Thursday, May 31, 2018

शक्तिपीठ की पौराणिक कथा ||

मां दुर्गा के नौ स्‍वरूपों के बारे में हर कोई जानता है और नवरात्रि में मां के इन्‍हीं रूपों की आराधना की जाती है. हिंदू धर्म में नवदुर्गा पूजन के समय ही मां के मंदिरों में भी भक्‍तों का तांता लगता है और उनमें भी मां के शक्तिपीठों का महत्‍व अलग ही माना जाता है.

पवित्र शक्ति पीठ पूरे भारत के अलग-अलग स्‍थानों पर स्थापित हैं. देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है तो देवी भागवत में 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है, वहीं तन्त्र चूड़ामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं. देवी पुराण के मुताबिक 51 शक्तिपीठ में से कुछ विदेश में भी स्थापित हैं. भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्तिपीठ हैं.



शक्तिपीठ की पौराणिक कथा :-

मां के 51 शक्तिपीठों की एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता दुर्गा ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से उनका विवाह हुआ था. एक बार मुनियों के एक समूह ने यज्ञ आयोजित किया. यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था. जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए. भगवान शिव दक्ष के दामाद थे.

यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए. अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने भी एक यज्ञ का आयोजन किया. उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शिव को इस यज्ञ का निमंत्रण नहीं भेजा.

भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए और जब नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है. यह जानकर वे क्रोधित हो उठीं. नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की जरूरत नहीं होती है. जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने उन्हें समझाया लेकिन वह नहीं मानी तो प्रभु ने स्वयं जाने से इंकार कर दिया.

शंकर जी के रोकने पर भी जिद कर सती यज्ञ में शामिल होने चली गईं. यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया. इस पर दक्ष, भगवान शंकर के बारे में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे. इस अपमान से पीड़ित सती ने यज्ञ-कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी.

भगवान शंकर को जब यह पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया. ब्रम्हाण्ड में प्रलय व हाहाकार मच गया. शिव जी के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सजा दी. भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी होकर सारे भूमंडल में घूमने लगे.

भगवती सती ने शिवजी को दर्शन दिए और कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के अंग अलग होकर गिरेंगे, वहां महाशक्तिपीठ का उदय होगा. सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर घूमते हुए तांडव भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी. पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर धरती पर गिराते गए. जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से माता के शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते.

शास्‍त्रों के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, उनके वस्त्र या आभूषण गिरे , वहां-वहां शक्तिपीठ का उदय हुआ. इस तरह कुल 51 स्थानों में माता के शक्तिपीठों का निर्माण हुआ. अगले जन्म में सती ने राजा हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया.

Wednesday, May 30, 2018

महालक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु नहीं बल्कि गणेशजी की पूजा की जाती है परंतु ऐसा क्यों ?

यह सर्व ज्ञात है कि महालक्ष्मी, भगवान विष्णु की प्राण सखी हैं। यदि धन की देवी को प्रसन्न करना है तो उनके पति विष्णु जी का उनके साथ पूजन करना आवश्यक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार महालक्ष्मी भगवान विष्णु का साथ कभी नहीं छोड़तीं। वेदों के अनुसार भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में महालक्ष्मी को ही उनकी पत्नी का स्थान मिला है। जहां विष्णु हैं वहीं महालक्ष्मी भी हैं। परंतु फिर भी आज भगवान विष्णु के साथ नहीं बल्कि गणेश के साथ लक्ष्मी का पूजन किया जाता है।


महालक्ष्मी संग गणपति का पूजन दीपावली कि रात्रि को किया जाता है। सनातन धर्म में दीपावली के पर्व को अत्यंत महत्ता दी गई है। इस दिन सभी लोग अपने-अपने घरों को साफ-सुथरा करके, स्वयं भी शुद्ध पवित्र होकर रात्रि को विधि-विधान से गणेश लक्ष्मी का पूजन कर उनको प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। दीपावली के त्यौहार में लक्ष्मी पूजन एक ही भावना से किया जाता है कि मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर धन का प्रकाश लेकर आएं। इस पूजा में यदि हम चाहते हैं कि महालक्ष्मी का स्थाई निवास हमारे घर में हो और उनकी कृपा हम पर बनी रहे तो उनके पति विष्णु जी का आह्वान करना चाहिए लेकिन फिर भी विष्णु के स्थान पर गणेश को पूजा जाता है, ऐसा क्यों ?

