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Monday, April 1, 2019

शिव पुराण | Shiv Puran in Hindi |



'शिव पुराण' का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु 'शिव पुराण' में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

भगवान शिव सदैव लोकोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति को सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती । शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं। जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से 'जीवन' और 'मृत्यु' का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।

'रामचरितमानस' में तुलसीदास ने जिन्हें 'अशिव वेषधारी' और 'नाना वाहन नाना भेष' वाले गणों का अधिपति कहा है, वे शिव जन-सुलभ तथा आडम्बर विहीन वेष को ही धारण करने वाले हैं। वे 'नीलकंठ' कहलाते हैं। क्योंकि समुद्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए मरे जा रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। तभी से शिव नीलकंठ कहलाए। क्योंकि विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था।

ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही इस पुराण की रचना की गई है। यह पुराण पूर्णत: भक्ति ग्रन्थ है। पुराणों के मान्य पांच विषयों का 'शिव पुराण' में अभाव है। इस पुराण में कलियुग के पापकर्म से ग्रसित व्यक्ति को 'मुक्ति' के लिए शिव-भक्ति का मार्ग सुझाया गया है।
मनुष्य को निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म शिव को अर्पित कर देने चाहिए। वेदों और उपनिषदों में 'प्रणव - ॐ' के जप को मुक्ति का आधार बताया गया है। प्रणव के अतिरिक्त 'गायत्री मन्त्र' के जप को भी शान्ति और मोक्षकारक कहा गया है। परन्तु इस पुराण में आठ संहिताओं सका उल्लेख प्राप्त होता है, जो मोक्ष कारक हैं। ये संहिताएं हैं- विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता (पूर्व भाग) और वायु संहिता (उत्तर भाग)।
इस विभाजन के साथ ही सर्वप्रथम 'शिव पुराण' का माहात्म्य प्रकट किया गया है। इस प्रसंग में चंचुला नामक एक पतिता स्त्री की कथा है जो 'शिव पुराण' सुनकर स्वयं सद्गति को प्राप्त हो जाती है। यही नहीं, वह अपने कुमार्गगामी पति को भी मोक्ष दिला देती है। तदुपरान्त शिव पूजा की विधि बताई गई है। शिव कथा सुनने वालों को उपवास आदि न करने के लिए कहा गया है। क्योंकि भूखे पेट कथा में मन नहीं लगता। साथ ही गरिष्ठ भोजन, बासी भोजन, वायु विकार उत्पन्न करने वाली दालें, बैंगन, मूली, प्याज, लहसुन, गाजर तथा मांस-मदिरा का सेवन वर्जित बताया गया है।

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Source:https://bit.ly/2FNII5x

Monday, July 2, 2018

भगवान शिव की जटा में विराजमान हैं चंद्रमा.

अक्‍सर लोगों के मन में यह सवाल उठते होंगे कि देवों के देव महादेव भोले बाबा की जटा पर चंद्रमा क्‍यों विराजता है। आखिर इसके पीछे क्‍या कारण है कि हर तस्वीर में, हर मूर्ति में शंकर जी के सिर पर चंद्र जरूर दिखाई देता है। ऐसे में आइए आज जानें शिव जी और उनके माथे पर विराजे इस चंद्रमा के बारे में....



रोहिणी ज्‍यादा खूबसूरत:- 
हिंदू शास्‍त्रों के मुताबिक शिव जी और चंद्रमा का गहरा नाता है। इसकी कहानी दक्ष प्रजापति की कन्‍याओं से भी जुड़ी है। कहते हैं कि दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं का विवाह चंद्र के साथ हुआ था। जिसमें दक्ष की पुत्री रोहिणी ज्‍यादा खूबसूरत थी और उसे चंद्रमा का बेहद प्‍यार मिलता था। ऐसे में दक्ष की बाकी पुत्रियां अपने पिता से नाराज हो गईं।

च्रंद्र को श्राप दे दिया: -

इस पर स्वभाव से ही क्रोधी प्रवृत्ति के दक्ष पहले तो दुखी हुए लेकिन बाद में क्रोध में आकर च्रंद्र को श्राप दे दिया। दक्ष के श्राप के बाद चंद्र क्षय रोग से पीड़ित हो गए। वह इस रोग से बेहद परेशान हुए। उनकी सभी कलाएं भी खतम होने लगीं और मृत्युतुल्य कष्टों में घिर गए। इस पर एक दिन नारद जी ने चंद्र को सलाह दी कि वह भगवान आशुतोष की पूजा अर्चना करें।

आशुतोष जी की पूजा की:- 

वही उन्‍हें इस श्राप से मुक्‍त करा सकते हैं। इसके बाद चंद्र ने मृत्युंजय आशुतोष जी की पूजा शुरू कर दी और उन्‍हें इस रोग से छुटकारा मिल गया। इतना ही नहीं भगवान ने उन्‍हें नया जीवन प्रदान कर अपने मस्‍तक पर विशेष स्‍थान भी दिया। जिससे शिव भक्‍तों को शिव जी की पूजा के साथ उनक माथे पर विराजे अ‌र्द्ध चंद्र की पूजा करना जरूरी होता है।

source :- https://bit.ly/2MDfS8q

Monday, June 18, 2018

क्यों होती है सोमवार को भगवान शिव की पूजा?

सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। पुरातन काल से लोग इस दिन शिव की पूजा करते आ रहे है। कभी सोचा है आपने कि सोमवार के दिन ही भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते है इस दिन शिव की पूजा का क्या महत्व है।

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा करने की परंपरा शुरू से चली आ रही है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए तो कोई अपने भाग्य को बदलने के लिए पूजा करता है। हिंदू धर्म में अगल दिन का अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा करने का महत्व है।

सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। पुरातन काल से लोग इस दिन शिव की पूजा करते आ रहे है। कभी सोचा है आपने कि सोमवार के दिन ही भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते है इस दिन शिव की पूजा का क्या महत्व है।



सोमवार का व्रत :-

लोग सोमवार को जो व्रत रखते हैं उसे सोमेश्वर कहते हैं। सोमेश्वर का अर्थ आप दो तरह से समझ सकते हैं इसका पहला अर्थ चंद्रमा है और दूसरा वह देव, जिसे सोमदेव भी अपना देव मानते हैं। हिंदू धर्म में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस दिन पूजा और व्रत किया जाता है। भगवान शिव को लोग भोले नाथ,महेश,के नाम से भी जानते हैं। भोले नाथ की पूजा-अर्चना करने से आपके सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। मान्यता है श्रद्धालु अगर सोलह सोमवार पूरी श्रद्धा के साथ व्रत करें तो, भोले नाथ उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं।

मान्यता है कि सोमवार के दिन जो व्यक्ति भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करता है उसकी सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं। सोम का एक अर्थ सौम्य भी होता है, शिव जी को संसार में शांत देवता के रूप में भी मान्यता दी जाती है। इसलिए भी सोमवार के दिन को भगवान शिव का दिन माना जाता है।

पूजन की सामग्री और विधि :-

इस दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करने के बाद पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। भोलेनाथ की पूजा सामग्री में आप शुद्ध जल, गंगा जल, कच्चा दूध,चीनी, केसर, रोली, सफेद चंदन, धतूरा, फल, अक्षत, सफेद फूल, माला,धूप बत्ती, दीपक, अगरबत्ती आदि सामग्री श्रद्धालु पूजा कर सकते हैं। इस दिन शिव की पूजा के लिए बेलपत्र को बहुत शुभ माना जाता है।

Source :- https://bit.ly/2MAMh0g

Sunday, June 3, 2018

नंदी कैसे बने शिव की सवारी

नंदी बैल – भगवान शिव हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. ये इकलौते ऐसे भगवान हैं, जिन्हें देवता, दैत्य और इंसान पूजते हैं. भगवान शिव ने कभी भी अपने भक्तों में भेद नहीं किया. भले ही वो दानव ही क्यों न हों, इसीलिए भगवान शिव की भक्ति पूरे लोक में फ़ैल गई. भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता बन गए, जिन्हें हर कोई पूजता है. भगवान शिव की आराधना और पूजा तो हर कोई करता है. उनेक मंदिर में जाने से पहले आपने नंदी बैल को देखा होगा. नंदी बैल की पूजा करने के बाद ही लोग मंदिर में प्रवेश करते हैं. असल में बिना इनको चढ़ावा चढ़ाए आपकी भक्ति पूरी नहीं होती.


नंदी बैल को भगवान शिव का प्रिय माना गया है. भगवान शिव के प्रिय गणों में नंदी महत्व रखते हैं. नंदी को भगवान शिव ने अपनी सवारी के रूप में भू चुना. ये विशेष महत्व किसी और को नहीं प्राप्त है. किसी भी मंदिर में शिव से पहले इनकी आराधना की जाती है. इन्हें माला-फूल आदि चढ़ाया जाता है. वो इसलिए कि अगर आप भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके प्रिय को प्रसन्न कीजिए.

नंदी बह्ग्वान शिव के प्रिय कैसे बन गए, जबकि उनके गले में सांपों का घेरा रहता है. भला किसी एक के इतने करीब होने पर कोई और कैसे उनका प्रिय बन सकता है. इसके पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है. पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्मचारी व्रत का पालन करते हुए शिलाद ऋषि को यह भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका पूरा वंश समाप्त हो जाएगा, इसलिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेने का निर्णय किया. ये ऋषि एक ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिसपर भगवान शिव की अपार कृपा हो. ऐसे में ऋषि भगवान् शिव की आराधना करने लगें.

ऋषि कठोर तपस्या करते रहे, लेकिन उन्हें भगवान की कृपा प्राप्त नहीं हुई. वो फिर से तपस्या करना शुरू किये. उनकी तपस्या का उद्देश्य किसी आम बच्चे को पाना नहीं, बल्कि एक ऐसी संतान को अपनाना पाना था, जिसपर भगवान शिव का आशीर्वाद हो और वह असामान्य रूप से आध्यात्मिक हो. ऋषि ने अपनी तपस्या को और भी कठोर बना दिया. अंत में भगवान शिव को अपने भक्त के लिए आना पड़ा. शिव उस ऋषि से प्रसन्न हुए.

