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Thursday, March 14, 2019

भगवन श्री विष्णु का पौराणिक संदर्भ | Story of Lord Vishnu |




  • पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्रीविष्णु ही परमार्थ तत्त्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी हैं।
  • वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युतकृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं।
  • कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं। इसलिये भगवान श्रीविष्णु का नाम हरि है। मत्स्यकूर्मवराहवामनहयग्रीव तथा श्रीराम-कृष्ण आदि भगवान विष्णु के ही अवतार हैं।
  • भगवान श्रीविष्णु अत्यन्त दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करुणा-वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है।
  • जो भक्त भगवान श्रीविष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनके अर्चाविग्रह का दर्शन, वन्दन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।
  • यद्यपि भगवान विष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्त वत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं |
    • ध्रुव, प्रह्लादअजामिलद्रौपदी, गणिका आदि अनेक भक्तों का उनकी कृपा से उद्धार हुआ।
    • भक्त वत्सल भगवान को भक्तों का कल्याण करनें में यदि विलम्ब हो जाय तो भगवान उसे अपनी भूल मानते हैं और उसके लिये क्षमा-याचना करते हैं। धन्य है उनकी भक्त वत्सलता।
    • मत्स्य, कूर्म, वराह, श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारों की कथाओं में भगवान श्रीविष्णु की भक्त वत्सलता के अनेक आख्यान आये हैं। ये जीवों के कल्याण के लिये अनेक रूप धारण करते हैं।
    • वेदों में इन्हीं भगवान श्रीविष्णु की अनन्त महिमा का गान किया गया है।
    • विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णन मिलता है कि लवण समुद्र के मध्य में विष्णु लोक अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है। उसमें भगवान श्रीविष्णु वर्षा ऋतु के चार मासों में लक्ष्मी द्वारा सेवित होकर शेषशय्या पर शयन करते हैं।
    • पद्म पुराण के उत्तरखण्ड के 228वें अध्याय में भगवान विष्णु के निवास का वर्णन है।
    • वैकुण्ठ धाम के अन्तर्गत अयोध्यापुरी में एक दिव्य मण्डप है। मण्डप के मध्य भाग में रमणीय सिंहासन है। वेदमय धर्मादि देवता उस सिंहासन को नित्य घेरे रहते हैं। धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य, वैराग्य सभी वहाँ उपस्थित रहते हैं। मण्डप के मध्यभाग में अग्नि, सूर्य और चंद्रमा रहते हैं। कूर्म, नागराज तथा सम्पूर्ण वेद वहाँ पीठ रूप धारण करके उपस्थित रहते हैं। सिंहासन के मध्य में अष्टदल कमल है; जिस पर देवताओं के स्वामी परम पुरुष भगवान श्रीविष्णु लक्ष्मी के साथ विराजमान रहते हैं।
    • भक्त वत्सल भगवान श्रीविष्णु की प्रसन्नता के लिये जप का प्रमुख मन्त्र- ॐ नमो नारायणाय तथा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय है।
    • भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा के समय की जाने वाली आरती है।
    • भृगु द्वारा त्रिदेवपरीक्षा से देवताओं ने माना कि विष्णु ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

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                                                                                                                                                                                                          Source:https://bit.ly/2VYCapG

Thursday, March 7, 2019

क्यों दिया भगवान विष्णु को शुक्राचार्य के पिता ने श्राप?



शापित जीवन हमेशा दुखदायी माना जाता है। धार्मिक कथाओं की मानें तो यहां तक कि भगवान भी इसके दुष्परिणामों से बच नहीं पाए हैं। ऋषि दुर्वासा हमेशा अपने क्रोध और उसमें लोगों को श्राप देने के लिए जाने जाते रहे हैं। भगवान शिव से लेकर कृष्ण तक इसका परिणाम भुगत चुके हैं। लेकिन क्या किसी भी प्रकार यह श्राप आपकी जिंदगी को सुधार सकता है?
अध्यात्मिक मायनों में हर अंधेरा एक प्रकाश की ओर लेकर जाता है। अगर इसे श्राप के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत हद तक यह भी वरदान बन सकता है। आपने सुना होगा कि जो होता है वह हमेशा अच्छे के लिए होता है, फिर उसके तात्कालिक परिणाम बुरे ही क्यों ना दिख रहे हों।
अच्छे और बुरे परिणामों के साथ धार्मिक हिंदू कथाओं का उदाहरण लें तो ये श्राप ही थे जिसने कई रूपों में सृष्टि का कल्याण किया। अगर ये श्राप ना होते तो शायद संसार भी आज इन उन्नत रूपों में नहीं होता। इनमें एक है ऋषि भृगु का भगवान विष्णु को शाप देना जिसने हिंदू सभ्यता को जीने की राह दी।