लक्ष्मी संग गणेश पूजन का शास्त्रीय आधार

शास्त्रों के अनुसार गणपति को महालक्ष्मी का मानस-पुत्र माना गया है। दीपावली के शुभ अवसर पर ही इन दोनों का पूजन किया जाता है। तांत्रिक दृष्टि से दीपावली को तंत्र-मंत्र को सिद्ध करने तथा महाशक्तियों को जागृत करने की सर्वश्रेष्ठ रात्रि माना गया है। यह तो सभी जानते हैं कि किसी भी कार्य को करने से पहले गणपति का पूजन किया जाता है लेकिन इसके साथ ही गणपति के विविध नामों का स्मरण सभी सिद्धियों को प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन एवं नियामक भी है।

दीपावली पर महालक्ष्मी के साथ गणपति का पूजन करने में संभवतः एक भावना यह भी कही गई है कि मां लक्ष्मी अपने प्रिय पुत्र की भांति हमारी भी सदैव रक्षा करें। हमें भी उनका स्नेह व आशीर्वाद मिलता रहे। महालक्ष्मी के साथ गणेश पूजन में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गणपति को सदा महालक्ष्मी की बाईं ओर ही रखें। आदिकाल से पत्नी को ‘वामांगी’ कहा गया है। बायां स्थान पत्नी को ही दिया जाता है। अतः कभी भी पूजा करते समय लक्ष्मी-गणेश को इस प्रकार स्थापित करें कि महालक्ष्मी सदा गणपति के दाहिनी ओर ही रहें, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होगा।

कृष्ण, बलराम और राक्षस - महाभारत की बात ||

महाभारत काल की बात है। एक बार कृष्ण और बलराम किसी जंगल से गुजर रहे थे। चलते-चलते काफी समय बीत गया और अब सूरज भी लगभग डूबने वाला था। अँधेरे में आगे बढना संभव नहीं था, इसलिए कृष्ण बोले, “ बलराम, हम ऐसा करते हैं कि अब सुबह होने तक यहीं ठहर जाते हैं, भोर होते ही हम अपने गंतव्य की और बढ़ चलेंगे।”


बलराम बोले, “ पर इस घने जंगल में हमें खतरा हो सकता है, यहाँ सोना उचित नहीं होगा, हमें जाग कर ही रात बितानी होगी।”

“अच्छा, हम ऐसा करते हैं कि पहले मैं सोता हूँ और तब तक तुम पहरा देते रहो, और फिर जैसे ही तुम्हे नींद आये तुम मुझे जगा देना; तब मैं पहरा दूंगा और तुम सो जाना।”, कृष्ण ने सुझाव दिया।

बलराम तैयार हो गए।

कुछ ही पलों में कृष्ण गहरी नींद में चले गए और तभी बलराम को एक भयानक आकृति उनकी ओर आती दिखी, वो कोई राक्षस था।

राक्षस उन्हें देखते ही जोर से चीखा और बलराम बुरी तरह डर गए।

इस घटना का एक विचित्र असर हुआ- भय के कारण बलराम का आकार कुछ छोटा हो गया और राक्षस और विशाल हो गया।

उसके बाद राक्षस एक बार और चीखा और पुन: बलराम डर कर काँप उठे, अब बलराम और भी सिकुड़ गए और राक्षस पहले से भी बड़ा हो गया।

राक्षस धीरे-धीरे बलराम की और बढ़ने लगा, बलराम पहले से ही भयभीत थे, और उस विशालकाय राक्षस को अपनी और आता देख जोर से चीख पड़े –“कृष्णा…” ,और चीखते ही वहीँ मूर्छित हो कर गिर पड़े।

बलराम की आवाज़ सुन कर कृष्ण उठे, बलराम को वहां देख उन्होंने सोचा कि बलराम पहरा देते-दते थक गए और सोने से पहले उन्हें आवाज़ दे दी।

अब कृष्ण पहरा देने लगे।

कुछ देर बाद वही राक्षस उनके सामने आया और जोर से चीखा।

कृष्ण जरा भी घबराए नही और बोले, “बताओ तुम इस तरह चीख क्यों रहे हो, क्या चाहिए तुम्हे?”

इस बार भी कुछ विच्त्र घटा- कृष्ण के साहस के कारण उनका आकार कुछ बढ़ गया और राक्षस का आकर कुछ घट गया।

राक्षस को पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उससे डर नहीं रहा था। घबराहट में वह पुन: कृष्ण पर जोर से चीखा!

इस बार भी कृष्ण नहीं डरे और उनका आकर और भी बड़ा हो गया जबकि राक्षस पहले से भी छोटा हो गया।

एक आखिरी प्रयास में राक्षस पूरी ताकत से चीखा पर कृष्ण मुस्कुरा उठे और फिर से बोले, “ बताओ तो क्या चाहिए तुम्हे?”

फिर क्या था राक्षस सिकुड़ कर बिलकुल छोटा हो गया और कृष्ण ने उसे हथेली में लेकर अपनी धोती में बाँध लिया और फिर  कमर में खोंस कर रख लिया।

कुछ ही देर में सुबह हो गयी, कृष्ण ने बलराम को उठाया और आगे बढ़ने के लिए कहा! वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे तभी बलराम उत्तेजित होते हुए बोले, “पता है कल रात में क्या हुआ था, एक भयानक राक्षस हमे मारने आया था!”

“रुको-रुको”, बलराम को बीच में ही टोकते हुए कृष्ण ने अपनी धोती में बंधा राक्षस निकाला  और बलराम को दिखाते हुए बोले, “कहीं तुम इसकी बात तो नहीं कर रहे हो?”