भगवान् को अपने समक्ष देखकर ऋषि की आँखें ही चुंधिया गई. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्वयं ईश्वर उनके सामने खड़े हैं. ऋषि ख़ुशी से भगवान् के चरणों में गिर पड़े. भगवान् शिव ने ऋषि से वरदान मांगने को कहा. ऋषि ने अपनी कामना भगवान् के समक्ष रख दी. भगवान् ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए. अगले ही दिन खेती करने के लिए वह खेत पर पहुंचे, जहां उन्हें एक खूबसूरत नवजात शिशु मिला. ऋषि बहुत खुश हुए, तभी भगवान् ने कहा कि यही तुम्हारी संतान है.

देखते देखते समय बीतता गया. नंदी बड़ा हो गया. एक दिन उस ऋषि के आश्रम पर दो सन्यासी आएं और उन्होंने कहा कि नंदी ज्यादा जीवित नहीं रहेगा. ये बात नंदी सुन लिए और जाकर भगवान् शिव की आराधना करने लगे. भगवान् प्रसन्न हुए, उन्होंने न केवल नंदी को वरदान दिया बल्कि बैल का मुख देकर उन्हें अपना वाहन बना लिया. इस तरह से नंदी बैल भगवान शिव के प्रिय वाहन बन गए. वो अजर और अमर हो गए. आज लोग भगवान् शिव के साथ ही उनकी भी पूजा करते हैं.

Copy rights ;- https://bit.ly/2JfhvrB 
Image Source :- https://bit.ly/2sD9pBX

Sunday, February 25, 2018

शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी?

शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी 


शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त  होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा।

भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए। शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो गया। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है।

नंदी के दर्शन और महत्व

नंदी के नेत्र सदैव अपने इष्ट को स्मरण रखने का प्रतीक हैं, क्योंकि नेत्रों से ही उनकी छवि मन में बसती है और यहीं से भक्ति की शुरुआत होती है। नंदी के नेत्र हमें ये बात सिखाते हैं कि अगर भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध, अहम व दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता।

नंदी के दर्शन करने के बाद उनके सींगों को स्पर्श कर माथे से लगाने का विधान है। माना जाता है इससे मनुष्य को सद्बुद्धि आती है, विवेक जाग्रत होता है। नंदी के सींग दो और बातों का प्रतीक हैं। वे जीवन में ज्ञान और विवेक को अपनाने का संंदेश देते हैं। नंदी के गले में एक सुनहरी घंटी होती है। जब इसकी आवाज आती है तो यह मन को मधुर लगती है। घंटी की मधुर धुन का मतलब है कि नंदी की तरह ही अगर मनुष्य भी अपने भगवान की धुन में रमा रहे तो जीवन-यात्रा बहुत आसान हो जाती है।

नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं।उनका हर क्षण शिव को ही समर्पित है और मनुष्य को यही शिक्षा देते हैं कि वह भी अपना हर क्षण परमात्मा को अर्पित करता चले तो उसका ध्यान भगवान रखेंगे।


Sunday, February 18, 2018

अमरनाथ मंदिर गुफा

अमरनाथ गुफा एक हिन्दू तीर्थ स्थान है जो भारत के जम्मू कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। हिन्दू धर्म में इस तीर्थ स्थान का काफी महत्त्व है और हिन्दुओ में अमरनाथ तीर्थ स्थान को सबसे पवित्र भी माना जाता है।


अमरनाथ मंदिर गुफा का इतिहास :- 

इस गुफा के चारो तरफ बर्फीली पहाड़ियाँ है। बल्कि यह गुफा भी ज्यादातर समय पूरी तरह से बर्फ से ढंकी हुई होती है और साल में एक बार इस गुफा को श्रद्धालुओ के लिये खोला भी जाता है। हजारो लोग रोज़ अमरनाथ बाबा के दर्शन के लिये आते है और गुफा के अंदर बनी बाबा बर्फानी को मूर्ति को देखने हर साल लोगो भारी मात्रा में आते है।

इतिहास में इस बात का भी जिक्र किया जाता है की, महान शासक आर्यराजा कश्मीर में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा करते थे। रजतरंगिनी किताब में भी इसे अमरनाथ या अमरेश्वर का नाम दिया गया है। कहा जाता है की 11 वी शताब्दी में रानी सुर्यमठी ने त्रिशूल, बनालिंग और दुसरे पवित चिन्हों को मंदिर में भेट स्वरुप दिये थे। अमरनाथ गुफा की यात्रा की शुरुवात प्रजाभट्ट द्वारा की गयी थी। इसके साथ-साथ इतिहास में इस गुफा को लेकर कयी दुसरे कथाए भी मौजूद है।

पवित्र गुफा की खोज :- 

कहा जाता है की मध्य कालीन समय के बाद, 15 वी शताब्दी में दोबारा धर्मगुरूओ द्वारा इसे खोजने से पहले लोग इस गुफा को भूलने लगे थे।

इस गुफा से संबंधित एक और कहानी भृगु मुनि की है। बहुत समय पहले, कहा जाता था की कश्मीर की घाटी जलमग्न है और कश्यप मुनि ने कुई नदियों का बहाव किया था। इसीलिए जब पानी सूखने लगा तब सबसे पहले भृगु मुनि ने ही सबसे पहले भगवान अमरनाथ जी के दर्शन किये थे। इसके बाद जब लोगो ने अमरनाथ लिंग के बारे में सुना तब यह लिंग भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग कहलाने लगा और अब हर साल लाखो श्रद्धालु भगवान अमरनाथ के दर्शन के लिये आते है।

