Monday, January 29, 2018

माता वैष्णो देवी की अमर कथा :-

वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं।



माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा

मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया।

भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया।

भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी।

माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं।

माता वैष्णो देवी की अन्य कथा

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुता नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण वैष्णवी नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी।

जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतुकलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो। जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त किया तब मां ने नवरात्रमनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

महाभारत कथा : दुर्योधन ने भीम को पहुंचाया नाग लोक में

दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से शिकायत की, ‘मैंने भीम को मारने की कितनी कोशिशें की, लेकिन किसी न किसी तरह से वह बच ही जाता है।’ यह सुन कर धृतराष्ट्र हैरान रह गए। महल के भीतर ही उनका पुत्र अपने चचेरे भाई को मारने की योजना बना रहा था। और वह भी तब, जब दोनों सिर्फ सोलह साल के थे।



शकुनी ने सिखाया दुर्योधन को चालें रचना

कुनि ने दुर्योधन को सलाह दी, ‘ऐसे काम नहीं बनेगा। अगर हम उसे महल के बाहर मारने की योजना बनाएं, तो वहां हम जो करना चाहेंगे, वह ज्यादा आजादी के साथ कर पाएंगे। महल में तुम्हें उसे चालाकी से मारना होगा, मगर तुम्हारा चचेरा भाई इतना शक्तिशाली है, कि उसे ऐसे मारना मुश्किल है।’ उसने आगे कहा, ‘शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ दिल के भाव को व्यक्त करने के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि मन में चल रही बातों को छिपाने के लिए भी किया जाता है। भीम से दोस्ती करो। उससे प्रेम के साथ पेश आओ। उसके साथ कुश्ती मत लड़ो, उसे गले लगाओ। उसे गुस्से से मत देखो, मुस्कुरा कर देखो। वह मूर्ख है, तुम्हारी बातों में आ जाएगा।’

इस तरह एक बहादुर, निर्भय. और एक सीध में सोचने वाला दुर्योधन धोखेबाज और छली बन गया। उसके अंदर हमेशा से जलन, नफरत और गुस्सा तो था, मगर धोखेबाजी उसे शकुनि ने सिखाई। इसके बाद दुर्योधन ने पांचों भाइयों, खास तौर पर भीम से दोस्ती कर ली। उन सभी को लगा कि दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है, और वह उनसे प्रेम करने लगा है। सिर्फ सहदेव, जो पांचों में सबसे बुद्धिमान था, इस झांसे में नहीं आया और उसने दूरी बनाए रखी।

सिर्फ सहदेव समझते थे कौरवों की चालें

सहदेव को ऐसी बुद्धि कैसे मिली, इसके पीछे भी एक कहानी है। एक दिन जंगल में अलाव के पास बैठे हुए, उनके पिता पांडु ने अपने पुत्रों से कहा, ‘इन सोलह सालों में मैं न सिर्फ तुम्हारी माताओं से दूर रहा, बल्कि ब्रह्मचर्य की साधना करके असाधारण भीतरी शक्ति और बहुत ज्यादा दूरदर्शिता, परख तथा बुद्धि हासिल की है। मगर मैं कोई गुरु नहीं हूं। इसलिए मैं नहीं जानता कि इन गुणों को तुम लोगों तक कैसे पहुंचाऊं। जिस दिन मेरी मृत्यु होगी, तुम सब को बस इतना करना है कि मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा लेकर खा लेना। अगर तुम मेरे मांस को अपने शरीर का एक हिस्सा बना लोगे, तो मेरी बुद्धिमत्ता अपने आप तुम्हारे अंदर पहुंच जाएगी और तुम लोगों को उसके लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।’

जब पांडु की मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार किया जा रहा था, तो भावनाओं के वशीभूत होकर लगभग हर कोई इस बात को पूरी तरह भूल गया। सिर्फ सबसे छोटे और विचारशील सहदेव ने जब एक चींटी को पांडु के मांस का एक छोटा सा टुकड़ा ले जाते देखा, तो उसे पिता की बात याद आ गई। उसने वह टुकड़ा चींटी से छीनकर खा लिया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी और शक्ति बढ़ गई।

