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Friday, September 6, 2019

क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?

क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?


भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।

सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया। दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था।

सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है।





Friday, March 29, 2019

आइये जाने मां दुर्गा की उत्‍पत्ति की कहानी | Maa-durga-kahani-in-Hindi


हिंदू धर्म में मां दुर्गा की आराधना के लिए विशेष रूप से नवरात्रि का त्‍यौहार मनाया जाता है। इस त्‍यौहार को साल में दो बार मनाया जाता है। मां दुर्गा को कई नामों जैसे- काली, पार्वती, गौरी, सती, महामाया और महिषासुर मर्दिनी के नाम से जाना जाता है। मां दुर्गा के रूप पार्वती को भगवान शिव की अर्धांगनी माना जाता है। मां दुर्गा की उत्‍पत्ति की गाथा कुछ इस प्रकार है: नवरात्री में आरती की थाली ऐसे सजाएं

एक बार की बात है, एक भैंसा दानव था, जिसे महिषासुर के नाम से जाना जाता था, जो बड़ा शक्तिशाली था। वह सभी देवताओं का वध करना चाहता था, ताकि वह संसार में सर्वोच्‍च हो सकें। इससे घबराकर सभी देवता, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रहम् के पास गए और अपनी बात कही। तब सभी ने सर्वसम्‍मत्ति से अपनी शक्तियों से मिलाकर देवी दुर्गा का सृजन किया।

देवी दुर्गा का सृजन सभी की शक्तियों को मिलाने से ही संभव था ताकि महिषासुर का वध किया जा सकें। मां देवी दुर्गा का स्‍वरूप, बेहद आकर्षक है, उनके मुख में सौम्‍यता और स्‍नेह झलकता है। उनके दस हाथ हैं, जिसमें हर एक में एक विशेष शस्‍त्र है। उन्‍हे हर भगवान और देवता ने कुछ न कुछ अवश्‍य दिया था, भगवान शिव ने त्रिशुल, भगवान विष्‍णु ने चक्र, भगवान वायु ने तीर आदि। देखिये दुर्गा पूजा की बेहतरीन तस्‍वीरे मां के कपड़े और सवारी: मां दुर्गा की सवारी शेर है, जो हिमावंत पर्वत से लाया गया था। इस प्रकार देवी दुर्गा को महिषासुर का वध करने के लिए बनाया गया। बाद में देवी दुर्गा ने महिषासुर को मार डाला। इस स्‍वरूप को आप अक्‍सर तस्‍वीरों और मूर्तियों में देख सकते हैं। महिषासुर को देवी दुर्गा ने अपने शेर और शस्‍त्रों से मार डाला। इस प्रकार मां दुर्गा, आज भी बुरी बाधाओं का वध करने के लिए पूजी जाती हैं। साल में चैत्र माह की नवरात्रि मुख्‍य होती है।

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                                                                                                                                                                                        Source:https://bit.ly/2Wx4Kio

Wednesday, May 23, 2018

हिरण्याक्ष का वध करने के लिए विष्णु बने वराह अवतार.

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनत-सनकादि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ धाम पहुंचे। वैकुंठ में विष्णु धाम के द्वार पर भगवान के दो पार्षद जय-विजय द्वारपाल के रूप में बैठे थे। इन दिगम्बर साधुओं को देखकर पहले तो उन्हें हंसी आ गई, फिर पूछा- “आप लोग कौन है ? ऐसे नंग-धड़ंग यहां कहां चले आ रहे है ?


उनकी बात का सनत ने बुरा नहीं माना, क्योंकि ये द्वारपाल थे और बिना पूरी जांच-पड़ताल के कैसे अंदर जाने देते। अपनी वेश-भूषा पर उनके हंसने का भी बुरा नहीं माना, क्योंकि वैकुंठ जैसे वैभवशाली परिवेश में ऐसे साधुओं का क्या काम। उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-“हम सनत कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते है। हम सदा इसी रूप में रहते है, इसलिए हमे अंदर जाने दो। ”

मगर जय-विजय नामक द्वारपालों ने सनत-सनकादि को अंदर नहीं जाने दिया। इससे ऋषियों को क्रोध आ गया कि इन द्वारपालों को इतनी भी समझ नहीं की ऋषियों साधुओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्रोध में उन्होंने शाप देते हुए कहा-“तुम दोनों ने देवों के साथ रहकर भी दैत्यों जैसा व्यवहार किया है, इसलिए अगले जन्म में तुम दोनों दैत्य कुल में जन्म लोगे।”