लिंग :-

40 मीटर ऊँची अमरनाथ गुफा में पानी की बूंदों के जम जाने की वजह से पत्थर का एक आरोही निक्षेप बन जाता है। हिन्दू धर्म के लोग इस बर्फीले पत्थर को शिवलिंग मानते है। यह गुफा मई से अगस्त तक मोम की बनी हुई होती है क्योकि उस समय हिमालय का बर्फ पिघलकर इस गुफा पर आकर जमने लगता है और शिवलिंग समान प्रतिकृति हमें देखने को मिलती है। इन महीने के दरमियाँ ही शिवलिंग का आकर दिन ब दिन कम होते जाता है। कहा जाता है की सूर्य और चन्द्रमा के उगने और अस्त होने के समय के अनुसार इस लिंग का आकार भी कम-ज्यादा होता है। लेकिन इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नही है।

हिन्दू महात्माओ के अनुसार, यह वही गुफा है जहाँ भगवान शिव ने माता पार्वती को जीवन के महत्त्व के बारे में समझाया था। दूसरी मान्यताओ के अनुसार बर्फ से बना हुआ पत्थर पार्वती और शिवजी के पुत्र गणेशजी का का प्रतिनिधित्व करता है।

इस गुफा का मुख्य वार्षिक तीर्थस्थान बर्फ से बनने वाली शिवलिंग की जगह ही है।

अमरनाथ गुफा के लिए रास्ता :- 

भक्तगण श्रीनगर या पहलगाम से पैदल ही यात्रा करते है। इसके बाद की यात्रा करने के लिये तक़रीबन 5 दिन लगते है।

राज्य यातायात परिवहन निगम और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर रोज़ जम्मू से पहलगाम और बालताल तक की यात्रा सेवा प्रदान करते है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर से प्राइवेट टैक्सी भी हम कर सकते है।

उत्तरी रास्ता तक़रीबन 16 किलोमीटर लंबा है लेकिन इस रास्ते पर चढ़ाई करना बहुत ही मुश्किल है। यह रास्ता बालताल से शुरू होता है और डोमिअल, बरारी और संगम से होते हुए गुफा तक पहुचता है। उत्तरी रास्ते में हमें अमरनाथ घाटी और अमरावाथी नदी भी देखने को मिलती है जो अमरनाथ ग्लेशियर से जुडी हुई है।

कहा जाता है की भगवान शिव पहलगाम (बैल गाँव) में नंदी और बैल को छोड़ गए थे। चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटाओ से चन्द्र को छोड़ा था। और शेषनाग सरोवर के किनारे उन्होंने अपना साँप छोड़ा था। महागुनास (महागणेश पहाड़ी) पर्वत पर उन्होंने भगवान गणेश को छोड़ा था। पंजतारनी पर उन्होंने पाँच तत्व- धरती, पानी, हवा, आग और आकाश छोड़ा था। और इस प्रकार दुनिया की सभी चीजो का त्याग कर भगवान शिव ना वहाँ तांडव नृत्य किया था। और अंत में भगवान देवी पार्वती के साथ पवित्र गुफा अमरनाथ आये थे।

अमरनाथ गुफा यात्रा

हिन्दुओ के लिये यहाँ भगवान अमरनाथ बाबा का मंदिर प्रसिद्ध और पवित्र यात्रा का स्थान है। कहा जाता है की 2011 में तक़रीबन 635, 000 लोग यहाँ आये थे, और यह अपनेआप में ही एक रिकॉर्ड है। यही संख्या 2012 में 625,000 और 2013 में 3,50,000 थी। श्रद्धालु हर साल भगवान अमरनाथ के 45 दिन के उत्सव के बीच उन्हें देखने और दर्शन करने के लिये पहुचते है। ज्यादातर श्रद्धालु जुलाई और अगस्त के महीने में श्रावणी मेले के दरमियाँ ही आते है, इसी दरमियाँ हिन्दुओ का सबसे पवित्र श्रावण महिना भी आता है।

अमरनाथ की यात्रा जब शुरू होती है तब इसे भगवान श्री अमरनाथजी का प्रथम पूजन भी कहा जाता है।

पुराने समय में गुफा की तरफ जाने का रास्ता रावलपिंडी (पकिस्तान) से होकर गुजरता था लेकिन अब हम सीधे ट्रेन से जम्मू जा सकते है, जम्मू को भारत का विंटर कैपिटल (ठण्ड की राजधानी) भी कहा जाता है। इस यात्रा का सबसे अच्छा समय गुरु पूर्णिमा और श्रावण पूर्णिमा के समय में होता है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रद्धालुओ की सुख-सुविधाओ के लिये रास्ते भर में सभी सुविधाए उपलब्ध करवाई है। ताकि भक्तगण आसानी से अपनी अमरनाथ यात्रा पूरी कर सके। लेकिन कई बार यात्रियों की यात्रा में बारिश बाधा बनकर आ जाती है। जम्मू से लेकर पहलगाम (7500 फीट) तक की बस सेवा भी उपलब्ध है। पहलगाम में श्रद्धालु अपने सामन और कपड़ो के लिये कई बार कुली भी रखते है। वहाँ हर कोई यात्रा की तैयारिया करने में ही व्यस्त रहता है। इसीके साथ सूरज की चमचमाती सुनहरी किरणे जब पहलगाम नदी पर गिरती है, तब एक महमोहक दृश्य भी यात्रियों को दिखाई देता है। कश्मीर में पहलगाम मतलब ही धर्मगुरूओ की जमीन।