कथा
यह कथा मत्स्य की है। इसके अनुसार भगवान विष्णु ने धरती पर अवतार तो लिया लेकिन इनका अवतार लेना उनको मिले श्राप का परिणाम था। असुर गुरु शुक्राचार्य के पिता महाऋषि भृगु ने भगवान विष्णु को कई बार धरती पर जन्म लेने का श्राप दिया था और इसीलिए उन्होंने राम, कृष्ण, नरसिंहा और परशुराम आदि रूपों में मनुष्य रूप में जन्म लिया।
इसके अनुसार शुक्राचार्य बृहस्पति से अधिक ज्ञानी थे, बावजूद इसके देवराज इंद्र ने उनकी बजाय बृहस्पति को अपना गुरु माना। इसे अपना अपमान मानकर शुक्राचार्य ने असुरों का गुरु बनना स्वीकार कर लिया और असुरों के माध्यम से इंद्र से बदला लेने की ठानी।
लेकिन देवों को अमरता का वरदान था और असुरों को नहीं, इसलिए शुक्राचार्य को यह अच्छी तरह पता था कि असुर कभी भी देवों से जीत नहीं पाएंगे। इस मुश्किल का हल पाने के लिए शुक्राचार्य ने भगवान शिव को प्रसन्न कर मृत-संजीवनी का वरदान पाने की युक्ति सोची।
यह वह चीज थी जिससे किसी मृत को भी जिंदा किया जा सकता था। शुक्राचार्य भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या करने निकल गए लेकिन जाने से पहले उन्होंने असुरों को अपने माता-पिता ऋषि भृगु और मां काव्यमाता की कुटिया में रहने का निर्देश दिया ताकि उनकी अनुपस्थिति में देवता उन्हें नुकसान ना पहुंचा सकें।
जब इंद्र को यह बात पता चली तो उन्होंने इसे देवों को जीतने का एक सुनहरा अवसर माना। एक दिन जब ऋषि भृगु कुटिया में नहीं थे उन्होंने वहां आक्रमण कर दिया। लेकिन काव्यमाता ने अपने तेज से एक सुरक्षा कवच का निर्माण किया जिससे देव असुरों को नुकसान नहीं पहुंचा सके। इस प्रकार देवता असुरों से हारने लगे।
भगवान विष्णु को जब यह बात पता चली तो उन्होंने देवों की रक्षा करने की सोची। वे इंद्र का रूप धरकर कुटिया में गए और जब काव्यमाता देवों को परास्त करने लगीं तो अपने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। ऋषि भृगु को जब यह बात पता चली तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि उन्हें भी बार-बार धरती पर जन्म लेकर जन्म-मरण के कष्टों को महसूस करना होगा। हालांकि बाद में ऋषि ने कामधेनु गाय की मदद से काव्यमाता को जिंदा कर लिया लेकिन उन्होंने भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस नहीं लिया।
इस प्रकार धरती पर बार-बार पहले राम और फिर कृष्ण रूप में जन्म लिया। इसके अलावा नरसिंहा, परशुराम आदि रूपों में भी वे धरती पर अवतरित हुए। राम के जन्म से रामायण की रचना हुई और कृष्ण के अवतार में महाभारत कथा हुई। इस प्रकार जगत को ‘रामायण’ और ‘गीता’ ग्रंथ मिले। इनकी उपयोगिता और महत्व को किसी भी तरह समझाने की आवश्यकता नहीं है।

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Thursday, February 21, 2019

भगवन विष्णु - महापुराण । (Lord Vishnu story)



सच्चे भक्त बालक के लिए विष्णु ने धरती के कर दिए थे दो टुकड़े ! आज का विशेष – भक्तों का भगवान !!


भगवान अपने भक्त का ध्यान हमेशा रखता है.
अगर भक्त सभी मुश्किलों को झेलते हुए अपने ईश्वर का ध्यान करता रहता है तो भगवान भी ऐसे भक्त के लिए कुछ भी कर देते हैं.
हमारे इतिहास में वैसे इस तरह की कई कहानियां हैं लेकिन संत महिदास जी की कथा को बहुत ही कम लोग जानते हैं. एक बच्चा जो विष्णु भगवान को बहुत मानता था और इनकी आराधना करता था. पिता इस बालक को निकम्मा समझते थे और समाज भी बालक को इज्जत नहीं देता था. एक बार बालक परेशान हुआ तो कहते हैं कि विष्णु भगवान धरती फाड़कर उसमें से प्रकट हुए थे.
तो आइये आज इसी बालक महिदास की कहानी पढ़ते हैं. पेश है आज का विशेष- भक्तों का भगवान
कहानी है कि हारीत ऋषि के वंश में माणडूकि नाम के विधान थे. कहते हैं कि इनकी कई पत्नियाँ थीं. इसीलिए शायद शास्त्रों में यह ऋषि काफी विवादों से घिरे हुए रहे हैं.
अनेक पत्नियों में से एक पत्नी का नाम इतरा था. इन्हीं से जन्म लेने वाले पुत्र का नाम महिदास था.
लेकिन यहाँ पर इस ऋषि के नाम पर कुछ विवाद हैं. पहला विवाद यह है कि हारीत ऋषि खुद तो हारित थे तो इनका बच्चा कैसे ‘मही’-‘दास’ बोला जाता है. क्योकि दास को छोटी जाति का सूचक है.
तो कुछ विद्वान कहते हैं कि इनकी कई पत्नियों में से यह पत्नी शायद छोटी जात से थी इसलिए बच्चा महिदास ही रहा.
बाद में जब बच्चे को पिता का नाम नहीं मिला तो इसने माता का नाम खुद के साथ जोड़ते हुए, खुद को महिदास हारीत की बजाय महिदास ऐतरेय बोला.
अब अगर मुख्य मुद्दे की बात करें तो स्कन्दपुराण बताता है कि महिदास बचपन से ही विष्णु के मन्त्र का जाप करते थे.  एक यही कारण था कि इनके पिता माणडूकि इनको बेकार समझते थे. कुछ समय बाद पिता ने रोज ही इस बालक को अपमानित करना शुरू कर दिया था.
इस बात को देखकर महिदास की माँ बहुत निराश रहने लगी थी. वह खिन्न थी क्योकि पिता इसके बच्चे का अपमान करता था और दूसरी पत्नियों के बच्चों को गले से लगाकर रखता था.
एक बार यज्ञ के दौरान पिता ने एक बालक को अपनी गोद में बैठा लिया और हरिदास को जमीन पर ही रहने दिया. इस बात से हरिदास और उसकी को काफी चोट पहुंची और माँ ने धरती फट जाए ऐसा बोला.
तब कहते हैं कि तुरंत धरती फटती है और विष्णु भगवान सोने का सिंहासन लिए प्रकट होते हैं. यह सिंहासन हरिदास के लिए था. एक भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर खुद भगवान प्रकट हुए थे.
बाद में इसी बालक ने ब्राह्मणग्रन्थ का निर्माण कर इतिहास लिखा है. यह कथा दर्शाती है कि भगवान बिना बोले भी भक्त की परेशानी समझते हैं और वक़्त आने पर उसका हल भी निकाल देते हैं.
(प्रस्तुत कहानी की सत्यता स्कन्दपुराण और भारत गाथा नामक पुस्तक से जाँची जा सकती हैं. कहानी के कई प्रकार के अन्य रूप भी हैं किन्तु कहानी का अंत हर जगह यही है.)
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Thursday, February 14, 2019

