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Friday, March 15, 2019

जानिये श्री हनुमान क्यों हुए सिंदूरी ?



शास्त्रों में इस विषय में जानकारी दी गई है कि जब रावण को मारकर राम जी सीता जी को लेकर अयोध्या आए थे। तब हनुमान जी ने भी भगवान राम और माता सीता के साथ आने की जिद की। राम ने उन्हें बहुत रोका। लेकिन हनुमान जी थे कि अपने जीवन को श्री राम की सेवा करके ही बिताना चाहते थे। श्री हनुमान दिन-रात यही प्रयास करते थे कि कैसे श्री राम को खुश रखा जाए।

एक बार उन्होंनें माता सीता को मांग में सिंदूर भरते हुए देखा। तो माता सीता से इसका कारण पूछ लिया। माता सीता ने उनसे कहा कि वह प्रभु राम को प्रसन्न रखने के लिए सिंदूर लगाती हैं। हनुमान जी को श्री राम को प्रसन्न करने की ये युक्ति बहुत भा गई। उन्होंने सिंदूर का एक बड़ा बक्सा लिया और स्वयं के ऊपर उड़ेल लिया। और श्री राम के सामने पहुंच गए।
तब श्री राम उनको इस तरह से देखकर आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने हनुमान से इसका कारण पूछा। हनुमान जी ने श्री राम से कहा कि प्रभु मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए ये किया है। सिंदूर लगाने के कारण ही आप माता सीता से बहुत प्रसन्न रहते हो। अब आप मुझसे भी उतने ही प्रसन्न रहना। तब श्री राम को अपने भोले-भाले भक्त हनुमान की युक्ति पर बहुत हंसी आई। और सचमुच हनुमान के लिए श्री राम के मन में जगह और गहरी हो गई। 
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Source:https://bit.ly/2TF9bL7

Saturday, February 23, 2019

भगवान हनुमान की कहानी | (Hanuman Story in Hindi)


हनुमान के जन्म की कहानी  Hanuman Ji Birth Story in Hindi

राम को अपना देवता मानते हुए भगवान शिव ने घोषित किया और शिव ने उनकी सेवा करने के लिए पृथ्वी पर अवतार की इच्छा जाहिर की। जब सती ने इसका विरोध प्रदर्शन किया और कहा कि वह उन्हें स्मरण करेंगी तो शिव ने केवल खुद का एक हिस्सा पृथ्वी पर भेजने का वादा किया और इसलिए कैलाश पर उनके साथ रहे।
वे सोच रहे थे कि क्या करना चाहिए, इस समस्या पर चर्चा करने लगे; यदि वह मनुष्य के आकार को लेते है, तो वह सेवा के धर्म का उल्लंघन करेगें, क्योंकि नौकर मालिक से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिव ने आखिरकार एक बंदर का रूप धारण करने का निर्णय लिया, क्योंकि यह विनम्र होता है, इसकी जरूरतें और जीवनशैली सरल होती है: कोई आश्रय नहीं, कोई पका हुआ भोजन नहीं, और जाति और जीवन स्तर के नियमों का कोई पालन नहीं होती है। इससे सेवा के लिए अधिकतम दायरे की अनुमति होगी।

भगवान श्री राम ने शरीर त्यागने के लिए हनुमान का मन विचलित किया Lord Rama’s death and Hanuman Story in Hindi

मृत्यु के देवता यम, हनुमान से डरते थे, हनुमान जी राम के महल के दरवाजे की रक्षा करते थे और स्पष्ट था कि कोई भी राम को उनसे दूर नहीं ले जा सकता है। यम को प्रवेश करवाने के लिए हनुमान का मन भटकाना ज़रूरी था।
तो राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श में एक दरार में गिरा दिया और अनुरोध किया कि हनुमान इसे लाने के लिए जाएँ, बाद में, हनुमान को एहसास हो गया कि नाग-लोक में प्रवेश और अंगूठी के साथ यह समय कोई दुर्घटना नहीं थी। यह राम के यह कहने का तरीका था कि वह आने वाली मृत्यु को नहीं रोक सकते थे। राम मर जाएगे, दुनिया मर जाएगी।
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Saturday, February 9, 2019

कैसे बाल मारुती का नाम हनुमान रख दिया गया?


