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Saturday, May 4, 2019

संतोषी माता की कहानी | Santoshi Mata ki kahani |


एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और बची हुई झूठन सातवें बेटे को दे दिया करती थी। बेटे को यह पता नहीं था।

उसकी पत्नी ने उसे यह बात बताई। उसे विश्वास नहीं हुआ। छुपकर देखा तो उसे पता चला की यह सच था। उसे बड़ा दुःख हुआ। माँ के खाना खाने बुलाने पर वह बोला – मैं यह खाना नहीं खाऊंगा। परदेस जाकर कमाई करूँगा।
माँ बोली – कल जाता हो तो आज ही चला जा। यह सुनकर वह तुरंत घर से निकल गया।
रास्ते में पत्नी से मिला। वह गोबर से कंडे बना रही थी। बोला – मैं परदेस जा रहा हूँ कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम अपना धर्म का पालन करते हुए ध्यान से रहना।
वह बोली आप मेरी चिंता ना करें। मुझे भूलना मत और मुझे अपनी कुछ निशानी दे दो। उसे देखकर मैं समय बिता लूँगी। उसने उसे अपनी अंगूठी दे दी और चल पड़ा।  
एक बड़े शहर में बड़ी दुकान देखकर उसने काम माँगा। वहां जरुरत थी इसलिए सेठ ने उसे काम पर रख लिया। उसने दिन रात मेहनत की। सेठ उसे तरक्की देता गया।
कुछ ही समय में अपनी मेहनत और लगन से उसने सेठ का विश्वास इतना जीत लिया की सेठ ने उसे अपना पार्टनर बना लिया। कुछ समय बाद सारा काम उसे सौंप कर सेठ यात्रा पर निकल गया। अब वह खुद बड़ा सेठ बन चुका था।
उधर उसकी पत्नी पर बड़े जुल्म हो रहे थे। घर के सभी लोग उससे दिन भर काम करवाते। जंगल में लकड़ी लाने भेजते। भूसे की रोटी खाने को देते। नारियल के कटोरे में पानी पिलाते।
एक दिन जंगल जाते समय उसने रास्ते में कुछ औरतों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। कथा कहते हुए सुना। उसने पूछा की यह व्रत कैसे करते है , और इसे करने से क्या होता है।  
उनमे से एक औरत ने बताया कि यह संतोषी माता का व्रत है। इसे करने से दरिद्रता मिटती है , मन की चिंता दूर होती है , कुंवारों को मनपसंद जीवन साथी मिलता है , रोग दूर होते है , हर प्रकार का सुख  प्राप्त होता है।
इसे करने के लिए अपनी सुविधा और शक्ति  के अनुसार गुड़ चना खरीद लेना। हर शुक्रवार व्रत करना और कथा कहना या सुनना। जब तक कार्य सिद्ध नहीं हो जाता बिना क्रम तोड़े व्रत करना।
कथा सुनने वाला कोई ना मिले तो दीपक को सामने रखकर कथा कहना। कार्य सिद्ध होने पर उद्यापन करना। उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा , उतनी ही खीर और उतना ही चने का साग बनाना।
आठ लड़कों को भोजन कराना। लड़के परिवार के ही हो तो अच्छा नहीं तो पड़ोस से भी बुला सकते हैं। भोजन कराकर व केला आदि फल देकर विदा करना। खट्टे फल नहीं देना।
उस दिन घर में कोई खटाई ना खाये।  
सारी विधि जानकर उसने गुड़ चने खरीद लिए। रास्ते में संतोषी माता के मंदिर में भोग लगाकर याचना करने लगी – माँ मुझे व्रत के नियम कायदे नहीं पता। मैं शुक्रवार का व्रत निष्ठां से करुँगी , मेरा दुःख दूर करना।
एक शुक्रवार बीता ,दूसरे शुक्रवार को पति का पत्र आया ,तीसरे शुक्रवार पति के भेजे रूपये आ गए। परन्तु सब घर वाले ताना मारने से नहीं चूकते।
दुखी होकर माता के मंदिर में प्रार्थना करने लगी – माँ मुझे पैसा नहीं चाहिए। मुझे अपने स्वामी के दर्शन करने हैं। माता ने उसे आशीर्वाद देकर कहा – तेरा पति जल्दी ही आएगा। वह बहुत खुश हुई।
परदेस में उसके पति के पास बिल्कुल समय नहीं था। दिनभर व्यस्त रहता था। माँ संतोषी ने उसके सपने में आकर उसे बताया कि उसकी पत्नी बहुत दुखी है। उसे उसके पास जाना चाहिए। उसे पत्नी की बहुत चिंता होने लगी। दुकान बेचकर पत्नी के लिए कपड़े , गहने और ढ़ेर सारा पैसा लेकर रवाना हो गया। 
बहु जंगल से लकड़ी काटकर लौट रही थी तब उसने धूल का गुबार उठते देखा। माता ने उसे बताया की उसका पति आ रहा है। वह घर माँ के पास जा रहा है।
इसलिए वह भी घर जाये और चौक में लकड़ी का गट्ठर डाल कर आवाज लगाये – लो सासुजी लकड़ी का गट्ठर , भूसी की रोटी दो , नारियल के खोखे में पानी दो ,आज कौन मेहमान आया है। उसने ऐसा ही किया।
आवाज सुनकर उसका पति बाहर आया और अंगूठी देखकर व्याकुलता के साथ माँ से पूछा की ये कौन है ? माँ बोली ये तेरी बहु है। दिन भर घूमती रहती है। भूख लगे तो यहाँ आकर खाना खा लेती है। काम कुछ करती नहीं है।  तुझे दिखाने के लिए नाटक कर रही है।
उसे विश्वास नहीं हुआ और माँ से चाबी लेकर ऊपर वाली मंजिल के कमरे में अपनी पत्नी के साथ चला गया। कमरे को महंगे सामान से सजा कर महल जैसा बना दिया। दोनों सुख से रहने लगे।  