Shri Vishnu Puran | श्री विष्णु पुराण ।


श्री विष्णु-पुराण


प्राचीन काल में महर्षि मैत्रेय ने श्री पाराशर मुनि के आश्रम में जाकर उन्हें प्रणाम किया फिर स्वस्थ चित्त से सत्संग प्रारंभ हुआ। मैत्रेय ने कहा, हे महात्मन् ! मेरे मन में कुछ प्रश्न उठ रहे हैं उन्हीं के उत्तर की अकांक्षा से मैं आपके दर्शन करने चला आया। आप अपने श्री मुख से अमृत वर्षा करके मुझे कृतार्थ करने की कृपा करें। इस संसार की उत्पत्ति कैसे हुई। पहले यह किसमें लीन था। प्रलय काल में किसमें लीन होगा। पंच महाभूत, भूमि, वन, पर्वत, देव, मानव तथा मन्वन्तर के विषयों पर आप प्रकाश डाल कर मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिये।

तब प्रसन्न होकर महर्षि पाराशर बोले हे, महात्मन् ! यह प्रसंग मेरे पितामह वशिष्ठ जी तथा पुलस्त्य जी से मैंने सुना था। मैं आपकी जिज्ञासा यथासम्भव शान्त करूँगा। आप पूर्णमनोयोग से सुनें। प्राचीन काल में विश्वामित्र की प्रेरणा से मेरे पिता को एक राक्षस ने खा डाला था जिससे मेरा क्रोध बढ़ गया था। शोक एवं क्रोधावेश में आकर मैंने राक्षसों का विनाश करने के लिये एक यज्ञ अनुष्ठित किया। यज्ञाहुतियों के साथ सैकड़ों राक्षस जल कर भष्म होने लगे। तब मेरे दादा वशिष्ठ जी ने मुझसे समझाते हुए कहा हे वत्स ! क्रोध का त्याग करो। इन राक्षसों का क्या दोष ? तुम्हारे पिता के भाग्य का लेख ही ऐसा था। ज्ञानी को क्रोध शोभा नहीं देता। मारना जिलाना ईश्वर के आधीन है भले ही निमित्त कोई भी बन जाय। यज्ञ को यहीं विराम दो ! क्षमा साधु का भूषण होता है।

उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैंने यज्ञ बन्द कर दिया। मेरे दादा वशिष्ठ जी मुझ पर प्रसन्न हुए। उसी समय पुलस्त्य जी भी वहाँ आ गए। वशिष्ठ जी ने उनका अभिवादन करते हुए उन्हें अर्ध्य देकर आसन प्रदान किया। फिर बातों-बातों में मेरे विषय में भी बता दिया। तब पुलस्त्य जी ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा कि तुमने अपने पितामह की आज्ञा मानकर क्षमा का आश्रय लिया। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें आशीर्वाद दे रहा हूँ कि सम्पूर्ण सास्त्रों का ज्ञान तुम्हें सहज ही हो जाएगा और तुम पुराण संहिता की रचना करोगे तथा तुम्हें ईश्वर के यथार्थ रूप का ज्ञान हो जायेगा। पूर्वर्ती काल में उन दोनों ऋषियों के वर के प्रभाव से मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया। यह संसार विष्णु के द्वारा उत्पन्न किया गया वही इसके पालक हैं तथा प्रलय में यह उन्हीं में लय हो जाता है।

सृष्टि का उद्भव


महर्षि पाराशार ने कहा हे मुनीश्वर ! ब्रह्मा रूप में सृष्टि विष्णु रूप में पालन तथा रुद्र रूप में संहार करने वाले भगवान विष्णु को नमन करता हूँ। एक रूप होते हुए भी अनेक रूपधारी, अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त रूप वाले, घट घट वासी अविनाशी पुरुषोत्तम को नमस्कार करते हुए मैं आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों के विषय में कहने जा रहा हूँ।

भगवान नारायण त्रिगुण प्रधान तथा विष्ण के मूल है। वह अनादि हैं। उत्पत्ति लय से रहित हैं। वह सर्वत्र तथा सबमें व्याप्त हैं। प्रलय काल में दिन था न रात्रि, न पृथ्वी न आकाश, न प्रकाश और न अन्धकार ही था। केवल ब्रह्म पुरुष ही था। विष्णु के निरूपाधि रूप से दो रूप हुए। पहला प्रधान और दूसरा पुरुष। विष्णु के जिस अन्य रूप द्वारा वह दोनों सृष्टि तथा प्रलय में संयुक्त अथवा वियुक्त होते हैं उस रूपान्तर को ही काल कहा जाता है। बीत चुके प्रलय काल में इस व्यक्त प्रपंच की स्थित प्रकृति में ही थी।

