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Thursday, March 14, 2019

भगवन श्री विष्णु का पौराणिक संदर्भ | Story of Lord Vishnu |




  • पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्रीविष्णु ही परमार्थ तत्त्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी हैं।
  • वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युतकृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं।
  • कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं। इसलिये भगवान श्रीविष्णु का नाम हरि है। मत्स्यकूर्मवराहवामनहयग्रीव तथा श्रीराम-कृष्ण आदि भगवान विष्णु के ही अवतार हैं।
  • भगवान श्रीविष्णु अत्यन्त दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करुणा-वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है।
  • जो भक्त भगवान श्रीविष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनके अर्चाविग्रह का दर्शन, वन्दन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।
  • यद्यपि भगवान विष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्त वत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं |
    • ध्रुव, प्रह्लादअजामिलद्रौपदी, गणिका आदि अनेक भक्तों का उनकी कृपा से उद्धार हुआ।
    • भक्त वत्सल भगवान को भक्तों का कल्याण करनें में यदि विलम्ब हो जाय तो भगवान उसे अपनी भूल मानते हैं और उसके लिये क्षमा-याचना करते हैं। धन्य है उनकी भक्त वत्सलता।
    • मत्स्य, कूर्म, वराह, श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारों की कथाओं में भगवान श्रीविष्णु की भक्त वत्सलता के अनेक आख्यान आये हैं। ये जीवों के कल्याण के लिये अनेक रूप धारण करते हैं।
    • वेदों में इन्हीं भगवान श्रीविष्णु की अनन्त महिमा का गान किया गया है।
    • विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णन मिलता है कि लवण समुद्र के मध्य में विष्णु लोक अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है। उसमें भगवान श्रीविष्णु वर्षा ऋतु के चार मासों में लक्ष्मी द्वारा सेवित होकर शेषशय्या पर शयन करते हैं।
    • पद्म पुराण के उत्तरखण्ड के 228वें अध्याय में भगवान विष्णु के निवास का वर्णन है।
    • वैकुण्ठ धाम के अन्तर्गत अयोध्यापुरी में एक दिव्य मण्डप है। मण्डप के मध्य भाग में रमणीय सिंहासन है। वेदमय धर्मादि देवता उस सिंहासन को नित्य घेरे रहते हैं। धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य, वैराग्य सभी वहाँ उपस्थित रहते हैं। मण्डप के मध्यभाग में अग्नि, सूर्य और चंद्रमा रहते हैं। कूर्म, नागराज तथा सम्पूर्ण वेद वहाँ पीठ रूप धारण करके उपस्थित रहते हैं। सिंहासन के मध्य में अष्टदल कमल है; जिस पर देवताओं के स्वामी परम पुरुष भगवान श्रीविष्णु लक्ष्मी के साथ विराजमान रहते हैं।
    • भक्त वत्सल भगवान श्रीविष्णु की प्रसन्नता के लिये जप का प्रमुख मन्त्र- ॐ नमो नारायणाय तथा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय है।
    • भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा के समय की जाने वाली आरती है।
    • भृगु द्वारा त्रिदेवपरीक्षा से देवताओं ने माना कि विष्णु ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

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                                                                                                                                                                                                          Source:https://bit.ly/2VYCapG

Thursday, March 7, 2019

क्यों दिया भगवान विष्णु को शुक्राचार्य के पिता ने श्राप?



शापित जीवन हमेशा दुखदायी माना जाता है। धार्मिक कथाओं की मानें तो यहां तक कि भगवान भी इसके दुष्परिणामों से बच नहीं पाए हैं। ऋषि दुर्वासा हमेशा अपने क्रोध और उसमें लोगों को श्राप देने के लिए जाने जाते रहे हैं। भगवान शिव से लेकर कृष्ण तक इसका परिणाम भुगत चुके हैं। लेकिन क्या किसी भी प्रकार यह श्राप आपकी जिंदगी को सुधार सकता है?
अध्यात्मिक मायनों में हर अंधेरा एक प्रकाश की ओर लेकर जाता है। अगर इसे श्राप के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत हद तक यह भी वरदान बन सकता है। आपने सुना होगा कि जो होता है वह हमेशा अच्छे के लिए होता है, फिर उसके तात्कालिक परिणाम बुरे ही क्यों ना दिख रहे हों।
अच्छे और बुरे परिणामों के साथ धार्मिक हिंदू कथाओं का उदाहरण लें तो ये श्राप ही थे जिसने कई रूपों में सृष्टि का कल्याण किया। अगर ये श्राप ना होते तो शायद संसार भी आज इन उन्नत रूपों में नहीं होता। इनमें एक है ऋषि भृगु का भगवान विष्णु को शाप देना जिसने हिंदू सभ्यता को जीने की राह दी।