कृष्ण का आदेश पाकर चुप रहे सहदेव

वह राजाओं के बीच एक ऋषि की तरह जी सकता था मगर कृष्ण ने भांप लिया था कि उसकी बुद्धिमानी भाग्य की धारा को रोक देगी। इसीलिए एक बार उन्होंने सहदेव को टोकते हुए उससे कहा – ‘यह मेरा आदेश कि कभी अपनी बुद्धि को प्रकट मत करना। अगर कोई तुमसे प्रश्न पूछता है, तो उसका उत्तर हमेशा दूसरे प्रश्न के रूप में देना।’

उस दिन के बाद से सहदेव हमेशा प्रश्नों के जवाब प्रश्नों से ही देते, जिन्हें बहुत कम लोग समझ पाते। उसे समझने वाले लोग उसकी बुद्धिमानी को देख सकते थे और जिन्हें ये प्रश्न समझ में नहीं आते थे, उन्हें लगता था कि वह सिर्फ हर चीज को लेकर अस्पष्टता और भ्रम पैदा करना चाहता है। एक पूरा शास्त्र इसी से निकला है, जिसे ‘सहदेव – बुद्धि’ कहा जाता है। आज भी दक्षिण भारत में अगर कोई ज्यादा चतुराई दिखाने की कोशिश करता है, तो कहा जाता है, ‘वह सहदेव बनने की कोशिश कर रहा है।’ क्योंकि लोगों को लगता था कि वह सवालों में जवाब देकर चतुराई दिखाने की कोशिश करते थे। मगर वास्तव में वह कृष्ण के आदेश का पालन कर रहे थे। जिससे सिर्फ बुद्धिमान लोगों को ही यह समझ आता था, कि वो उन्हें उत्तर देने की कोशिश कर रहा है। अन्य लोग ये बात नहीं समझ पाते थे।

पांडव फंस गए दुर्योधन की चाल में

सिर्फ सहदेव दुर्योधन के दिल में झांक सकते थे, जहां उसे सिर्फ जहर दिखाई दिया। बाकी चार भाई दुर्योधन के जाल में फंस चुके थे। दुर्योधन उन पर उपहारों की बरसात करता। भीम को सिर्फ एक ही उपहार की परवाह रहती थी – वो था भोजन। दुर्योधन उसे खूब खिलाता। भीम इतना पेटू था कि भोजन के सामने आते ही वह सब कुछ भूल जाता। जो उसे भोजन कराता, वह उसके लिए मित्र था। उसे हर समय भूख लगी रहती थी, इसलिए वह खाता रहा, खाता रहा और विशालकाय हो गया। एक दिन दुर्योधन ने पिकनिक पर चलने का प्रस्ताव रखा। शकुनि ने बहुत सावधानी से योजना बनाई। उन्होंने प्रमनकोटि नाम की जगह पर नदी के किनारे एक मंडप बनवाया। सभी लोग वहां गए और ढेर सारा भोजन परोसा गया। दुर्योधन ने मेजबान की भूमिका को खूब अच्छी तरह निभाया। उसने हरेक पांडव के पास जाकर अपने हाथ से उन्हें खिलाया। भीम को अकेले इतना भोजन परोसा गया, जितना बाकी सब ने मिलकर खाया। हर किसी ने खूब दावत उड़ाई। मूर्ख लोग दुर्योधन के इस बर्ताव पर मुग्ध थे – बस सहदेव एक कोने में बैठकर चुपचाप देखता रहा।

नाग लोक पहुंचे भीम :- 

भोजन के बाद जब मिष्ठान का समय आया, तो भीम को एक प्लेट भरकर मिष्ठान दिया गया। उसमें धीमे असर करने वाला एक खास जहर मिलाया गया था। भीम ने पूरी प्लेट साफ कर दी। फिर वे सब नदी में तैरने और मस्ती करने चले गए। कुछ देर बाद भीम पानी से बाहर निकला और नदी के तट पर लेट गया। बाकी लोग वापस मंडप में जाकर मजे करने लगे और आपस में कहानियां सुनाने लगे। कुछ समय बाद, दुर्योधन नदी तक वापस गया तो उसने भीम को आधी बेहोशी की हालत में पाया। उसने भीम के हाथ-पैर बांध कर उसे नदी में फेंक दिया। भीम नीचे डूबकर ऐसी जगह पहुंचा, जहां बहुत सारे जहरीले सांप थे।