“हाँ, ये वही है। पर कल जब मैंने इसे देखा था तो ये बहुत बड़ा था, ये इतना छोटा कैसे हो गया?”, बलराम आश्चर्यचकित होते हुए बोले।

कृष्ण बोले, “ जब जीवन में तुम किसी ऐसी चीज से बचने की कोशिश करते हो जिसका तुम्हे सामना करना चाहिए तो वो तुमसे बड़ी हो जाती है और तुम पर नियंत्रण करने लगती है लेकिन जब तुम उस चीज का सामना करते हो जिसका सामना तुम्हे करना चाहिए तो तुम उससे बड़े हो जाते हो और उसे नियंत्रित करने लगते हो!”

Wednesday, May 23, 2018

हिरण्याक्ष का वध करने के लिए विष्णु बने वराह अवतार.

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनत-सनकादि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ धाम पहुंचे। वैकुंठ में विष्णु धाम के द्वार पर भगवान के दो पार्षद जय-विजय द्वारपाल के रूप में बैठे थे। इन दिगम्बर साधुओं को देखकर पहले तो उन्हें हंसी आ गई, फिर पूछा- “आप लोग कौन है ? ऐसे नंग-धड़ंग यहां कहां चले आ रहे है ?


उनकी बात का सनत ने बुरा नहीं माना, क्योंकि ये द्वारपाल थे और बिना पूरी जांच-पड़ताल के कैसे अंदर जाने देते। अपनी वेश-भूषा पर उनके हंसने का भी बुरा नहीं माना, क्योंकि वैकुंठ जैसे वैभवशाली परिवेश में ऐसे साधुओं का क्या काम। उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-“हम सनत कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते है। हम सदा इसी रूप में रहते है, इसलिए हमे अंदर जाने दो। ”

मगर जय-विजय नामक द्वारपालों ने सनत-सनकादि को अंदर नहीं जाने दिया। इससे ऋषियों को क्रोध आ गया कि इन द्वारपालों को इतनी भी समझ नहीं की ऋषियों साधुओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्रोध में उन्होंने शाप देते हुए कहा-“तुम दोनों ने देवों के साथ रहकर भी दैत्यों जैसा व्यवहार किया है, इसलिए अगले जन्म में तुम दोनों दैत्य कुल में जन्म लोगे।”

द्वार पर इस विवाद को सुनकर भगवान विष्णु स्वयं बाहर आ गए और सनत-सनकादि को आदर से अंदर जाने को कहा। उधर जय-विजय को दुखी देख भगवान विष्णु ने कारण पूछा तो उन्होंने अपने शाप की बात बताई।

भगवान विष्णु ने कहा-“उद्दंडता का फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। असुर कुल में तुम्हारा अगला जन्म अवश्य होगा। इतनी चिंता मत करो। तुम मेरे पार्षद हो, इसलिए इसका पुण्य भी मिलेगा। मेरे द्वारा ही तुम्हें दैत्य-योनि से मुक्ति मिलेगी।”

सनत-सनकादि भगवान के दर्शन कर चले गए। जय-विजय की मृत्यु होने पर उनका जन्म कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से हुआ। दिति दैत्य कुलों की माता थी, अतः उसके गर्भ से जन्म लेने वाले जय-विजय का नाम इस जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुआ। उन दोनों में प्रबल आसुरी शक्ति थी। उन्होंने अपने उत्पात द्वारा आसुरी शक्ति के बल पर आसुरी राज्य स्थापित किया। उन्होंने देवलोक पर भी आक्रमण कर देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके राज्य के सारे यज्ञ उनके ही नाम पर होंगे। देवों को कोई यज्ञ भाग नहीं मिलेगा। किसी भी देवी-देवता या ईश्वर की पूजा आराधना के बजाय उनकी ही पूजा होगी। देवगण कभी यहां पहुंच ही न सके, इसलिए मैं पृथ्वी को ही पाताल में पहुंचा देता हूं।” यह निश्चय कर हिरण्याक्ष आसुरी शक्ति के बल पर पृथ्वी को रसातल में ले गया।

इससे सारे ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि का नियम भंग होने लगा। चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया। ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर विष्णु से प्रार्थना की- “भगवान ! देखिए इन दो महापराक्रमी असुरो ने क्या किया ? देवताओं का यज्ञ भाग छीना, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त किए और अब तो समस्त भूमण्डल को ही रसातल में ले गए। उठिए, कुछ करिए। ब्रह्मा की सृष्टि में बड़ा व्यवधान उपस्थित हो गया है। आप ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने का स्थान बनाएं। पृथ्वी जल में डुब रही है, उसके उद्धार के लिए वैकुण्ठ का वास छोड़कर कोई अवतार लीजिए। ”

भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को आश्वासन दिया- “जब पृथ्वी पर पाप का भार ज्यादा हो जाता है तो उसके उद्धार के लिए मुझे अवतार लेना ही पड़ता है। आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं कुछ करता हूं।”