कथा
यह कथा मत्स्य की है। इसके अनुसार भगवान विष्णु ने धरती पर अवतार तो लिया लेकिन इनका अवतार लेना उनको मिले श्राप का परिणाम था। असुर गुरु शुक्राचार्य के पिता महाऋषि भृगु ने भगवान विष्णु को कई बार धरती पर जन्म लेने का श्राप दिया था और इसीलिए उन्होंने राम, कृष्ण, नरसिंहा और परशुराम आदि रूपों में मनुष्य रूप में जन्म लिया।
इसके अनुसार शुक्राचार्य बृहस्पति से अधिक ज्ञानी थे, बावजूद इसके देवराज इंद्र ने उनकी बजाय बृहस्पति को अपना गुरु माना। इसे अपना अपमान मानकर शुक्राचार्य ने असुरों का गुरु बनना स्वीकार कर लिया और असुरों के माध्यम से इंद्र से बदला लेने की ठानी।
लेकिन देवों को अमरता का वरदान था और असुरों को नहीं, इसलिए शुक्राचार्य को यह अच्छी तरह पता था कि असुर कभी भी देवों से जीत नहीं पाएंगे। इस मुश्किल का हल पाने के लिए शुक्राचार्य ने भगवान शिव को प्रसन्न कर मृत-संजीवनी का वरदान पाने की युक्ति सोची।
यह वह चीज थी जिससे किसी मृत को भी जिंदा किया जा सकता था। शुक्राचार्य भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या करने निकल गए लेकिन जाने से पहले उन्होंने असुरों को अपने माता-पिता ऋषि भृगु और मां काव्यमाता की कुटिया में रहने का निर्देश दिया ताकि उनकी अनुपस्थिति में देवता उन्हें नुकसान ना पहुंचा सकें।
जब इंद्र को यह बात पता चली तो उन्होंने इसे देवों को जीतने का एक सुनहरा अवसर माना। एक दिन जब ऋषि भृगु कुटिया में नहीं थे उन्होंने वहां आक्रमण कर दिया। लेकिन काव्यमाता ने अपने तेज से एक सुरक्षा कवच का निर्माण किया जिससे देव असुरों को नुकसान नहीं पहुंचा सके। इस प्रकार देवता असुरों से हारने लगे।
भगवान विष्णु को जब यह बात पता चली तो उन्होंने देवों की रक्षा करने की सोची। वे इंद्र का रूप धरकर कुटिया में गए और जब काव्यमाता देवों को परास्त करने लगीं तो अपने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। ऋषि भृगु को जब यह बात पता चली तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि उन्हें भी बार-बार धरती पर जन्म लेकर जन्म-मरण के कष्टों को महसूस करना होगा। हालांकि बाद में ऋषि ने कामधेनु गाय की मदद से काव्यमाता को जिंदा कर लिया लेकिन उन्होंने भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस नहीं लिया।
इस प्रकार धरती पर बार-बार पहले राम और फिर कृष्ण रूप में जन्म लिया। इसके अलावा नरसिंहा, परशुराम आदि रूपों में भी वे धरती पर अवतरित हुए। राम के जन्म से रामायण की रचना हुई और कृष्ण के अवतार में महाभारत कथा हुई। इस प्रकार जगत को ‘रामायण’ और ‘गीता’ ग्रंथ मिले। इनकी उपयोगिता और महत्व को किसी भी तरह समझाने की आवश्यकता नहीं है।

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Thursday, February 21, 2019

भगवन विष्णु - महापुराण । (Lord Vishnu story)



सच्चे भक्त बालक के लिए विष्णु ने धरती के कर दिए थे दो टुकड़े ! आज का विशेष – भक्तों का भगवान !!