अमरनाथ यात्रा आयोजक –

अधिकारिक तौर पे, यात्रा का आयोजन राज्य सरकार श्री अमरनाथ यात्रा बोर्ड के साथ मिलकर करती है। सरकारी एजेंसी यात्रा के दौरान लगने वाली सभी सुख-सुविधाए श्रद्धालुओ को प्रदान करती है, जिनमे कपडे, खाना, टेंट, टेलीकम्यूनिकेशन जैसी सभी सुविधाए शामिल है।

अमरनाथ हिंदी के दो शब्द “अमर” मतलब “अनश्वर” और “नाथ” मतलब “भगवान” को जोड़ने से बनता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से अमरत्व के रहस्य को प्रकट करने के लिये कहा, जो वे उनसे लंबे समय से छुपा रहे थे। तब यह रहस्य बताने के लिये भगवान शिव, पार्वती को हिमालय की इस गुफा में ले गए, ताकि उनका यह रहस्य कोई भी ना सुन पाये और यही भगवान शिव ने देवी पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

सुरक्षा –

हर साल हजारो सेंट्रल और राज्य सरकार के पुलिस कर्मी श्रद्धालुओ की सुरक्षा में तैनात रहते है। जगह-जगह पर सेनाओ के कैंप भी लगे हुए होते है।

सुविधाए –

गुफा के रास्ते में बहुत सी समाजसेवी संस्थाए श्रद्दालुओ को खाना, आराम करने के लिये टेंट या पंडाल की व्यवस्था करते है। यात्रा के रास्ते में 100 से भी ज्यादा पंडाल लगाये जाते है, जिन्हें हम रात में रुकने के लिये किराये पर भी ले सकते है। निचले कैंप से पंजतारनी (गुफा से 6 किलोमीटर) तक की हेलिकॉप्टर सुविधा भी दी जाती है।

                http://bit.ly/2ETnZh3  

Sunday, February 4, 2018

10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...


ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

जीवन के संहारक भगवान शिव की मन से की गई आराधना भोले बाबा को खुश करने के लिए बहुत है. इनकी पूजा में शिवलिंग अभिषेक और उस पर अर्पित की जाने वाले चीजें अलग-अलग महत्व रखती हैं.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

1. जल मंत्रों का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाने से हमारा स्वभाव शांत और स्नेहमय होता है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

2. केसर शिवलिंग पर केसर अर्पित करने से हमें सौम्यता मिलती है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

3. चीनी (शक्कर) महादेव का शक्कर से अभिषेक करने से सुख और समृद्धि बढ़ती है. ऐसा करने से मनुष्य के जीवन से दरिद्रता चली जाती है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

4.इत्र शिवलिंग पर इत्र लगाने से विचार पवित्र और शुद्ध होते हैं. इससे हम जीवन में गलत कामों के रास्ते पर जाने से बचते हैं.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...
5. दूध शिव-शंकर को दूध अर्पित करने से स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहता है और बीमारियां दूर होती हैं.


6.दही पार्वतीपति को दही चढ़ाने से स्वभाव गंभीर होता है और जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होने लगती हैं.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

7.घी भगवान शंकर पर घी अर्पित करने से हमारी शक्ति बढ़ती है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

8. चंदन शिवजी को चंदन चढ़ाने से हमारा व्यक्तित्व आकर्षक होता है. इससे हमें समाज में मान-सम्मान और यश मिलता है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...

9. शहद भोलेनाथ को शहद चढ़ाने से हमारी वाणी में मिठास आती है.

ये 10 चीजें भगवान शिव को हैं बेहद प्रिय...


10. भांग औघड़-अविनाशी शिव को भांग चढ़ाने से हमारी कमियां और बुराइयां दूर होती हैं.



Thursday, January 18, 2018

अद्भुत पौराणिक कथा : शिव और सती का प्रेम

दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्ति-संपन्न हो एवं सर्वविजयिनी हो। अत: दक्ष एक ऐसी ही पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण तप कर रहे हो? दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम होगा सती।


मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी। जब सती विवाह योग्य हो गई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया।

ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु किसी वजह से दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया।

Sunday, January 7, 2018

भगवान शिव के पूजन में बेलपत्र का विशेष महत्व है ||

शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से प्रसन्न होते हैं महादेव. मान्यता है कि शिव की उपासना बिना बेलपत्र के पूरी नहीं होती.

अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है. आइए जानते हैं कि बेलपत्र क्यों है शिव को इतना प्रिय और क्या है बेलपत्र का महत्व...


बेलपत्र का महत्व
बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं. बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं. भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र प्रयोग होते हैं और इनके बिना शिव की उपासना सम्पूर्ण नहीं होती. पूजा के साथ ही बेलपत्र के औषधीय प्रयोग भी होते हैं. इसका प्रयोग करके तमाम बीमारियां दूर की जा सकती हैं.

बेलपत्र के प्रयोग की सावधानियां
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो जब भी आप महादेव को बेलपत्र अर्पित करें तो कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि गलत तरीके से अर्पित किए हुए बेलपत्र शिव को अप्रसन्न भी कर सकते हैं.