दोस्तों श्री हनुमान जी की माता अंजनी और केसरी के पुत्र थे। कथा के अनुसार, अंजनी और केसरी को विवाह के बहुत समय बाद तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। तब दोनों पति-पत्नी ने मिलकर पवन देव की तपस्या की थी। पवन देव जी के आशीर्वाद से श्री हनुमान जी का जन्म हुआ था। हनुमान जी बचपन से ही बहुत अधिक ताकतवर नटखट और विशाल शरीर वाले थे। हनुमान जी के बचपन का नाम मारुती था। एक बार मारुती ने सूर्य देवता को फल समझकर उन्हें खाने के लिए सूर्यदेव के आगे बढ़े,और उनके पास पहुंचकर सूर्यदेव को निगलने के लिए अपना मुंह बड़ा कर लिया। इंद्रदेव ने मारुती  को ऐसा करते देखा तो इंद्रदेव ने मारुती  पर अपने बज्र से प्रहार कर दिया। इंद्र देव का बज्र मारुती  की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगी। इंद्र देव का बज्र नन्हे मारुती  को लगते ही मारुती  बेहोश हो गए। यह देख उनके पालक पिता पवनदेव को बहुत ही गुस्सा आ गया। पवन देव अपने पुत्र मारुती की हालत देखकर इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने सारे संसार में पवन का बहना रोक दिया। प्राण वायु के बिना सारे पृथ्वी लोक के वासी त्राहि-त्राहि करने लगे। यह सब देख कर इंद्रदेव ने पवनदेव को तुरंत मनाया। और मारुती  को पहले जैसा कर दिया।  सभी देवताओं ने नन्हे मारुती को बहुत सारी शक्तियां प्रदान की। सूर्य देव के तेज अंश प्रदान करने के कारण ही श्री हनुमान जी का बुद्धि संपन्न हुआ। इंद्रदेव का बज्र मारुती  के हनु पर लगा था जिसके कारण ही नन्हे मारुती का नाम हनुमान हुआ।

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                                                                                                                                                                                                              Source: https://bit.ly/2FtRSEc

Friday, February 1, 2019

जानिये भगवान हनुमान के जन्‍म का रहस्‍य |


भगवान हनुमान के जन्‍म की कथा, माता अंजना से जुड़ी हुई है। भगवान हनुमान माता अंजना और केसरी नन्‍दन के पुत्र थे, जो अंजनागिरि पर्वत के थे। पहले अंजना, भगवान ब्रह्मा के कोर्ट में एक अप्‍सरा थी, उसे एक ऋषि ने शाप देकर बंदरिया बना दिया। अपने बचपन में अंजना ने एक बंदर को पैरों पर खड़े होकर ध्‍यान लगाते देखा, तो उसने उस बंदर को फल फेंक कर मार दिया। वह बंदर एक ऋषि में बदल गया और उसकी तपस्‍या भंग होने पर वह क्रोधित हो गया। उसने अंजना को शाप दिया कि जिस दिन उसे किसी से प्रेम हो जाएगा, उसी क्षण वह बंदरिया बन जाएगी।

अंजना ने बहुत माफी मांगी और ऋषि से उसे क्षमा करने को कहा। पर ऋषि ने एक नहीं सुनी और अंजना को शाप देकर कहा कि वह प्रेम में पड़ने के बाद बंदरिया बन जाएगी लेकिन उसका पुत्र भगवान शिव का रूप होगा।

कुछ समय बाद, अंजना जंगलों में रहने लगी। वहां उसकी भेंट केसरी से हुई, जिससे प्रेम होने पर वह बंदरिया बन गई और केसरी ने अपना परिचय देते हुए अंजना को बताया कि वह बंदरों का राजा है। अंजना ने गौर से देखा तो पाया कि केसरी के पास ऐसा मुख था जिसे वह मानव से बंदर या बंदर से मानव कर सकता था। केसरी की ओर से प्रस्‍ताव रखने पर अंजना मान गई और दोनों का विवाह हो गया। अंजना ने घोर तपस्‍या की और भगवान शिव से उनके समान एक पुत्र मांगा। भगवान ने तथास्‍तु कहा।