भगवान अपने भक्त का ध्यान हमेशा रखता है.
अगर भक्त सभी मुश्किलों को झेलते हुए अपने ईश्वर का ध्यान करता रहता है तो भगवान भी ऐसे भक्त के लिए कुछ भी कर देते हैं.
हमारे इतिहास में वैसे इस तरह की कई कहानियां हैं लेकिन संत महिदास जी की कथा को बहुत ही कम लोग जानते हैं. एक बच्चा जो विष्णु भगवान को बहुत मानता था और इनकी आराधना करता था. पिता इस बालक को निकम्मा समझते थे और समाज भी बालक को इज्जत नहीं देता था. एक बार बालक परेशान हुआ तो कहते हैं कि विष्णु भगवान धरती फाड़कर उसमें से प्रकट हुए थे.
तो आइये आज इसी बालक महिदास की कहानी पढ़ते हैं. पेश है आज का विशेष- भक्तों का भगवान
कहानी है कि हारीत ऋषि के वंश में माणडूकि नाम के विधान थे. कहते हैं कि इनकी कई पत्नियाँ थीं. इसीलिए शायद शास्त्रों में यह ऋषि काफी विवादों से घिरे हुए रहे हैं.
अनेक पत्नियों में से एक पत्नी का नाम इतरा था. इन्हीं से जन्म लेने वाले पुत्र का नाम महिदास था.
लेकिन यहाँ पर इस ऋषि के नाम पर कुछ विवाद हैं. पहला विवाद यह है कि हारीत ऋषि खुद तो हारित थे तो इनका बच्चा कैसे ‘मही’-‘दास’ बोला जाता है. क्योकि दास को छोटी जाति का सूचक है.
तो कुछ विद्वान कहते हैं कि इनकी कई पत्नियों में से यह पत्नी शायद छोटी जात से थी इसलिए बच्चा महिदास ही रहा.
बाद में जब बच्चे को पिता का नाम नहीं मिला तो इसने माता का नाम खुद के साथ जोड़ते हुए, खुद को महिदास हारीत की बजाय महिदास ऐतरेय बोला.
अब अगर मुख्य मुद्दे की बात करें तो स्कन्दपुराण बताता है कि महिदास बचपन से ही विष्णु के मन्त्र का जाप करते थे.  एक यही कारण था कि इनके पिता माणडूकि इनको बेकार समझते थे. कुछ समय बाद पिता ने रोज ही इस बालक को अपमानित करना शुरू कर दिया था.
इस बात को देखकर महिदास की माँ बहुत निराश रहने लगी थी. वह खिन्न थी क्योकि पिता इसके बच्चे का अपमान करता था और दूसरी पत्नियों के बच्चों को गले से लगाकर रखता था.
एक बार यज्ञ के दौरान पिता ने एक बालक को अपनी गोद में बैठा लिया और हरिदास को जमीन पर ही रहने दिया. इस बात से हरिदास और उसकी को काफी चोट पहुंची और माँ ने धरती फट जाए ऐसा बोला.
तब कहते हैं कि तुरंत धरती फटती है और विष्णु भगवान सोने का सिंहासन लिए प्रकट होते हैं. यह सिंहासन हरिदास के लिए था. एक भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर खुद भगवान प्रकट हुए थे.
बाद में इसी बालक ने ब्राह्मणग्रन्थ का निर्माण कर इतिहास लिखा है. यह कथा दर्शाती है कि भगवान बिना बोले भी भक्त की परेशानी समझते हैं और वक़्त आने पर उसका हल भी निकाल देते हैं.
(प्रस्तुत कहानी की सत्यता स्कन्दपुराण और भारत गाथा नामक पुस्तक से जाँची जा सकती हैं. कहानी के कई प्रकार के अन्य रूप भी हैं किन्तु कहानी का अंत हर जगह यही है.)
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Thursday, February 14, 2019

Shri Vishnu Puran | श्री विष्णु पुराण ।


श्री विष्णु-पुराण


प्राचीन काल में महर्षि मैत्रेय ने श्री पाराशर मुनि के आश्रम में जाकर उन्हें प्रणाम किया फिर स्वस्थ चित्त से सत्संग प्रारंभ हुआ। मैत्रेय ने कहा, हे महात्मन् ! मेरे मन में कुछ प्रश्न उठ रहे हैं उन्हीं के उत्तर की अकांक्षा से मैं आपके दर्शन करने चला आया। आप अपने श्री मुख से अमृत वर्षा करके मुझे कृतार्थ करने की कृपा करें। इस संसार की उत्पत्ति कैसे हुई। पहले यह किसमें लीन था। प्रलय काल में किसमें लीन होगा। पंच महाभूत, भूमि, वन, पर्वत, देव, मानव तथा मन्वन्तर के विषयों पर आप प्रकाश डाल कर मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिये।

तब प्रसन्न होकर महर्षि पाराशर बोले हे, महात्मन् ! यह प्रसंग मेरे पितामह वशिष्ठ जी तथा पुलस्त्य जी से मैंने सुना था। मैं आपकी जिज्ञासा यथासम्भव शान्त करूँगा। आप पूर्णमनोयोग से सुनें। प्राचीन काल में विश्वामित्र की प्रेरणा से मेरे पिता को एक राक्षस ने खा डाला था जिससे मेरा क्रोध बढ़ गया था। शोक एवं क्रोधावेश में आकर मैंने राक्षसों का विनाश करने के लिये एक यज्ञ अनुष्ठित किया। यज्ञाहुतियों के साथ सैकड़ों राक्षस जल कर भष्म होने लगे। तब मेरे दादा वशिष्ठ जी ने मुझसे समझाते हुए कहा हे वत्स ! क्रोध का त्याग करो। इन राक्षसों का क्या दोष ? तुम्हारे पिता के भाग्य का लेख ही ऐसा था। ज्ञानी को क्रोध शोभा नहीं देता। मारना जिलाना ईश्वर के आधीन है भले ही निमित्त कोई भी बन जाय। यज्ञ को यहीं विराम दो ! क्षमा साधु का भूषण होता है।

उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैंने यज्ञ बन्द कर दिया। मेरे दादा वशिष्ठ जी मुझ पर प्रसन्न हुए। उसी समय पुलस्त्य जी भी वहाँ आ गए। वशिष्ठ जी ने उनका अभिवादन करते हुए उन्हें अर्ध्य देकर आसन प्रदान किया। फिर बातों-बातों में मेरे विषय में भी बता दिया। तब पुलस्त्य जी ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा कि तुमने अपने पितामह की आज्ञा मानकर क्षमा का आश्रय लिया। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें आशीर्वाद दे रहा हूँ कि सम्पूर्ण सास्त्रों का ज्ञान तुम्हें सहज ही हो जाएगा और तुम पुराण संहिता की रचना करोगे तथा तुम्हें ईश्वर के यथार्थ रूप का ज्ञान हो जायेगा। पूर्वर्ती काल में उन दोनों ऋषियों के वर के प्रभाव से मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया। यह संसार विष्णु के द्वारा उत्पन्न किया गया वही इसके पालक हैं तथा प्रलय में यह उन्हीं में लय हो जाता है।

सृष्टि का उद्भव


महर्षि पाराशार ने कहा हे मुनीश्वर ! ब्रह्मा रूप में सृष्टि विष्णु रूप में पालन तथा रुद्र रूप में संहार करने वाले भगवान विष्णु को नमन करता हूँ। एक रूप होते हुए भी अनेक रूपधारी, अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त रूप वाले, घट घट वासी अविनाशी पुरुषोत्तम को नमस्कार करते हुए मैं आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों के विषय में कहने जा रहा हूँ।

भगवान नारायण त्रिगुण प्रधान तथा विष्ण के मूल है। वह अनादि हैं। उत्पत्ति लय से रहित हैं। वह सर्वत्र तथा सबमें व्याप्त हैं। प्रलय काल में दिन था न रात्रि, न पृथ्वी न आकाश, न प्रकाश और न अन्धकार ही था। केवल ब्रह्म पुरुष ही था। विष्णु के निरूपाधि रूप से दो रूप हुए। पहला प्रधान और दूसरा पुरुष। विष्णु के जिस अन्य रूप द्वारा वह दोनों सृष्टि तथा प्रलय में संयुक्त अथवा वियुक्त होते हैं उस रूपान्तर को ही काल कहा जाता है। बीत चुके प्रलय काल में इस व्यक्त प्रपंच की स्थित प्रकृति में ही थी।

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                                                                                                                                                                                                               Source:https://bit.ly/2BC8B5y

Thursday, February 7, 2019

भगवान विष्णु जी और माता लक्ष्मी जी की एक कहानी |

एक बार भगवान विष्णु जी शेषनाग पर बेठे बेठे बोर होगये, ओर उन्होने धरती पर घुमने का विचार मन मै किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, ओर वह अपनी यात्रा की तेयारी मे लग गये, स्वामी को तेयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा !
आज सुबह सुबह कहा जाने कि तेयारी हो रही है?? विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हुं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हुं???? भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी मनवाली।
ओर सुबह सुबह मां लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये, अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी, ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, ओर मां लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, ओर भुल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है?ओर चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।
उत्तर दिशा मै मां लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, ओर उस तरफ़ से भीनी भीनी खुशबु आ रही थी,ओर बहुत ही सुन्दर सुन्दर फ़ुल खिले थे,यह एक फ़ुलो का खेत था, ओर मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत मे गई ओर एक सुंदर सा फ़ुल तोड लाई, लेकिन यह क्या जब मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे, ओर भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उस का कुछ भी नही लेना चाहिये, ओर साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।
ओर मां लक्ष्मी एक गरीब ओरत का रुप धारण करके , उस खेत के मालिक के घर गई, घर क्या एक झोपडा था, ओर मालिक का नाम माधव था, माधब की बीबी, दो बेटे ओर तीन बेटिया थी , सभी उस छोटे से खेत मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,
मां लक्ष्मी जब एक साधारण ओर गरीब ओरत बन कर जब माधव के झोपडे पर गई तो माधव ने पुछा बहिन तुम कोन हो?ओर इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा ,मै एक गरीब ओरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मेने कई दिनो से खाना भी नही खाया मुझे कोई भी काम देदॊ, साथ मै मै तुम्हरे घर का काम भी कर दिया करुगी, बस मुझे अपने घर मै एक कोने मै आसरा देदो? माधाव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटिया होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।
माधाव ने मां लक्ष्मी को अपने झोपडे मए शरण देदी, ओर मां लक्ष्मी तीन साल उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही;
जिस दिन मां लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को इतनी आमदनी हुयी फ़ुलो से की शाम को एक गाय खरीद ली,फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खारीद ली, ओर सब ने अच्छे अच्छे कपडे भी बनबा लिये, ओर फ़िर एक बडा पक्का घर भी बनबा लिया, बेटियो ओर बीबी ने गहने भी बनबा लिये, ओर अब मकान भी बहुत बडा बनाबा लिया था।
माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है मेरी, ओर अब २-५ साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै ओर खेत मै काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने खेतो से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने दुवार पर एक देवी स्वरुप गहनो से लदी एक ओरात को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया अरे यह तो मेरी मुहं बोली चोथी बेटी यानि वही ओरत है, ओर पहचान गया कि यह तो मां लक्ष्मी है.
अब तक माधव का पुरा परिवार बाहर आ गया था, ओर सब हेरान हो कर मां लक्ष्मी को देख रहै थे,माधव बोला है मां हमे माफ़ कर हम ने तेरे से अंजाने मै ही घर ओर खेत मे काम करवाया, है मां यह केसा अपराध होगया, है मां हम सब को माफ़ कर दे|
अब मां लक्ष्मी मुस्कुराई ओर बोली है माधव तुम बहुत ही अच्छे ओर दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेती की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्या की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हुं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की ओर धन की कमी नही रहै गी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हक दार हो, ओर फ़िर मां अपने स्वामी के दुवारा भेजे रथ मे बेठ कर बेकुण्ठ चली गई
इस कहानी मै मां लक्ष्मी का संदेशा है कि जो लोग दयालु ओर साफ़ दिल के होते है मै वही निवास करती हुं, हमे सभी मानवओ की मदद करनी चाहिये, ओर गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।
शिक्षा….. इस कहानी मै लेखक यहि कहना चाहता है कि एक छोटी सी भुल पर भगवान ने मां लक्ष्मी को सजा देदी हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर इन्सान के प्र्ति दयालुता दिखानि ओर बरतनि चाहिये, ओर यह दुख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है | 
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                                                                                                                                                                                           Source:https://bit.ly/2SiBwpR