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Thursday, February 7, 2019

भगवान विष्णु जी और माता लक्ष्मी जी की एक कहानी |

एक बार भगवान विष्णु जी शेषनाग पर बेठे बेठे बोर होगये, ओर उन्होने धरती पर घुमने का विचार मन मै किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, ओर वह अपनी यात्रा की तेयारी मे लग गये, स्वामी को तेयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा !
आज सुबह सुबह कहा जाने कि तेयारी हो रही है?? विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हुं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हुं???? भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी मनवाली।
ओर सुबह सुबह मां लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये, अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी, ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, ओर मां लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, ओर भुल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है?ओर चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।
उत्तर दिशा मै मां लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, ओर उस तरफ़ से भीनी भीनी खुशबु आ रही थी,ओर बहुत ही सुन्दर सुन्दर फ़ुल खिले थे,यह एक फ़ुलो का खेत था, ओर मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत मे गई ओर एक सुंदर सा फ़ुल तोड लाई, लेकिन यह क्या जब मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे, ओर भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उस का कुछ भी नही लेना चाहिये, ओर साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।
ओर मां लक्ष्मी एक गरीब ओरत का रुप धारण करके , उस खेत के मालिक के घर गई, घर क्या एक झोपडा था, ओर मालिक का नाम माधव था, माधब की बीबी, दो बेटे ओर तीन बेटिया थी , सभी उस छोटे से खेत मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,
मां लक्ष्मी जब एक साधारण ओर गरीब ओरत बन कर जब माधव के झोपडे पर गई तो माधव ने पुछा बहिन तुम कोन हो?ओर इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा ,मै एक गरीब ओरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मेने कई दिनो से खाना भी नही खाया मुझे कोई भी काम देदॊ, साथ मै मै तुम्हरे घर का काम भी कर दिया करुगी, बस मुझे अपने घर मै एक कोने मै आसरा देदो? माधाव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटिया होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।
माधाव ने मां लक्ष्मी को अपने झोपडे मए शरण देदी, ओर मां लक्ष्मी तीन साल उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही;
जिस दिन मां लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को इतनी आमदनी हुयी फ़ुलो से की शाम को एक गाय खरीद ली,फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खारीद ली, ओर सब ने अच्छे अच्छे कपडे भी बनबा लिये, ओर फ़िर एक बडा पक्का घर भी बनबा लिया, बेटियो ओर बीबी ने गहने भी बनबा लिये, ओर अब मकान भी बहुत बडा बनाबा लिया था।
माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है मेरी, ओर अब २-५ साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै ओर खेत मै काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने खेतो से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने दुवार पर एक देवी स्वरुप गहनो से लदी एक ओरात को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया अरे यह तो मेरी मुहं बोली चोथी बेटी यानि वही ओरत है, ओर पहचान गया कि यह तो मां लक्ष्मी है.
अब तक माधव का पुरा परिवार बाहर आ गया था, ओर सब हेरान हो कर मां लक्ष्मी को देख रहै थे,माधव बोला है मां हमे माफ़ कर हम ने तेरे से अंजाने मै ही घर ओर खेत मे काम करवाया, है मां यह केसा अपराध होगया, है मां हम सब को माफ़ कर दे|
अब मां लक्ष्मी मुस्कुराई ओर बोली है माधव तुम बहुत ही अच्छे ओर दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेती की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्या की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हुं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की ओर धन की कमी नही रहै गी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हक दार हो, ओर फ़िर मां अपने स्वामी के दुवारा भेजे रथ मे बेठ कर बेकुण्ठ चली गई
इस कहानी मै मां लक्ष्मी का संदेशा है कि जो लोग दयालु ओर साफ़ दिल के होते है मै वही निवास करती हुं, हमे सभी मानवओ की मदद करनी चाहिये, ओर गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।
शिक्षा….. इस कहानी मै लेखक यहि कहना चाहता है कि एक छोटी सी भुल पर भगवान ने मां लक्ष्मी को सजा देदी हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर इन्सान के प्र्ति दयालुता दिखानि ओर बरतनि चाहिये, ओर यह दुख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है | 
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                                                                                                                                                                                           Source:https://bit.ly/2SiBwpR