जानिए बेलपत्र से जुड़ी इन सावधानियों के बारे में...
- एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए.
- पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए.
- भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें.
- एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं.
- शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं.
- बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए.

शादी में देरी हो रही हो तो कैसे करें बेलपत्र का प्रयोग?
कई बार ना चाहते हुए भी शादी में देरी होने लगती है. कोई भी रिश्ता तय नहीं हो पाता. इसका कारण जो भी हो पर बेलपत्र के उपाय से इस समस्या का समाधान जरूर हो सकता है. तो आइए जानते हैं बेलपत्र के प्रयोग से कैसे मनचाहे समय पर होगा आपका विवाह...
- 108 बेलपत्र लें और हर बेलपत्र पर चन्दन से 'राम' लिखें.
- 'ॐ नमः शिवाय' कहते हुए बेलपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- सारे बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिव जी से शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें.

गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाएगा बेलपत्र
शिव जी का प्रिय बेलपत्र गंभीर बीमारियों से भी आपको छुटकारा दिला सकता है. अगर आप लंबे समय से किसी बीमारी से परेशान हैं और हर इलाज नाकाम हो रहा है तो अब आपकी ये बीमारी बेलपत्र के प्रयोग से खुद ब खुद दूर हो जाएगी...
- 108 बेलपत्र लें और एक पात्र में चन्दन का इत्र भी लें.
- अब एक-एक बेलपत्र चन्दन में डुबाते जाएं और शिवलिंग पर चढ़ाते जाएं.
- हर बेलपत्र के साथ 'ॐ हौं जूं सः' का जाप करते रहें.
- मंत्र जाप के बाद जल्दी स्वस्थ होने की प्रार्थना करें.

बेलपत्र के आयुर्वेदिक प्रयोग
बेलपत्र का केवल दैवीय प्रयोग नहीं है. यह तमाम औषधियों में भी काम आता है. इसके प्रयोग से आपकी सेहत से जुड़ी तमाम समस्याएं चुटकियों में हल होती हैं. आइए जानें क्या-क्या हैं बेलपत्र के औषधीय प्रयोग...
- बेलपत्र का रस आंख में डालने से आंखों की ज्योति बढ़ती है.
- बेलपत्र का काढ़ा शहद में मिलाकर पीने से खांसी से राहत मिलती है.
- सुबह 11 बेलपत्रों का रस पीने से पुराना सिरदर्द भी ठीक हो जाता है.

Source:- http://bit.ly/2Ff7Ork

Sunday, June 18, 2017

|| भोजेश्वर मंदिर : यहाँ है एक ही पत्थर से निर्मित विशव का सबसे बड़ा शिवलिंग ||

भोजपुर,मध्य प्रदेश कि राजधानी भोपाल से 32 किलो मीटर दूर स्तिथ है। भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, अधूरा शिव मंदिर हैं। यह भोजपुर शिव या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज द्वारा किया गया था। इस मंदिर  कि अपनी कई विशेषताएं हैं।

इस मंदिर कि पहली विशेषता इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विशव का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग हैं।  सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर, व्यास 2.3 मीटर, तथा केवल लिंग कि लम्बाई 3.85 मीटर है।
दूसरी विशेषता भोजेश्वर मंदिर के पीछे के भाग में बना ढलान है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने  के लिए किया गया था। पूरे विश्व में कहीं भी अवयवों को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक उपलब्ध नहीं है। ये एक प्रमाण के तौर पर है, जिससे ये रहस्य खुल गया कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों का मंदिर क शीर्ष तक पहुचाया गया।
भोजेश्वर मंदिर कि तीसरी विशेषता इसका अधूरा निर्माण हैं।  इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है पर ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए काम अधूरा रह गया।
चौथी विशेषता भोजेश्वर मंदिर कि गुम्बदाकार छत हैं।चुकी इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस  मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।
इस मंदिर की पांचवी विशेषता इसके 40 फीट ऊचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।
भोजेश्वर मंदिर कि एक अन्य विशेषता यह है कि  इसके अतिरिक्त भूविन्यास, सतम्भ, शिखर , कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं।
भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।
इस प्रसिद्घ स्थल में वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जो मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय होता है। इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां तीन दिवसीय भोजपुर महोत्सव का भी आयोजन किया जाने लगा है।
भोजपुर शिव मंदिर के बिलकुल सामने पश्चमी दिशा में एक गुफा हैं यह पारवती गुफा के नाम से जानी जाती हैं। इस गुफा में पुरातात्विक महत्तव कि अनेक मुर्तिया हैं।
भोजपुर में एक अधूरा जैन मंदिर भी है।  इस मंदिर में भगवन शांतिनाथ कि 6 मीटर ऊंची मूर्ति हैं। दो अन्य मुर्तिया भगवान पार्शवनाथ व सुपारासनाथ कि हैं। इस मंदिर  में लगे एक शिलालेख पर राजा भोज का नाम लिखा है। यह शिलालेख एक मात्र हैं जो कि राजा भोज से सम्बंधित हैं।


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Saturday, June 10, 2017

क्यों होती है शिवलिंग की पूजा?