Wednesday, January 23, 2019

विष्णु पुराण की कुछ महत्वपूर्ण बातें ।


विष्णु पुराण
सदियों से भारतीय पुराणों और ग्रंथों में लिखी बातें व्यक्ति के जीवन को सफल और सुखमय बनाने में अपनी भूमिका निभाती आई हैं। प्राचीन ऋषियों और महाज्ञानियों ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा या लिखा जो अव्यवहारिक दिखता। आज हम आपको विष्णु पुराण में लिखी कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण जानकारियां देने वाले हैं जो वाकई जीवन को उत्तम बनाती हैं। विष्णु पुराण में कुछ ऐसे कार्यों का उल्लेख है जिन्हें कभी भी व्यक्ति को अधिक देर तक नहीं करना चाहिए।

ज्यादा देर तक नहीं करना चाहिए स्नान
स्वास्थ्य की दृष्टि से स्नान करना बहुत उपयोगी है, स्नान करने के लिए कई लाभ भी है लेकिन अगर यही स्नान ज्यादा समय तक के लिए किया जाता है तो फायदे की जगह नुकसान पहुंचाता है। ज्यादा समय तक स्नान करने से शरीर को कई बीमारियां, जैसे सर्दी, जुखाम या बुखार जकड़ लेती है। इसलिए स्नान करने का काम जल्दी से जल्दी कर लेना चाहिए।

सोना और जागना
ज्यादा समय तक सोना और ज्यादा देर तक जागना, दोनों ही कार्य व्यक्ति के लिए घातक साबित होते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार सोने का समय कम या ज्यादा होने से स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। व्यक्ति को हमेशा ब्रह्ममुहुर्त में उठ जाना चाहिए।

विष्णु पुराण के अनुसार निर्वस्त्र होकर न सोएं
यदि आप निर्वस्त्र होकर सोते हैं तो इससे आपको ही नुकसान होता है। क्योंकि रात में कीट-पतंगे घूमते रहते हैं। और वह कीट-पतंगे आपको काट सकते हैं। दूसरा यह भी माना जाता है कि रात के समय में आपके पूर्वज आपसे मिलने आते हैं और यदि निर्वस्त्र होकर सोएंगे तो वे आपसे मिलेंगे नहीं।

विष्णु पुराण के अनुसार संभोग
विष्णु पुराण के अनुसार ज्यादा लंबे समय तक शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। इससे शारीरिक दुर्बलता आने लगती है और शरीर कमजोर पड़ने लगता है।

विष्णु पुराण के अनुसार व्यायाम करना
शरीर के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी है। लेकिन ये व्यायाम कितना और कब तक किया जाना चाहिए, यह बात बहुत मायने रखती है। व्यायाम हमेशा उतना ही करना चाहिए जितना हमारा शरीर सहन कर सके।

विष्णु पुराण के अनुसार लाल रंग के कपड़े
विष्णु पुराण वह ग्रंथ है जिसमें जीवन को कैसे जिया जाए इसके बारे में बताया गया है। इसी पुराण में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को किन चीजों को बेचना चाहिए और किन चीजों को नहीं बेचना चाहिए। इसी के अनुसार लाल रंग के कपड़ों को बेचने की मनाही है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति लाल रंग के कपड़े बेचता है तो वह पाप माना जाता है क्योंकि लाल रंग पूजा में शामिल होता है। और इस रंग के कपड़ों को दान में देना चाहिए।