Wednesday, January 30, 2019

विष्णु भगवान की कहानी |




एक नगर में एक सेठ व सेठानी रहते थे और सेठानी रोज विष्णु भगवान की पूजा करती थी. सेठ को उसका पूजा करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. इसी वजह से एक दिन सेठ ने सेठानी को घर से निकाल दिया. घर से निकलने पर वह जंगल की ओर गई तो देखा चार आदमी मिट्टी खोदने का काम कर रहे थे. उसने कहा कि मुझे नौकरी पर रख लो. उन्होंने उसे रख लिया लेकिन मिट्टी खोदने से सेठानी के हाथों में छाले पड़ गए और उसके बाल भी उड़ गए. वह आदमी कहते हैं कि बहन लगता है तुम किसी अच्छे घर की महिला हो, तुम्हें काम करने की आदत नहीं है. तुम ये काम रहने दो और हमारे घर का काम कर दिया करो.
वह चारों आदमी उसे अपने साथ घर ले गए और वह चार मुट्ठी अनाज लाते और सभी बाँटकर खा लेते. एक दिन सेठानी ने कहा कि कल से आठ मुठ्ठी अनाज लाना. अगले दिन वह आठ मुठ्ठी अनाज लाए और सेठानी पड़ोसन से आग माँग लाई. उसने भोजन बनाया, विष्णु भगवान को भोग लगाया फिर सभी को खाने को दिया. सारे भाई बोले कि बहन आज तो भोजन बहुत स्वादिष्ट बना है. सेठानी ने कहा कि भगवान का जूठा है तो स्वाद तो होगा ही.
सेठानी के जाने के बाद सेठ भूखा रहने लगा और आस-पड़ोस के सारे लोग कहने लगे कि ये तो सेठानी के भाग्य से खाता था. एक दिन सेठ अपनी सेठानी को ढूंढने चल पड़ा. उसे ढूंढते हुए वह भी उस जंगल में पहुंच गया जहाँ वह चारों आदमी मिट्टी खोद रहे थे. सेठ ने उन्हें देखा तो कहा कि भाई मुझे भी काम पर रख लो. उन आदमियों ने उसे काम पर रख लिया लेकिन मिट्टी खोदने से उसके भी हाथों में छाले पड़ गए और बाल उड़ने लगे. उसकी यह हालत देख चारों बोले कि तुम्हे काम की आदत नहीं है, तुम हमारे साथ चलो और हमारे घर में रह लो.
सेठ उन चारों आदमियों के साथ उनके घर चला गया और जाते ही उसने सेठानी को पहचान लिया लेकिन सेठानी घूँघट में थी तो सेठ को देख नही पाई. सेठानी ने सभी के लिए भोजन तैयार किया और हर रोज की भाँति विष्णु भगवान को भोग लगाया. उसने उन चारों भाईयों को भोजन परोस दिया लेकिन जैसे ही वह सेठ को भोजन देने लगी तो विष्णु भगवान ने उसका हाथ पकड़ लिया. भाई बोले कि बहन ये तुम क्या कर रही हो़? वह बोली – मैं कुछ नहीं कर रही हूँ, मेरा हाथ तो विष्णु भगवान ने पकड़ लिया है. भाई बोले – हमें भी विष्णु भगवान के दर्शन कराओ? उसने भगवान से प्रार्थना की तो विष्णु जी प्रकट हो गए, सभी ने दर्शन किए.
सेठ ने सेठानी से क्षमा माँगी और सेठानी को साथ चलने को कहा. भाईयों ने अपनी बहन को बहुत सा धन देकर विदा किया. अब सेठानी के साथ सेठ भी भगवान विष्णु की पूजा करने लगा और उनके परिणाम से उनका घर अन्न-धन से भर गया.

इस कहानी को कहने के लिए संक्रांति से इसका आरंभ करना चाहिए और एक साल तक इसे कहना चाहिए. उसके बाद उद्यापन कर दे. विष्णु भगवान का पीला पीताम्बर, पाव भर गुड़, सवा पाँच रुपये और लक्ष्मी जी का श्रृंगार का सामान, साड़ी व दक्षिणा दें |

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                                                                                                                                                                                                            Source: https://bit.ly/2GerfUf

Wednesday, January 23, 2019

विष्णु पुराण की कुछ महत्वपूर्ण बातें ।


विष्णु पुराण
सदियों से भारतीय पुराणों और ग्रंथों में लिखी बातें व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखमय बनाने में अपनी भूमिका निभाती आई हैं। प्राचीन ऋषियों और महाज्ञानियों ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा या लिखा जो अव्यवहारिक दिखता। आज हम आपको विष्णु पुराण में लिखी कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण जानकारियां देने वाले हैं जो वाकई जीवन को उत्तम बनाती हैं। विष्णु पुराण में कुछ ऐसे कार्यों का उल्लेख है जिन्हें कभी भी व्यक्ति को अधिक देर तक नहीं करना चाहिए।

ज्यादा देर तक नहीं करना चाहिए स्नान
स्वास्थ्य की दृष्टि से स्नान करना बहुत उपयोगी है, स्नान करने के लिए कई लाभ भी है लेकिन अगर यही स्नान ज्यादा समय तक के लिए किया जाता है तो फायदे की जगह नुकसान पहुंचाता है। ज्यादा समय तक स्नान करने से शरीर को कई बीमारियां, जैसे सर्दी, जुखाम या बुखार जकड़ लेती है। इसलिए स्नान करने का काम जल्दी से जल्दी कर लेना चाहिए।

सोना और जागना
ज्यादा समय तक सोना और ज्यादा देर तक जागना, दोनों ही कार्य व्यक्ति के लिए घातक साबित होते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार सोने का समय कम या ज्यादा होने से स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। व्यक्ति को हमेशा ब्रह्ममुहुर्त में उठ जाना चाहिए।

विष्णु पुराण के अनुसार निर्वस्त्र होकर न सोएं
यदि आप निर्वस्त्र होकर सोते हैं तो इससे आपको ही नुकसान होता है। क्योंकि रात में कीट-पतंगे घूमते रहते हैं। और वह कीट-पतंगे आपको काट सकते हैं। दूसरा यह भी माना जाता है कि रात के समय में आपके पूर्वज आपसे मिलने आते हैं और यदि निर्वस्त्र होकर सोएंगे तो वे आपसे मिलेंगे नहीं।

विष्णु पुराण के अनुसार संभोग
विष्णु पुराण के अनुसार ज्यादा लंबे समय तक शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। इससे शारीरिक दुर्बलता आने लगती है और शरीर कमजोर पड़ने लगता है।