पूरे भारत में बारह ज्योर्तिलिंग हैं जिसके विषय में मान्यता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं हुई। इनके अलावा देश के विभिन्न भागों में लोगों ने मंदिर बनाकर शिवलिंग को स्थापित किया है और उनकी पूजा करते हैं।

भारतीय सभ्यता के प्राचीन अभिलेखों एवं स्रोतों से भी ज्ञात होता है कि आदि काल से ही मनुष्य शिव के लिंग की पूजा करते आ रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सभी देवों में महादेव के लिंग की ही पूजा क्यों होती है। इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं हैं।

एक बार शिव को अपना होश नहीं रहा और वह निर्वस्त्र होकर भटकने लगे इससे ऋषियों ने उन्हें शाप दिया कि उनका लिंग कटकर गिर जाए। इसके बाद शिव का लिंग कटकर पाताल में चला गया। उससे निकलने वाली ज्योति से संसार में तबाही मचने लगी।

इइसके बाद सभी देवतागण देवी पार्वती के पास पहुंचे और उनसे इस समस्या का समाधान करने की प्रार्थना करने लगे। इसके बाद पार्वती ने शिवलिंग को धारण कर लिया और संसार को प्रलय से बचा लिया।

इसके बाद से शिवलिंग के नीचे पार्वती का भाग विराजमान रहने लगा। यह नियम बनाया गया कि शिवलिंग की आधी परिक्रमा होगी। इस प्रकार की कथा कई पुराणों में है।

शिव पुराण में शिवलिंग की पूजा के विषय में जो तथ्य मिलता है वह तथ्य इस कथा से अलग है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरूष और निराकार ब्रह्म हैं। इसी के प्रतीकात्मक रूप में शिव के लिंग की पूजा की जाती है।

भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई।

हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने लिंग और योनी मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति के पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति लिंग और योनी से हुई है। इसी से लिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।

सभ्यता के आरंभ में लोगों का जीवन पशुओं और प्रकृति पर निर्भर था इसलिए वह पशुओं के संरक्षक देवता के रूप में पशुपति की पूजा करते थे। सैंधव सभ्यता से प्राप्त एक सील पर तीन मुंह वाले एक पुरूष को दिखाया गया है जिसके आस-पास कई पशु हैं।

इसे भगवान शिव का पशुपति रूप माना जाता है। प्रथम देवता होने के कारण ही इन्हें ही सृष्टिकर्ता मान लिया गया और लिंग रूप में इनकी पूजा शुरू हो गयी।

Monday, June 5, 2017

भगवान शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है?

भगवान शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है? उनका वर्णन इस प्रकार किया जाता है कि वे एक ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आँखें, सिर पर चंद्रमा, गले में सांप है तथा शुद्ध गंगा उनके बालों में है, हाथों में त्रिशूल है तथा वे अपने प्रिय वाहन नंदी की सवारी करते हैं। भगवान शिव देवों के देव हैं जो केवल एक धारणा है। उनका कोई आकार या रूप नहीं है। वे ब्रह्मांड से परे, आकाश से ऊंचे तथा सागर से गहरे हैं। नीलकंठ शिव के पीछे यह कहानी है कि वे हमेशा ही मानव जाति के रक्षक तथा बुरी शक्तियों और असुरों के विध्वंसक रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें नीलकंठ (नीले गले वाला) कहा जाता है।


क्या आपने कभी भगवान शिव के नामों की गिनती की है? आप नहीं गिन सकते। आप यह जानकार आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है और उनके बारे में क्या विशिष्ट है। शिव के अनेक नाम हैं तथा हम उन्हें अनेक नामों से बुलाते हैं और प्रत्येक नाम के साथ कुछ रोचक और ज्ञानवर्धक बातें जुडी हुई हैं। उसी प्रकार उनका नाम नीलकंठ है जो एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है नीले गले वाला। इसके पीछे एक महान कहानी है। मेरे दोस्तों आज मैं आपको नीलकंठ शिव की कहानी सुनाऊंगा। यदि आप इसे पहली बार सुन रहे हैं तो यह मेरी खुशनसीबी है।

पुराणों के अनुसार (पौराणिक कथाओं के अनुसार) बहुत बहुत वर्ष पहले क्षीरसागर (दूध के समुद्र) के मंथन (समुद्र को मथने की क्रिया) के समय कई महत्वपूर्ण लाभदायक वस्तुएं जैसे कल्पवृक्ष, कामधेनु (इच्छा पूर्ण करने वाली गाय) आदि निकल कर आयी तथा इन्हें देवों और राक्षसों के बीच बांटा गया। इन सब में अमृत भी था जिसे देव चतुराई से स्वर्ग में लाने में सफल हो गए परन्तु जो बुरी वस्तु निकली वह थी विष। यह इतना अधिक शक्तिशाली था कि इसकी एक बूँद से संपूर्ण ब्रह्मांड का नाश हो सकता था। इसके कारण देवताओं और राक्षसों में खलबली मच गयी। इससे सभी डर गए तथा इसके हल की खोज ने उन्हें महादेव शिव तक पहुंचा दिया।


और जैसा हम जानते हैं कि नीलकंठ भगवान शिव बहुत दयालु और बड़े हृदय वाले हैं। उन्होंने इस विष के लिए एक उपाय निकाला। उन्होंने विष का पूरा घड़ा पी लिया। परंतु रुकिये!! उन्होंने इसे निगला नहीं। उन्होंने उसे गले में ही पकड़कर रखा जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया।