इन पांच कारणों से भगवान राम को जाना पड़ा था वनवास :-

रामयण की सबसे बड़ी घटना है भगवन श्री राम का देवी सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास गमन। रामायण की कथा के अनुसार कैकेयी की ज‌िद्द की वजह से भगवान राम को वन जाना पड़ा था। लेक‌िन यह मात्र एक दृश्य घटना है। श्रीराम के वन गमन के पीछे कई दूसरे कारण भी थे ज‌िन्हें वही व्यक्त‌ि समझ सकता है ज‌िन्होंने रामायण को पढ़ा और समझा हो।



1. कैकेयी ने हमेशा राम को अपने पुत्र भरत के समान ही प्रेम क‌िया। कभी भी कैकेयी ने राम के साथ कोई भेद भाव नहीं क‌िया। यही वजह थी क‌ि जब राम के वन जाने की वजह का पता भरत को चला तो वह हैरान हुए थे क‌ि माता कैकेयी ऐसा कैसे कर सकती है। और सच भी यही था क‌ि कैकेय ने यह जान बुझकर नहीं क‌िया था। इनसे यह काम देवताओं ने करवाया था। यह बात राम च‌र‌ित मानस के इस दोहे से स्पष्ट होता है-  ब‌िपत‌ि हमारी ब‌िलोक‌ि बड़‌ि मातु कर‌िअ सोइ आजु। रामु जाह‌िं बन राजु तज‌ि होइ सकल सुरकाजु।।

2. भगवान राम का जन्म रावण वध करने के उद्देश्य से हुआ था। अगर राम राजा बन जाते तो देवी सीता का हरण और इसके बाद रावण वध का उद्देश्य अधूरा रह जाता। इसल‌िए देवताओं के अनुरोध पर देवी सरस्वती कैकेयी की दासी मंथरा की मत‌ि फेर देती हैं। मंथरा आकर कैकेयी का कान भरना शुरु कर देती है क‌ि राम अगर राजा बन गए तो कौशल्या का प्रभाव बढ़ जाएगा। इसल‌िए भरत को राजा बनवाने के ल‌िए तुम्हें हठ करना चाह‌िए।

3. मंथरा की जुबान से देवी सरस्वती बोल रही थी। इसल‌िए मंथरा की बातें कैकेयी की मत‌ि को फेरने के ल‌िए काफी था। कैकेयी ने खुद को कोप भवन में बंद कर ल‌िया। राजा दशरथ जब कैकेयी को मनाने पहुंचे तो कैकेयी ने भरत को राजा और राम को चौदह वर्ष का वनवास का वचन मांग ल‌िया। इस तरह भगवान राम को वनवास जाना पड़ा।

4. इसके अलावा जो कारण है उसका संबंध एक शाप से है। नारद मुन‌ि के मन में एक सुंदर कन्या को देखकर व‌िवाह की इच्छा जगी। नारद मुन‌ि नारायण के पास पहुंचे और हर‌ि जैसी छव‌ि मांगी। हर‌ि का मतलब व‌िष्‍णु भी होता है वानर भी। भगवान ने नारद को वानर मुख दे द‌िया इस कारण से नारद मुन‌ि का व‌िवाह नहीं हो पाया। क्रोध‌ित होकर नारद मुन‌ि ने भगवान व‌िष्‍णु को शाप दे द‌िया क‌ि आपको देवी लक्ष्मी का व‌ियोग सहना पड़ेगा और वानर की सहायता से ही आपका पुनः म‌िलन होगा। इस शाप के कारण राम सीता का व‌ियोग होना था इसल‌िए भी राम को वनवास जाना पड़ा।

5. पांचवां और सबसे बड़ा कारण स्वयं भगवान श्री राम हैं। तुलसी दास जी ने रामचर‌ित मानस में ल‌‌िखा है 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा।' यानी भगवान राम की इच्छा के ब‌िना कुछ भी नहीं होता । भगवान राम स्वयं ही अपनी लीला को पूरा करने के ल‌िए वन जाना चाहते थे क्योंक‌ि वन में उन्हें हनुमान से म‌िलना था। सबरी का उद्धार करना था। धरती पर धर्म और मर्यादा की सीख देनी थी। इसल‌िए जन्म से पहले ही राम यह तय कर चुके थे क‌ि उन्हें वन जाना है और पृथ्वी से पाप का भार कम करना है।