विष्णु पुराण के अनुसार व्यायाम करना
शरीर के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी है। लेकिन ये व्यायाम कितना और कब तक किया जाना चाहिए, यह बात बहुत मायने रखती है। व्यायाम हमेशा उतना ही करना चाहिए जितना हमारा शरीर सहन कर सके।

विष्णु पुराण के अनुसार लाल रंग के कपड़े
विष्णु पुराण वह ग्रंथ है जिसमें जीवन को कैसे जिया जाए इसके बारे में बताया गया है। इसी पुराण में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को किन चीजों को बेचना चाहिए और किन चीजों को नहीं बेचना चाहिए। इसी के अनुसार लाल रंग के कपड़ों को बेचने की मनाही है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति लाल रंग के कपड़े बेचता है तो वह पाप माना जाता है क्योंकि लाल रंग पूजा में शामिल होता है। और इस रंग के कपड़ों को दान में देना चाहिए।

विष्णु पुराण के अनुसार मांस बेचना
विष्णु पुराण में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मांस बेचता है तो वह अपराध माना जाता है। विष्णु पुराण में ही कहा गया है कि मांस बेचने वाले व्यक्ति को अगले जन्म किसी जानवर का जन्म मिलता है।

निर्वस्त्र होकर स्नान ना करें
विष्णु पुराण के अनुसार जो स्त्री-पुरुष निर्वस्त्र होकर स्नान करते हैं वे जल देवता का अपमान करते हैं। और इसे कृष्ण के जलकांड से भी जाना जाता है। एक बार गोपियों के पानी में स्नान करते हुए उन्होंने उनके वस्त्र हर लिए थे। वे गोपियां निर्वस्त्र थीं। इस वजह से कहा जाता है कि किसी को भी निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए।

रात में पेड़ों के नीचे सोने से बचें
हम यह जानते हैं कि पेड़ ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। यदि आप रात में पेड़ों के नीचे सोते हैं तो आपको सांस की समस्या हो सकती है। इसके अलावा अधिक मात्रा में कार्बनडाई ऑक्साइड लेने से दम घुटने लगता है।

सूनसान जगहों से बचें
विष्णु पुराण के अनुसार रात में ऐसी जगहों पर खड़े नहीं होना चाहिए जहां सूनापन हो। क्योंकि ऐसी जगहों का वातावरण नकारात्मक होता है। जिससे आपको समस्याएं हो सकती हैं।

गरीबों को सताना पाप
विष्णु पुराण में ऐसे कर्म को पाप माना गया है जिससे गरीबों को नुकसान हो। मसलन महंगाई के इस दौर में ऐसी वस्तुएं भी अधिक महंगी हो गई हैं जो किसी के जीवन के लिए अनिवार्य हैं। जैसे दूध, फल, अनाज आदि। गरीबों को अधिक महंगा पड़ता है। इस वजह से यह उन्हें सताना हुआ। और विष्णु पुराण में इसे पाप माना गया है।

विष्णु पुराण के अनुसार गाय का दूध
हम जानते हैं कि गाय एक ऐसा पशु है जिसे माता की संज्ञा दी गई है। विष्णु पुराण में गाय के दूध को बेचना भी पाप माना गया है।

अधार्मिक व्यक्ति से दूर रहे हैं
जिस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं होता वह अधार्मिक होता है। इसलिए ऐसे अधार्मिक व्यक्ति से किसी सज्जन व्यक्ति को दूर रहना चाहिए। क्योंकि ऐसा खऱाब चरित्र वाला व्यक्ति कुछ गड़बड़ करता है तो उसमें आपको भी परेशान होना पड़ सकता है।

विष्णु पुराण के अनुसार नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहे है

ऐसे स्थान जहां नकारात्मक वातावरण हो उस जगह पर मनुष्य को नहीं जाना चाहिए। खासकर श्मसान में रात के समय किसी भी व्यक्ति को नहीं जाना चाहिए। क्योंकि रात के समय श्मसान से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है

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                                                                                                                                                        Source:https://bit.ly/2Rbjr7x

Wednesday, January 2, 2019

भगवान विष्‍णु से जुड़ी ऐसी 5 ख़ास बातें ।

 
ऐसा माना गया है कि गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से गुरु ग्रह को शांत करने में मदद मिलती है. क्योंकि विष्णु जी सौरमंडल के गृह गुरु का प्रतिनिधित्व करते हैं. साथ ही पीला रंग विष्णु जी का अति प्रिय है. इस दिन पीले कपड़े पहनने चाहिए और पीली चीज़ों से ही इनकी पूजा की जानी चाहिए. जैसे केला, पीले फूल, बेसन के लड्डू या पीले मीठे चावल. यहां हम भगवान विष्णु जी से जुड़ी 5 बातें बता रहे हैं जिन्हें विष्णु जी के साधक को ज़रूर जानना चाहिए |

1. विष्णु जी के चार हाथ जीवन के इन चार चरणों को दर्शातें हैं पहला- ज्ञान की खोज, दूसरा- पारिवारिक जीवन, तीसरा- वन में वापसी और चौथा संन्यास.
2. उनके कानों के दो कुंडल दो विपरित चीज़ों के जोड़ को दर्शाते हैं. जैसे ज्ञान और अज्ञान, सुख और दुख आदि. 

3. उनके मुकुट पर लगा मोर पंख, उनके कृष्ण अवतार को दर्शाता है. ऐसा माना भी जाता है कि ये विष्णु जी ने कृष्ण भगवान से लिया है.
4. विष्णु जी की छाती पर बना श्रीवस्ता उनका लक्ष्मी जी के लिए प्रेम को दर्शाता है.