देवताओं के चले जाने पर भगवान विष्णु ने नीचे देखा। पृथ्वी का कही पता नहीं, सर्वत्र जल-ही-जल दिख रहा था। फिर तो भगवान वाराह के रूप में प्रकट हुए और समुद्र में कूद पड़े, भयंकर गर्जना के साथ अपनी विशाल दाढ़ पर पृथ्वी को रखकर वे अथाह जल राशि को चीरते हुए ऊपर आ गए। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते देख तथा वाराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष बौखला गया कि किसने उसकी शक्ति को चुनौती दी है। वाराह को देखते ही वह उसे मारने दौड़ा। उसका हर अस्त्र-शस्त्र वराह के शरीर से टकराकर चूर-चूर हो जाता था। भगवान कुछ देर उसके प्रहार झेलते रहे और उसके क्रोध को भड़काते रहे। रूप भले ही वाराह का था, पर थे तो वे परब्रह्म अनन्त शक्ति भगवान विष्णु।

उन्होंने एक झटके से हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठा लिया और घुमाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटकर वह धड़ाम से पृथ्वी पर वाराह के पास ही गिर पड़ा। मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वह वाराह अब वाराह न होकर भगवान विष्णु है। उसे अपना पूर्व जन्म याद हो आया।

उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा- “भगवान ! पाप के शाप का आपने अंत कर दिया और अपने ही हाथों इस जन्म से मुक्ति दिलाई। मुझे तो मुक्ति मिली, पर मेरे भाई हिरण्यकशिपु का क्या होगा ? उसे भी तो मुक्ति दीजिये।

भगवान विष्णु हंसकर बोले- “समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकशिपु के पाप का अभी अंत नहीं है। तुम्हारे अंत के लिए पृथ्वी कारण बनी। उसके अंत के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वाराह बनना पड़ा। उसके लिए नृसिंह रूप में अवतार लेकर उसका उद्धार करना पड़ेगा।”

भगवान विष्णु के ये शब्द सुनकर हिरण्याक्ष ने बड़ी शान्ति से अपने प्राण त्याग दिए।

Thursday, May 10, 2018

क्यों माता शक्ति (माँ भगवती) का नाम दुर्गा पड़ा?

पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। तब दुर्गम ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब देवताओं को देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया।



देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की बात सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया।
यह बात जब दैत्यों का राजा दुर्गम को पता चली तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया। सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया। तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण भी भगवती का नाम दुर्गा के नाम से भी विख्यात हुआ।

Monday, March 26, 2018

मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व है करते है भगवान श्री राम ः गुरु राधे मां

मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व है करते है भगवान श्री राम ः गुरु राधे मां














श्री रामनवमी के उपलक्ष्य में मुकेरिया में महंत बलदेव दास की अध्यक्षता में आयोजित शोभायात्रा में ममतामयी श्री राधे गुरु मां भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए पहुंची। इस दौरान विभिन्न धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। राधे मां ने भक्तों को आशीर्वाद दिया और श्री राम नवमी की बधाई देते हुए कहा कि प्रभू राम मानवता का प्रतिनिधित्व है। मानवता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते है। मर्यादाओं को एकांतित करते है और विवेक, त्याग तपस्या उसकी एक मिसाल हमारे बीच छोड़ कर गए है। देश का हर भक्त राम तो नहीं बन पाएगा, लेकिन अनाचार, दुराचार और अत्याचारके सामने हम जुटायू जैसी भूमिका तो ्दा कर सकते है। श्री राम भक्त के रग-रग में है। जन-जन में है मन है। प्रभू श्री राम हमें मानवता के रास्ते पर चलने की ताकत दे। उन्होंने कहा कि हमें सभी धर्मों का मान सत्कार करना चाहिए। इस अवसर पर संजीव गुप्ता, भुपिंदर सिंह बंटी, हरजिंदर सिंह, नीशू, मेघा सिंह, मनीषा सिंह, राज, डॉ. जगदीश कश्यप, मनोज अग्रवाल, रुपिंदर भाटिया, जसविंदर भाटिया, जगमोहन गुप्ता, नकुल गुप्ता, अकुल गुप्ता, योगराज शर्मा, विजय ओहरी, डॉ सहगल, सोनी शर्मा, चंद्र मोहन, शिव कुमार, विशू कुंद्रा, भगवान दास, केसी राणा, रजिंदर शर्मा, कमल देव, मंगलेश कुमार व भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

Saturday, March 24, 2018

हनुमान जी का लंका गमन

हनुमान जी का लंका गमन :- 



पवन वेग से हनुमान जी समुद्र के ऊपर आकाश में उड़े जा रहे थे । पवनदेव अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहायता कर रहे थे । आकाश में देवगण उन पर पुष्प वर्षा कर रहे थे । समुद्र के गर्भ में मैनाक नामक एक पर्वत था ।

