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Monday, July 10, 2017

गणपति बप्पा के साथ क्यों जुड़ा है ‘मोरया’का नाम ?


आस्था की एक अनोखी यात्रा पिछले 600 सालों से जारी है। इस यात्रा में करोड़ों भक्त शामिल हैं। उनमें से कुछ इस यात्रा के बारे में जानते हैं तो कुछ बिना जाने चल रहे हैं। हम बात कर रहे हैं करोड़ों गणेश भक्तों की, जो सालों से गणपति बप्पा मोरया के नारे लगा रहे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नहीं जानते कि मोरया असल में थे कौन?

हो सकता है कि देश के हजारों गणेश भक्तों की तरह आप भी गणपति बप्पा के मोरया की कहानी ना जानते हों, लेकिन पुणे से 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ के इस इलाके का बच्चा-बच्चा मोरया की कहानी जानता है। मोरया गोसावी 14वीं शताब्दी के वो महान गणपति भक्त हैं जिनकी आस्था की चर्चा उस दौर के पेशवाओं तक पहुंची तो वो भी इस दर पर अपना माथा टेकने यहां तक चले आए। उन्हीं के नाम पर बना मोरया गोसावी समाधि मंदिर आज करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है। पुणे से करीब 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ में इस मंदिर की स्थापना खुद मोरया गोसावी ने की थी। इस मंदिर के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है।

कहते हैं कि मोरया गोसावी हर गणेश चतुर्थी को चिंचवाड़ से पैदल चलकर 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने जाते थे। ये सिलसिला उनके बचपन से लेकर 117 साल तक चलता रहा। उम्र ज्यादा हो जाने की वजह से उन्हें मयूरेश्वर मंदिर तक जाने में काफी मुश्किलें पेश आने लगी थीं। तब एक दिन गणपति उनके सपने में आए।

चिंचवाड़ देवस्थान के ट्रस्टी विश्राम देव कहते हैं कि 1492 की बात है। 117 साल उम्र थी। मयूरेश्वर जी सपने में आए, कहा कि जब स्नान करोगे तो मुझे पाओगे। जैसा सपने में देखा था, ठीक वैसा ही हुआ। मोरया गोसावी जब कुंड से नहाकर बाहर निकले तो उनके हाथों में मयूरेश्वर गणपति की छोटी सी मूर्ति थी। उसी मूर्ति को लेकर वो चिंचवाड़ आए और यहां उसे स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दी। धीरे-धीरे चिंचवाड़ मंदिर की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। महाराष्ट्र समेत देश के अलग-अलग कोनों से गणेश भक्त यहां बप्पा के दर्शन के लिए आने लगे। इस मंदिर में प्रवेश करते ही आपको कण-कण में भगवान गणेश की छाप दिखेगी।

मान्यता है कि जब मंदिर का ये स्वरूप नहीं था तब भी यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती थी। यहां आने वाले भक्त सिर्फ गणपति बप्पा के दर्शन के लिए नहीं आते थे, बल्कि विनायक के सबसे बड़े भक्त मोरया का आशीर्वाद लेने भी आते थे। भक्तों के लिए गणपति और मोरया अब एक ही हो गए थे।

पुणे शहर से 15 किलोमीटर दूर बसा चिंचवाड़ गांव मोरया गोसावी के नाम से मशहूर है। मोरया गोसावी मंदिर इस गांव की शान माना जाता है। गणेश के सबसे बड़े भक्त बनकर मोरया गोसावी ने गणेश का वरदान पाया और गणेश के नाम के साथ अपना नाम हमेशा के लिए जोड़कर सिद्धि प्राप्त कर ली। यही वजह है की चिंचवाड़ गावों में  लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो वह नमस्ते नहीं बल्कि मोरया कहते हैं।