5. ऐसा माना जाता है कि विष्णु जी की नाग पर लेटे हुए रूप का अर्थ है कि मनुष्यों को सुख और खुशियों के साथ-साथ कई समस्याओं से भी उसी वक्त गुज़रना पड़ता है. यानि सुख के साथ दर्द भी. इसीलिए जीवन के इस सच को वो सांपों के ऊपर लेटकर मुस्कुराते हुए दर्शाते हैं |
                                                                                                                                 Source:https://bit.ly/2VqPe80

Thursday, September 20, 2018

विष्‍णु भगवान के चार हाथों के पीछे है इतनी बड़ी कहानी




हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु को धरती पर सबसे ज्यादा मनुष्य रूप में अवतार लेने वाले सभी देवताओं में सबसे पहला स्थान दिया जाता है।

अक्सर शेषनाग की शैय्या पर मौन होकर लेटे रहने वाले भगवान विष्णु का एक ऐसा रहस्य है जो उनके आशीष देने वाले हाथ से जुड़ा है।
पौराणिक कथा के मुताबिक, प्राचीनकाल में जब भगवान शिव के मन में सृष्टि की रचना का विचार आया तो उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि से भगवान विष्णु को उत्पन्न किया।

इसी गलती से सुदामा को मिली थी गरीबी

उन्हें चार हाथ भी प्रदान किए जिसमें कई शक्तियां विदमान हैं। भगवान विष्णु के दो हाथ मनुष्य के लिए भौतिक फल देने वाले हैं, पीठ की तरफ बने हुए दो हाथ मनुष्य के लिए आध्यात्मिक दुनिया का मार्ग दिखाते हैं।

माना जाता है कि भगवान विष्णु के चार हाथ चारों दिशाओं की भांति अंतरिक्ष की चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रीहरि के यह चारों हाथ मानव जीवन के लिए चार चरणों और चार आश्रमों के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं-


पहला - ज्ञान के लिए खोज (ब्रह्मचर्य )।


दूसरा - पारिवारिक जीवन (गृहस्थी)


तीसरा - वन में वापसी (वानप्रस्थ)


चौथा - संन्यास (संन्यासी जीवन)। 


                                                                                                                source - https://bit.ly/2Npk1Sn

Wednesday, May 23, 2018

हिरण्याक्ष का वध करने के लिए विष्णु बने वराह अवतार.

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनत-सनकादि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ धाम पहुंचे। वैकुंठ में विष्णु धाम के द्वार पर भगवान के दो पार्षद जय-विजय द्वारपाल के रूप में बैठे थे। इन दिगम्बर साधुओं को देखकर पहले तो उन्हें हंसी आ गई, फिर पूछा- “आप लोग कौन है ? ऐसे नंग-धड़ंग यहां कहां चले आ रहे है ?


उनकी बात का सनत ने बुरा नहीं माना, क्योंकि ये द्वारपाल थे और बिना पूरी जांच-पड़ताल के कैसे अंदर जाने देते। अपनी वेश-भूषा पर उनके हंसने का भी बुरा नहीं माना, क्योंकि वैकुंठ जैसे वैभवशाली परिवेश में ऐसे साधुओं का क्या काम। उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-“हम सनत कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते है। हम सदा इसी रूप में रहते है, इसलिए हमे अंदर जाने दो। ”

मगर जय-विजय नामक द्वारपालों ने सनत-सनकादि को अंदर नहीं जाने दिया। इससे ऋषियों को क्रोध आ गया कि इन द्वारपालों को इतनी भी समझ नहीं की ऋषियों साधुओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्रोध में उन्होंने शाप देते हुए कहा-“तुम दोनों ने देवों के साथ रहकर भी दैत्यों जैसा व्यवहार किया है, इसलिए अगले जन्म में तुम दोनों दैत्य कुल में जन्म लोगे।”

द्वार पर इस विवाद को सुनकर भगवान विष्णु स्वयं बाहर आ गए और सनत-सनकादि को आदर से अंदर जाने को कहा। उधर जय-विजय को दुखी देख भगवान विष्णु ने कारण पूछा तो उन्होंने अपने शाप की बात बताई।

भगवान विष्णु ने कहा-“उद्दंडता का फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। असुर कुल में तुम्हारा अगला जन्म अवश्य होगा। इतनी चिंता मत करो। तुम मेरे पार्षद हो, इसलिए इसका पुण्य भी मिलेगा। मेरे द्वारा ही तुम्हें दैत्य-योनि से मुक्ति मिलेगी।”

सनत-सनकादि भगवान के दर्शन कर चले गए। जय-विजय की मृत्यु होने पर उनका जन्म कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से हुआ। दिति दैत्य कुलों की माता थी, अतः उसके गर्भ से जन्म लेने वाले जय-विजय का नाम इस जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुआ। उन दोनों में प्रबल आसुरी शक्ति थी। उन्होंने अपने उत्पात द्वारा आसुरी शक्ति के बल पर आसुरी राज्य स्थापित किया। उन्होंने देवलोक पर भी आक्रमण कर देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके राज्य के सारे यज्ञ उनके ही नाम पर होंगे। देवों को कोई यज्ञ भाग नहीं मिलेगा। किसी भी देवी-देवता या ईश्वर की पूजा आराधना के बजाय उनकी ही पूजा होगी। देवगण कभी यहां पहुंच ही न सके, इसलिए मैं पृथ्वी को ही पाताल में पहुंचा देता हूं।” यह निश्चय कर हिरण्याक्ष आसुरी शक्ति के बल पर पृथ्वी को रसातल में ले गया।