द्रोणागिरी – यहां वर्जित है हनुमान जी की पूजा

हम सब जानते है हनुमान जी हिन्दुओं के प्रमुख आराध्य देवों में से एक है, और सम्पूर्ण भारत में इनकी पूजा की जाती है।  लेकिन बहुत काम लोग जानते है की हमारे भारत में ही एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है।  ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ के रहवासी हनुमान जी द्वारा किए गए एक काम से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड स्तिथ द्रोणागिरि गांव।


द्रोणागिरि गांव –
द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है।

द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार –
द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं।

इस घटना से जुड़ा प्रसंग –
यूँ तो राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है पर इनमे से दो प्रमुख है एक तो वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और एक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस। इनमे से जहाँ वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है वही तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस सबसे अधिक पढ़ा जाता है। पर जैसा की हमने हमारे एक पिछले लेख में आप सब को बताया था की रामायण और रामचरितमानस में कई घटनाओं में, कई प्रसंगो में अंतर है। ऐसा ही कुछ अंतर दोनों किताबों में इस प्रसंग के संबंध में भी है।  यहाँ हम आपको दोनों किताबो में वर्णित प्रसंग के बारे में बता रहे है।

वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार - 
हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाकर श्रीराम व लक्ष्मण सहित समूची वानर सेना को घायल कर दिया। अत्यधिक घायल होने के कारण जब श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए तो मेघनाद प्रसन्न होकर वहां से चला गया। उस ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार भाग व्यतीत होते-होते 67 करोड़ वानरों को घायल कर दिया था।

हनुमानजी, विभीषण आदि कुछ अन्य वीर ही उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाए थे। जब हनुमानजी घायल जांबवान के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा – इस समय केवल तुम ही श्रीराम-लक्ष्मण और वानर सेना की रक्षा कर सकते हो। तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत पर जाओ और वहां से औषधियां लेकर आओ,  जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं।

जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि- हिमालय पहुंचकर तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश पर्वत दिखाई देंगे। उन दोनों के बीच में औषधियों का एक पर्वत है, जो बहुत चमकीला है। वहां तुम्हें चार औषधियां दिखाई देंगी, जिससे सभी दिशाएं प्रकाशित रहती हैं। उनके नाम मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है।

हनुमान तुम तुरंत उन औषधियों को लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान की बात सुनकर हनुमानजी तुरंत आकाश मार्ग से औषधियां लेने उड़ चले। कुछ ही समय में हनुमानजी हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने हनुमानजी ने अनेक महान ऋषियों के आश्रम देखे।

हिमालय पहुंचकर हनुमानजी ने कैलाश तथा ऋषभ पर्वत के दर्शन भी किए। इसके बाद उनकी दृष्टि उस पर्वत पर पड़ी, जिस पर अनेक औषधियां चमक रही थीं। हनुमानजी उस पर्वत पर चढ़ गए और औषधियों की खोज करने लगे। उस पर्वत पर निवास करने वाली संपूर्ण महाऔषधियां यह जानकर कि कोई हमें लेने आया है, तत्काल अदृश्य हो गईं। यह देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वह पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, जिस पर औषधियां थीं।

कुछ ही समय में हनुमान उस स्थान पर पहुंच गए, जहां श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना बेहोश थी। हनुमानजी को देखकर श्रीराम की सेना में पुन: उत्साह का संचार हो गया। इसके बाद उन औषधियों की सुगंध से श्रीराम-लक्ष्मण व घायल वानर सेना पुन: स्वस्थ हो गई। उनके शरीर से बाण निकल गए और घाव भी भर गए। इसके बाद हनुमानजी उस पर्वत को पुन: वहीं रख आए, जहां से लेकर आए थे।

लेकिन रामचरितमानस में कुछ अन्य प्रसंग है। तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा चरित श्रीरामचरितमानस के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद व लक्ष्मण के बीच जब भयंकर युद्ध हो रहा था, उस समय मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाकर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया। हनुमानजी उसी अवस्था में लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आए। लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर श्रीराम बहुत दु:खी हुए।

तब जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, तुम उसे यहां ले आओ। हनुमानजी ने ऐसा ही किया। सुषेण वैद्य ने हनुमानजी को उस पर्वत और औषधि का नाम बताया और हनुमानजी से उसे लाने के लिए कहा, जिससे कि लक्ष्मण पुन: स्वस्थ हो जाएं। हनुमानजी तुरंत उस औषधि को लाने चल पड़े। जब रावण को यह बात पता चली तो उसने हनुमानजी को रोकने के लिए कालनेमि दैत्य को भेजा।