बहु में अपने पति से कहा – मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने स्वीकृति दे दी। ख़ुशी से माता के उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठानी के बच्चों को खाने का न्योता दिया।
उसका उद्यापन बिगड़ने के लिए जेठानी ने बच्चों से कहा की तुम खटाई मांगना। बच्चों ने वैसा ही किया पर उसने खटाई देने से मना कर दिया तो बच्चों ने पैसे मांगे जो उसने दे दिए।
बच्चों ने खटाई खरीद कर खा ली। माता क्रुद्ध हो गई। सिपाही आये और उसके पति को अपने साथ ले गए। जेठानी बोली चोरी करके पैसे इकट्ठे किये है। इसलिए सिपाही पकड़कर ले गए।
बहु रोती बिलखती माता के मंदिर गई। माँ ने कहा तुमसे भूल हुई यह उसी का परिणाम है। बहु क्षमा मांग कर बोली में फिर से उद्यापन करुँगी और अब ऐसी भूल नहीं होगी। मेरे पति को वापस बुलाओ।
माता ने कहा वह रास्ते में आता हुआ मिल जायेगा। उसका पति रास्ते में मिला और कहने लगा इतना धन कमाया है उसका टेक्स भरने गया था। सिपाही इसी कारण आये थे। बहु ने चैन की साँस ली।
शुक्रवार आने पर फिर से उद्यापन की तैयारी कर ली। इस बार जेठानी के बच्चों को नहीं बुलाया। पंडित के बच्चों को बुलाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया और केले देकर विदा किया। माता बहुत प्रसन्न हुई।
कुछ समय बाद उसे बहुत सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर रोजाना माता के मंदिर जाती थी। एक दिन माता ने सोचा आज मैं इसके घर जाकर देखती हूँ।   
माता ने भयानक रूप अपनाया। गुड़ और चने से सना मुख , सूंड जैसे होंठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी। दहलीज पर पांव रखते ही उसकी सास चिल्लाने लगी।
अरे देखो कोई चुड़ैल आ गई है। इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। घर के सब लोग डर गए और चिल्लाने लगे। घर के खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। छोटी बहु देखते ही पहचान गई।
प्रसन्न होकर बोली – आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं। सास से बोली माँ जी डरो मत ये वही संतोषी माता जी हैं जिनकी मैं पूजा करती हूँ और जिनका व्रत रखती हूँ। यह कह कर उसने घर के सब खिड़की दरवाजे खोल दिए ।
सभी लोग माँ के चरणों में गिर गए । कहते हैं – माँ , हम अज्ञानी हैं। आपका व्रत भंग करके हमने जो अपराध किया है उसके लिए हमें क्षमा करो। माँ ने सभी को क्षमा करके कुशल मंगल का आशीर्वाद दिया और प्रेम पूर्वक रहने की सीख दी। सब आनंद से रहने लगे।
बहु को जैसा फल दिया संतोषी माँ सबको वैसा ही दे। जो यह कहानी पढ़े ,उसका मनोरथ पूर्ण हो।
For medical and educational help, we are a helping hand. For more info, visit us at www.radhemaa.com
                                                                                                                                               Source:http://bit.ly/2V2nHZ0

Friday, September 4, 2015

Mahamantra of Goddess Santoshi Mata



ॐ श्री संतोषी महामाया गजानंदम दायिनी 
शुक्रवार प्रिये देवी नारायणी नमोस्तुते ||



Friday, July 10, 2015

Santoshi Mata - The Goddess Of Bravery


Maa Santoshi is an emblem of love, contentment, forgiveness, happiness and hope. It is so believed that fasting and praying for her for 16 consecutive Fridays brings peace and prosperity in ones family

Note:
To know more about Guru Maa’s teachings you may follow her on her account on Twitter and Facebook or log on to www.radhemaa.com. These social pages are handled by her devoted sevadars. To experience her divine grace, Bhakti Sandhyas and Shri Radhe Guru Maa Ji’s darshans are conducted every 15 days at Shri Radhe Maa Bhavan in Borivali, Mumbai. The darshans are free and open to everyone.
One may also volunteer to Mamtamai Shri Radhe Guru Maa’s ongoing social initiatives that include book donation drives, blood donation drives, heart checkup campaigns and financial support for various surgical procedures. Contact Shri Radhe Maa’s sevadar on +91 98200 82849 or email on admin@radhemaa.com to participate in these charitable activities.

(Photo Courtesy – google.com)

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