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Friday, April 12, 2019

दुर्गा कथा : मां पार्वती की पवित्र पौराणिक गाथा | Maa Durga Story in Hindi |



कैलाश पर्वत के निवासी भगवान शिव की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो 'मां' ही है।

माता की पवित्र गाथा : -
आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को शक्ति कहा जाता है। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। लेकिन वह भस्म रमाने वाले योगी शिव के प्रेम में पड़ गई। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया।
एक यज्ञ में जब दक्ष ने पार्वती (शक्ति) और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी पार्वती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। पार्वती को यह सब सहन नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।  

यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने कंधों पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित हो गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया। 

माता का रूप :-

मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। रक्तांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्धचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है।
माता की प्रार्थना :- 
जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

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Friday, March 15, 2019

जानिये दुर्गा देवी का रहस्य | Story of Maa Durga |


देवी दुर्गा की कहानी

देवी दुर्गा की एक कहानी के अनुसार एक बार देवताओं ने उनसे पूछा कि, "देवी, आपने इन शस्त्रों को क्यों उठा रखा है? आप अपनी एक हुंकार से सभी दानवों का विनाश कर सकती हैं।" तब कुछ देवताओं ने स्वयं ही उत्तर देते हुए कहा, "आप इतनी दयावान हैं, कि आप दानवों को भी अपने शस्त्रों के माध्यम से शुद्ध कर देना चाहती हैं। आप उन्हें मुक्त करना चाहती हैं, और इसीलिये आप ऐसा कर रहीं हैं।"
"मैं आपको संक्षेप में बताता हूँ। उन दिनों में बंदूक नहीं होती थी। उन दिनों में, केवल त्रिशूल होते थे। यदि उन दिनों में बन्दूक होती, तो शायद दुर्गा माँ के हाथों में AK-47 होती।"- श्री श्री रविशंकर

देवी दुर्गा के रूप का गहरा अर्थ

माँ दुर्गा की कहानी के पीछे यह संदेश है, कि कर्म की अपनी जगह होती है। केवल अकेले संकल्प के होने से काम नहीं होता। देखिये, भगवान ने हमें हाथ और पैर दिए हैं, ताकि हम काम कर सकें। देवी माता के इतने सारे हाथ क्यों हैं?
इसका तात्पर्य यह है कि भगवान भी काम करते हैं, और केवल एक हाथ से नहीं, हज़ारों हाथों से और हज़ारों तरीकों से। देवी के पास असुरों का विनाश करने के हज़ारों तरीकें हैं।वे एक फूल से भी अधर्म का विनाश कर सकती हैं, जैसे गांधीगिरी। इसीलिये देवी अपने हाथों में फूल लिए हैं, ताकि फूल से ही काम हो जाए। और फिर शंख बजाकर, ज्ञान प्रसारण करके भी। अगर वह भी काम नहीं करता, तो फिर वे सुदर्शन चक्र का उपयोग करती हैं। इसलिए, उनके पास एक से अधिक उपाय हैं।
यह इस बात का प्रतीक है कि इस विश्व में परिवर्तन लाने के लिए, केवल कोई एक ही युक्ति काम नहीं करती।आपको बहुत से तरीके ढूँढने पड़ते हैं।

देवी दुर्गा के रूप का असर हमारे रिश्ते और जीवन में

यही बात हमारे रिश्तों में भी है। हम हर परिस्थिति में हठ नहीं कर सकते। यदि आप अपने पिता के साथ हर समय हठ करेंगे, और फिर उम्मीद करेंगे कि बात बन जाए तो ऐसा नहीं होगा। कभी प्यार, कभी हठ करना और कभी कभी गुस्सा करने से काम होता है। बच्चों के साथ भी यही है। देखिये किस तरह माँ-बाप बच्चों को बड़ा करते समय तरह तरह की युक्ति और व्यवहार करते हैं। हर बार डंडे का प्रयोग करने से काम नहीं बनेगा। कभी कभी उन्हें प्यार से भी काम करवाना पड़ेगा। तो यही बात कही गयी है।
हर समस्या के बहुत से समाधान हो सकते हैं और इसीलिये देवी इतने सारे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं।

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                                                                                                                                                                                  Source:https://bit.ly/2XSPBt4

Thursday, March 7, 2019

क्या आप जानते है दुर्गा माँ की यह कहानी ?



हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं से जुड़े सभी तथ्य बेहद रोचक हैं... यदि आप हिन्दू धर्म के बारे में अधिक जानकारी नहीं रखते तो शायद समझ ना पाएं। लेकिन यदि आपकी थोड़ी भी रुचि है तो एक बार देवी-देवताओं के बारे में जरूर जानें। उनसे जुड़ी कहानियां, उनका स्वरूप, वे कैसे दिखते थे, कैसे शस्त्र पकड़ते थे और किस वाहन की सवारी करते थे यह भी अति दिलचस्प है।

भगवान शिव के वाहन नंदी, गणेश जी के वाहन मूषक, मां दुर्गा के वाहन शेर एवं भगवान सूर्य के वाहन सात घोड़े हैं। क्या आप जानते हैं कि सूर्य देव एक या दो नहीं, बल्कि पूरे सात घोड़ों की सवारो क्यों करते हैं।

दरअसल इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक उद्देश्य भी छिपा है। कहते हैं इन सातो घोड़ों का एक खास उद्देश्य था, सभी के पास एक खास ऊर्जा थी। वैज्ञानिक दृष्टि से इन सात घोड़ों को सूर्य की सात किरणों का नाम दिया जाता है।

इसी तरह से भगवान शिव एवं गणेश जी या अन्य किसी भी हिन्दू देवी-देवता को मिले वाहन के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। आज हम आपको एक ऐसी ही कहानी बताने जा रहे हैं जो देवी दुर्गा एवं उनके वाहन शेर से जुड़ी है।

शक्ति का रूप दुर्गा, जिन्हें सारा जगत मानता है... ना केवल कोई साधारण मनुष्य, वरन् सभी देव भी उनकी अनुकम्पा से प्रभावित रहते हैं। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार मां दुर्गा को यूं ही शेर की सवारी प्राप्त नहीं हुई थी, इसके पीछे एक रोचक कहानी बनी है।

आदि शक्ति, पार्वती, शक्ति... आदि नाम से प्रसिद्ध हैं मां दुर्गा। धार्मिक इतिहास के अनुसार भगवान शिीव को पतिक रूप में पाने के लि्ए देवी पार्वती ने हजारों वर्ष तक तपस्या की। कहते हैं उनकी तपस्या में इतना तेज़ था जिसके प्रभाव से देवी सांवली हो गईं।

इस कठोर तपस्या के बाद शिव तथा पार्वती का विवाह भी हुआ एवं संतान के रूप में उन्हें कार्तिकेय एवं गणेश की प्राप्ति भी हुई। एक कथा के अनुसार भगवान शिव से वि्वाह के बाद एक दि न जब शि व, पार्वती साथ बैठे थे तब भगवान शिहव ने पार्वती से मजाक करते हुए काली कह दििया।

देवी पार्वती को शिंव की यह बात चुभ गई और कैलाश छोड़कर वापस तपस्या करने में लीन हो गईं। इस बीच एक भूखा शेर देवी को खाने की इच्छा से वहां पहुंचा। ले‌किोन चमत्कार तो देखिए... देवी को तपस्या में लीन देखकर वह वहीं चुपचाप बैठ गया।

ना जाने क्यों शेर देवी के तपस्या को भंग नहीं करना चाहता था। वह सोचने लगा कि देवी कब तपस्या से उठें और वह उन्हें अपना आहार बना ले। इस बीच कई साल बीत गए लेकिेन शेर अपनी जगह डटा रहा।

कई वर्ष बीत गए लेकिन माता पार्वती अभी भी तपस्या में मग्न ही थीं, वे तप से उठने का फैसला किसी भी हाल में लेना नहीं चाहती थीं। लेकिन तभी शिव वहां प्रकट हुए और देवी को गोरे होने का वरदान देकर चले गए।

थोड़ी देर बाद माता पार्वती भी तप से उठीं और उन्होंने गंगा स्नान किया। स्नान के तुरंत बाद ही अचानक उनके भीतर से एक और देवी प्रकट हुईं। उनका रंग बेहद काला था।

उस काली देवी के माता पार्वती के भीतर से निकलते ही देवी का खुद का रंग गोरा हो गया। इसी कथा के अनुसार माता के भीतर से निकली देवी का नाम कौशिकी पड़ा और गोरी हो चुकी माता सम्पूर्ण जगत में ‘माता गौरी’ कहलाईं।

स्नान के बाद देवी ने अपने निकट एक सिंह को पाया, जो वर्षों से उन्हें खाने की ललक में बैठा था। लेकिन देवी की तरह ही वह वर्षों से एक तपस्या में था, जिसका वरदान माता ने उसे अपना वाहन बनाकर दिया।