कालनेमि दैत्य ने रूप बदलकर हनुमानजी को रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमानजी उसे पहचान गए और उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमानजी तुरंत औषधि वाले पर्वत पर पहुंच गए, लेकिन औषधि पहचान न पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और आकाश मार्ग से उड़ चले। अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत को लगा कि कोई राक्षस पहाड़ उठा कर ले जा रहा है। यह सोचकर उन्होंने हनुमानजी पर बाण चला दिया।

हनुमानजी श्रीराम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमानजी के मुख से पूरी बात जानकर भरत को बहुत दु:ख हुआ। इसके बाद हनुमानजी पुन: श्रीराम के पास आने के लिए उड़ चले। कुछ ही देर में हनुमान श्रीराम के पास आ गए। उन्हें देखते ही वानरों में हर्ष छा गया। सुषेण वैद्य ने औषधि पहचान कर तुरंत लक्ष्मण का उपचार किया, जिससे वे पुन: स्वस्थ हो गए।

श्रीलंका में स्थित है संजीवनी बूटी वाला पर्वत :- 

जहां वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार हनुमान जी पर्वत को पुनः यथास्थान रख आए थे वही तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार हनुमान जी पर्वत को वापस नहीं रख कर आए थे, उन्होंने उस पर्वत को वही लंका में ही छोड़ दिया था। श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नाम का एक पहाड़ है। मान्यता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर लंका ले गए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहते हैं। यह पर्वत लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रीलंकाई लोग इसे रहुमाशाला कांडा कहते हैं। इस पहाड़ पर एक मंदिर भी बना है।

विष्णु पुराण :- रात के समय नहीं करने चाहिए ये तीन काम

सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे, इसके लिए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों में बताया गया है कि हमें किस समय कौन से काम नहीं करना चाहिए। यहां जानिए विष्णु पुराण के अनुसार 3 ऐसी बातें, जिनसे रात के समय दूर रहना चाहिए…


विष्णु पुराण में बताए गए गृहस्थ संबंधी नियमों का पालन करने पर भगवान विष्णु, महालक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त की जा सकती है। यहां जानिए बुद्धिमान व्यक्ति को रात के समय किन 3 से दूर रहना चाहिए…

1. चौराहों पर नहीं जाना चाहिए

किसी भी समझदार व्यक्ति को रात के समय चौराहे से दूर ही रहना चाहिए। रात के समय अक्सर चौराहों पर असामाजिक तत्वों की उपस्थिति रहती है। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति चौराहे पर जाएगा तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, ये काम सदाचार के नियमों के विरुद्ध भी है। रात के समय अपने घर में ही रहना चाहिए।

2. श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए

रात के समय श्मशान के आसपास जाना भी नहीं चाहिए। श्मशान क्षेत्र में सदैव नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है। इसका बुरा असर हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ सकता है। साथ ही, श्मशान क्षेत्र में जलते हुए शवों से निकलने वाला धुआं भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रहता है। उस क्षेत्र के वातावरण में कई सूक्ष्म कीटाणु भी रहते हैं जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसीलिए श्मशान जाने के बाद स्नान करना जरूरी बताया गया है। रात के समय में स्नान करना भी स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। इन्हीं कारणों के चलते रात के समय श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए।

3. बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए

वैसे तो बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से हमेशा ही दूर रहना चाहिए, लेकिन रात के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बुरे चरित्र वाले लोग अधिकतर अधार्मिक और गलत कार्य रात के समय में ही करते हैं। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति इनके साथ रहेगा तो वह परेशानियों में उलझ सकता है। अत: इन लोगों से दूर रहना चाहिए।

मूषक कैसे बना भगवान श्री गणेशजी का वाहन?

मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना। सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होता है। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेशजी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य और चूहे के मस्तिष्क का आकार-प्रकार एक समान है। चूहे का किसी न किसी रूप में मनुष्य से कोई सबंध जरूर है उसी तरह जिस तरह की चूहे और हाथी का संबंध गहरा है।


शिवपुत्र गणेशजी का वाहन है मूषक। हालांकि गणेश पुराण अनुसार हर युग में गणेशजी का वाहन बदलता रहता है। सतयुग में गणेशजी का वाहन सिंह है। त्रेता युग में गणेशजी का वाहन मयूर है, द्वापर में उनका वाहन मूषक है और वर्तमान युग यानी कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है। मूषक को भगवान श्री गणेश द्वारा अपना वाहन बनाने के संबंध में कई कथाएं प्रचलन में है।

गणेश पुराण की एक कथा के अनुसार गणेशची का वाहन चूहा पूर्वजन्म में एक गंधर्व था जिसका नाम क्रोंच था। एक बार देवराज इंद्र की सभा में गलती से क्रोंच का पैर मुनि वामदेव के ऊपर पड़ गया। मुनि वामदेव को लगा की क्रोंच ने यह शरारत की है। इसलिए गुस्से में उन्होंने क्रोंच को चूहा बनने का शाप दे दिया। इस शाप के चलते वह चूहा बन गया लेकिन वह बहुत ही विशालकाय था। वह इतना विशालकाय था कि झाड़ पेड़ आदि जो भी उसके रास्ते में आता उसे वह नष्ट कर देता था। एक बार वह उत्पात मचाता हुआ महर्षि पराशर के आश्रम में पहुंच गया।

महर्षि पराशर के आश्रम में पहुंचकर वह बलवान मूषक उत्पात मचाने लगा। जिससे परेशान होकर महर्षि ने भगवान श्रीगणेश की स्तुति की। गणेशजी महर्षि की भक्ति से प्रसन्न हुए और उत्पाती मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका। पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक पहुंच गया और उसे बांधकर गणेशजी के सामने ले आया।

गणेशजी को सामने देखकर मूषक उनकी स्तुति करने लगा। गणेश जी ने कहा तुमने महर्षि पराशर को बहुत परेशान किया है लेकिन अब तुम मेरी शरण में हो इसलिए जो चाहो वरदान मांग लो। गणेश जी के ऐसे वचन सुनते ही मूषक अहंकारवश खुद ही गणेशजी से कहने लगा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, अगर आपको मुझसे कुछ चाहिए तो मांग लीजिए। गणेश जी मुस्कुराए और मूषक से कहा कि अच्‍छा ठीक है तब फिर तुम मेरा वाहन बन जाओ। मूषक तो हतप्रभ रह गया।

अपने अभिमान के कारण मूषक गणेश जी का वाहन बन गया। लेकिन जैसे ही गणेश जी मूषक पर चढ़े गणेश जी के भार से वह दबने लगा। मूषक ने गणेश जी से कहा कि हे प्रभो मैं आपके वजन से दबा जा रहा हूं। अपने वाहन की विनती सुनकर गणेशजी ने अपना भार कम कर लिया। इसके बाद से मूषक गणेशजी का वाहन बनकर उनकी सेवा में लगा हुआ है।



Sunday, January 28, 2018

शिव के प्रतीक और उनका गहन रहस्य :-

शिव औढरदानी, कल्याण के देवता माने गए हैं। सृष्टि निर्माण में एक ही शक्ति तीन रूपों में अपना कार्य संपादन करते हुए दिखाई देती है। ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण करते हैं, विष्णु पालन-पोषण करते हैं और शिव संहार करते हैं यानी निर्माण से नाश तक जगत का चक्र परम सत्ता द्वारा निरंतर प्रकृति में चलता रहता है।

वेदों में प्रकृ‍ति के उपादानों की उपासना की गई है। हरेक उपादान को देवता का रूप दिया गया है। यह प्रकृति-विज्ञान का सारा प्रपंच बड़ा रहस्यमय है जिसे समझना सामान्यजन के लिए कठिन है। अनादिकाल से ऋषियों ने इन रहस्यों का मनन-चिंतन द्वारा अनुसंधान करने का प्रयत्न किया है।

ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में रात्रि को नित्य प्रलय और दिन को नित्य सृष्टि कहा गया है। दिन में हमारा मन और हमारी इंद्रियां भीतर से बाहर निकलकर प्रपंच की ओर दौड़ती हैं और रात्रि में फिर बाहर से भीतर जाकर शिव की ओर प्रवृत्त हो जाती हैं। इसीलिए दिन सृष्टि का और रात प्रलय की द्योतक है। आइए पहचानें शिव के प्रतीक और उनका गहन रहस्य-