समुद्र ने उससे कहा, ”हे मैनाक ! पवन पुत्र हनुमान रघुवंश शिरोमणि श्री रघुनाथ जी के कार्य के लिए लंका जा रहे हैं । तुम अपना आकार ऊपर-नीचे और चारों दिशाओं में बढ़ा सकते हो । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि तुम समुद्र के गर्भ से ऊपर उठो और श्री हनुमान जी को थोड़ा विश्राम करने के लिए कहो । इस प्रकार कोई यह नहीं कहेगा कि समुद्र ने श्री रघुनाथ जी के कार्य में सहयोग नहीं किया ।”

मैनाक पर्वत से भेंट:

समुद्र की आज्ञा पाकर मैनाक पर्वत आकाश की ओर ऊंचा उठ गया और तीव्र गति से जाते हुए हनुमान जी के मार्ग में आ गया । हनुमान जी ने समझा कि यह पर्वत उनके मार्ग में बाधा बन रहा है । इसलिए उन्होंने उस पर पद प्रहार करना चाहा ।

तभी मैनाक पर्वत हाथ जोड़कर हनुमान जी से बोला, ”हे पवनपुत्र ! मेरा आशय तुम्हारे मार्ग में रोड़ा बनने का नहीं है । मैं तो चाहता हूं कि आप मेरा आतिश्य ग्रहण करें और कुछ देर यहां विश्राम करके आगे जाए ।” इस पर हनुमान जी ने कहा, ”हे मैनाक ! तुम्हारा आतिथ्य मैंने स्वीकार कर लिया । परंतु मैं रुक नहीं सकता । मैंने सकल्प लिया हुआ है कि मार्ग में रुके बिना ही मैं लंका पहुँचूँगा ।”

ऐसा कहकर हनुमान ने अपने एक पैर का आघात करके मैनाक पर्वत को फिर से समुद्र में धकेल दिया और आगे बढ़ गए । उनकी गति और भी तीव्र हो गई ।

सुरसा से भेंट:

हनुमान जी अभी थोड़ा आगे बढे ही थे कि समुद्र में रहने वाली नागमाता सुरसा अपना विकराल मुंह फाड़कर हनुमान जी के मार्ग में आ खडी हुई और हनुमान जी से बोली, ”अरे वानर ! तू मेरा निरादर करके कहां जा रहा है ? तू मेरा भोजन है । मैं तुझे उठाऊंगी ।”

हनुमान जी ने मुस्कराकर सुरसा से कहा, ”देवी ! मैं श्रीरामचंद्र जी के कार्य से लंका जा रहा हूं । तुम्हें मेरे मार्ग में अवरोध नहीं बनना चाहिए और उनके कार्य में विप्न नहीं डालना चाहिए । यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो मैं तुम्हें वचन देताहूं किमैं श्रीरामचंद्र जी के कार्य को संपन्न करकेपुन तुम्हारे पास आ जाऊंगा, तब तुम मुझे खा लेना ।”

हनुमान जी के ऐसा कहने पर सुरसा बोली, ”अरे वानर ! मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लांघकर आगे नहीं जा सकता । तुम्हें यदि आगे जाना ही है तो मेरे मुख में प्रवेश करके ही आगे जाना हो सकेगा ।” ऐसा कहकर सुरसा ने अपना विशाल मुख फैला दिया ।

आगे का मार्ग अवरुद्ध देखकर हनुमान जी ने भी अपना आकार बढ़ा लिया । सुरसा ने अपने मुख का आकार उनसे भी बड़ा कर लिया । तब हनुमान जी ने अपना रूप अंगूठे के बराबर छोटा करके सुरसा के मुख में प्रवेश किया और वे तत्काल उसके मुख से बाहर निकल आए ।

बाहर आकर हनुमान ने अपने पूर्व रूप में आकर सुरसा से कहा, ”हे देवी ! मैंने तुम्हारे मुख में प्रवेश कर लिया है । इस प्रकार तुम्हारा वर सत्य हो गया है । अब मैं उस स्थान को जाऊँगा जहाँ माता सीता विराजमान हैं ।”

हनुमान जी की चतुराई देखकर सुरसा ने अपने सामान्य रूप में आकर हनुमान जी से कहा, ”हे कपिश्रेष्ठ अब मैं तुम्हारे मार्ग में बाधा नहीं डालूंगी । तुम सुखपूर्वक श्रीराम के कार्य को संपन्न करने के लिए जाओ । मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं ।”

हनुमान जी द्वारा सिंहिका राक्षसी का वध:

हनुमान जी एक पल गंवाए बिना तीव्र गति से आगे बढ़ गए । वे अभी कुछ ही दूर गए थे कि समुद्र के गर्भ में रहने वाली एक अत्यंत भयंकर सिंहिका नामक राक्षसी ने उछलकर हनुमान जी को पकड़ लिया और बोली, ”अरे ! मुझे लांघकर जाने वाला तू कौन है ?”