इससे सारे ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि का नियम भंग होने लगा। चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया। ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर विष्णु से प्रार्थना की- “भगवान ! देखिए इन दो महापराक्रमी असुरो ने क्या किया ? देवताओं का यज्ञ भाग छीना, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त किए और अब तो समस्त भूमण्डल को ही रसातल में ले गए। उठिए, कुछ करिए। ब्रह्मा की सृष्टि में बड़ा व्यवधान उपस्थित हो गया है। आप ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने का स्थान बनाएं। पृथ्वी जल में डुब रही है, उसके उद्धार के लिए वैकुण्ठ का वास छोड़कर कोई अवतार लीजिए। ”

भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को आश्वासन दिया- “जब पृथ्वी पर पाप का भार ज्यादा हो जाता है तो उसके उद्धार के लिए मुझे अवतार लेना ही पड़ता है। आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं कुछ करता हूं।”

देवताओं के चले जाने पर भगवान विष्णु ने नीचे देखा। पृथ्वी का कही पता नहीं, सर्वत्र जल-ही-जल दिख रहा था। फिर तो भगवान वाराह के रूप में प्रकट हुए और समुद्र में कूद पड़े, भयंकर गर्जना के साथ अपनी विशाल दाढ़ पर पृथ्वी को रखकर वे अथाह जल राशि को चीरते हुए ऊपर आ गए। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते देख तथा वाराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष बौखला गया कि किसने उसकी शक्ति को चुनौती दी है। वाराह को देखते ही वह उसे मारने दौड़ा। उसका हर अस्त्र-शस्त्र वराह के शरीर से टकराकर चूर-चूर हो जाता था। भगवान कुछ देर उसके प्रहार झेलते रहे और उसके क्रोध को भड़काते रहे। रूप भले ही वाराह का था, पर थे तो वे परब्रह्म अनन्त शक्ति भगवान विष्णु।

उन्होंने एक झटके से हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठा लिया और घुमाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटकर वह धड़ाम से पृथ्वी पर वाराह के पास ही गिर पड़ा। मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वह वाराह अब वाराह न होकर भगवान विष्णु है। उसे अपना पूर्व जन्म याद हो आया।

उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा- “भगवान ! पाप के शाप का आपने अंत कर दिया और अपने ही हाथों इस जन्म से मुक्ति दिलाई। मुझे तो मुक्ति मिली, पर मेरे भाई हिरण्यकशिपु का क्या होगा ? उसे भी तो मुक्ति दीजिये।

भगवान विष्णु हंसकर बोले- “समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकशिपु के पाप का अभी अंत नहीं है। तुम्हारे अंत के लिए पृथ्वी कारण बनी। उसके अंत के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वाराह बनना पड़ा। उसके लिए नृसिंह रूप में अवतार लेकर उसका उद्धार करना पड़ेगा।”

भगवान विष्णु के ये शब्द सुनकर हिरण्याक्ष ने बड़ी शान्ति से अपने प्राण त्याग दिए।

Monday, January 29, 2018

विष्णु पुराण :- रात के समय नहीं करने चाहिए ये तीन काम

सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे, इसके लिए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों में बताया गया है कि हमें किस समय कौन से काम नहीं करना चाहिए। यहां जानिए विष्णु पुराण के अनुसार 3 ऐसी बातें, जिनसे रात के समय दूर रहना चाहिए…


विष्णु पुराण में बताए गए गृहस्थ संबंधी नियमों का पालन करने पर भगवान विष्णु, महालक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त की जा सकती है। यहां जानिए बुद्धिमान व्यक्ति को रात के समय किन 3 से दूर रहना चाहिए…

1. चौराहों पर नहीं जाना चाहिए

किसी भी समझदार व्यक्ति को रात के समय चौराहे से दूर ही रहना चाहिए। रात के समय अक्सर चौराहों पर असामाजिक तत्वों की उपस्थिति रहती है। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति चौराहे पर जाएगा तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, ये काम सदाचार के नियमों के विरुद्ध भी है। रात के समय अपने घर में ही रहना चाहिए।

2. श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए

रात के समय श्मशान के आसपास जाना भी नहीं चाहिए। श्मशान क्षेत्र में सदैव नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है। इसका बुरा असर हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ सकता है। साथ ही, श्मशान क्षेत्र में जलते हुए शवों से निकलने वाला धुआं भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रहता है। उस क्षेत्र के वातावरण में कई सूक्ष्म कीटाणु भी रहते हैं जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसीलिए श्मशान जाने के बाद स्नान करना जरूरी बताया गया है। रात के समय में स्नान करना भी स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। इन्हीं कारणों के चलते रात के समय श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए।

3. बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए

वैसे तो बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से हमेशा ही दूर रहना चाहिए, लेकिन रात के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बुरे चरित्र वाले लोग अधिकतर अधार्मिक और गलत कार्य रात के समय में ही करते हैं। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति इनके साथ रहेगा तो वह परेशानियों में उलझ सकता है। अत: इन लोगों से दूर रहना चाहिए।

Monday, May 9, 2016

अक्षय तृतीया का महत्व क्या है जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी



आज के दिन ही 1008 भगवान आदिनार्थ को गन्ने का आहार 6 माह बाद आहार की विधि मिली

आज  ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था ।

महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था ।

माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था 

द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था ।

कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था ।

कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था ।

सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।

ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।

प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है ।

बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है ।

इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था ।

अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है