वृषभ : शिव का वाहन :- 

वृषभ शिव का वाहन है। वह हमेशा शिव के साथ है। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार 'वृषो हि भगवान धर्म:'। वेद ने धर्म को चार पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके चार पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। महादेव इस चार पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनके अधीन हैं।
वृषभ का एक अर्थ वीर्य और शक्ति भी है। अथर्ववेद में वृषभ को पृथ्वी का धारक, पोषक, उत्पादक आदि बताया गया है। वृष का अर्थ मेघ भी है। इसी धातु से वर्षा, सृष्टि आदि शब्द बने हैं।

जटाएं :- 

शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। उनका नाम व्योमकेश है अत: आकाश उनकी जटास्वरूप है। जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं। वायु आकाश में व्याप्त रहती है। सूर्यमंडल से ऊपर परमेष्ठि मंडल है। इसके अर्थतत्व को गंगा की संज्ञा दी गई है अत: गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्रस्वरूप उग्र और संहारक रूप धारक भी माने गए हैं।

गंगा और चंद्रमा :- 

इस उग्रता का निवास मस्तिष्क में है इसीलिए शांति की प्रतीक गंगा और अर्द्धचंद्र शिव के मस्तक पर विराजमान होकर उनकी उग्र वृत्ति को शांत-शीतल रखते हैं। दूसरे, विषपान के कारण वे जो नीलकंठ हो गए हैं, उसकी जलन को शांति भी गंगा और चंद्रमा से प्राप्त होती है।
चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र और सशक्त है। उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। उनके मस्तिष्क में कभी अविवेकपूर्ण विचार नहीं पनप पाते हैं। शिव का चंद्रमा स्वच्छ और उज्ज्वल है। उसमें मलीनता नहीं, वह अमृत की वर्षा करता है। चंद्रमा का एक नाम 'सोम' है, जो शांति का प्रतीक है। इसी हेतु सोमवार शिवपूजन, दर्शन और उपासना का दिन माना गया है।

तीन नेत्र :- 

शिव को त्रिलोचन कहते हैं यानी उनकी तीन आंखें हैं। वेदानुसार सूर्य और चंद्र विराट पुरुष के नेत्र हैं। अग्नि शिव का तीसरा नेत्र है, जो यज्ञाग्नि का प्रतीक है। सूर्य बुद्धि के अधिदेवता हैं और इस ज्ञान नेत्र या अग्नि से ही उन्होंने कामदेव को भस्म किया था।
शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम- तीन गुणों, भूत, भविष्य, वर्तमान- तीन कालों और स्वर्ग, मृत्यु, पाताल- तीन लोकों के प्रतीक हैं अत: शिव को त्र्यंबक भी कहते हैं।

सर्पों का हार :- 

भगवान शंकर के गले और शरीर पर सर्पों का हार है। सर्प तमोगुणी है और संहारक वृत्ति का जीव है। यदि वह मनुष्य को डस ले तो उसका प्राणांत हो जाता है।
अत: संहारिकता के प्रतीकस्वरूप शिव उसे धारण किए हुए हैं अर्थात शिव ने तमोगुण को अपने वश में कर रखा है। सर्प जैसा क्रूर और हिंसक जीव महाकाल के अधीन है।

त्रिशूल :- 

शिव के हाथों में एक मारक शस्त्र त्रिशूल है। सृष्टि में मानवमात्र आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीन तापों से त्रस्त रहता है। शिव का त्रिशूल इन तापों को नष्ट करता है।
शिव की शरण में जाकर ही भक्त इन दुखों से छूटकर आनंद की प्राप्ति कर सकता है। शिव का त्रिशूल इच्‍छा, ज्ञान और क्रिया का सूचक है।

डमरू :- 

शिव के हाथ में डमरू है। तांडव नृत्य के समय वे उसे बजाते हैं। पुरुष और प्रकृति के मिलन का नाम ही तांडव नृत्य है। उस समय अणु-अणु में क्रियाशीलता जागृत होती है और सृष्टि का निर्माण होता है।
अणुओं के मिलन और संघर्ष से शब्द का जन्म होता है। शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। डमरू का शब्द या नाद ही ब्रह्म रूप है। वही 'ओंकार' का व्यंजक है।

मुंडमाला :- 

शिव के गले में मुंडमाला से यह भाव व्यक्त होता है कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा रखा है तथा वे उससे भयभीत नहीं हैं। शिव के श्मशानवास का प्रतीक यह है कि जो जन्मता है, एक दिन अवश्य मरता है अत: जीवित अवस्था में शरीर-नाश का बोध होना ही चाहिए।