देवी उस सिंह की तपस्या से अति प्रसन्न हुई थीं, इसलिए उन्होंने अपनी शक्ति से उस सिंह पर नियंत्रण पाकर उसे अपना वाहन बना लिया।

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                                                                                                                                                                                                                 Source:https://bit.ly/2IXqMZz

Thursday, January 24, 2019

मां दुर्गा की कहानी |


कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती ही दूसरे जन्म में पार्वती के रूप में विख्या हुई उन्हें ही ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जोड़कर देखा जाता है। जिन्हें दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि कहा जाता है वे सदाशिव की अर्धांगिनी है।

माता की कथा :
आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री सती माता को शक्ति कहा जाता है। शिव के कारण उनका नाम शक्ति हो गया। हालांकि उनका असली नाम दाक्षायनी था। यज्ञ कुंड में कुदकर आत्मदाह करने के कारण भी उन्हें सती कहा जाता है। बाद में उन्हें पार्वती के रूप में जन्म लिया। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी।

पिता की ‍अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया। एक यज्ञ में जब दक्ष ने 
सती और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी माता सती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती को यह सब बरदाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।

यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित किए गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया। इसका यह मतलब नहीं कि अनेक माताएं हो गई।

माता पर्वती ने ही ‍शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि राक्षसों का वध किया था।

माता का रूप : 
मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। पितांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्थचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है।

माता की प्रार्थना : 
जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

माता का तीर्थ : 
शिव का धाम कैलाश पर्वत है वहीं मानसरोवर के समीप माता का धाम है। जहां दक्षायनी माता का मंदिर बना है। वहीं पर मां साक्षात विराजमान है।

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                                                                                                                                                                                       Source:https://bit.ly/2UjNLz5

Friday, December 28, 2018

माँ दुर्गा शक्ति का स्वरुप |

दुर्गा पार्वती का दूसरा नाम है। हिन्दुओं के शाक्त सम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है (शाक्त सम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है) वेदों में तो दुर्गा का कोई ज़िक्र नहीं है, मगर उपनिषद में देवी 'उमा हैमवती' उमा, हिमालय की पुत्री का वर्णन है। पुराण में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। दुर्गा असल में शिव की पत्नी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति देवताओं की प्रार्थना पर राक्षसों का नाश करने के लिये हुई थी। इस तरह दुर्गा युद्ध की देवी हैं। देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं। मुख्य रूप उनका 'गौरी' है अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गोरा रूप। उनका सबसे भयानक रूप काली है, अर्थात काला रूप। विभिन्न रूपों में दुर्गा भारत और नेपाल के कई मन्दिरों और तीर्थस्थानों में पूजी जाती हैं। कुछ दुर्गा मन्दिरों में पशुबलि भी चढ़ती है। भगवती दुर्गा की सवारी शेर है।

दुर्गा जी की पूजा में दुर्गा जी की आरती और दुर्गा चालीसा का पाठ किया जाता है.

नवरात्र में देवी पूजन

हिन्दू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय नवरात्र होता है। भारत में नवरात्र का पर्व, एक ऐसा पर्व है जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है। वर्ष के चार नवरात्रों में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन के होते हैं, परंतु प्रसिद्धि में चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवीभक्त आश्विन के नवरात्र अधिक करते हैं। इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से होता है। अतः यह प्रतिपदा ’सम्मुखी’ शुभ होती है।
दुर्गा जी के सोलह नाम

ब्रह्म वैवर्त पुराण से उद्धृत:

नारदजी बोले- ब्रह्मन्! मैंने अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण उपाख्यानों को सुना। अब दुर्गाजी के उत्तम उपाख्यान को सुनना चाहता हूँ। वेद की कौथुमी शाखा में जो दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमंगला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी- ये सोलह नाम बताये गये हैं, वे सब के लिये कल्याणदायक हैं। वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ नारायण! इन सोलह नामों का जो उत्तम अर्थ है, वह सबको अभीष्ट है। उसमें सर्वसम्मत वेदोक्त अर्थ को आप बताइये। पहले किसने दुर्गाजी की पूजा की है? फिर दूसरी, तीसरी और चौथी बार किन-किन लोगों ने उनका सर्वत्र पूजन किया है?
श्रीनारायण ने कहा- देवर्षे! भगवान् विष्णु ने वेद में इन सोलह नामों का अर्थ किया है, तुम उसे जानते हो तो भी मुझसे पुन: पूछते हो। अच्छा, मैं आगमों के अनुसार उन नामों का अर्थ कहता हूँ।
दुर्गा दुर्गा शब्द का पदच्छेद यों है- दुर्ग+आ। 'दुर्ग' शब्द दैत्य, महाविघ्न, भवबन्धन, कर्म, शोक, दु:ख, नरक, यमदण्ड, जन्म, महान भय तथा अत्यन्त रोग के अर्थ में आता है तथा 'आ' शब्द 'हन्ता' का वाचक है। जो देवी इन दैत्य और महाविघ्न आदि का हनन करती है, उसे 'दुर्गा' कहा गया है।
नारायणी
यह दुर्गा यश, तेज, रूप और गुणों में नारायण के समान है तथा नारायण की ही शक्ति है। इसलिये 'नारायणी' कही गयी हैं
ईशाना
ईशाना का पदच्छेद इस प्रकार है- ईशान+आ। 'ईशान' शब्द सम्पूर्ण सिद्धियों के अर्थ में प्रयुक्त होता है और 'आ' शब्द दाताका वाचक है। जो सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाली है, वह देवी 'ईशाना' कही गयी है।
विष्णुमाया
पूर्वकाल में सृष्टि के समय परमात्मा विष्णु ने माया की सृष्टि की थी और अपनी उस मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्व को मोहित किया। वह मायादेवी विष्णु की ही शक्ति है, इसलिये 'विष्णुमाया' कही गयी है।
शिवा
'शिवा' शब्द का पदच्देद यों है- शिव+आ। 'शिव' शब्द शिव एवं कल्याण अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा 'आ' शब्द प्रिय और दाता-अर्थ में। वह देवी कल्याणस्वरूपा है, शिवदायिनी है और शिवप्रिया है, इसलिये 'शिवा' कही गयी है।
सती
देवी दुर्गा सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं, प्रत्येक युग में विद्यमान हैं तथा पतिव्रता एवं सुशीला हैं। इसीलिये उन्हें 'सती' कहते हैं।
नित्या

जैसे भगवान् नित्य हैं, उसी तरह भगवती भी 'नित्या' हैं। प्राकृत प्रलय के समय वे अपनी माया से परमात्मा श्रीकृष्ण में तिरोहित रहती हैं।

सत्या

ब्रह्मासे लेकर तृण अथवा कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् कृत्रिम होने के कारण मिथ्या ही है, परंतु दुर्गा सत्यस्वरूपा हैं। जैसे भगवान् सत्य हैं, उसी तरह प्रकृतिदेवी भी 'सत्या' हैं।
भगवती
सिद्ध, ऐश्वर्य आदि के अर्थ में 'भग' शब्द का प्रयोग होता है, ऐसा समझना चाहिये। वह सम्पूर्ण सिद्ध, ऐश्वर्यादिरूप भग प्रत्येक युग में जिनके भीतर विद्यमान है, वे देवी दुर्गा 'भगवती' कही गयी हैं।
सर्वाणी
जो विश्व के सम्पूर्ण चराचर प्राणियों को जन्म, मृत्यु, जरा आदि की तथा मोक्षकी भी प्राप्ति कराती हैं, वे देवी अपने इसी गुण के कारण 'सर्वाणी' कही गयी हैं।
सर्वमंगला
'मंगल' शब्द मोक्ष का वाचक है और 'आ' शब्द दाताका। जो सम्पूर्ण मोक्ष देती हैं, वे दी देवी 'सर्वमंगला' हैं। 'मंगल' शब्द हर्ष, सम्पत्ति और कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जो उन सबको देती हैं, वे ही देवी 'सर्वमंगला' नामसे विख्यात हैं।
अम्बिका
'अम्बा' शब्द माता का वाचक है तथा वन्दन और पूजन-अर्थ में भी 'अम्ब' शब्द का प्रयोग होता है। वे देवी सबके द्वारा पूजित और वन्दित हैं तथा तीनों लोकों की माता हैं, इसलिये 'अम्बिका' कहलाती हैं
वैष्णवी
देवी श्रीविष्णु की भक्ता, विष्णुरूपा तथा विष्णु की शक्ति हैं। साथ ही सृष्टकाल में विष्णु के द्वारा ही उनकी सृष्टि हुई है। इसलिये उनकी 'वैष्णवी' संज्ञा है।
गौरी
'गौर' शब्द पीले रंग, निर्लिप्त एवं निर्मल परब्रह्म परमात्मा के अर्थ में प्रयुक्त होता है। उन 'गौर' शब्दवाच्य परमात्मा की वे शक्ति हैं, इसलिये वे 'गौरी' कही गयी हैं। भगवान् शिव सबके गुरु हैं और देवी उनकी सती-साध्वी प्रिया शक्ति हैं। इसलिये 'गौरी' कही गयी हैं। श्रीकृष्ण ही सबके गुरु हैं और देवी उनकी माया है। इसलिये भी उनको 'गौरी' कहा गया है।
पार्वती
'पर्व' शब्द तिथिभेद (पूर्णिमा), पर्वभेद, कल्पभेद तथा अन्यान्य भेद अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा 'ती' शब्द ख्याति के अर्थ में आता है। उन पर्व आदि में विख्यात होने से उन देवी की 'पार्वती' संज्ञा है। 'पर्वन्' शब्द महोत्सव-विशेष के अर्थ में आता है। उसकी अधिष्ठात्री देवी होने के नाते उन्हें 'पार्वती' कहा गया है। वे देवी पर्वत (गिरिराज हिमालय)- की पुत्री हैं। पर्वत पर प्रकट हुई हैं तथा पर्वत की अधिष्ठात्री देवी हैं। इसलिये भी उन्हें 'पार्वती' कहते हैं।'