द्वार पर इस विवाद को सुनकर भगवान विष्णु स्वयं बाहर आ गए और सनत-सनकादि को आदर से अंदर जाने को कहा। उधर जय-विजय को दुखी देख भगवान विष्णु ने कारण पूछा तो उन्होंने अपने शाप की बात बताई।

भगवान विष्णु ने कहा-“उद्दंडता का फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। असुर कुल में तुम्हारा अगला जन्म अवश्य होगा। इतनी चिंता मत करो। तुम मेरे पार्षद हो, इसलिए इसका पुण्य भी मिलेगा। मेरे द्वारा ही तुम्हें दैत्य-योनि से मुक्ति मिलेगी।”

सनत-सनकादि भगवान के दर्शन कर चले गए। जय-विजय की मृत्यु होने पर उनका जन्म कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से हुआ। दिति दैत्य कुलों की माता थी, अतः उसके गर्भ से जन्म लेने वाले जय-विजय का नाम इस जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुआ। उन दोनों में प्रबल आसुरी शक्ति थी। उन्होंने अपने उत्पात द्वारा आसुरी शक्ति के बल पर आसुरी राज्य स्थापित किया। उन्होंने देवलोक पर भी आक्रमण कर देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके राज्य के सारे यज्ञ उनके ही नाम पर होंगे। देवों को कोई यज्ञ भाग नहीं मिलेगा। किसी भी देवी-देवता या ईश्वर की पूजा आराधना के बजाय उनकी ही पूजा होगी। देवगण कभी यहां पहुंच ही न सके, इसलिए मैं पृथ्वी को ही पाताल में पहुंचा देता हूं।” यह निश्चय कर हिरण्याक्ष आसुरी शक्ति के बल पर पृथ्वी को रसातल में ले गया।

इससे सारे ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि का नियम भंग होने लगा। चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया। ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर विष्णु से प्रार्थना की- “भगवान ! देखिए इन दो महापराक्रमी असुरो ने क्या किया ? देवताओं का यज्ञ भाग छीना, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त किए और अब तो समस्त भूमण्डल को ही रसातल में ले गए। उठिए, कुछ करिए। ब्रह्मा की सृष्टि में बड़ा व्यवधान उपस्थित हो गया है। आप ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने का स्थान बनाएं। पृथ्वी जल में डुब रही है, उसके उद्धार के लिए वैकुण्ठ का वास छोड़कर कोई अवतार लीजिए। ”

भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को आश्वासन दिया- “जब पृथ्वी पर पाप का भार ज्यादा हो जाता है तो उसके उद्धार के लिए मुझे अवतार लेना ही पड़ता है। आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं कुछ करता हूं।”

देवताओं के चले जाने पर भगवान विष्णु ने नीचे देखा। पृथ्वी का कही पता नहीं, सर्वत्र जल-ही-जल दिख रहा था। फिर तो भगवान वाराह के रूप में प्रकट हुए और समुद्र में कूद पड़े, भयंकर गर्जना के साथ अपनी विशाल दाढ़ पर पृथ्वी को रखकर वे अथाह जल राशि को चीरते हुए ऊपर आ गए। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते देख तथा वाराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष बौखला गया कि किसने उसकी शक्ति को चुनौती दी है। वाराह को देखते ही वह उसे मारने दौड़ा। उसका हर अस्त्र-शस्त्र वराह के शरीर से टकराकर चूर-चूर हो जाता था। भगवान कुछ देर उसके प्रहार झेलते रहे और उसके क्रोध को भड़काते रहे। रूप भले ही वाराह का था, पर थे तो वे परब्रह्म अनन्त शक्ति भगवान विष्णु।

उन्होंने एक झटके से हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठा लिया और घुमाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटकर वह धड़ाम से पृथ्वी पर वाराह के पास ही गिर पड़ा। मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वह वाराह अब वाराह न होकर भगवान विष्णु है। उसे अपना पूर्व जन्म याद हो आया।

उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा- “भगवान ! पाप के शाप का आपने अंत कर दिया और अपने ही हाथों इस जन्म से मुक्ति दिलाई। मुझे तो मुक्ति मिली, पर मेरे भाई हिरण्यकशिपु का क्या होगा ? उसे भी तो मुक्ति दीजिये।

भगवान विष्णु हंसकर बोले- “समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकशिपु के पाप का अभी अंत नहीं है। तुम्हारे अंत के लिए पृथ्वी कारण बनी। उसके अंत के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वाराह बनना पड़ा। उसके लिए नृसिंह रूप में अवतार लेकर उसका उद्धार करना पड़ेगा।”

भगवान विष्णु के ये शब्द सुनकर हिरण्याक्ष ने बड़ी शान्ति से अपने प्राण त्याग दिए।

Wednesday, December 13, 2017

श्री साईं बाबा व्रत कथा और पूजन विधि


साईंबाबा के पूजन के लिए सभी दिनों में  गुरुवार का दिन सर्वोत्तम माना जाता हैं. साईं व्रत कोई भी कर सकतें हैं चाहे बच्चा हो या बुजुर्ग या महिला .ये व्रत कोई भी जाती-पति के भेद भावः बिना कोई भी व्यक्ति कर सकता है.शिर्डी साईं बाबा  वैसे भी हम सभी जानते हैं कि साईं बाबा जात-पात को नहीं मानते थे और उनका कहना था कि इश्वर  तो एक ही  है. सबका मालिक एक.

ये व्रत कोई भी गुरूवार को साईं बाबा का नाम ले कर शुरू किया जा सकता. सुबह या शाम को साईं बाबा के फोटो की पूजा करना किसी आसन पर पीला या लाल कपडा बिछा कर उस पर साईं बाबा का फोटो रख कर स्वच्छ पानी से पोछ कर चंदन या कुमकुम  का तिलक लगाना चाहिये और उन पर पीला फूल या हार चढाना चाहिये अगरबत्ती और दीपक जलाकर साईं व्रत की कथा पढ़ना चाहिये और साईं बाबा का स्मरण करना चाहिये और प्रसाद बाटना चाहिये प्रसाद में कोई भी फलाहार या मिठाई बाटी जा सकती है. अगर सं भव हो तो साईं बाबा के मंदिर में जाकर भक्तिभाव से बाबा के दर्शन करना चाहिए, और बाबा साईं के भजनों में भक्तिमय रहना चाहिए.

शिरडी के साई बाबा के व्रत की संख्या 9 हो जाने पर अंतिम व्रत के दिन पांच गरीब व्यक्तियों को भोजन और सामर्थ्य अनुसार दान देना चाहिए. इसके साथ ही साई बाबा की कृ्पा का प्रचार करने के लिये 7, 11, 21 साई पुस्तकें या साईं सत्चरित्र , अपने आस-पास के लोगों में बांटनी चाहिए. इस प्रकार इस व्रत को समाप्त किया जाता है. इसे उददापन के नाम से भी जाना जाता है.

source:-http://www.saibabashirditemple.in/hindi/hindi-fast-sai-baba.php

Friday, August 11, 2017

कालका मंदिर के स्थल पर प्रकट हुई थीं मां भगवती 'महाकाली'



अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात 'कालिका मंदिर' देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है। जहां नवरात्र में हजारों लोग माता का दर्शन करने पहुंचते हैं।

इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। माना जाता है कि हर काल में इसका स्वरूप बदला। मान्यता है कि इसी जगह आद्यशक्ति माता भगवती 'महाकाली' के रूप में प्रकट हुई और असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। मौजूदा मंदिर बाबा बालक नाथ ने स्थापित किया। उनके कहने पर मुगल सम्राज्य के कल्पित सरदार अकबर शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने इसी जगह शिवा (शक्ति) की अराधना की। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने काली की स्तुति की तो मां भगवती ने कहा कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

माना जाता है कि महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की। तब माता भगवती से उनका साक्षात्कार हुआ।

मंदिर की विशेषता

मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर के परिक्रमा में 36 मातृकाओं (हिन्दी वर्णमाला के अक्षर) के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। इसलिए दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला होता है।