प्रलयकाल में सारा ब्रह्मांड श्मशान हो जाता है। हम मृत शरीरों को जिस श्मशान में ले जाते हैं, वह प्रलय का संक्षिप्त रूप है। उसके बीच अल्प उपस्‍थिति और उसके दर्शन से क्षणिक वैराग्य उत्पन्न हो ही जाता है।

व्याघ्र चर्म :- 

शिव की देह पर व्याघ्र चर्म को धारण करने की कल्पना की गई है। व्याघ्र अहंकार और हिंसा का प्रतीक है अत: शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है।

भस्म :- 

शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर में नित्य प्रात: भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान के मुर्दे की भस्म से शिव का पूजन-अर्चन होता है। लिंग पर भस्म का लेप किया जाता है। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है।

प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, केवल भस्म (राख) शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है। भस्म से नश्वरता का स्मरण होता है। वेद में रुद्र को अग्नि का प्रतीक माना गया है। अग्नि का कार्य भस्म करना है अत: भस्म को शिव का श्रृंगार माना गया है।

रुद्र :- 

शिव को रुद्रस्वरूप भी कहा गया है। पुराणानुसार रुद्र 11 हैं, जो तारामंडल में स्थित हैं। वैदिक वाक्य 'अग्निर्वेरुद्र:' से अभिप्राय है कि अग्नि ही रुद्र है। साहित्य में रुद्र से रौद्र रस की कल्पना की गई है जिसका अर्थ क्रोध होता है। प्रकृति-विज्ञान के अनुसार अंतरिक्ष में अभिव्यक्त विश्वव्यापक रुद्र देवता स्वानुकूल जिन-जिन विशेष शक्तियों द्वारा जिन-जिन कार्यों का संचालन करते हैं, उन्हीं शक्तियों की उपासना वेदों में बताई गई है।

इसीलिए वेदों में प्रकृति के उपादानों पर ऋचाएं और स्तुतियां कही गई हैं। व्यवहार मार्ग से इन्हें जनसाधारण को सरलता से समझाने के लिए मूर्ति शिल्प का सहारा लिया गया तथा देवताओं के मुंह, हाथ, पांव, रंग, अवस्था, वाहन, आयुध और आभूषण आदि को धारण करने के पीछे कौन-सा संकेत या रहस्य छिपा है, उसे समझाया गया है।

10 आयुध :- 

मूर्तियों का निर्माण निदान शास्त्र के आधार पर किया गया है। निदान का अर्थ संकेत है। आदिपुरुष ब्रह्मस्वरूप शिव ही ब्रह्मांड में अग्नितत्व या रुद्र तत्व से व्याप्त हैं। एक ही अग्नितत्व, अग्नि, वायु और सूर्य इन तीनों रूपों में परिणित हो रहे हैं। इनमें से एक ही सूर्यात्मक रुद्र 5 दिशाओं में व्याप्त होकर पंचमुख बन जाते हैं।

उसी एक के पांचों मुख पूर्वा,पश्चिमा, उत्तरा, दक्षिणा एवं ऊर्ध्वा दिक्भेद से क्रमश: तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर एवं ईशान नामों से जाने जाते हैं। इस पंचवक्त्र शिव के 'प्रतिवक्त्रं भुजदयम' सिद्धांत से 10 हाथ हैं। इनमें अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, घंटा, नाद और अग्नि- ये 10 आयुध हैं। पुराणों में इनके उद्देश्य और कार्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

5 मुख 10 हाथ :- 

संक्षेप में महादेव के 5 मुख पंच महाभूतों के सूचक हैं। 10 हाथ 10 दिशाओं के सूचक हैं। हाथों में विद्यमान अस्‍‍त्र-शस्त्र जगतरक्षक शक्तियों के सूचक हैं।

अनेक विद्वान मानते हैं कि सृष्टि, स्‍थिति, लय, अनुग्रह एवं निग्रह- इन 5 कार्यों की निर्मात्री 5 शक्तियों के संकेत शिव के 5 मुख हैं। पूर्व मुख सृष्टि, दक्षिण मुख स्थिति, पश्चिम मुख प्रलय, उत्तर मुख अनुग्रह (कृपा) एवं ऊर्ध्व मुख निग्रह (ज्ञान) का सूचक है।