विष्णु पुराण के अनुसार मांस बेचना
विष्णु पुराण में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मांस बेचता है तो वह अपराध माना जाता है। विष्णु पुराण में ही कहा गया है कि मांस बेचने वाले व्यक्ति को अगले जन्म किसी जानवर का जन्म मिलता है।

निर्वस्त्र होकर स्नान ना करें
विष्णु पुराण के अनुसार जो स्त्री-पुरुष निर्वस्त्र होकर स्नान करते हैं वे जल देवता का अपमान करते हैं। और इसे कृष्ण के जलकांड से भी जाना जाता है। एक बार गोपियों के पानी में स्नान करते हुए उन्होंने उनके वस्त्र हर लिए थे। वे गोपियां निर्वस्त्र थीं। इस वजह से कहा जाता है कि किसी को भी निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए।

रात में पेड़ों के नीचे सोने से बचें
हम यह जानते हैं कि पेड़ ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। यदि आप रात में पेड़ों के नीचे सोते हैं तो आपको सांस की समस्या हो सकती है। इसके अलावा अधिक मात्रा में कार्बनडाई ऑक्साइड लेने से दम घुटने लगता है।

सूनसान जगहों से बचें
विष्णु पुराण के अनुसार रात में ऐसी जगहों पर खड़े नहीं होना चाहिए जहां सूनापन हो। क्योंकि ऐसी जगहों का वातावरण नकारात्मक होता है। जिससे आपको समस्याएं हो सकती हैं।

गरीबों को सताना पाप
विष्णु पुराण में ऐसे कर्म को पाप माना गया है जिससे गरीबों को नुकसान हो। मसलन महंगाई के इस दौर में ऐसी वस्तुएं भी अधिक महंगी हो गई हैं जो किसी के जीवन के लिए अनिवार्य हैं। जैसे दूध, फल, अनाज आदि। गरीबों को अधिक महंगा पड़ता है। इस वजह से यह उन्हें सताना हुआ। और विष्णु पुराण में इसे पाप माना गया है।

विष्णु पुराण के अनुसार गाय का दूध
हम जानते हैं कि गाय एक ऐसा पशु है जिसे माता की संज्ञा दी गई है। विष्णु पुराण में गाय के दूध को बेचना भी पाप माना गया है।

अधार्मिक व्यक्ति से दूर रहे हैं
जिस व्यक्ति का चरित्र ठीक नहीं होता वह अधार्मिक होता है। इसलिए ऐसे अधार्मिक व्यक्ति से किसी सज्जन व्यक्ति को दूर रहना चाहिए। क्योंकि ऐसा खऱाब चरित्र वाला व्यक्ति कुछ गड़बड़ करता है तो उसमें आपको भी परेशान होना पड़ सकता है।

विष्णु पुराण के अनुसार नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहे है

ऐसे स्थान जहां नकारात्मक वातावरण हो उस जगह पर मनुष्य को नहीं जाना चाहिए। खासकर श्मसान में रात के समय किसी भी व्यक्ति को नहीं जाना चाहिए। क्योंकि रात के समय श्मसान से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है

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                                                                                                                                                        Source:https://bit.ly/2Rbjr7x

Wednesday, January 2, 2019

भगवान विष्‍णु से जुड़ी ऐसी 5 ख़ास बातें ।

 
ऐसा माना गया है कि गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से गुरु ग्रह को शांत करने में मदद मिलती है. क्योंकि विष्णु जी सौरमंडल के गृह गुरु का प्रतिनिधित्व करते हैं. साथ ही पीला रंग विष्णु जी का अति प्रिय है. इस दिन पीले कपड़े पहनने चाहिए और पीली चीज़ों से ही इनकी पूजा की जानी चाहिए. जैसे केला, पीले फूल, बेसन के लड्डू या पीले मीठे चावल. यहां हम भगवान विष्णु जी से जुड़ी 5 बातें बता रहे हैं जिन्हें विष्णु जी के साधक को ज़रूर जानना चाहिए |

1. विष्णु जी के चार हाथ जीवन के इन चार चरणों को दर्शातें हैं पहला- ज्ञान की खोज, दूसरा- पारिवारिक जीवन, तीसरा- वन में वापसी और चौथा संन्यास.
2. उनके कानों के दो कुंडल दो विपरित चीज़ों के जोड़ को दर्शाते हैं. जैसे ज्ञान और अज्ञान, सुख और दुख आदि. 

3. उनके मुकुट पर लगा मोर पंख, उनके कृष्ण अवतार को दर्शाता है. ऐसा माना भी जाता है कि ये विष्णु जी ने कृष्ण भगवान से लिया है.
4. विष्णु जी की छाती पर बना श्रीवस्ता उनका लक्ष्मी जी के लिए प्रेम को दर्शाता है.