और यही कारण था कि उनका नाम नीलकंठ शिव पड़ा। नीलकंठ शिव की कहानियों से हमें हमेशा कुछ न कुछ सीखने मिलता है। इन सभी कहानियों पर हम भारतीय त्योहार मनाते हैं। ये त्योहार सकारात्मकता और आध्यात्मिकता का धन्यवाद करने के उद्देश्य से मनाये जाते हैं।


इस समुद्र मंथन घटना की याद में तथा मानव जाति को घातक विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव को धन्यवाद देने के लिए हम प्रतिवर्ष फाल्गुन महीने की कृष्ण चतुर्दशी (फरवरी/मार्च) को शिवरात्रि का त्योहार मनाते हैं।

जी हाँ! शिवरात्रि इसलिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। परन्तु पहले बताया हुआ कारण भी सत्य है। इसी प्रकार हम जो भी त्योहार मनाते हैं उनके पीछे अनेक कहानियाँ हैं जो हम विभिन्न देवी देवताओं के अनुसार मनाते हैं। मैं इस बार पर जोर देता हूँ कि यदि आपको शिव नीलकंठ की इस कहानी को किसी के साथ बांटने का अवसर मिले तो अवश्य बाँटें। इससे उन लोगों के मन में भी सुरक्षा की भावना जागृत होगी तथा भगवान शिव के प्रति उनका विश्वास बढेगा।

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Friday, April 1, 2016

Jai Ratneshwar Mahadev Karachiwaale



In Clifton, which is among the poshest neighborhoods of Karachi, a cosmopolitan city with a sizable Hindu population, stands the 105-century old Ratneshwar Mahadev Mandir that attracts as many as 50,000 Hindus during major festivals like Shivaratri. 

May Lord Ratneshwar Mahadev of Karachi, Pakistan, bless us with intelligence, compassion and strength. 

Har Har Mahadev! 


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Monday, March 28, 2016

A Lord Shiva temple in Muscat


Merchants from Gujarat have settled in Muscat for centuries where they traded in pearls. Over a century ago, some merchants decided to built a temple of Lord Shiva in 
Muscat with the support of the local ruler.

The Motishwar Mahadev Temple is home to Lord Shiva as the Lord of Pearl or Motishwar. 

May Lord Motishwara bless all his devotees with success, peace and compassion for all sentient beings. 

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Friday, March 18, 2016

Jai Mandapeshwar Mahadev ki!



Lord Shiva is worshiped as Mandapeshwar at the Mandapeshwar caves situated in Borivali (West), Mumbai.

Nataraja, Sadashiva, Ardhanarishvara, Ganesha, Brahma and Vishnu sculptures adorn the Mandapeshwar caves that are believed to have been carved around 1500 years ago.

May Lord Mandapeshwar Mahadev, the granter of auspciousness, bless us all with his merciful glance, which frees beings from all sorrow and grants them liberation.

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Wednesday, March 9, 2016

Ganga river in Sri Lanka




The Hindus of Sri Lanka consider the Mahaweli river in Trincomalee as a manifestation of Mata Ganga and address the river as Mahawali Ganga, and consider the body of water as holy to Lord Shiva.
The Mahawali Ganga is the longest flowing river in Sri Lanka. Just as Lord Shiva is believed to recieve the Ganga on his head on Mount Kailasa, Mahawali Ganga is believed to be the same river flowing at his feet. 

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Sunday, March 6, 2016

Mahashivaratri the night of the cosmic dance



Lord Shiva, is said to have performed the Tandava on Mahashivaratri, his favorite day in the entire year. Whoever worships Lord Shiva on this day has his blessings. 

Such is the Lord's compassion that even Yama the god of death does not carry Lord Shiva's devotees who observe the Lord's worship on this auspcious day. 

May the One with the Blue Throat,
 the Three-Eyed One bless us all. 

‎ॐ नमःशिवाय‬

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Friday, January 22, 2016

How the Shakti Peethas came into existence




Sati, the wife of Lord Shiva jumped into the yagya fire after her husband was insulted by her father Daksha. Shiva was so angry and grief strucken that he carried her body in his arms and danced his fearsome tandava dance. 

Every spot where a body part of Mata Sati fell became a Shakti Peetha - a place where the Mother Goddess is worshipped with rituals as old as time. 


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Saturday, December 19, 2015

The Nandi statue that spouts water from an unknown source




The Nandishwara Teertha Temple was discovered in the 1990s. The temple has a Nandi idol that spouts water from its mouth. The temple was discovered accidentally and the Nandi was found buried along with the entire temple. The source of the water at the said temple, 
which is considered to be centuries old has not been found till date.

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Friday, December 4, 2015

Lord Kuber Bhandari, the granter of prosperity



Lord Kuber took residence in the village of Karnali 36 miles from Vadodara after he lost the kingdom of Lanka to Ravan who won it with his austerities. 

Whoever offers Lord Kuber with pan-supari, the Lord grants them with wealth. This spot was chosen by Lord Kuber because it has Mother Amba in all her glory. This was the only place where Ravan could hurt Kuber.

May Lord Kuber Bhandari bless us all with good fortune!  

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