वह राक्षसी अत्यंत विकट थी । वह पानी पर पड़ने वाली छाया से ही ऊपर उड़ते हुए जीव को पकड़ लेने की क्षमता रखती थी । हनुमान जी समझ गए कि यह अत्यंत दुष्ट राक्षसी है । इससे पहले कि वे अपने बचाव का कोई मार्ग सोचते, उस राक्षसी ने अपने विशाल मुख में हनुमान जी को डाल लिया और सटक गई ।

परंतु उसके पेट में पहुंचते ही हनुमान जी ने अपना आकार बढ़ाया और उसके पेट को फाड़कर बाहर निकल आए । सिंहिका का वध करके वे पुन: आकाश में उड़ने लगे । सिंहिका का विशाल शरीर समुद्र के गर्भ में समा गया ।

जिस समय हनुमान जी लंका के करीब पहुंचे तो उन्होंने सोचा कि उनके इस विशाल शरीर को देखकर कहीं राक्षसगण भयभीत न हो जाएं, ऐसा सोचकर उन्होंने अपना आकार छोटा कर लिया और अपने सामान्य रूप में आकर धीरे से लंका की धरती पर उतर पड़े ।

लंका प्रवेश के अवसर पर लंकिनी से भेंट:

त्रिकूट पर्वत पर खड़े होकर हनुमान जी ने लंका नगरी की शोभा को देखा । लंका नगरी के चारों ओर गहरी खाई थी । समस्त राजभवन स्वर्ण पत्रों से मंडित थे । विशाल परकोटे थे और सर्वत्र भव्य भवन दिखाई पड़ रहे थे ।

लंका में चारों ओर शक्तिशाली और विराट शरीर वाले राक्षस मदमस्त होकर विचरण कर रहे थे । परकोटों पर रावण के सशस्त्र सैनिक विद्यमान थे । उनके वर्ण काले थे और वे बड़े भयानक दिखाई पड़ रहे थे । अधिकांश राक्षस और राक्षसियां मद्यपान किए हुए थे और मांस भक्षण कर रहे थे ।

लंका के परकोटों के बाहर भयानक वन थे और नगर में प्रवेश के लिए भारी भरकम दरवाजे थे । उन दरवाजों पर भी सशस्त्र राक्षसों का पहरा था । लंका में कोई भी घर संपदा विहीन दिखाई नहीं पड़ता था । सभी संपन्न और बलशाली थे ।

हनुमान जी ने सोचा कि लंका में प्रवेश करने का यह समय उचित नहीं है । रात्रि में जब ये राक्षस मद्यपान और विलास कृत्यों से थक-हारकर सो जाएंगे, तब मैं लंका में प्रवेश करूंगा और सीता जी की खोज करूंगा । ऐसा सोचकर हनुमान जी ने त्रिकूट पर्वत पर ही समय बिताया और रात्रि का तीसरा प्रहर होने की प्रतीक्षा करने लगे ।

रात्रि का तीसरा प्रहर होने पर जब लंका में सोता पड़ गया तो हनुमान जी ने अपना सामान्य रूप बनाया और लंका में प्रवेश करने लगे । लेकिन तभी एक विशाल और कुरूप राक्षसी ने उन्हें रोका, ”हे वानर ! तू कौन है और इस तरह लंका में कहां घुसा चला जा रहा है ?

तू क्या जानता नहीं कि इस लंका की रक्षा करने का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा गया है ? मैं राजराजेश्वर लंकापति रावण की प्रधान सेविका हूं और मेरा नाम लंकिनी है । मेरे नाम पर ही इस नगरी का नाम लंका पड़ा है । मेरी आज्ञा के बिना कोई भी इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता । तू बता कि यहां किसलिए आया है ?”

हनुमान जी ने कहा, ”हे देवी ! मैं श्रीराम का दूत हनुमान हूं और उनकी पत्नी सीता जी की खोज में यहां आया हूँ । मैं इस लंका नगरी से उनकी खोज करके ही वापस जाऊंगा । कोई भी मेरा मार्ग नहीं रोक सकता । जो ऐसा दुस्साहस करेगा वह पछताएगा ।”

हनुमान जी की बात सुनकर लंकिनी ने कहा, “तू जो भी है, मुझे परास्त किए बिना लंका में प्रवेश नहीं कर सकता । तुझे पहले मुझे परास्त करना होगा ।” ”हे देवी ! मैं स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाता । यह हमारी संस्कृति के विपरीत है । किंतु यदि कोई स्त्री भी मेरे मार्ग की बाधा बनेगी, तो मैं उसे भी अपने मार्ग से हटा दूंगा ।”

हनुमान जी ने उससे कहा । हनुमान जी की बात सुनकर लंकिनी को क्रोध आ गया । उसने पलटकर एक थप्पड़ हनुमान जी को मार दिया और चीखी, ”भाग जा यहां से, वरना मैं तुझे कच्चा चबा जाऊंगी ।” हनुमान जी ने भी आव देखा न ताव, अपना एक ऐसा लंकिनी पर चला दिया ।

वह ऐसा उन्होंने उसे स्त्री जानकर हल्के से ही चलाया था, पर वह उस घूंसे के प्रहार से धरती पर जा गिरी और उसके मुख से रक्त बहने लगा । लंकिनी का सारा शरीर पीड़ा से भर उठा । वह जोर-जोर से सांस लेकर हांफने लगी । कुछ क्षण बाद वह उठी और हनुमान जी के सामने हाथ जोड़कर बोली, ”हे महाबली वानर! मुझे लगता है कि अब लंका के पापों का अत समय आ पहुँचा है । ब्रह्मा जी की बात असत्य नहीं हो सकती ।

उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रम से अपने वश में कर लेगा, तब तुझे समझ लेना होगा कि राक्षसों पर महान विपत्ति आने वाली है और इस लंका का सर्वनाश हो जाएगा । हे महाबली ! आपकी शक्ति अपार है । आपके एक हल्के से प्रहार ने ही मेरे शरीर की चूल-चूल हिला दो है ।

आप श्रीराम के दूत हैं । आपके दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया । आप अपनी इच्छा से इस लंका नगरी में प्रवेश करें और सीता जी से भेंट करे ।” इतना कहकर लंकिनी उनके मार्ग से हट गई । हनुमान जी ने तभी अपना सूक्ष्म रूप बनाया और लंका में प्रवेश किया ।

लंका में विभीषण से भेंट:

लंकिनी की बातों पर विचार करते हुए हनुमान जी राजभवन के अंतःपुर में प्रवेश कर गए । वहां उन्होंने अनेकानेक सुदर युवतियों और राक्षसों को सशस्त्र पहरा देते हुए देखा । राजभवन की शोभा नेत्रों को चकाचौंध कर रही थी । वहाँ एक शयनकक्ष में उन्होंने महाबली रावण को एक अति सुँदर गौरांग स्त्री के साथ सोते हुए देखा ।

पलभर के लिए उनके मन में विचार आया कि कहीं ये देवी सीता तो नहीं । लेकिन तत्काल उनके मन में विचार कौंधा कि देवी सीता इस प्रकार अपने पति से बिछुड़ने के उपरांत पूरे साज-संगार के साथ एक परपुरुष के साथ कैसे हो सकती है ।

निश्चय ही ये देवी सीता नहीं, कोई और है । तभी उन्हें लगा कि वे इस प्रकार सोती हुई स्त्रियों को देख रहे हैं, इससे कहीं उनके धर्म का लोप तो नहीं हो रहा है ? परंतु दूसरे ही पल वे सोचने लगते कि उन्हें देखकर भी उनके मन में किसी प्रकार के काम भाव उत्पन्न नहीं हो रहे हैं ।

वे तो बालब्रह्यचारी हैं और सदैव सात्विक विचारों को धारण करने वाले हैं । तभी उन्हें श्रीराम का ध्यान आया तो उनके मन का सारा मैल धुल गया । वे एक महल से दूसरे और दूसरे से तीसरे में होकर घूमते रहे । परंतु उन्हें कहीं भी सीता मैथ्या के दर्शन नहीं हुए ।

उन्होंने रावण द्वारा कुबेर से छीना हुआ ‘पुष्पक विमान’ भी देखा और उसकी भव्यता तथा शिल्प को देखकर वे चकित रह गए । एक बार उनके मन में आया कि वे रावण को सोते से उठाकर मार डालें और उसके शव को ले जाकर श्रीराम के चरणों में डाल दें ।

लेकिन इससे प्रभु श्रीराम का कार्य तो पूर्ण नहीं हो पाएगा । ऐसा सोचते हुए वे वहां भटक रहे थे । तभी उनकी दृष्टि एक ऐसे भवन पर पड़ी जिसकी बुर्जी पर चक्र लगा हुआ शोभा पा रहा था और दीवारों पर जगह-जगह प्रभु श्रीराम लिखा हुआ था ।

उसके चारों ओर वाटिका में सुंदर फूल खिले हुए थे और एक मंदिर भी वहां था । उस मंदिर में चतुर्भुज विष्णु और महालक्ष्मी की मूर्तियां विराजमान थीं । हनुमान जी सोच में पड गए कि इस राक्षस नगरी में भगवान विष्णु का भक्त यह वैष्णव कौन है ?

उसी समय भवन के भीतर से किसी के उठने और भगवान श्रीराम की स्तुति के स्वर सुनाई दिए । हनुमान जी ने सोचा कि यह अवश्य श्रीराम का कोई भक्त है । इससे मिलना चाहिए । हनुमान जी ने तत्काल एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और महल के द्वार पर जाकर ‘जय श्रीराम’ का उद्‌घोष किया ।

उस उद्‌घोष को सुनकर राजसी वस्त्रों में एक सौम्य आकृति वाले भद्र पुरुष ने द्वार खोला और कहा, ”विप्रवर ! आपका स्वागत है । मेरे अहोभाग्य, जो आज प्रात: वेला में मुझे आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कृपा अपना परिचय दें ।”

हनुमान जी ने कहा, ”हे भद्र पुरुष ! मैं दशरथ नंदन श्रीराम का दूत और किष्किंधा नरेश सुग्रीव का सेवक हनुमान हूं और इस राक्षस नगरी में श्रीराम के भक्त को देखकर आश्चर्यचकित हूँ ।”  हनुमान जी का परिचय पाकर उस भद्र पुरुष के चेहरे पर हर्ष छा गया । वह बोला, ”मेरे आराध्यदेव श्रीराम के आप दूत हैं, यह जानकर मेरा हृदय गद्‌गद हो उठा है ।