मोरया गोसावी को सबसे बड़े गणेश भक्त का दर्जा यूं ही नहीं मिल गया था। कहा जाता है कि 1375 में मोरया गोसावी का जन्म भी भगवान गणेश की कृपा से ही हुआ था। उनके पिता वामनभट और मां पार्वतीबाई की भक्ति से खुश होकर भगवान ने कहा था कि वो उनके यहां पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यही वजह है कि मोरया गोसावी का जन्मस्थल भी गणेश भक्तों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है।

बचपन से ही मोरया गोसावी गणेश भक्ति में कुछ इस तरह रम गए कि उन्हें दीन-दुनिया का कुछ ख्याल ही नहीं रहता। थोड़े बड़े हुए तो मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर में गणपति के दर्शन के लिए जाने लगे। ये सिलसिला तब तक चला जब तक कि स्वयं भगवान गणेश ने उन्हें स्वयं अपना प्रतिरूप नहीं सौंप दिया। तबसे गणपति के भक्त चिंचवाड़ के गजानन को मयूरेश्वर गणपति का अंश मानते हैं। साल में दो बार भगवान गणेश को पालकी में लेकर मयूरेश्वर मंदिर जाते हैं, ताकि भगवान का अपने अंश से भेंट हो सके।

पुणे शहर से करीब 80 किलोमीटर दूर मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई, इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन इतना तय है कि मोरया गोसावी की भक्ति ने इस तीर्थ स्थल को सभी गणेश भक्तों के लिए अहम बना दिया है। मान्यता है कि अष्टविनायक के दर्शन की शुरुआत भी मयूरेश्वर से होती है और अंत भी यहीं होता है। अष्टविनायक यानी 8 गणपति। ये आठ मंदिर महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों में हैं।

ये हैं पुणे के मोरगांव का मयूरेश्वर मंदिर, अहमदनगर के सिद्धटेक का सिद्धिविनायक मंदिर, रायगढ़ के पाली का बल्लालेश्वर मंदिर, रायगढ़ के कपोली का वरदनायक मंदिर, पुणे के थेउर का चिंतामणि मंदिर, पुणे के ही लेनयाद्री का गिरिजात्मज मंदिर, पुणे के ओजर का विघ्नेश्वर मंदिर और पुणे के रंजनागांव का महागणपति मंदिर। कहते हैं कि इन आठों गणपति के दर्शन के बाद भक्त की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। अष्टविनायक की ये यात्रा मयूरेश्वर मंदिर से शुरू होता है, इसीलिए इसे सर्वाद्य मंदिर कहते हैं।

मयूरेश्वर मंदिर परिसर में इस पेड़ के नीचे मोरया गोसावी की ये मूर्ति भक्ति की एक अनोखी कहानी कहती है।  बताया जाता है कि एक बार चिंचवाड़ से चलकर मोरया गोसावी यहां तक आ तो गए, लेकिन आगे का रास्ता बाढ़ की वजह से बंद हो चुका था। तब इसी पेड़ के नीचे बैठकर मोरया गोसावी ने मयूरेश्वर गणपति को याद किया और भगवान अपने भक्त को दर्शन देने यहां तक चले आए। यहां आने वाले भक्तों की जितनी श्रद्धा मयूरेश्वर गणपति में हैं, उतनी ही मोरया गोसावी में है। भक्त मोरया गोसावी को मयूरेश्वर गणपति का अवतार मानते हैं। भक्तों के मुताबिक यहां आकर उन्हें दोनों देवों के दर्शन हो जाते हैं, उन्हें मनचाही मुराद मिल जाती है।

कहते हैं कि मोरया गोसावी जी ने संजीवन समाधि ले ली थी, यानी जीते जी वो समाधि में लीन हो गए थे। भक्त मानते हैं कि आज भी मोरया गोसावी इन दोनों तीर्थस्थलों में मौजूद हैं। यही वजह है कि यहां गणपति के साथ-साथ मोरया की भी पूजा की जाती है। भक्त सच्चे मन से एक ही जयकारा लगाते हैं।