नवरात्र मेले में घूमती है माता

आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों से पूजा होती है। नवरात्र में यहां मेला लगता है। रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मंदिर में अखंड दीप प्रज्जवलित है। पहली नवरात्र के दिन लोग मंदिर से माता की जोत अपने घर ले जाते हैं। नवरात्र में रात 2:30 बजे सुबह की व शाम की आरती सात बजे होती है। मान्यता है कि अष्टमी व नवमी को माता मेला में घूमती हैं। इसलिए अष्टमी के दिन सुबह की आरती के बाद कपाट खोल दिया जाता है। दो दिन आरती नहीं होती। दसवीं को आरती होती है।

Thursday, June 15, 2017

शिंगणापुर में शनिदेव का मंदिर बनने के पीछे यह है कहानी

महाराष्ट्र में शिरडी के पास स्थित एक छोटा सा गांव शिंगणापुर इन दिनों काफी चर्चा में है। यहां के प्रसिद्ध शनि मंदिर में महिलाओं के पूजा करने पर लगी पाबंदी को लेकर पिछले कई दिनों से विवाद हो रहा है। आखिर क्या है शिंगणापुर और शनिदेव से जुड़ी कहानी.



क्या है शनिदेव की कहानी :- 

कहते हैं एक बार शिंगणापुर गांव में काफी बाढ़ आ गई। पानी इतना बढ़ गया कि सबकुछ डूबने लगा। लोगों का कहना है कि उस भयंकर बाढ़ के दौरान कोई दैवीय शिला पानी में बह रही थी। जब पानी का स्तर कुछ कम हुआ तो एक इसांन ने पेड़ पर एक बड़ा सा पत्थर देखा। ऐसा अजीबोगरीब पत्थर उसने आज तक नहीं देखा था। उसने लालचवश पत्थर को नीचे उतारा। उसे तोड़ने के लिए जैसे ही उसमें कोई नुकीली चीज मारी उस पत्थर में से खून बहने लगा। यह देखकर वह भागा और गांव वापस लौटकर उसने सबको यह बात बताई।

सभी दोबारा उस जगह पर पहुंचे, जहां वह पत्थर रखा था। सभी उसे देखकर भौचक्के रह गए। लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिरकार इस चमत्कारी पत्थर का क्या करें। इसलिए अंतत: उन्होंने गांव वापस लौटकर अगले दिन फिर आने का फैसला किया। उसी रात गांव के एक शख्स के सपने में भगवान शनि आए और बोले 'मैं शनि देव हूं, जो पत्थर तुम्हें आज मिला उसे अपने गांव में लाओ और स्थापित करो'।

सुबह होते ही उस शख्स ने गांववालों को सारी बात बताई, जिसके बाद सभी उस पत्थर को उठाने के लिए वापस उसी जगह लौटे। उस रात फिर से शनि देव उस शख्स के स्वप्न में आए और उसे यह बता गए कि वह पत्थर कैसे उठाया जा सकता है। इसके बाद पत्थर को उठाकर एक बड़े से मैदान में सूर्य की रोशनी के तले स्थापित किया गया। यहां जाने वाले आस्थावान लोग केसरिया रंग के कपड़े पहन कर जाते हैं। 

कहते हैं मंदिर में कथित तौर पर कोई पुजारी नहीं है। भक्त प्रवेश करके शनि देव जी के दर्शन करके सीधा मंदिर से बाहर निकल जाते हैं। रोजाना शनिदेव की मूर्ति पर सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है। मंदिर में आने वाले भक्त अपनी इच्छानुसार यहां तेल का चढ़ावा भी देते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जो भी भक्त मंदिर के भीतर जाए वह केवल सामने ही देखता हुआ जाए। उसे पीछे से कोई भी आवाज लगाए तो मुड़कर देखना नहीं है। शनिदेव को माथा टेक कर सीधा-सीधा बाहर आ जाना है।

Wednesday, June 14, 2017

जानिए किस देवी को प्रिय है कौन सा फूल !!