सनातनी


'सना' का अर्थ है सर्वदा और 'तनी' का अर्थ है विद्यमाना। सर्वत्र और सब काल में विद्यमान होने से वे देवी 'सनातनी' कही गयी हैं।

                                                                                                                                                                       Source : https://bit.ly/2Vd9xpk


Friday, August 24, 2018

जानिए कैसे प्रकट हुईं महादुर्गा, किस देवता ने दिए उन्हें कौनसे अस्त्र-शस्त्र?

देवी भगवती ने असुरों का वध करने के लिए कई अवतार लिए। सर्वप्रथम महादुर्गा का अवतार लेकर देवी ने महिषासुर का वध किया था। दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतार का स्पष्ट उल्लेख आता है, जिसके अनुसार - महिषासुर नामक असुरों के राजा ने अपने बल और पराक्रम से देवताओं से स्वर्ग छिन लिया। जब सारे देवता भगवान शंकर व विष्णु के पास सहायता के लिए गए। पूरी बात जानकर शंकर व विष्णु को क्रोध आया तब उनके तथा अन्य देवताओं से मुख से तेज प्रकट हुआ, जो नारी स्वरूप में परिवर्तित हो गया।

शिव के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियां, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भृकुटि और वायु के तेज से कानों की उत्पत्ति हुई।

इसके बाद देवी को शस्त्रों से सुशोभित भी देवों ने किया। देवताओं से शक्तियां प्राप्त कर महादुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध कर देवताओं को पुन: स्वर्ग सौंप दिया। महिषासुर का वध करने के कारण उन्हें ही महादुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।


देवताओं ने दिए माता दुर्गा को शस्त्र :- 

देवी भागवत के अनुसार, शक्ति को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने अपने प्रिय अस्त्र-शस्त्र सहित कई शक्तियां उन्हें प्रदान की। इन सभी शक्तियों को प्राप्त कर देवी मां ने महाशक्ति का रूप ले लिया-

1. भगवान शंकर ने मां शक्ति को त्रिशूल भेंट किया।

2. भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र प्रदान दिया।

3. वरुण देव ने शंख भेंट किया।

4. अग्निदेव ने अपनी शक्ति प्रदान की।

5. पवनदेव ने धनुष और बाण भेंट किए।

6. इंद्रदेव ने वज्र और घंटा अर्पित किया।

7. यमराज ने कालदंड भेंट किया।

8. प्रजापति दक्ष ने स्फटिक माला दी।

9. भगवान ब्रह्मा ने कमंडल भेंट दिया।

10. सूर्य देव ने माता को तेज प्रदान किया।

11. समुद्र ने मां को उज्जवल हार, दो दिव्य वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, दो कुंडल, कड़े, अर्धचंद्र, सुंदर हंसली और अंगुलियों में पहनने के लिए रत्नों की अंगूठियां भेंट कीं।

12. सरोवरों ने उन्हें कभी न मुरझाने वाली कमल की माला अर्पित की।

13. पर्वतराज हिमालय ने मां दुर्गा को सवारी करने के लिए शक्तिशाली सिंह भेंट किया।

14. कुबेर देव ने मधु (शहद) से भरा पात्र मां को दिया।

Source :- https://bit.ly/2NbfLRX