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Sunday, June 11, 2017

|| गणेश के 108 नाम और उनके अर्थ ||

भगवान श्री गणेश को हिन्दू धर्म में प्रथम पूजनीय माना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्य से
पहले सर्वप्रथम भगवान गणेश के पूजन का विधान है। इनकी सवारी मूषक यानि चूहा और प्रिय भोग मोदक
(लड्डू) है।

हाथी जैसा सिर होने के कारण भगवान गणेश को गजानन भी कहा जाता है। शिवपुत्र, गौरी नंदन जैसे नामों से साथ गणेश जी को विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है जैसे मुंबई में गणेश जी को गणपति बप्पा मोरया के नाम से जाना जाता है। गणेश जी को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। गणेश जी के कुछ प्रमुख नाम निम्न हैं:


भगवान गणेश जी के 108 नाम :-

1. बालगणपति : सबसे प्रिय बालक
2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान
4. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर : एकल अक्षर
6. एकदन्त : एक दांत वाले
7. गजकर्ण : हाथी की तरह आंखें वाला
8. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान
9. गजनान : हाथी के मुख वाले भगवान
10. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुँह है
12. गणाध्यक्ष : सभी गणों के मालिक
13. गणपति : सभी गणों के मालिक
14. गौरीसुत : माता गौरी के पुत्र
15. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले
16. लम्बोदर : बड़े पेट वाले
17. महाबल : बलशाली
18. महागणपति : देवो के देव
19. महेश्वर : ब्रह्मांड के भगवान
20. मंगलमूर्त्ति : शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन : जिसका सारथी चूहा
22. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर : सब के बीच प्रथम आने वाले
24. शूपकर्ण : बड़े कान वाले
25. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु
26. सिद्धिदाता : इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक : सफलता के स्वामी
28. सुरेश्वरम : देवों के देव
29. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड
30. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता : अनन्त देव
32. अमित : अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना
34. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न : बाधाओं को हरने वाले
36. भीम : विशाल
37. भूपति : धरती के मालिक
38. भुवनपति : देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता
40. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले
42. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी : बुराइयों और असुरों के विनाशक
44. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले
46. धार्मिक : दान देने वाला
47. दूर्जा : अपराजित देव
48. द्वैमातुर : दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र : एक दांत वाले
50. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर : जिसका हथियार गदा है
52. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन : जो सभी गुणों के ज्ञानी
54. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब : माँ का प्रिय पुत्र
56. कपिल : पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश : कवियों के स्वामी
58. कीर्त्ति : यश के स्वामी
59. कृपाकर : कृपा करने वाले
60. कृष्णपिंगाश : पीली भूरि आंख वाले
61. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला
62. क्षिप्रा : आराधना के योग्य
63. मनोमय : दिल जीतने वाले
64. मृत्युंजय : मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है
66. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित : जिसे संगीत से प्यार हो
68. नमस्थेतु : सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन : भगवान शिव का बेटा
70. सिद्धांथ : सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाला
72. प्रमोद : आनंद
73. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व
74. रक्त : लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहीते
76. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकर्ता
77. सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता
78. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार : ओम के आकार वाला
80. शशिवर्णम : जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन : जो सभी गुण के गुरु हैं
82. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले
84. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख : शुभ मुख वाले
86. स्वरुप : सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण : जिसकी कोई आयु न हो
88. उद्दण्ड : शरारती
89. उमापुत्र : पार्वती के बेटे
90. वरगणपति : अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता
92. वरदविनायक : सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति : वीर प्रभु
94. विद्यावारिधि : बुद्धि की देव
95. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले
96. विघ्नहर्त्ता : बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले
98. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान
100. विघ्नविनाशाय : सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर : सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान
102. विकट : अत्यंत विशाल
103. विनायक : सब का भगवान
104. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा : संसार के स्वामी
105. यज्ञकाय : सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
106. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव
108. योगाधिप : ध्यान के प्रभु 

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