संसार में धर्म की स्थापना एवं भक्तों के कल्याण के लिए मां ने कई रूप धारण किये हैं। महिषासुर का वध करने वाली माता ने कात्यायन ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस कारण से माता कात्ययनी कहलायी।

चण्ड मुण्ड का वध करने के लिए काजल के समान काला वर्ण लिये हुए प्रकट हुई और काली कहलायी। शुभ निशुम्भ का संहार करने के लिए मां कौशिकी हुई। जीवों को ज्ञान, बुद्घि एवं वाणी देने के लिए मां वागीश्वरी हुई। 

मां के जितने भी रूप हैं सभी के अपने-अपने गुण एवं कर्म हैं। मां के ज‌िस रूप की कृपा पाना चाहते हैं मां के उस रूप की पसंद के अनुसार फूल अर्प‌ित करके उनकी पूजा करें। इससे माता की अनुकंपा जल्दी मिलती है।

काली एवं कालरात्रि का प्रिय फूल :- 

माता काली एवं कालरात्रि को गुरहल का फूल बहुत पसंद है। इन्हें 108 लाल गुरहुल का फूल अर्पित करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।


दुर्गा मां का प्रिय फूल :- 

दुर्गा मां को भी लाल फूल पसंद है। इन्हें खुश करने के लिए लाल गुलाब या लाल गुरहुल के फूल की माला पहनाएं। आर्थिक परेशानियां दूर होगी।


सरस्वती मां का प्रिय फूल :- 

मां सरस्वती शांत एवं सौम्य मूर्ति हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए सफेद अथवा पीले रंग का फूल चढ़ाएं। सफेद गुलाब, सफेद कनेर, चम्पा एवं गेंदे के फूल से मां खुश होती हैं। इससे ज्ञान एवं बौद्घिक क्षमता बढ़ती है। माता ब्रह्मचारिणी को भी यह फूल पसंद है।



लक्ष्मी मां का प्रिय फूल :- 

माता लक्ष्मी सौभाग्य एवं सम्पदा की प्रतिमूर्ति हैं। इन्हें लाल फूल पसंद है। लक्ष्मी माता की कृपा पाने के लिए इन्हें कमल का फूल अथवा गुलाब का फूल अर्पित करें। भगवान विष्णु की अर्धांगिनी होने के कारण लक्ष्मी माता पीले रंग के फूल से भी खुश होती हैं। जल में उत्पन्न होने के कारण कमल कमल फूल माता को सबसे अधिक प्रिय है क्योंकि लक्ष्मी स्वयं जल (सागर) से प्रकट हुई हैं।


गौरी माता एवं शैलपुत्री का प्रिय फूल :- 

माता गौरी एवं शैलपुत्री को सफेद एवं लाल पुष्प पसंद है। सुहागन स्त्रियों को लाल फूल से मां की पूजा करनी चाहिए। इससे सुहाग की उम्र बढ़ती है। कुंवारी कन्याओं को भी लाल रंग के फूल से ही मां की पूजा करनी चाह‌िए।



copyrights :- http://www.amarujala.com




Wednesday, May 10, 2017

ज्ञान की चाँदनी फैलाती है बुद्ध पूर्णिमा !!

|| ज्ञान की चाँदनी फैलाती है बुद्ध पूर्णिमा ||


भिक्षाम् देहि' की पुकार सुनकर जैसे ही यशोधरा द्वार पर आईं , तो देखती हैं कि सामने बुद्ध खड़े हैं-कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ और वह भी हाथ में भिक्षा का पात्र लिए हुए।उस समय पत्नी यशोधरा पति सिद्धार्थ से बुद्ध बने इस भिक्षुक से एक बहुत ही प्रखर एवं शाश्वत महत्व का प्रश्न पूछती हैं।वे पूछती हैं- 'आर्य जो ज्ञान आपको वन में जाने से प्राप्त हुआ, क्या वही ज्ञान यहां प्राप्त नहीं हो सकता था ?'बुद्ध ने तत्काल उत्तर दिया, 'हो सकता था।' यशोधरा के लिए यह उत्तर चौंकाने के साथ ही अत्यतं व्यतिथ करने वाला भी था। ' तो फिर यहां से क्यों गए स्वामी ?' यह यशोधरा का अगला प्रश्न था।इसके उत्तर में बुद्ध ने जो कहा , वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।बुद्ध ने कहा , 'वह यहां भी प्राप्त हो सकता था , इस तथ्य का ज्ञान मुझे वहीं जाकर प्राप्त हो सका।' 