वहीं दूसरी ओर, अयोध्‍या के राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रकामेस्‍थी यज्ञ आयोजित किया। अग्नि देव को प्रसन्‍न करने के बाद उन्‍होने दैवीय गुणों वाले पुत्रों की कामना की। अग्निदेवता ने प्रसन्‍न होकर दशरथ को एक पवित्र हलवा दिया, जिसे तीनों पत्नियों में बांटने को कहा। राजा ने बड़ी रानी तक हलवे को पंतग से पहुंचाया, वहीं बीच में कहीं माता अंजना प्रार्थना कर रही थी, हवन की कटोरी में वह हलुवा जा गिरा, माता अंजना ने उस हलवे को ग्रहण कर लिया। उसे खाने के बाद उन्‍हे लगा जैसे गर्भ में भगवान शिव का वास हो गया हो।

इसके पश्‍चात उन्‍होने हनुमान जी को जन्‍म दिया। भगवान हनुमान को वायुपुत्र इसलिए कहा जाता है क्‍योंकि हवा चलने के कारण ही वह हलुवा, माता अंजनी की कटोरी में आकर गिरा था। भगवान हनुमान के जन्‍म लेते ही माता अंजना अपने शाप से मुक्‍त होकर वापस स्‍वर्ग चली गई। भगवान हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और भगवान श्रीराम के भक्‍त थे। रामायण की गाथा में उनका स्‍थान हम सभी को पता है।

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Thursday, January 24, 2019

हनुमान पौराणिक कथा ।


श्रीरामचरित मानस लिखने के दौरान तुलसीदासजी ने लिखा- सिय राम मय सब जग जानी;
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी!

अर्थात 'सब में राम हैं और हमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए।'

यह लिखने के उपरांत तुलसीदासजी जब अपने गांव की तरफ जा रहे थे तो किसी बच्चे ने आवाज दी- 'महात्माजी, उधर से मत जाओ। बैल गुस्से में है और आपने लाल वस्त्र भी पहन रखा है।'

तुलसीदासजी ने विचार किया कि हूं, कल का बच्चा हमें उपदेश दे रहा है। अभी तो लिखा था कि सब में राम हैं। मैं उस बैल को प्रणाम करूंगा और चला जाऊंगा।
पर जैसे ही वे आगे बढ़े, बैल ने उन्हें मारा और वे गिर पड़े। किसी तरह से वे वापस वहां जा पहुंचे, जहां श्रीरामचरित मानस लिख रहे थे। सीधे चौपाई पकड़ी और जैसे ही उसे फाड़ने जा रहे थे कि श्री हनुमानजी ने प्रकट होकर कहा- तुलसीदासजी, ये क्या कर रहे हो?

तुलसीदासजी ने क्रोधपूर्वक कहा, यह चौपाई गलत है और उन्होंने सारा वृत्तांत कह सुनाया।

हनुमानजी ने मुस्कराकर कहा- चौपाई तो एकदम सही है। आपने बैल में तो भगवान को देखा, पर बच्चे में क्यों नहीं? आखिर उसमें भी तो भगवान थे। वे तो आपको रोक रहे थे, पर आप ही नहीं माने।
तुलसीदास जी को एक बार और चित्रकूट पर श्रीराम ने दर्शन दिए थे तब तोता बन कर हनुमान जी ने दोहा पढ़ा था:

चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसी दास चंदन घीसे तिलक करें रघुबीर।

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                                                                                                                                                                                       Source:https://bit.ly/2R8Y4nq