5. ऐसा माना जाता है कि विष्णु जी की नाग पर लेटे हुए रूप का अर्थ है कि मनुष्यों को सुख और खुशियों के साथ-साथ कई समस्याओं से भी उसी वक्त गुज़रना पड़ता है. यानि सुख के साथ दर्द भी. इसीलिए जीवन के इस सच को वो सांपों के ऊपर लेटकर मुस्कुराते हुए दर्शाते हैं |
                                                                                                                                 Source:https://bit.ly/2VqPe80

Monday, December 31, 2018

सफला एकादशी -जानिए संपूर्ण पूजन विधि, कथा व महत्व |


पौष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 18 दिसंबर, गुरुवार को है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत को करने से भगवान श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। इस व्रत की विधि इस प्रकार है- 

सफला एकादशी के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहन कर माथे पर चंदन लगाकर कमल अथवा वैजयंती फूल, फल, गंगा जल, पंचामृत व धूप-दीप से भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा एवं आरती करें। भगवान श्रीहरि के विभिन्न नाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए फलों के द्वारा उनका पूजन करें। पूरे दिन निराहार रहें, शाम को दीपदान के बाद फलाहार कर सकते हैं।

इस रात्रि को वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान श्रीहरि का नाम-संकीर्तन करते हुए जागते हैं। सफला एकादशी की रात जागरण करने से जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर भी नहीं मिलता, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है।

द्वादशी (19 दिसंबर, शुक्रवार) के दिन भगवान की पूजा के पश्चात कर्मकाण्डी ब्राह्मण को भोजन करवा कर जनेऊ एवं दक्षिणा देकर विदा करने के पश्चात भोजन करें।

                                                                                                                                  Source: https://bit.ly/2St7L1D

Wednesday, January 10, 2018

भगवान विष्णु के 24 अवतार कौन से हैं

जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान शिव और भगवान विष्णु ने कई बार पृथ्वी पर अवतार लिया है। भगवान विष्णु के 24 वें अवतार के बारे में कहा जाता है कि‘कल्कि अवतार’के रूप में उनका आना सुनिश्चित है। उनके 23 अवतार अब तक पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं।  इन 24 अवतार में से 10 अवतार विष्णु जी के मुख्य अवतार माने जाते हैं। यह है मत्स्य अवतार, कूर्म अवतार, वराह अवतार, नृसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार. कृष्ण अवतार, बुद्ध अवतार, कल्कि अवतार।


1- श्री सनकादि मुनि  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

2- वराह अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए।

जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया।

3- नारद अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार देवर्षि नारद भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है।  श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं।

4- नर-नारायण  :
सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए दो रूपों में अवतार लिया। इस अवतार में वे अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं वक्ष:स्थल में श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका संपूर्ण वेष तपस्वियों के समान था। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने नर-नारायण के रूप में यह अवतार लिया था।

5- कपिल मुनि  :
भगवान विष्णु ने पांचवा अवतार कपिल मुनि के रूप में लिया। इनके पिता का नाम महर्षि कर्दम व माता का नाम देवहूति था। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह के शरीर त्याग के समय वेदज्ञ व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवा कपिल भी वहां उपस्थित थे। भगवान कपिल के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं।

6- दत्तात्रेय अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय भी भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-
एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें।

तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं।
 
ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

7-  यज्ञ :
भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई। इन्हीं आकूति के यहां भगवान विष्णु यज्ञ नाम से अवतरित हुए। भगवान यज्ञ के उनकी धर्मपत्नी दक्षिणा से अत्यंत तेजस्वी बारह पुत्र उत्पन्न हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तर में याम नामक बारह देवता कहलाए।

8- भगवान ऋषभदेव  :
भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में आठवांं अवतार लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाराज नाभि की कोई संतान नहीं थी। इस कारण उन्होंने अपनी धर्मपत्नी मेरुदेवी के साथ पुत्र की कामना से यज्ञ किया। यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।

वरदान स्वरूप कुछ समय बाद भगवान विष्णु महाराज नाभि के यहां पुत्र रूप में जन्मे। पुत्र के अत्यंत सुंदर सुगठित शरीर, कीर्ति, तेल, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम ऋषभ (श्रेष्ठ) रखा।

9- आदिराज पृथु  :
भगवान विष्णु के एक अवतार का नाम आदिराज पृथु है। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वायम्भुव मनु के वंश में अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसिक पुत्री सुनीथा के साथ हुआ। उनके यहां वेन नामक पुत्र हुआ। उसने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा।
 
तब महर्षियों ने मंत्र पूत कुशों से उसका वध कर दिया। तब महर्षियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया कि पृथु के वेष में स्वयं श्रीहरि का अंश अवतरित हुआ है।

10- मत्स्य अवतार  :
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।
 
राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा।
 
उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।

11- कूर्म अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इंद्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इंद्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए।
 
समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया।
 
किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

12- भगवान धन्वन्तरि  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार जब देवताओं व दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमें से सबसे पहले भयंकर विष निकला जिसे भगवान शिव ने पी लिया। इसके बाद समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, देवी लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, कल्प वृक्ष, अप्सराएं और भी बहुत से रत्न निकले। सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। यही धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अवतार माने गए हैं। इन्हें औषधियों का स्वामी भी माना गया है।

13- मोहिनी अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर निकले। जैसे ही अमृत मिला अनुशासन भंग हुआ। देवताओं ने कहा हम ले लें, दैत्यों ने कहा हम ले लें। इसी खींचातानी में इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कुंभ लेकर भाग गया। सारे दैत्य व देवता भी उसके पीछे भागे। असुरों व देवताओं में भयंकर मार-काट मच गई।

देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। भगवान ने मोहिनी रूप में सबको मोहित कर दिया किया। मोहिनी ने देवता व असुर की बात सुनी और कहा कि यह अमृत कलश मुझे दे दीजिए तो मैं बारी-बारी से देवता व असुर को अमृत का पान करा दूंगी। दोनों मान गए। देवता एक तरफ  तथा असुर दूसरी तरफ  बैठ गए।
 
फिर मोहिनी रूप धरे भगवान विष्णु ने मधुर गान गाते हुए तथा नृत्य करते हुए देवता व असुरों को अमृत पान कराना प्रारंभ किया । वास्तविकता में मोहिनी अमृत पान तो सिर्फ देवताओं को ही करा रही थी, जबकि असुर समझ रहे थे कि वे भी अमृत पी रहे हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं का भला किया।

14- भगवान नृसिंह  :
भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया।
 
हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

15- वामन अवतार :
सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया।
 
एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा। बलि के सिर पर पग रखने से वह सुतललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे सुतललोक का स्वामी भी बना दिया। इस तरह भगवान वामन ने देवताओं की सहायता कर उन्हें स्वर्ग पुन: लौटाया।

16- हयग्रीव अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

17- श्रीहरि अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समय में त्रिकूट नामक पर्वत की तराई में एक शक्तिशाली गजेंद्र अपनी हथिनियों के साथ रहता था। एक बार वह अपनी हथिनियों के साथ तालाब में स्नान करने गया। वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा। गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष एक हजार साल तक चलता रहा। अंत में गजेंद्र शिथिल पड़ गया और उसने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। गजेंद्र की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया। भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया।

18- परशुराम अवतार  :
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के  प्रमुख अवतारों में से एक थे। भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-
 
प्राचीन समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा कि आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं, सभी ओर मेरा ही राज है। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्रि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया।

19- महर्षि वेदव्यास  :
पुराणों में महर्षि वेदव्यास को भी भगवान विष्णु का ही अंश माना गया है। भगवान व्यास नारायण के कलावतार थे। वे महाज्ञानी महर्षि पराशर के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। उनका जन्म कैवर्तराज की पोष्यपुत्री सत्यवती के गर्भ से यमुना के द्वीप पर हुआ था। उनके शरीर का रंग काला था। इसलिए उनका एक नाम कृष्णद्वैपायन भी था। इन्होंने ही मनुष्यों की आयु और शक्ति को देखते हुए वेदों के विभाग किए। इसलिए इन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। इन्होंने ही महाभारत ग्रंथ की रचना भी की।

20- हंस अवतार  :
एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा में बैठे थे। तभी वहां उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे। तभी वहां भगवान विष्णु महाहंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया। इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की। इसके बाद महाहंसरूपधारी श्रीभगवान अदृश्य होकर अपने पवित्र धाम चले गए।

21- श्रीराम अवतार :
त्रेतायुग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे। उसके वध के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और मर्यादा का पालन करते हुए अपना जीवन यापन किया।
पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास भोगते समय राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर ले गया। सीता की खोज में भगवान लंका पहुंचे, वहां भगवान श्रीराम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मारा गया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को भय मुक्त किया।

22- श्रीकृष्ण अवतार  :
द्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया।   भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था। भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए और दुष्टों का सर्वनाश किया। कंस का वध भी भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

23- बुद्ध अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है। एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इंद्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इंद्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।
 
इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं। भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण करना छोड़ दिया। इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।

24- कल्कि अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार कलयुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।

Source :- http://bit.ly/2CY5U0f
                http://bit.ly/2mjDbsl

Wednesday, December 3, 2014

Hindu Quiz - Vishnu Avatar





Quiz - Can you guess the Lord Vishnu avatar ?

1. Narasimha
2. Kurma
3. Matsya
4. Krishna

How to enter contest 

1. Like Param Shradhey Shri Radhe Maa page on facebook 


2. Guess the right answer and submit on - Link 

3. Comment and tag your friends in comment, more you tag more chances of winning!

- Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust

Note

To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.

One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

(Photo Courtesy - google.com)

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