गौतम बुद्ध के जीवन का अत्यतं ही भावप्रवण यह प्रसंग हमारी चेतना और आचरण का हिस्सा होना चाहिए ।दुख ही अशांति का कारण है।यह जानने के लिए वे भटके थे कि इन दुखों से छुटकारा कैसे पाया जा सके।जैसे ही उन्होंने जाना , वे सिद्धार्थ से बुद्ध हो गए।
जिस प्रकार हर तार में संगीत निहित होता है,हर पत्थर में प्रतिमा मौजूद रहती है।जरूरत ऐसे हाथों की होती है जो छिपे इस स्वरूप साकार कर सके। 
बात सीधी सी है कि कर्म में ही शांति है और उसे उदात्त चेतना के साथ करना ही आध्यात्मिक जीवन जीने का उपक्रम है।यदि आपको काम में रस आ रहा है , आनंद मिल रहा है, तो निश्चित रूप से वहां शांति भी मिलेगी।
गौतम बुद्ध के संदेश "अप्प दीपो भव।" अर्थात ' हम सभी अपना दीपक स्वयं बनें ' को अपने जीवन में अमल करते हुए जीवन को सार्थक करें।
बुद्ध पूर्णिमा ज्ञान की चांदनी फैलाकर मानवता में शांति और समृद्धि का संचार कर रही है।जरूरत है हम खुले मन से बांहें फैला कर उसे अंगीकार करें।

Friday, January 13, 2017

मकर सक्रांति

🌺 मकर सक्रांति🌺
मकर संक्रांति पर इस साल दुर्लभ महायोग बन रहा है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश की प्रक्रिया को हिन्दू धर्मशास्त्र में संक्रान्ति कहा जाता है,  इसी तरह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रान्ति के रुप से पहचाना जाता है।

करीब 28 साल बाद बना दुर्लभ महायोग 12 राशियों धारको के लिए दस गुना फलदायक होगा। मकर संक्रान्ति यानी 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगें। पिता-पुत्र के मिलन का लाभ लगभग दो महीने  तक रहेगा ।

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मलमास समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही शुभ कार्यो की शुरुवात भी 14 जनवरी से ही हो जाएगी।हमेशा की तरह इसबार भी मकर संक्रान्ति 14 जनवरी को मनाई जाएगी।

क्या खास रहेगा इस बार मकर संक्रातिं पर !
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ज्योतिषार्चायों के अनुसार इस बार मकर संक्रान्ति के पूरे दिन पुण्य काल रहेगा। इस दिन तीर्थ स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन साल का पहला पुष्य नक्षत्र है मतलब खरीदारी के लिए बेहद शुभ दिन।

मकर संक्रान्ति से पहले 13 जनवरी को सुबह 7.14 से रात 11.14 बजे तक साल का पहला शुभ पुष्य नक्षत्र पड रहा है।इसी तरह 14 जनवरी दोपहर 1.55 से सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे।
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इस दिन का योग 28 साल के बाद बन रहा है। मकर प्रवेश के साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग व चंद्रमा कर्क राशि में और अश्लेषा नक्षत्र के अलावा प्रीति तथा मानस योग भी रहेगा।

इन नक्षत्रों का योग बेहद शुभ दुर्लभ और श्रेष्ठ है। इस योग से संक्रान्ति पर 12 राशियों के धारकों को दस गुना फलदायी हो सकता है।

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क्यों करते है मकर संक्राति पर दान !
वैसे तो हिन्दू धर्म के साथ साथ सभी धर्मो में हर रोज दान का विशेष महत्व होता है, लेकिन मकर संक्रान्ति पर दान का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि  मकर संक्रान्ति के दिन दान करने से पुण्य अन्य दिनों की तुलना में कई गुणा बढ जाता है।

दान किसे देना चाहिए इसका उल्लेख भी किया गया है। इस दिन गरीब को अन्नदान, जैसे तिल व गुड़ का दान देना चाहिए। इसमें तिल या तिल से लड्डू या  तिल से बने खाद्य पदार्थों को दान देना चाहिए है।

धर्म शास्त्रों में विश्वास करने वाले मानते है कि कोई भी धर्म कार्य तभी फलदायी  है जब पूर्ण आस्था व विश्वास के साथ  दिया जाता हो । दान क्षमतानुसार दिया जाना चाहिए।
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हरे कृष्ण