हे हनुमान जी! मैं लंकेश्वर रावण का छोटा भाई विभीषण हूं । मेरा एक भाई कुम्भकरण सदैव सोता रहता है और मेरे अग्रज लंकेश्वर रावण और उनके पुत्र मेघनाद सदैव युद्धरत रहते हैं । इसलिए राज्य का सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही रहता है ।”

”हे असुरश्रेष्ठ आप श्रीराम के भक्त हैं ।” हनुमान जी ने हर्षित होकर कहा, ”परंतु आपका भाई रावण तो उनका वैरी है । उसने दण्डकारण्य से उनकी धर्मपत्नी सीता जी का अपहरण किया है और यहां लंका में उन्हें रखा है । मैं उन्हीं की खोज में यहां आया हूं ।” ऐसा कहकर वे अपने असली रूप में आ गए ।

”हे वानरराज! मैं तो आपको देखते ही समझ गया था कि यह ब्राह्मण वेश आपका असली रूप नहीं है ।” विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”आपके इस रूप को देखकर मेरा मन हर्ष से भर उठा है । मैंने सुना है कि श्रीराम तो परमब्रह्म श्री विष्णु जी के अवतार हैं । आज मुझे आपके दर्शन हुए हैं तो शीघ्र ही उनके भी दर्शन होंगे ।”

”विभीषण जी! श्रीराम तो भक्तवत्सल, दयास्मिघु और सबके तारनहार हैं । मैं उन्हीं की कृपा से यह सौ योजन समुद्र लाघकर यहीं तक आया हू । क्या आप मुझे सीता मैथ्या का पता बताने की कृपा करेंगे ?” हनुमान जी ने उनसे पूछा, ”साथ ही मुझे यह आश्चर्य भी है कि आप यहां अपने अग्रज के शत्रु श्रीराम का नाम लेकर कैसे रह पाते हैं ?”

वीर शिरोमणि विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”वानरेन्द्र यह मेरे भ्राताश्री की विवशता है, जो वे मेरे किसी कार्य में व्यवधान नहीं डालते । मैंने आपको बताया तो था कि उनके पीछे लंका की देखभाल का दायित्व मुझ पर ही रहता है । इसीलिए वे मुझसे कुछ नहीं कहते । अब आप सुनें कि सीता जी को भ्राताश्री ने कहां रखा हुआ है ।

उन्हें यह शाप है कि वे किसी भी स्त्री से बलात्कार नहीं कर सकते । यदि ऐसा उन्होंने किया तो उसी समय उनकी मृत्यु हो जाएगी । इसीलिए पतिव्रता देवी सीता को उन्होंने अपने महल के निकट अशोक वाटिका में रखा है । वहां वे अत्यत साधारण वस्त्रों में चिंतातुर होकर एक विशाल वट वृक्ष के नीचे रहती हैं ।

परंतु उनसे भेंट करना सहज नहीं है । क्योंकि उन्हें हर समय दुर्दांत राक्षसियां घेरे रहती हैं । भ्राताजी जब कभी उनके पास उन्हें मनाने और धमकाने जाते हैं, तब वे अपनी भार्या मंदोदरी के साथ ही वहां जाते हैं । आप यदि सीता जी से मिलना चाहते हैं तो आपको छिपकर ही वहां जाना होगा । क्योंकि पूरी अशोक वाटिका में भयानक और शक्तिशाली राक्षसों का पहरा रहता है ।”

हनुमान जी ने विभीषण को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोले, ”राक्षसेश्वर विभीषण जी ! अब आप मुझे आज्ञा दीजिए । मैं सीता मैथ्या से भेंट कर लूंगा और यहां से लौटकर भक्तवत्सल श्रीराम को आपके विषय में पूरे विस्तार से बताऊंगा ।”

”जाओ हनुमान!” विभीषण ने मुस्कराकर कहा, ”मेरे विषय में उन्हें तभी बताना जब आप उनके कार्य को पूरा करके पूरा संदेश उन्हें दे चुके । वह भी तब, जब वे पूरी तरह शांत हों । मैं तो बार-बार यही सोचकर शंकित हूं कि क्या वे मुझ जैसे राक्षस को अपने चरणों में स्थान देंगे ।”

”क्यों नहीं देंगे ।” हनुमान जी शीघ्रता से बोले, ”वे तो करुणा के सागर हैं । जो भी निश्छल हृदय से उनका स्मरण करता है, उसे वे अपने हृदय में स्थान देते हैं । जब मुझ जैसे अधम वानर को उन्होंने इतना सम्मान दिया है, तो वे आपको क्यों नहीं अपनाएंगे? वे जरूर आपसे मैत्री करके अपना मैत्री धर्म निबाहेंगे ।” ऐसा कहकर हनुमान जी तेजी से अशोक वाटिका की ओर चले गए ।