Friday, January 11, 2019

कैसे बाल मारुती का नाम हनुमान रख दिया गया |

                                 जानिये कैसे बाल मारुती का नाम हनुमान रख दिया गया |


दोस्तों श्री हनुमान जी की माता अंजनी और केसरी के पुत्र थे। कथा के अनुसार, अंजनी और केसरी को विवाह के बहुत समय बाद तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। तब दोनों पति-पत्नी ने मिलकर पवन देव की तपस्या की थी। पवन देव जी के आशीर्वाद से श्री हनुमान जी का जन्म हुआ था। हनुमान जी बचपन से ही बहुत अधिक ताकतवर नटखट और विशाल शरीर वाले थे। हनुमान जी के बचपन का नाम मारुती था। एक बार मारुती  ने सूर्य देवता को फल समझकर उन्हें खाने के लिए सूर्यदेव के आगे बढ़े,और उनके पास पहुंचकर सूर्यदेव को निगलने के लिए अपना मुंह बड़ा कर लिया। इंद्रदेव ने मारुती को ऐसा करते देखा तो इंद्रदेव ने मारुती पर अपने बज्र से प्रहार कर दिया। इंद्र देव का बज्र मारुती की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगी। इंद्र देव का बज्र नन्हे मारुती  को लगते ही मारुती  बेहोश हो गए। यह देख उनके पालक पिता पवनदेव को बहुत ही गुस्सा आ गया। पवन देव अपने पुत्र मारुती  की हालत देखकर इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने सारे संसार में पवन का बहना रोक दिया। प्राण वायु के बिना सारे पृथ्वी लोक के वासी त्राहि-त्राहि करने लगे। यह सब देख कर इंद्रदेव ने पवनदेव को तुरंत मनाया। और मारुती  को पहले जैसा कर दिया।  सभी देवताओं ने नन्हे मारुती  को बहुत सारी शक्तियां प्रदान की। सूर्य देव के तेज अंश प्रदान करने के कारण ही श्री हनुमान जी का बुद्धि संपन्न हुआ। इंद्रदेव का बज्र मारुती  के हनु पर लगा था जिसके कारण ही नन्हे मारुती  का नाम हनुमान  हुआ।

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                                                                                                                             Source:https://bit.ly/2FtRSEc

Saturday, May 10, 2014

This massive Lord Hanuman murti is in a sleeping position

Lord Hanuman


The murti formed of the roots of a living banyan tree in this ancient temple in Jamsavli, district Chindhwara, Madhya Pradesh is located very close to the state's border with Maharashtra, and is over 100 km from the town of Sausar. 

The pepul tree is considered to be a manifestation of Lord Rama here with Hanuman ji at his feet. The Lord is considered a Brahmachari here, and is reputed to very powerful.

Nagpur in the state of Maharashtra, is the city nearest to this temple.

Devotees with financial, health and spiritual difficulties visit this temple and are known to get relief by the grace of Shri Hanuman who is the destroyer of all pains of his devotees!

My Lord Hanuman, the slave of Shri Rama, inspire in us the desire to glorify the leelas, names and devotees of Raghunandana! Siyavar Ramchandra ki jai! Shri Hanuman ki jai!

Watch a bhajan at the famous Jamsavli Hanuman temple on the following link https://www.youtube.com/watch?v=U6rgEofNkNw


Note

To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.

One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

(Photo Courtesy - google.com)

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Friday, January 17, 2014

Touching story of West Indian Hanuman Bhakta Siewadass Sadhu



Siewadass Sadhu gave 25 years to build this stunningly beautiful Hanuman temple called the Temple in the Sea in the sea Waterloo, Trinidad, West Indies. While coming from India Siewadass narrowly escaped German torpedoes and decided to than Lord Hanuman - his Ishta devata by building a temple for him. 

Siewadass's repeated attempts to build a temple where defeated because he did not own land and the owners of the huge plantation where he worked refused to let him construct a Hindu temple. Finally, Seiwadass decided to build an island in the open sea where he would build his temple.

He spend 25 years carting rocks on his head and build the island rock by rock and began building the temple in 1947. However, he died in 1971 before he could see the temple become a reality. In 1994, the government of Trinidad honored Siewadass Sadhu's committment by building the temple which is major attraction for devotees today.


May the Ishta Devata of Siewadass Sadhu Lord Hanuman ji of Waterloo protect us all!



Note - 
Maa Jagdambe Chowki & Mamtamai Shri Radhe Maaji's Divya Darshan



                                                                      - Mamtamai Shri Radhe Guru Maa Charitable Trust
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