai
3. It was unknown
4. Baba only

How to enter contest 

1. Like Param Shradhey Shri Radhe Maa page on facebook 


2. Guess the right answer and submit on - Link 

3. Comment and tag your friends in comment, more you tag more chances of winning!

- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust

Note

To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.

One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

(Photo Courtesy - google.com)

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Monday, October 13, 2014

Shri Radhe Guru Maa - Quiz No. 26




Shraddha and ________ are the two cornerstones of the teachings of Sai Baba of Shirdi.

How to enter - 

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Win exciting Gift Hampers !! 



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Note -

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Sunday, November 17, 2013

Sai Baba Vachan Amrit - Part 11 - Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust



Sai Baba

I have become all this. Ant, fly, prince, and pauper, it is all my form in all these forms.

When all the veils between God and man are erased, the soul faces God and the mystics say it is like staring in a mirror because all souls are actually one substance, one light and that light is God Himself.

Says Kabir, Jaise til mein tel hai/ Jyon chakmak mein aag/ Tera Sai tujh mein hai/ Jaag sake toh jaag (Just as the seed holds oil in its heart/ Just as the flint stone carries fire/ Your Sai is in you/ Awaken to this truth if you can.  


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